आज 13 जुलाई है! ये वो तारीख है जिसे इस देश के गद्दार राजनेताओं, कश्मीर के उन अलगाववादी परिवारों और पूरे के पूरे इस्लामिक इकोसिस्टम ने दशकों तक हमारे मुंह पर ‘शहीद दिवस’ (Martyrs’ Day) का ठप्पा लगाकर मारा।
सालों तक इस दिन कश्मीर में सरकारी छुट्टी मनाई जाती रही, खून बहाने वालों की कब्रों पर फूल चढ़ाए जाते रहे।
लेकिन आज इस देश के हर एक सनातनी को, हर एक हिंदू को उस खौफनाक झूठ से पर्दा उठाना ही होगा। आज कोई शहादत का दिन नहीं है।
आज कश्मीरी हिंदुओं, हमारे कश्मीरी पंडित भाई-बहनों के लिए ‘ब्लैक डे’ (Black Day) है।
ये वो काला और मनहूस दिन है जब कश्मीर की उस जन्नत जैसी घाटी में पहली बार जिहादी आतंकवाद का वो नंगा नाच शुरू हुआ था, जिसने आगे चलकर हमारी पीढ़ियों को अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया।
हम सबने 1990 का कश्मीरी पंडितों का वो खौफनाक नरसंहार देखा है, हमने ‘द कश्मीर फाइल्स’ में वो चीखें सुनी हैं। लेकिन दोस्तों, 1990 तो उस खूनी ड्रामे का सिर्फ एक क्लाइमेक्स (Climax) था।
उस दर्दनाक फिल्म का असली ट्रेलर, उस नरसंहार की असली खूनी नींव आज ही के दिन 1931 में रखी गई थी।
ये वो दिन था जब पहली बार कश्मीर के निहत्थे पंडितों को ये एहसास कराया गया था की अगर तुम इस घाटी में काफिर (हिंदू) बनकर जियोगे, तो तुम्हारी औरतों, तुम्हारे घरों और तुम्हारी जान की कोई कीमत नहीं होगी।
ये लेख उन सेक्युलर हरामखोरों के गाल पर एक करारा तमाचा है जिन्होंने दशकों तक उन जिहादी कातिलों को ‘शहीद’ बताकर हमारे कश्मीरी पंडितों के बहते हुए खून का सरेआम मज़ाक बनाया।
1931 में कश्मीर में अब्दुल कदीर का वो खौफनाक जिहादी भाषण और हिंदू डोगरा राजा के खिलाफ रची गई इस्लामिक बगावत की साज़िश
अब ज़रा इतिहास के उस पन्ने को पलटते हैं जिसे सेक्युलर कीड़ों ने बहुत ही चालाकी से छुपा लिया था।
1931 का वो दौर था जब पूरे देश में अंग्रेज़ों का राज था, लेकिन कश्मीर उस वक्त एक रियासत हुआ करती थी। और कश्मीर के तख्त पर एक बेहद प्रतापी और स्वाभिमानी हिंदू सम्राट- डोगरा राजा महाराजा हरि सिंह विराजमान थे।
यही वो सबसे बड़ी बात थी जो इन जिहादियों की आंखों में सालों से एक कांटे की तरह चुभ रही थी। एक मुस्लिम बहुल इलाके में एक सनातनी राजा का डंके की चोट पर राज करना इनके उस ‘गज़वा-ए-हिंद’ वाले एजेंडे के बिल्कुल खिलाफ था।
ये लोग किसी भी तरह से उस हिंदू डोगरा राज को उखाड़ फेंकना चाहते थे ताकि कश्मीर को एक विशुद्ध ‘इस्लामिक स्टेट’ बनाया जा सके।
बस इन्हें एक चिंगारी की ज़रूरत थी, और वो चिंगारी लेकर आया एक बाहरी अफगानी आदमी, जिसका नाम था- ‘अब्दुल कदीर’।
अब्दुल कदीर कोई कश्मीरी नहीं था, वो एक अंग्रेज़ अफसर का बावर्ची बनकर कश्मीर आया था। लेकिन उसके दिमाग में वही जिहादी ज़हर भरा हुआ था।
जून 1931 में श्रीनगर के ‘खानकाह-ए-मौला’ में मुसलमानों की एक भारी भीड़ इकट्ठी हुई थी।
वहां इस अब्दुल कदीर ने मंच पर खड़े होकर एक ऐसा ज़हरीला और भड़काऊ भाषण दिया जिसने कश्मीर की फिज़ाओं में आग लगा दी।
उसने खुलेआम वहां मौजूद मुसलमानों को उकसाया की एक हिंदू राजा के खिलाफ बगावत कर दो, डोगरा पुलिस के टुकड़े-टुकड़े कर दो और इस राज को मिटा दो।
ज़रा सोचिए इस मक्कारी को! इस पूरे के पूरे सेक्युलर इकोसिस्टम ने बाद में किताबों में लिखवा दिया की ये तो कश्मीरियों की ‘लोकतांत्रिक आज़ादी’ की लड़ाई थी।
अरे भाई, खाक आज़ादी की लड़ाई थी! ये कोई लोकतंत्र के लिए नहीं लड़े जा रहे थे, ये सीधे-सीधे एक हिंदू राजा को मारकर वहां शरिया थोपने का खौफनाक जिहादी षड्यंत्र था।
जब अब्दुल कदीर ने ये ज़हर उगला, तो डोगरा प्रशासन ने बिल्कुल सही एक्शन लिया। पुलिस ने उस जिहादी को देशद्रोह और बगावत के जुर्म में तुरंत गिरफ्तार कर लिया और उस पर मुकदमा (Trial) चलाने की तैयारी शुरू कर दी।
श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर 13 जुलाई का वो खूनी तांडव और जिहादियों का एनकाउंटर, जिसे ‘शहादत’ का नाम दे दिया गया
अब्दुल कदीर की गिरफ्तारी के बाद पूरे कश्मीर के कट्टरपंथियों में बौखलाहट मच गई। अब आती है 13 जुलाई 1931 की वो खौफनाक तारीख।
प्रशासन को पता था की अगर अब्दुल कदीर का ट्रायल खुली अदालत में हुआ, तो ये जिहादी भीड़ वहां दंगा कर सकती है। इसलिए डोगरा सरकार ने फैसला किया की कदीर का ट्रायल श्रीनगर की सेंट्रल जेल के अंदर ही होगा।
लेकिन इन कट्टरपंथियों ने पहले से ही खौफनाक साज़िश रच रखी थी। 13 जुलाई को जब जेल के अंदर ट्रायल चल रहा था, तब बाहर हज़ारों की तादाद में एक बेहद खूंखार और बेलगाम जिहादी भीड़ इकट्ठी हो गई।
ये कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी नहीं थे जो वहां मोमबत्तियां लेकर खड़े थे। ये वो हिंसक भीड़ थी जिसकी आंखों में खून उतरा हुआ था।
जैसे ही दोपहर की नमाज़ का वक्त हुआ, उस भीड़ ने अचानक से सेंट्रल जेल के दरवाज़ों पर धावा बोल दिया। भीड़ ने जेल के फाटक तोड़ने शुरू कर दिए।
उन्होंने वहां तैनात डोगरा पुलिस और सैनिकों पर जानलेवा हमला कर दिया। ये दंगाई पुलिस वालों से उनकी बंदूकें और हथियार छीनने लगे।
अरे भाई, जब कोई हज़ारों की हिंसक भीड़ किसी जेल को तोड़ने लगे और पुलिस के हथियार छीनने लगे, तो दुनिया की कोई भी पुलिस क्या करेगी? क्या वो उन्हें बिरयानी परोसेगी?
अपनी जान, जेल की सुरक्षा और रियासत के कानून को बचाने के लिए डोगरा पुलिस के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा था।
पुलिस ने उस दंगाई भीड़ पर सीधे फायरिंग खोल दी। गोलियों की उस तड़तड़ाहट में 22 दंगाई और जिहादी वहीं सेंट्रल जेल के बाहर मारे गए।
अब ज़रा इस देश के सेक्युलर सिस्टम का सबसे सड़ा हुआ और घिनौना चेहरा देखिए। जिन गुंडों ने जेल तोड़ने की कोशिश की, जो एक क्रिमिनल को छुड़ाने के लिए पुलिस पर हमला कर रहे थे, उन्हें कश्मीर के गद्दार नेताओं (जैसे शेख अब्दुल्ला के खानदान) ने बाद में ‘शहीद’ (Martyrs) का दर्ज़ा दे दिया!
क्या दुनिया के किसी भी देश में पुलिस पर हमला करने वाले आतंकवादियों और गुंडों को शहीद कहा जाता है?
लेकिन कश्मीर में यही दोगलापन दशकों तक चलता रहा और 13 जुलाई को इन्हीं दंगाइयों की याद में सरकारी छुट्टी मनाई जाती रही।
ये हमारे मुंह पर, हमारे इतिहास पर मारा गया सबसे भद्दा तमाचा था।
13 जुलाई की ‘बाटा लूट’, वो ‘काला दिन’ जब जिहादियों ने निहत्थे कश्मीरी पंडितों के घरों को जलाकर रखी हिन्दुओं के नरसंहार की नींव
लेकिन 13 जुलाई की उस फायरिंग के बाद जो हुआ, वो इस इतिहास का सबसे दर्दनाक और सबसे खौफनाक हिस्सा है, जिसे हर हिंदू को जानना चाहिए।
जब जेल के बाहर पुलिस ने फायरिंग की और वो जिहादी भीड़ वहां से तितर-बितर हुई, तो उनका सारा गुस्सा, सारी बौखलाहट और वो सारा मज़हबी ज़हर उन निहत्थे कश्मीरी पंडितों पर फूट पड़ा जिनका उस पूरे ट्रायल से कोई लेना-देना ही नहीं था।
जेल से भागी हुई वो खूंखार भीड़ सीधे श्रीनगर के हिंदू बहुल इलाकों में घुस गई। महाराज गंज, विचारनाग और अमीराकदाल जैसे इलाके जहां हमारे कश्मीरी पंडित भाई शांति से अपना जीवन बिता रहे थे, वहां इन जिहादियों ने अचानक हमला बोल दिया।
इसे कश्मीर के इतिहास में ‘बाटा-लूट’ (Bata-Loot) कहा जाता है। ‘बाटा’ मतलब पंडित और ‘लूट’ मतलब डकैती और तबाही। यानी कश्मीरी पंडितों का वो सरेआम चीरहरण जिसे रोकने वाला उस वक्त वहां कोई नहीं था।
इन जिहादियों ने हिंदू दुकानों के ताले तोड़ दिए, करोड़ों की हिंदू संपत्तियों को आग लगा दी। जो भी कश्मीरी पंडित रास्ते में मिला, उसे बेरहमी से लाठियों और चाकुओं से पीटा गया।
हमारी बहन-बेटियों की इज़्ज़त पर सरेआम हाथ डाला गया। उनके घरों में घुसकर उनके पुश्तैनी जेवर और सामान लूट लिए गए।
उस खौफनाक दिन इस जिहादी तांडव में 3 निर्दोष कश्मीरी हिंदुओं को सरेआम बीच सड़क पर काट डाला गया और सैकड़ों हिंदुओं को अधमरा कर दिया गया।
ज़रा सोचिए उस खौफ को! जो पंडित अपने ही घर में आराम से बैठा था, उसे सिर्फ इसलिए लूट लिया गया, सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वो एक हिंदू था।
ये कश्मीर का पहला संगठित और वेल-प्लांड सांप्रदायिक नरसंहार था। ये कोई पुलिस के खिलाफ गुस्सा नहीं था, ये सीधे-सीधे उस एजेंडे का हिस्सा था जिसमें कश्मीरी पंडितों को ये एहसास कराना था की “इस घाटी में हमारी भीड़ का राज चलेगा, और तुम काफिरों को हमारे जूतों के नीचे रहना होगा।”
13 जुलाई को जो कश्मीरी पंडितों के घरों से धुआं उठा था, उसी धुएं ने आगे चलकर 1990 के उस भयानक तूफान का रूप लिया जिसने हमारे लोगों को हमेशा के लिए बेघर कर दिया।
ये वो ‘ब्लैक डे’ है जिसके एक-एक कतरे का हिसाब इतिहास आज भी मांग रहा है।
1931 से लेकर 1990 तक एक ही जिहादी स्क्रिप्ट, ‘रलिव गलिव या चलिव’ के वो नफरती बीज जो 13 जुलाई को बोए गए थे
अगर आज भी किसी भोले-भाले हिंदू को लगता है की 1990 में कश्मीर घाटी से जो लाखों कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, वो कोई अचानक भड़की हुई आग थी, तो वो बहुत गहरे अंधेरे में जी रहा है।
अरे भाई, 1990 में तो सिर्फ उस पेड़ के ज़हरीले फल काटे गए थे, उस नफरत के पेड़ का असली बीज तो 13 जुलाई 1931 को ही बो दिया गया था।
ज़रा 1990 की उस खौफनाक जनवरी की रात को याद कीजिए। जब कश्मीर की मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से चीख-चीख कर ऐलान किया जा रहा था की “कश्मीरी पंडितो, अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ और घाटी से भाग जाओ।”
वो जो नारा था ना- ‘रलिव, गलिव या चलिव’ (यानी इस्लाम कबूल करो, मरो या भाग जाओ)- उस नारे की सबसे पहली और सबसे खौफनाक रिहर्सल 13 जुलाई 1931 को ही कर ली गई थी।
1931 के उस ‘बाटा-लूट’ (पंडितों की लूट) वाले दिन इन जिहादियों ने सिर्फ दुकानें नहीं जलाई थीं, इन्होंने उस इलाके के कश्मीरी पंडितों के दिमाग में एक ऐसा खौफ पैदा कर दिया था जो पीढ़ियों तक उनके सीने में बसा रहा।
उस दिन कश्मीर के हर एक हिंदू को ये एहसास करा दिया गया था की तुम चाहे कितने भी पढ़े-लिखे हो, तुम चाहे कितने भी शांतिप्रिय हो, लेकिन जब मज़हब के नाम पर ये जिहादी भीड़ सड़कों पर उतरेगी, तो तुम्हारा कोई सगा पड़ोसी भी तुम्हें बचाने नहीं आएगा।
जो लोग कश्मीरी पंडितों के साथ सालों से उठते-बैठते थे, जिन लोगों ने उनके हाथों से दवाइयां खाई थीं, उन्हीं पड़ोसियों ने 13 जुलाई को दंगाई भीड़ को बताया था की “देखो, ये हिंदू का घर है, इसे लूट लो।”
ये जो पीठ में छुरा घोंपने वाली फितरत है ना, ये एक दिन में नहीं आती। ये वो जिहादी स्क्रिप्ट है जो पीढ़ियों से इनके दिमाग में फीड की जा रही है।
1931 की वो लूट और वो कत्लेआम महज़ एक ट्रेलर था। उस दिन इन कट्टरपंथियों ने डोगरा राज की ताकत का अंदाज़ा लगाया था।
जब इन्होंने देखा की 3 कश्मीरी हिंदुओं को सरेआम काटने और करोड़ों की संपत्तियां जलाने के बाद भी इनका पूरा मजहबी और सेक्युलर इकोसिस्टम इन्हें बचाने आ जाता है, तो इनके हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए।
इसी 13 जुलाई के ब्लैक डे ने उस खौफनाक जिहादी आतंकवाद को जन्म दिया, जिसने धीरे-धीरे घाटी के चप्पे-चप्पे में अपनी जड़ें फैला लीं और आखिरकार हमारे लाखों सनातनी भाई-बहनों को उनके ही पुश्तैनी घरों से उखाड़ फेंका।
कातिलों को शहीद बताने वाला वो गद्दार जिहादी इकोसिस्टम और मोदी सरकार का वो ऐतिहासिक हथौड़ा जिसने इस झूठे जश्न को कुचल दिया
अब ज़रा इस देश के उस सड़े हुए और दोगले इस्लामिक इकोसिस्टम का नंगा सच देखिए, जिसने हमारे कश्मीरी पंडितों के ज़ख्मों पर दशकों तक नमक छिड़कने का काम किया।
13 जुलाई 1931 को जिन 22 गुंडों और दंगाइयों को डोगरा पुलिस ने जेल तोड़ते वक्त गोलियों से भूना था, उन्हें कश्मीर के गद्दार नेताओं ने रातों-रात ‘हीरो’ बना दिया।
शेख अब्दुल्ला हो या बाद में मुफ्ती खानदान, इन सभी अलगाववादी सोच वाले नेताओं ने अपनी पूरी की पूरी राजनीतिक दुकान इन्हीं 22 जिहादी दंगाइयों की लाशों पर खड़ी की।
बड़ी बेशर्मी से 13 जुलाई को कश्मीर के अंदर ‘शहीद दिवस’ (Martyrs’ Day) घोषित कर दिया गया। अरे लानत है ऐसे सिस्टम पर!
जो लोग एक हिंदू राजा के खिलाफ बगावत कर रहे थे, जो पुलिस के हथियार छीनने आए थे, जो बाद में जाकर कश्मीरी पंडितों की दुकानों को लूट रहे थे- वो शहीद कैसे हो गए?
क्या इस देश में शहादत की परिभाषा ये जिहादी भीड़ तय करेगी?
हद तो तब हो गई जब जम्मू-कश्मीर में हर साल 13 जुलाई को बाकायदा सरकारी छुट्टी मनाई जाने लगी।
हमारे और आपके खून-पसीने के टैक्स के पैसों से, सरकारी खज़ाने से इन कातिलों की कब्रों पर मुख्यमंत्री और मंत्री जाकर फूल चढ़ाते थे और 21 तोपों की सलामी दी जाती थी।
ज़रा सोचिए उन कश्मीरी पंडितों के दिलों पर क्या बीतती होगी, जिनके बाप-दादाओं को इन्हीं गुंडों ने बेरहमी से मारा था, और वही कश्मीरी पंडित अपने ही टैक्स के पैसों से अपने कातिलों को शहीद का दर्ज़ा मिलते हुए देख रहे थे!
ये एक ऐसा ज़हरीला तमाचा था जो भारत का वो सेक्युलर सिस्टम हर साल कश्मीर के हिंदुओं के गाल पर मारता था।
लेकिन कहते हैं ना की पाप का घड़ा एक दिन ज़रूर फूटता है। और वो दिन आया जब केंद्र में मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को मलबे में तब्दील कर दिया।
दिसंबर 2019 का वो ऐतिहासिक महीना कोई सच्चा सनातनी नहीं भूल सकता। जम्मू-कश्मीर के उस नए प्रशासन ने बिना किसी सेक्युलर झिझक के वो कर दिखाया जिसका इंतज़ार कश्मीरी पंडित 8 दशकों से कर रहे थे।
सरकार ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “अब से 13 जुलाई को कोई शहीद दिवस नहीं मनाया जाएगा।” उस सरकारी छुट्टी को कैलेंडर से फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया गया।
उन 22 जिहादी दंगाइयों की कब्रों पर जो सरकारी पैसा लुटाया जाता था, वो पूरी तरह से बंद कर दिया गया।
ये मोदी सरकार का वो खौफनाक हथौड़ा था जिसने अब्दुल्ला और मुफ्ती जैसे गद्दार परिवारों के उस झूठे जश्न को जूतों तले कुचल कर रख दिया।
ये कश्मीरी पंडितों के उस रिसते हुए ज़ख्म पर लगाया गया सबसे बड़ा मरहम था, जिसने इस पूरे लिबरल और अलगाववादी इकोसिस्टम की चीखें निकाल दीं।
हमें इस 13 जुलाई के काले सच को सिर्फ एक तारीख समझकर भूल नहीं जाना है। आज 13 जुलाई है! आज ही के दिन हमारे पूर्वजों ने, हमारे सनातनी कश्मीरी पंडितों ने उस जिहादी आतंकवाद का वो पहला डंक झेला था, जिसका ज़हर आज भी कश्मीर में फैला हुआ है।
ये दिन हमें ये याद दिलाता है की अगर हम ‘भाईचारे’ की उस झूठी नींद में सोते रहे, तो कल कोई भी अब्दुल कदीर जैसा जिहादी किसी भी मस्जिद से भीड़ को भड़का कर हमारे घरों पर हमला करवा सकता है।
जिस ज़मीन को महर्षि कश्यप ने बसाया था, जिस ज़मीन पर शारदा पीठ और अमरनाथ जैसे साक्षात देव विराजमान हैं, वो ज़मीन सिर्फ और सिर्फ सनातनियों की है और कयामत तक रहेगी। उस पर इन जिहादियों का कोई हक नहीं है।
हर हर महादेव!
