हर साल 15 अगस्त को हम आज़ादी का जश्न मनाते हैं, ढोल-नगाड़े बजाते हैं और मिठाइयां बांटते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं की उस तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ आज़ादी की कीमत इस देश की किन मां-बहनों ने अपने खून और अपनी आबरू से चुकाई थी।
अगस्त 1947 का वो महीना हिंदू और सिख इतिहास का सबसे खौफनाक, सबसे खूनी और सबसे क्रूर कत्लेआम था। पश्चिमी पंजाब (लाहौर, मुल्तान, रावलपिंडी और शकरगढ़) के उस खौफनाक मंज़र को याद कीजिए।
वो ज़मीन जो कभी हमारे पूर्वजों की थी, वहां अचानक से रातों-रात जिहादियों की खूंखार भीड़ सड़कों पर उतर आई थी।
इन जिहादियों के हाथ में तलवारें थीं, भालें थीं और दिल में हिंदुओं और सिखों के लिए वो ज़हर था जो कभी मिट नहीं सकता। हमारे बुजुर्गों को बेरहमी से काटा जा रहा था, लेकिन सबसे भयानक गुज़र रही थी हमारी बहन-बेटियों पर।
इतिहास के आंकड़े गवाही देते हैं की उन चंद हफ्तों के अंदर पाकिस्तान के उन इलाकों से 20,000 से ज़्यादा हिंदू और सिख महिलाओं और मासूम बच्चियों का इन जिहादी भेड़ियों ने अपहरण कर लिया था!
जी हां, 20 हज़ार बेटियां! उन्हें उनके घरों से बालों से घसीट कर निकाला गया। उनके पिताओं और भाइयों को उनके ही सामने काट दिया गया!
और उन मासूम बेटियों को गुलाम बनाकर जिहादियों के घरों और मंडियों में जानवरों की तरह बेचा जाने लगा। उनका सरेआम चीरहरण हो रहा था, उन्हें ज़बरदस्ती धर्म बदलने पर मजबूर किया जा रहा था।
और उस वक्त दिल्ली में क्या हो रहा था? दिल्ली में आज़ादी के जश्न की तैयारियां चल रही थीं। सत्ता के नशे में चूर उस वक्त की कांग्रेसी सरकार सिर्फ ‘शांति’ और ‘भाईचारे’ की कागज़ी अपीलें कर रही थी।
पाकिस्तान की उस नई-नवेली कट्टरपंथी सरकार को दिल्ली से खत लिखे जा रहे थे की “कृपा करके हमारी औरतों को वापस कर दो।”
अरे भाई! जिन दरिंदों के मुंह में हमारी बहन-बेटियों का खून लग चुका हो, क्या वो किसी खत या अपील से रुकने वाले थे? दिल्ली की वो कायर खामोशी उन 20 हज़ार बेटियों के लिए मौत के फरमान से कम नहीं थी।
अपनी ही सेना की बेबसी और कूटनीति का जाल, जब हिंदू और सिख बहनों को बचाने के लिए पाकिस्तान में घुसने से कांप रही थी भारत सरकार
अब एक आम हिंदुस्तानी के दिमाग में ये सवाल ज़रूर आएगा की जब हमारी 20 हज़ार बेटियां वहां जिहादियों के चंगुल में तड़प रही थीं, तो भारत सरकार ने अपनी सेना (Indian Army) को वहां क्यों नहीं भेजा?
क्या हमारी सेना कमज़ोर थी? क्या हमारे जवानों के खून में उबाल नहीं था?
अरे भाई, हमारे जवानों का खून तो खौल रहा था! सरहद के इस पार खड़े भारतीय सैनिक और पुलिस वाले अपनी ही आंखों के सामने उस पार से आ रही चीखें सुन रहे थे।
वो देख रहे थे की कैसे हमारी मां-बहनों की इज़्ज़त लूटी जा रही है। वो अपनी राइफलें तान कर खड़े थे, उनके आंसू बह रहे थे, लेकिन वो सरहद पार नहीं कर सकते थे।
क्यों? क्योंकि इस देश के राजनेताओं ने उनके हाथ ‘कानून’ और ‘कूटनीति’ (Diplomacy) की ज़ंजीरों से बांध दिए थे।
असल में, रेडक्लिफ लाइन खिंच चुकी थी। पाकिस्तान अब भारत का हिस्सा नहीं, बल्कि एक अलग और संप्रभु (Sovereign) देश बन चुका था।
अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से अगर भारत सरकार आधिकारिक तौर पर अपनी सेना को वर्दी पहनाकर पाकिस्तान की सीमा में भेजती, तो उसे एक ‘आधिकारिक युद्ध’ (Official War) माना जाता।
यूनाइटेड नेशंस (UN) और दुनिया भर के देश भारत को एक आक्रामक देश घोषित कर देते। और उस वक्त की नई-नवेली नेहरू की कांग्रेस सरकार इस कूटनीतिक पचड़े में पड़ने से थर-थर कांप रही थी।
सरकार कांप रही थी, सेना लाचार थी, और उस पार हमारी बेटियां ज़िंदा नरक भोग रही थीं। रोज़ नई खबरें आती थीं की आज फलां गांव से 100 लड़कियों को अगवा कर लिया गया, आज फलां कुएं में 50 हिंदू औरतों ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए छलांग लगाकर जान दे दी।
पूरा का पूरा हिंदू और सिख समाज खून के आंसू रो रहा था। हर किसी को लग रहा था की अब शायद वो 20 हज़ार बेटियां कभी वापस भारत की ज़मीन नहीं देख पाएंगी।
उन्हें उन जिहादी दरिंदों के रहमो-करम पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था।
रक्षा मंत्री बलदेव सिंह की वो गुप्त गुहार और सरदार पटेल का सीक्रेट प्लान, जब बेटियों को बचाने के लिए ‘RSS’ को सौंपा गया मिशन
लेकिन कहते हैं ना की जब चारों तरफ अंधेरा छा जाता है, जब सरकारें और सिस्टम घुटने टेक देते हैं, तब इस सनातन मिट्टी से कोई ना कोई रक्षक ज़रूर पैदा होता है।
भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह एक बहुत ही सच्चे और ज़मीनी नेता थे। जब उन्होंने देखा की सेना कुछ नहीं कर सकती और हमारी सिख और हिंदू बेटियों का वो दर्दनाक चीरहरण हो रहा है, तो उनकी आत्मा छटपटा उठी।
उन्होंने तय किया की अगर सेना नहीं जा सकती, तो क्या हुआ, इस देश में कोई तो होगा जो अपनी जान पर खेलकर उन बेटियों को वापस लाएगा।
सितंबर 1947 में सरदार बलदेव सिंह ने भारत के ‘लौह पुरुष’ और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ एक बेहद गुप्त और खौफनाक मीटिंग की।
इस सीक्रेट मीटिंग में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे। इन तीनों राष्ट्रवादी शेरों ने मिलकर एक ऐसा प्लान बनाया जिसका ज़िक्र आज तक सरकारी फाइलों में नहीं मिलता।
ये तय हुआ की अगर सेना वर्दी में नहीं जा सकती, तो हमें एक ‘नॉन-स्टेट एक्टर’ (Non-State Actor) यानी आम नागरिकों के एक ऐसे संगठन को पाकिस्तान भेजना होगा, जिसके पास सेना जैसा कड़ा अनुशासन हो, जिसके रगों में भारत माता के लिए खून खौलता हो, और जो मौत को सामने देखकर भी अपनी पीठ ना दिखाए।
और उस वक्त पूरे भारत में सिर्फ और सिर्फ एक ही ऐसा संगठन था जो इस खौफनाक और नामुमकिन काम को कर सकता था- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)!
सरदार पटेल और बलदेव सिंह ने तुरंत आरएसएस के तत्कालीन सर-संघचालक गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) से संपर्क किया।
उन्होंने गुरुजी को पूरी स्थिति बताई और कहा की-
“हमें आपकी मदद चाहिए। ये एक ऐसा मिशन है जिसमें सरकार आपको कोई सपोर्ट नहीं दे सकती। अगर आपके लोग पकड़े गए, तो सरकार उन्हें पहचानने से इंकार कर देगी।”
अरे भाई, ज़रा संघ के उस राष्ट्रवाद को नमन कीजिए! गुरुजी ने एक सेकंड की भी देरी किए बिना इस खौफनाक ‘सुसाइड मिशन’ के लिए हामी भर दी।
संघ के लिए ये कोई राजनीतिक सौदा नहीं था, ये उन 20 हज़ार हिंदू-सिख बेटियों की गरिमा को बचाने का धर्मयुद्ध था।
संघ के बड़े अधिकारियों ने तुरंत पंजाब और उत्तर भारत की अपनी शाखाओं से सबसे चुनिंदा, सबसे मज़बूत और अपनी जान हथेली पर रखने वाले जांबाज स्वयंसेवकों को चुनना शुरू कर दिया।
ये वो शेर थे जिन्होंने तय कर लिया था की या तो वो अपनी बहनों को वापस लाएंगे, या फिर वहीं उस नापाक ज़मीन पर अपने प्राणों की आहुति दे देंगे।
सरहद पार जिहादियों के गढ़ में RSS के शेरों का खौफनाक सुसाइड मिशन, अपनी जान हथेली पर रखकर किया पाकिस्तान में प्रवेश
अब ज़रा इस मिशन के उस खौफनाक सच को समझने की कोशिश कीजिए जो किसी हॉलीवुड या बॉलीवुड की फिल्म से हज़ार गुना ज़्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
ये आरएसएस के वो युवा लड़के थे जिनकी उम्र 18 से 30 साल के बीच थी। इनके पास ना तो सेना जैसी बुलेटप्रूफ गाड़ियां थीं, ना ही कोई भारी तोपखाना।
इनके पास सिर्फ और सिर्फ अपनी देसी बंदूकें, तलवारें, लाठियां और सीने में धधकता हुआ सनातन का वो जज़्बा था जिसे दुनिया का कोई जिहादी नहीं हरा सकता।
इन स्वयंसेवकों ने अपनी पहचान छुपाई। कई लोगों ने पठानी सूट पहने, कई लोगों ने अपनी दाढ़ियां बढ़ाईं ताकि वो उस जिहादी भीड़ में घुल-मिल सकें।
और फिर रात के उस खौफनाक अंधेरे में, खुफिया और खतरनाक रास्तों से इन शेरों ने पाकिस्तान की उस सरहद में प्रवेश किया जहाँ एक हिंदू या सिख को देखते ही सीधे गोलियों से भून दिया जाता था।
लाहौर, शकरगढ़, सियालकोट, मुल्तान और गुजरांवाला! ये वो इलाके थे जो उस वक्त जिहादियों के सबसे खूंखार और मज़बूत गढ़ बन चुके थे।
इन इलाकों की गलियों में हिंदुओं का खून अभी भी ताज़ा था। संघ के इन जांबाजों ने वहां पहुंचकर अपने सीक्रेट ठिकाने बनाए।
उन्होंने उन दरिंदों के बीच रहकर, अपनी जान को हर पल दांव पर लगाकर ये जानकारी जुटाई की हमारी किन-किन हिंदू और सिख बेटियों को किन-किन हवेलियों, मदरसों और तहखानों में बंधक बनाकर रखा गया है।
ज़रा सोचिए इस पागलपन को! अगर इनमें से एक भी स्वयंसेवक पकड़ा जाता, तो उसे सीधा गोली नहीं मारी जाती। उसे चौराहों पर उल्टा लटका कर उसकी खाल उधेड़ी जाती।
उसके हाथ-पैर काटे जाते। ये पूरा का पूरा एक सुसाइड स्क्वाड (Suicide Squad) था। सरकार की तरफ से कोई बैकअप नहीं था।
अगर पुलिस या पाकिस्तानी सेना पकड़ लेती, तो भारत सरकार साफ मुकर जाती। लेकिन इन स्वयंसेवकों के चेहरे पर खौफ की एक लकीर तक नहीं थी।
उनका एक ही लक्ष्य था- उन तहखानों से आती हुई अपनी बहनों की उन चीखों को शांत करना और उन जिहादियों को उनकी ही भाषा में ये समझाना की अगर तुमने हिंदू की बेटी पर हाथ डाला है, तो तुम्हें पाताल से भी खींच कर तुम्हारी गर्दन मरोड़ी जाएगी।
लाहौर से लेकर रावलपिंडी तक, RSS स्वयंसेवको ने जिहादियों को चीरकर आजाद कराई हमारी बहन बेटियां, खून से लिखा गया वो सबसे बड़ा रेस्क्यू
जब आरएसएस के उन शेरों ने पाकिस्तान के खूंखार इलाकों में अपने सीक्रेट ठिकाने बना लिए, तो उसके बाद जो हुआ, वो इतिहास का वो खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाला तांडव था, जिसे सुनकर आज भी जिहादियों की रूह कांप जाती होगी।
ये कोई फिल्मों वाला सीधा-सादा रेस्क्यू नहीं था भाई! ये एक ऐसा महासंग्राम था जहाँ हर कदम पर मौत खड़ी थी और हर गली में जिहादी भेड़िए अपनी तलवारें लिए घूम रहे थे।
लाहौर, रावलपिंडी और सियालकोट की वो बड़ी-बड़ी हवेलियां और मदरसे, जहाँ हमारी हिंदू और सिख बेटियों को जानवरों की तरह जंजीरों में बांधकर रखा गया था, वहां रात के अंधेरे में संघ के इन जांबाजों ने सीधा धावा बोल दिया।
जब जिहादियों को लगा की ये निहत्थे हिंदू अब हमारा क्या बिगाड़ लेंगे, तब इन स्वयंसेवकों ने मौत का खौफ पीछे छोड़कर उन दरिंदों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया।
जिन दरवाज़ों के पीछे हमारी मां-बहनों का चीरहरण हो रहा था, संघ के शेरों ने उन दरवाज़ों को बारूद और लातों से तोड़कर ज़मीन पर गिरा दिया।
अंदर जो खौफनाक मंज़र था, वो किसी भी इंसान का दिल चीरने के लिए काफी था। हमारी बेटियां डरी-सहमी एक कोने में सुबक रही थीं।
जब उन्होंने अपने हिंदू और सिख भाइयों को देखा, तो उनकी आंखों से आंसुओं का जो सैलाब फूटा, वो इस देश के इतिहास का सबसे दर्दनाक पल था। उन स्वयंसेवकों ने अपनी बहनों के सिर पर हाथ रखा और दहाड़ते हुए कहा की “डरो मत, तुम्हारे भाई आ गए हैं।”
और फिर वहां जो जिहादियों से सीधा आमना-सामना हुआ, उसमें हमारे इन नौजवानों ने कोई अहिंसा का ज्ञान नहीं बांचा। जो जिहादी हमारी बेटियों की तरफ बढ़ा, उसे वहीं बीच हवेली में काट कर फेंक दिया गया।
लेकिन असली चुनौती तो उन महिलाओं को उस जिहादी गढ़ से निकालकर सुरक्षित भारत की सरहद तक लाना था।
ट्रकों में, ट्रेनों की टूटी हुई बोगियों में और रातों के अंधेरे में पैदल रास्तों से उन डरी-सहमी महिलाओं और छोटे-छोटे बच्चों को लेकर ये स्वयंसेवक भारत की तरफ निकले।
रास्ते में कई बार जिहादी भीड़ ने इन काफिलों पर जानलेवा हमले किए। गोलियों की बौछारें हुईं। लेकिन संघ के इन शेरों ने उन औरतों के चारों तरफ अपने सीनों की एक फौलादी दीवार बना ली थी।
इतिहास गवाह है की कई स्वयंसेवकों ने उन जिहादियों की गोलियां अपनी छाती पर खाईं। वो वहीं उस नापाक ज़मीन पर तड़प-तड़प कर शहीद हो गए, लेकिन मरते दम तक उन्होंने जिहादियों को हमारी एक भी बहन-बेटी को छूने तक नहीं दिया।
खून और बारूद की उस खौफनाक बारिश के बीच से, अपने ही साथियों की लाशों को पीछे छोड़कर, ये वीर 20 हज़ार से ज़्यादा हिंदू और सिख महिलाओं को सुरक्षित भारत की पवित्र ज़मीन पर ले आए।
ये दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे खौफनाक और सबसे कामयाब रेस्क्यू ऑपरेशन था!
प्रोफेसर ए एन बाली की किताब का वो आंखों देखा सच जब आरएसएस के स्वयंसेवकों ने जिहादियों का काल बनकर की थी रक्षा
अगर आज के दौर में कोई सेक्युलर कीड़ा या कांग्रेसी दरबारी आपसे सबूत मांगे की “अरे, आरएसएस ने आज़ादी के वक्त क्या किया था?”, तो उसे सीधा लाहौर के डीएवी (DAV) कॉलेज के प्रोफेसर ए.एन. बाली की वो ऐतिहासिक किताब- ‘Now It Can Be Told’ -उसके मुंह पर मार दीजिएगा।
प्रोफेसर बाली कोई संघ के प्रचारक नहीं थे, वो एक पढ़े-लिखे एकेडमिक इंसान थे जिन्होंने 1947 के उस खूनी मंज़र को अपनी आंखों से देखा था।
प्रोफेसर बाली ने अपनी किताब में डंके की चोट पर लिखा है की जब लाहौर और पश्चिमी पंजाब में जिहादी भीड़ हिंदुओं और सिखों को दर्दनाक तरीके से काट रही थी, तब वो सारे बड़े-बड़े कांग्रेसी नेता और सेक्युलर अफसर सबसे पहले अपनी जान बचाकर वहां से भाग खड़े हुए थे।
पुलिस और प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे। उस वक्त उन जलते हुए शहरों में, उन चीखते हुए मोहल्लों में सिर्फ और सिर्फ एक ही फोर्स थी जो मौत के सामने सीना तानकर खड़ी थी- और वो थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा लड़के!
बाली साहब लिखते हैं की इन लड़कों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मोहल्लों की पहरेदारी की। जब जिहादी भीड़ हमला करती थी, तो ये लड़के अपनी छतों से और गलियों के मोड़ों पर खड़े होकर उन्हें खदेड़ते थे।
और बात सिर्फ पाकिस्तान में लड़ने की नहीं थी भाई। जब वो कटे-पिटे, भूखे-प्यासे और लहूलुहान हिंदू-सिख शरणार्थी भारत की सीमा में दाखिल हुए, तो उनके लिए रिफ्यूजी कैंप किसने लगाए?
सरकार तो बस कागज़ों पर काम कर रही थी। उन कैंपों में घायलों के घावों पर मरहम लगाना, उनके लिए रसद और खाने का इंतज़ाम करना, और जो लोग रास्ते में शहीद हो गए थे उनका पूरे हिंदू और सिख रीति-रिवाज़ से अंतिम संस्कार करना- ये सब काम संघ के उन्हीं स्वयंसेवकों ने दिन-रात एक करके किया था।
उन लड़कों ने हफ्तों तक अपनी नींद त्याग दी थी। वो लाशें उठाते-उठाते थक जाते थे, लेकिन उनके चेहरों पर कभी कोई सिकन नहीं आई।
ये वो नंगा सच है जिसे इस देश के सेक्युलर सिस्टम ने बड़ी ही बेशर्मी से हमारी इतिहास की किताबों से मिटा दिया।
जिन शेरों ने 20 हज़ार बेटियों की इज़्ज़त बचाई, उन्हें नेहरू सरकार ने दिया बैन का इनाम, इतिहास की वो सबसे बड़ी कांग्रेसी गद्दारी
अब ज़रा इस पूरे खौफनाक ऑपरेशन के सबसे दर्दनाक और गद्दारी भरे हिस्से को समझिए।
जिन लड़कों ने बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी सरकारी सैलरी के, अपनी जान हथेली पर रखकर 20 हज़ार से ज़्यादा हिंदू और सिख बेटियों को जिहादियों के चंगुल से वापस निकाला, उन्हें क्या मिलना चाहिए था?
उन्हें परमवीर चक्र मिलना चाहिए था! उन्हें इस देश का असली हीरो घोषित किया जाना चाहिए था!
लेकिन उस वक्त दिल्ली के तख्त पर बैठी नेहरू सरकार ने उन शेरों के साथ क्या किया?
जिस सरकार ने अपनी लाचारी छुपाने के लिए संघ से गुप्त रूप से मदद मांगी थी, उसी सरकार ने सिर्फ चंद महीनों बाद आरएसएस के पीठ में खंजर घोंप दिया।
फरवरी 1948 में गांधी जी की हत्या का एक बहुत ही घटिया और झूठा बहाना बनाकर नेहरू सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बैन लगा दिया!
जी हां! जिन हाथों ने 20 हज़ार बेटियों की आबरू बचाई थी, उन्हीं हाथों में इस कांग्रेसी सरकार ने हथकड़ियां पहना दीं।
नेहरू सरकार ने उन हज़ारों जांबाज स्वयंसेवकों और संघ के अधिकारियों को बिना किसी सबूत के, बिना किसी ट्रायल के जेलों की काल कोठरियों में ठूंस दिया।
बेशर्म कांग्रेस ने उस सबसे बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन को ज़मीन में दफना दिया।
अब जिन गद्दारों ने हमारे रक्षकों को जेल में डाला और जिहादियों को गले लगाया, उनका पूरा का पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम हमें हमेशा-हमेशा के लिए मलबे में तब्दील करना होगा।
यही उन 20 हज़ार बेटियों के आंसुओं का, और उन शहीद स्वयंसेवकों के खून का असली इंसाफ होगा।
वंदे मातरम!
