अलाउद्दीन खिलजी एक ऐसा खूंखार दरिंदा था जिसकी पूरी ज़िंदगी सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं का खून पीने और हिन्दू बहन-बेटियों को मंडियों में बेचने में गुज़री।
1298-1299 ईस्वी के समय में जब दिल्ली के तख्त पर खिलजी बैठा था, तब उसे गुजरात की धन-दौलत और वहां के मंदिरों को लूटने की हवस सवार थी।
उसने अपने दो सबसे खूंखार और ज़ालिम सेनापतियों- उलूघ खान और नुसरत खान- को एक बहुत बड़ी जिहादी फौज देकर गुजरात (अन्हिलवाड़) पर हमला करने भेज दिया। इन दोनों जल्लादों ने गुजरात के हिंदू राजा कर्णदेव वाघेला को हराया। इसके बाद तो जैसे इन दरिंदों को हिंदुओं को काटने का खुला लाइसेंस मिल गया।
इन जिहादियों ने गांव के गांव जला दिए। लाखों निहत्थे हिंदुओं को बेरहमी से काट डाला। औरतों और मासूम बच्चों को जंजीरों में बांधकर गुलाम बना लिया गया ताकि उन्हें दिल्ली के बाज़ारों में टके-टके के भाव बेचा जा सके।
लेकिन इन राक्षसों की हवस और नफरत यहीं शांत नहीं हुई। इनका सबसे बड़ा टारगेट था हमारी आस्था का केंद्र- पवित्र सोमनाथ मंदिर! उलूघ खान की उस दरिंदी फौज ने हमारे सोमनाथ मंदिर पर धावा बोल दिया। हमारे पुजारियों को काटा गया और मंदिर को मलबे में तब्दील कर दिया गया।
इन मुस्लिम आक्रांताओं ने हमारे साक्षात सोमनाथ महादेव के उस विशाल और भव्य शिवलिंग को हथौड़ों से तोड़ डाला। और सिर्फ तोड़ा ही नहीं, इनकी नीचता तो देखिए!
इन्होंने उस शिवलिंग के टुकड़ों को गाड़ियों (छकड़ों) में लाद लिया ताकि इन पवित्र टुकड़ों को दिल्ली ले जाकर वहां की मस्जिदों की सीढ़ियों में चिनवा सकें, जहाँ मुसलमान रोज़ हमारे भगवान के ऊपर पैर रखकर नमाज़ पढ़ने जाएं।
ये हमारे पूरे सनातन धर्म के मुंह पर एक ऐसा तमाचा था जिसे मारकर ये जिहादी ठहाके लगा रहे थे। उन्हें लगा की अब इस भारतवर्ष में ऐसा कोई माई का लाल नहीं बचा जो मुगलों और सुल्तानों की इस विशाल फौज का रास्ता रोक सके।
लेकिन उन्हें नहीं पता था की राजस्थान की तपती रेत में उनका काल तलवार पर धार रख रहा था!
“मंदिर तोड़ने वाले जिहादियों को रास्ता नहीं दूंगा”, जालौर में हिन्दू शेर कान्हड़देव चौहान के हाथों मुगलों की बनी कब्र
गुजरात को लूटने के बाद उलूघ खान और नुसरत खान का घमंड सातवें आसमान पर था। उनके पास अथाह सोना-चांदी था, 20 हज़ार से ज़्यादा बेबस हिंदू कैदी थे जिन्हें रस्सियों से बांधा गया था, और सबसे बड़ा गुरूर ये था की उनके पास सोमनाथ महादेव के टूटे हुए टुकड़े थे।
उन्हें जल्दी से जल्दी दिल्ली पहुंचना था ताकि अपने आका अलाउद्दीन खिलजी के सामने ये लूट पेश कर सकें। दिल्ली जाने का सबसे छोटा और सुरक्षित रास्ता राजस्थान के जालौर (जिसे तब सोनगिरि कहा जाता था) से होकर गुज़रता था।
जालौर के उस अभेद्य दुर्ग में उस वक्त राजपूताने का एक ऐसा खूंखार शेर राज करता था, जिसकी रगों में साक्षात सम्राट पृथ्वीराज चौहान का खून उबल रहा था। उनका नाम था- राव कान्हड़देव चौहान (सोनगरा)। कान्हड़देव साक्षात भवानी के भक्त और सनातन के वो रक्षक थे जिनके नाम से ही दुश्मनों की पैंट गीली हो जाती थी।
उलूघ खान ने अपने अहंकार में चूर होकर जालौर के दरबार में अपना एक दूत भेजा। उस दूत ने कान्हड़देव चौहान के सामने खड़े होकर बड़ी गुस्ताखी से कहा, “हमारे सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की विजयी सेना गुजरात से लौट रही है। हमें जालौर के रास्ते से सुरक्षित निकलने की इजाज़त दी जाए।”
भाई साहब! जैसे ही कान्हड़देव चौहान ने ये सुना, उनका राजपूती खून खौल उठा। उन्हें पता चल चुका था की ये वही नीच सेना है जिसने हमारे सोमनाथ को तोड़ा है और हमारे हिंदू भाई-बहनों को जानवरों की तरह बांध रखा है। कान्हड़देव ने उस दूत को बीच दरबार में जो ऐतिहासिक और खौफनाक जवाब दिया, वो वो सुनने लायक है!
कान्हड़देव ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा-
“जाकर अपने सुल्तान से कह देना की ये जालौर है, कोई धर्मशाला नहीं! जो लोग हमारी औरतों को गुलाम बनाते हैं, जो हमारी गौ माता का खून बहाते हैं, जो हमारे निहत्थे ब्राह्मणों को मारते हैं और हमारे पवित्र मंदिरों को तोड़ते हैं… ऐसे नीच और दरिंदे जिहादियों को जालौर से ज़िंदा गुज़रने का रास्ता देना एक राजपूत की शान के खिलाफ है। अगर तुम्हारी सेना ने मेरे राज्य की तरफ आंख भी उठाई, तो यहीं जालौर की मिट्टी में गाड़ दूंगा!”
ये कोई कूटनीतिक जवाब नहीं था, ये सीधे-सीधे दिल्ली के सुल्तान के मुंह पर मारा गया एक भारी जूता था। जब वो दूत वापस उलूघ खान के पास पहुंचा और उसने कान्हड़देव की ये खूंखार ललकार सुनाई, तो खिलजी के उस घमंडी खेमे में खलबली मच गई।
उलूघ खान जानता था की जालौर के राजपूतों से टकराने का मतलब है सीधे मौत के मुंह में घुसना। डर के मारे उलूघ खान ने अपना रास्ता बदल लिया और वो जालौर से दूर, मेवाड़ के रास्ते से दिल्ली जाने की फिराक में खिसकने लगा।
सकराणा के मैदान में खिलजी की फौज का खौफनाक कत्लेआम, जब कान्हड़देव चौहान ने जिहादियों की बोटी बोटी काट डाली
उलूघ खान को लगा की रास्ता बदलने से वो बच जाएगा। लेकिन वो इस बात को समझ ही नहीं पाया की कान्हड़देव चौहान ने सिर्फ रास्ता नहीं रोका था, उन्होंने सोमनाथ महादेव के उस अपमान का बदला लेने की खौफनाक कसम खा ली थी।
कान्हड़देव ने अपनी सेना के कमांडरों को बुलाया। उनके सबसे खूंखार सेनापति जैता देवड़ा और उनके अपने बेटे, वीर नौजवान राजकुमार वीरमदेव चौहान ने अपनी तलवारें निकाल लीं।
कान्हड़देव का आदेश एकदम साफ था- “मुझे किसी भी कीमत पर सोमनाथ महादेव के वो टुकड़े वापस चाहिए और इन जिहादी लुटेरों का खून चाहिए!”
उलूघ खान की सेना अभी जालौर की सीमा से लगे ‘सकराणा’ के मैदान में पहुंची ही थी। रात का अंधेरा घिर आया था। खिलजी की वो घमंडी फौज अपनी लूट के माल और 20 हज़ार हिंदू बंदियों के साथ आराम से सो रही थी। उन्हें लगा था की वो दिल्ली के बहुत करीब हैं।
तभी रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ की वो खौफनाक गर्जना हुई जिसने आसमान को भी कंपा दिया।
जैता देवड़ा और वीरमदेव के नेतृत्व में जालौर के उन मुट्ठी भर राजपूत शेरों ने खिलजी की उस विशाल फौज पर एक ऐसा भयंकर गुरिल्ला हमला बोल दिया, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
भाई साहब, उस रात सकराणा के मैदान में जो हुआ, वो इतिहास का वो तांडव है जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सोती हुई जिहादी फौज को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
राजपूतों की तलवारें बिजली की तरह चमक रही थीं और आक्रांताओं के सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर गिर रहे थे। खून के ऐसे फव्वारे छूटे की सकराणा की मिट्टी लाल हो गई।
खिलजी की सेना में भगदड़ मच गई। उस वक्त अलाउद्दीन खिलजी का एक बहुत ही खास और खूंखार भतीजा, मलिक एज़ुद्दीन, अपनी तलवार लेकर आगे आया। लेकिन जालौर के राजपूतों ने उसे बीच मैदान में ऐसा घेरा की उसकी बोटी-बोटी काट कर कुत्तों के आगे फेंक दी।
अपने सबसे खास कमांडर को इस तरह कुत्तों की मौत मरते देख उलूघ खान की पैंट गीली हो गई। वो खूंखार उलूघ खान, जो कल तक सोमनाथ को लूटकर ठहाके लगा रहा था, वो अपनी जान बचाने के लिए अपने घोड़े से कूदा और रात के अंधेरे में नंगे पैर एक कायर की तरह अपनी जान बचाकर भागा।
पूरी की पूरी जिहादी फौज या तो काट दी गई या फिर अपनी जान की भीख मांगते हुए जंगलों में छुप गई।
जिहादियों की गर्दनें काटकर वापस छीना सोमनाथ का शिवलिंग, 20 हज़ार हिन्दू कैदियों की आज़ादी और कान्हड़देव चौहान का महा पराक्रम
सकराणा के मैदान में जो हुआ, वो भारत के इतिहास का एक ऐसा ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’ था जिस पर आज हॉलीवुड वाले होते तो दसियों फिल्में बना चुके होते, लेकिन हमारे वामपंथियों ने इसे छुपा लिया।
जैसे ही राजपूतों ने खिलजी की सेना को गाजर-मूली की तरह काटकर भगाया, सबसे पहला काम क्या हुआ? उन 20 हज़ार निहत्थे हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की रस्सियां और जंजीरें काटी गईं जिन्हें ये दरिंदे दिल्ली के बाज़ारों में जानवरों की तरह बेचने के लिए ले जा रहे थे।
जब उन बेबस हिंदू मां-बहनों ने अपने सामने खून से सने हुए उन राजपूती शेरों को देखा, तो उनके आंसू नहीं रुक रहे थे। वो कान्हड़देव चौहान और जैता देवड़ा के पैरों में गिर पड़ीं। उन 20 हज़ार सनातनियों को ससम्मान उनके घरों की तरफ वापस भेजा गया।
और फिर वो ऐतिहासिक पल आया जिसके लिए ये पूरी जंग लड़ी गई थी। राजपूत सेना ने खिलजी के उस खज़ाने और लूट के माल को खंगाला।
वहां उन्हें वो बैलगाड़ियां (छकड़े) मिलीं जिनमें हमारे साक्षात सोमनाथ महादेव के टूटे हुए शिवलिंग के टुकड़े रखे हुए थे। जिन जिहादियों ने उन गाड़ियों को घेर रखा था, उनकी गर्दनें वहीं धड़ से अलग कर दी गईं।
राजकुमार वीरमदेव और सेनापति जैता देवड़ा ने अपने खून से सने हाथों से उन पवित्र टुकड़ों को उठाया और अपनी आंखों से लगा लिया। महादेव वापस आ गए थे!
एक हिंदू राजा ने दिल्ली सल्तनत के सबसे क्रूर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के मुंह से निवाला छीन कर उसे उसकी असली औकात दिखा दी थी।
खिलजी की वो सारी की सारी लूट, वो सारा खज़ाना, वो घोड़े, वो हथियार- सब कुछ जालौर की सेना ने कब्ज़े में ले लिया और खिलजी के उन कटे हुए कमांडरों की लाशें वहीं गिद्धों को नोचने के लिए छोड़ दी गईं।
जब सकराणा के मैदान में खिलजी की उस खूंखार जिहादी फौज को काटकर जालौर के राजपूत वीर अपने किले की तरफ लौटे, तो आगे-आगे जालौर के शूरवीर सेनापति जैता देवड़ा और राजकुमार वीरमदेव चल रहे थे, और उनके पीछे वो बैलगाड़ियां थीं जिनमें हमारे साक्षात सोमनाथ महादेव के वो पवित्र टुकड़े रखे थे जिन्हें आक्रांताओं ने तोड़ा था।
जालौर की जनता की आंखों से आंसुओं की नदियां बह रही थीं। जो महादेव कुछ दिन पहले उन जिहादियों की कैद में थे, जिन्हें दिल्ली की मस्जिदों की सीढ़ियों में पैरों तले कुचलने के लिए ले जाया जा रहा था, आज वो महादेव पूरे राजपूती सम्मान के साथ वापस अपने भक्तों के बीच आ गए थे।
राव कान्हड़देव चौहान ने अपने सिंहासन से उतरकर महादेव के उन पवित्र टुकड़ों को अपने माथे से लगाया। उन टुकड़ों को पवित्र गंगाजल से नहलाया गया। पूरे जालौर में ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ के वो खौफनाक जयकारे गूंजे की आसमान भी कांप उठा।
कान्हड़देव ने पूरे वैदिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ उन टुकड़ों का अभिषेक करवाया और उन्हें जालौर (सोनगिरि) तथा उसके आस-पास के पांच बड़े शिव मंदिरों में पूरे सम्मान के साथ स्थापित कर दिया।
उन आक्रांताओं का वो घमंड, की वो हमारे भगवान को कुचल सकते हैं, उसे कान्हड़देव की तलवार ने बीच मैदान में टुकड़ों में बांट दिया था।
ये भारत के इतिहास की वो सबसे बड़ी और सबसे खौफनाक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ थी जिसने दिल्ली सल्तनत की नींव हिला दी थी!
15वीं सदी के महान कवि पद्मनाभ ने अपने महाकाव्य ‘कान्हड़दे प्रबंध’ (Kanhadade Prabandha) में इस पूरी शौर्यगाथा को डंके की चोट पर लिखा है। उस ग्रंथ का एक-एक पन्ना राजपूतों के खून और सनातन के स्वाभिमान से रंगा हुआ है।
खिलजी का खौफनाक आक्रमण और अपनों ने ही कर दी गद्दारी, जिहादियों के चीथड़े उड़ाते शहीद हुए कान्हड़देव और वीरमदेव
जब उलूघ खान ने रोते हुए दिल्ली पहुंचकर अलाउद्दीन खिलजी को ये बताया की कान्हड़देव के राजपूतों ने हमारी फौज को बीच मैदान में काट डाला है, हमारा खज़ाना लूट लिया है और सोमनाथ के टुकड़े वापस छीन लिए हैं, तो वो खूनी सुल्तान गुस्से से पागल हो गया।
उसका सारा गुरूर ज़मीन पर आ गिरा। उसने कसम खाई की वो जालौर का नामोनिशान मिटा देगा।
खिलजी ने अपने सबसे खूंखार और ज़ालिम सेनापति ‘कमालुद्दीन गुर्ग’ को एक ऐसी विशाल जिहादी फौज देकर भेजा, जिसका मुकाबला करना किसी भी आम राज्य के बस की बात नहीं थी। खिलजी की वो फौज जालौर के किले के बाहर आकर डट गई।
लेकिन जालौर का वो अभेद्य किला और अंदर बैठे भवानी के वो मुट्ठी भर राजपूत शेर! सालों तक खिलजी की सेना किले के बाहर पड़ी रही, लेकिन उनकी औकात नहीं हुई की वो किले का एक दरवाज़ा भी तोड़ सकें। कान्हड़देव और वीरमदेव के छापामार हमलों ने खिलजी की फौज को कुत्ते की तरह रुला कर रख दिया।
अब जब ये जिहादी आमने-सामने की लड़ाई में नहीं जीत पाए, तो इन्होंने अपनी उसी पुरानी और नीच फितरत का इस्तेमाल किया- ‘गद्दारी और धोखा’! उन्होंने जालौर के ही एक लालची और गद्दार राजपूत ‘बीका दहिया’ को रुपयों और सत्ता का लालच देकर खरीद लिया।
उस बीका दहिया ने खिलजी के सेनापति को किले का वो गुप्त और कमज़ोर रास्ता बता दिया जहाँ से दुश्मन अंदर घुस सकते थे।
पर यहाँ एक और खौफनाक और गर्व करने वाली बात सुनिए! जब उस गद्दार बीका दहिया ने घर जाकर अपनी पत्नी ‘हीरा दे’ को ये बताया की उसने पैसों के लिए जालौर के किले का राज मुगलों को बेच दिया है, तो उस राजपूतानी का खून खौल उठा। उसने एक पल की भी देरी नहीं की।
उस क्षत्राणी ने अपनी तलवार निकाली और अपने ही उस गद्दार पति का सिर धड़ से अलग कर दिया! वो भागी-भागी कान्हड़देव के पास गई ताकि उन्हें सावधान कर सके, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। खिलजी की टिड्डी दल फौज किले के अंदर घुस चुकी थी।
अब जालौर के उन शेरों के पास सिर्फ एक ही रास्ता था- ‘शाका’ और ‘जौहर’। जालौर की वीर क्षत्राणियों ने धधकती हुई आग में कूदकर जौहर कर लिया ताकि कोई भी जिहादी उनके शरीर को छू तक ना सके।
और फिर किले के दरवाज़े खोल दिए गए। राव कान्हड़देव और उनके नौजवान बेटे वीरमदेव अपनी भवानी तलवारें लेकर उस विशाल जिहादी फौज पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े।
भाई साहब, उस दिन जालौर की मिट्टी ने वो खौफनाक कत्लेआम देखा जो सदियों तक मुगलों की रूह कंपाता रहा। वीरमदेव ने अकेले ही खिलजी के सैकड़ों सैनिकों को काट कर रख दिया।
जब तक उनके शरीर में खून की आखिरी बूंद थी, उन्होंने अपनी मातृभूमि और अपने सोमनाथ महादेव की कसम को टूटने नहीं दिया। लड़ते-लड़ते कान्हड़देव और वीरमदेव ने वीरगति प्राप्त की, लेकिन उन्होंने उस क्रूर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आगे अपना सिर कभी नहीं झुकाया।
वीरमदेव ने साक्षात मृत्यु को गले लगा लिया, लेकिन इस्लाम कबूल करने के उस गंदे फरमान पर अपने जूतों से थूक दिया। ये था हमारे सनातनियों का वो सर्वोच्च बलिदान जो आज भी जालौर की रग-रग में ज़िंदा है!
कान्हड़देव चौहान ने हमें सिखाया है की जब तुम्हारे धर्म पर, तुम्हारे भगवान पर कोई आंख उठाए, तो फिर कोई समझौता नहीं होता, फिर सिर्फ और सिर्फ दुश्मनों की बोटी-बोटी कटती है!
अगर मुट्ठी भर राजपूत उस 13वीं सदी में दिल्ली के सबसे खूंखार सुल्तान की रातों की नींद हराम कर सकते थे, तो आज अगर ये 100 करोड़ हिंदू एक हो जाएं, तो इस दुनिया की कोई भी जिहादी ताकत हमारी तरफ आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकता।
हर हर महादेव!
