जब भी मेवाड़ का ज़िक्र आता है, तो हर सच्चे सनातनी के रगों में खून दुगनी रफ्तार से दौड़ने लगता है। मेवाड़ वो धधकती हुई आग थी जिसके आगे दिल्ली के मुगल बादशाहों ने अपनी एड़ियां रगड़ लीं, लेकिन इस राजपूती स्वाभिमान को कभी झुका नहीं पाए।
जब हम महाराणा प्रताप का नाम लेते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन आज मैं आपको उस अजेय राजपूत खून की कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसने जिहादी मुगलों की जिंदगी नर्क बना कर रख दी थी।
मैं बात कर रहा हूँ महाराणा प्रताप के सबसे बड़े और शूरवीर पुत्र- महाराणा अमर सिंह प्रथम की!
अमर सिंह कोई मखमली गद्दों पर सोकर पले-बढ़े राजकुमार नहीं थे। जब पूरा राजपूताना और भारत मुगलों के खौफ से कांप रहा था, तब इस राजपूत शेर का बचपन अरावली के बीहड़ों, घने जंगलों और पहाड़ों की उन खुरदरी चट्टानों पर मुगलों को काटते हुए बीता था।
उन्होंने बचपन से ही अपने पिता महाराणा प्रताप के संघर्ष को अपनी आंखों से देखा था। उनकी रोटियों में भले ही कभी-कभी घास शामिल रही हो, लेकिन उनके खून में वो शुद्ध सनातनी आग थी जिसे बुझाने की औकात किसी मुगलिया आक्रांता में नहीं थी।
ये वो शेर था जिसने अपने पिता की तलवार की धार को सिर्फ कायम नहीं रखा, बल्कि मुगलों के अंदर ऐसा खौफ पैदा कर दिया की दिल्ली के तख्त पर बैठे अकबर और उसके बाद जहांगीर की नींदें उड़ जाया करती थीं।
अमर सिंह का नाम सुनते ही मुगल सेनापतियों की टांगें कांपने लगती थीं। उन्हें पता था की अगर अमर सिंह युद्ध के मैदान में उतर आया, तो मुगलों की लाशें बिछाने से उसे इनका अल्लाह भी नहीं रोक सकता।
ये सनातन के उस सबसे प्रखर और खौफनाक पलटवार का इतिहास है जिसने मुगलों को उनकी असली औकात याद दिला दी थी।
दिवेर का महासंग्राम और सुल्तान खान का गुरूर, जब महाराणा प्रताप और अमर सिंह की तलवारों से कांप उठी मुगलिया फौज
हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अकबर को एक बहुत बड़ी और बेवकूफी भरी गलतफहमी हो गई थी। उस जिहादी आक्रांता को लगने लगा था की उसने मेवाड़ की कमर तोड़ दी है और अब महाराणा प्रताप और उनकी सेना पहाड़ों में कमज़ोर पड़ चुकी है।
इसी गुरूर में आकर अकबर ने मेवाड़ के 36 अलग-अलग इलाकों में मुगलों की भारी-भरकम चौकियां (थाने) बिठा दी थीं। इन सबमें सबसे बड़ी और सबसे मज़बूत छावनी थी- दिवेर!
अकबर ने इस दिवेर की छावनी का इंचार्ज किसे बनाया? अपने सगे चाचा और मुगलों के सबसे खूंखार सेनापति सुल्तान खान को। सुल्तान खान कोई आम सिपहसालार नहीं था।
उसके पास मुगलों की लाखों की फौज, भयंकर तोपखाना और हथियारों का ज़खीरा था। सुल्तान खान इतना घमंडी था की वो सोचता था की उसके इस लोहे के अभेद्य कवच और विशाल सेना के आगे मुट्ठी भर राजपूत क्या कर लेंगे। उसे लगता था की वो दिवेर में बैठकर पूरे मेवाड़ को अपने जूतों तले कुचल देगा।
लेकिन मुगलों को ये नहीं पता था की राजपूत शेर कभी छुपकर नहीं बैठता, वो सिर्फ अपनी अगली और खौफनाक छलांग के लिए पीछे हटता है। साल 1582, दिन था विजयादशमी (दशहरे) का!
महाराणा प्रताप और उनके 23 साल के नौजवान बेटे अमर सिंह ने तय कर लिया की अब इन मुगलों को वो मौत देनी है की इनकी आने वाली नस्लें भी मेवाड़ की तरफ देखने से कांपें। इतिहासकार इस युद्ध को ‘मैराथन ऑफ मेवाड़’ कहते हैं।
दशहरे के उस दिन, राजपूती सेना भूखे शेरों की तरह दिवेर की उस विशाल मुगल छावनी पर टूट पड़ी। मुगलों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
अमर सिंह के नेतृत्व में राजपूती तलवारें हवा में लहराईं और मुगलों की गर्दनों को काटना शुरू कर दिया। सुल्तान खान के तोपखाने और बंदूकें अरावली के उन बीहड़ों में धरे के धरे रह गए।
एक ही भाले में सुल्तान खान और उसका घोड़ा ज़मीन में आर पार, मौत से पहले अमर सिंह को देखने की उस जिहादी की आखिरी ख्वाहिश
अब ज़रा इस महासंग्राम के उस सबसे खौफनाक, सबसे रूह कंपाने वाले और अकल्पनीय दृश्य पर आते हैं, जिसे सुनकर ही शरीर का सारा खून उबाल मारने लगता है।
युद्ध अपने चरम पर था। चारों तरफ मुगलों की लाशें बिछी हुई थीं। तभी रणभूमि के ठीक बीचों-बीच 23 साल के नौजवान अमर सिंह और मुगलों के मुख्य सेनापति सुल्तान खान का आमना-सामना हो गया।
सुल्तान खान एक बहुत ही भारी-भरकम और ऊंचे अरबी घोड़े पर सवार था। उसने सिर से लेकर पैर तक लोहे का वो भारी कवच और ज़िरहबख्तर पहन रखा था जिसे किसी भी आम तलवार से काटना नामुमकिन था। उसे अपने उस अभेद्य कवच पर बहुत घमंड था। सुल्तान खान ने अमर सिंह पर वार करने के लिए अपना घोड़ा आगे बढ़ाया।
लेकिन भाई साहब, अमर सिंह के अंदर तो साक्षात महाकाल का रूप आ चुका था। उस सनातनी राजपूत शेर ने कोई तलवार नहीं निकाली, बल्कि अपने हाथों में वो भारी-भरकम और विशाल भाला उठाया जिसका वज़न उठाने में ही आम इंसान की नसें फट जाएं।
अमर सिंह ने अपने घोड़े को ज़ोर से हवा में उछाला। उनका घोड़ा सुल्तान खान के घोड़े के बराबर ऊंचाई पर पहुंच गया। और फिर हवा में ही अमर सिंह ने अपनी पूरी राजपूती ताकत, अपने पूरे पुरखों का ज़ोर लगाकर उस भाले को सुल्तान खान की छाती पर दे मारा!
अरे बाप रे! वो वार इतना खौफनाक, इतना अमानवीय ताकत वाला था की जो हुआ उसने मुगलों की आंखें फाड़ कर रख दीं। वो भाला सुल्तान खान के उस लोहे के अभेद्य कवच को कागज़ की तरह फाड़ता हुआ, उसकी पसलियों को तोड़कर उसकी छाती के आर-पार हो गया।
और सिर्फ सुल्तान खान की छाती ही नहीं! वो भाला सुल्तान खान की छाती को चीरता हुआ, उसके उस विशाल अरबी घोड़े के पेट को फाड़ता हुआ सीधा ज़मीन में जाकर धंस गया!
एक ही भाले में सुल्तान खान और उसका भारी-भरकम घोड़ा सींक-कबाब की तरह बिंध गए थे और ज़मीन में आर-पार गड़ गए थे!
सुल्तान खान उस भाले में टंगा हुआ तड़प रहा था। उसके मुंह से खून के फव्वारे छूट रहे थे। मौत उसके सामने खड़ी थी और उसकी सांसें उखड़ रही थीं।
तभी वहां खुद महाराणा प्रताप पहुंच गए और उन्होंने सुल्तान खान से पूछा की क्या उसकी कोई आखिरी इच्छा है? उस जिहादी सेनापति सुल्तान खान ने मौत से ठीक पहले एक ऐसी आखिरी मांग कर दी जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गई।
उसने महाराणा प्रताप को देखकर पानी नहीं मांगा, उसने अपनी जान की भीख नहीं मांगी। उसने हांफते और खून थूकते हुए कहा-
“महाराणा! मुझे प्राण त्यागने से पहले उस खूंखार योद्धा का चेहरा देखना है जिसने मुझ पर ये खौफनाक वार किया है। मेरी मुगलों की इतनी बड़ी फौज में ऐसा कोई शूरवीर नहीं जो लोहे के कवच को फाड़कर घोड़े समेत ज़मीन में भाला गाड़ दे। मैं मरते दम तक ये जानना चाहता हूँ की वो इंसान है या कोई साक्षात काल!”
लेकिन महाराणा प्रताप ने देखा की ये सुल्तान तो बस मरने ही वाला है, जब तक अमर सिंह को बुलाऊंगा, तब तक तो ये मर जायेगा, तो उन्होंने पास में ही खड़े एक सेना के जवान को बुला कर सुल्तान खान के सामने खड़ा कर दिया।
सुल्तान खान समझ गया की उसको मारने वाला कोई आम इंसान नहीं हो सकता, तो उसने महाराणा प्रताप से दोबारा गुज़ारिश करी की उसे सिर्फ उसको ही देखना है जिसने उसे मौत के घांट उतारा।
सुल्तान खान की ये बात सुनकर महाराणा प्रताप ने पीछे मुड़कर इशारा किया। तब 23 साल के नौजवान अमर सिंह, जिनकी आंखों में राजपूती आग धधक रही थी, वो सुल्तान खान के सामने आकर खड़े हो गए।
उस 23 साल के लड़के को देखकर सुल्तान खान की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसे यकीन ही नहीं हुआ की इस कम उम्र के नौजवान के हाथों में इतनी अलौकिक और अमानवीय ताकत हो सकती है।
सुल्तान खान समझ गया था की जिन सनातनी राजपूतों के खून में इतनी भयंकर आग और इतना शौर्य भरा हो, उन्हें दुनिया की कोई भी मुगलिया ताकत कभी नहीं हरा सकती। वो उस राजपूती पराक्रम को मन ही मन सलाम करता हुआ वहीं उसी भाले पर टंगे-टंगे जहन्नुम सिधार गया।
अपने सबसे खूंखार सेनापति की ऐसी मौत देखकर पूरी की पूरी मुगल फौज में खौफ फैल गया। उनके हाथों से तलवारें छूट गईं और वो रणभूमि छोड़कर कुत्तों की तरह दुम दबाकर वहां से भाग खड़े हुए। ये है असली राजपूती ताकत, जिसने मुगलों को उनकी हैसियत याद दिला दी थी!
पिता की मौत के बाद 17 खौफनाक युद्धों में मुगलों का कत्लेआम, जहांगीर और खुर्रम की फौज को अमर सिंह ने अरावली में कुत्तों की तरह दौड़ाया
दिवेर के इस खौफनाक युद्ध के बाद मुगलों की ऐसी कमर टूटी की उन्होंने अगले 12 सालों तक मेवाड़ की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की। इसके बाद 1597 में जब महाराणा प्रताप का देहांत हुआ, तो अमर सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे।
महाराणा प्रताप की मौत की खबर सुनकर दिल्ली में बैठे जहांगीर को लगा की शायद अब मेवाड़ कमज़ोर पड़ गया है।
जहांगीर ने एक के बाद एक मुगलों की विशाल सेनाएं मेवाड़ को कुचलने के लिए भेजीं। उसने अपने सबसे खूंखार कमांडरों- शहज़ादा परवेज़, महावत खान और अब्दुल्ला खान को लाखों की फौज लेकर भेजा।
लेकिन राजपूत सेना की गुरिल्ला युद्धनीति के सामने मुगलों की भारी-भरकम फौजें अरावली की संकरी घाटियों में आकर फंस जाती थीं।
अमर सिंह की सेना रातों-रात मुगलों की छावनियों पर धावा बोलती, मुगलों का खज़ाना लूटती, उनके सेनापतियों के सिर धड़ से अलग करती और वापस पहाड़ों में गायब हो जाती। मुगलों की सप्लाई लाइन काट दी गई। मुगल सैनिक भूखे प्यासे अरावली की घाटियों में तड़प-तड़प कर मरने लगे।
जब जहांगीर के सारे सेनापति फेल हो गए, तो उसने अपने सबसे चहेते बेटे खुर्रम (जो बाद में शाहजहां बना) को एक बहुत बड़ी और अजेय फौज देकर मेवाड़ भेजा।
लेकिन अमर सिंह के खौफ और राजपूती तलवारों के प्रहार ने खुर्रम की भी वो हालत कर दी की उसे अपनी जान बचाने के लिए अरावली की घाटियों में कुत्तों की तरह दर-दर भागना पड़ा। खुर्रम समझ गया था की इन राजपूत शेरों को युद्ध के मैदान में हराना नामुमकिन है।
अमर सिंह ने अपने 17 युद्धों में मुगलों का वो कत्लेआम किया की दिल्ली के लाल किले में बैठी मुगलिया सल्तनत मेवाड़ के नाम से थर-थर कांपती रही।
