दुर्गा माँ को गालियां देने वाली निशु आज़ाद को सुप्रीम कोर्ट की VIP सुरक्षा और मामूली विवाद में बेगुनाह पर झूठा SC/ST एक्ट, लेकिन जब ये केस निकलते फर्जी तो इस अंधे बहरे कानून को क्यों सूंघ जाता सांप

हम हमेशा से कोर्ट-कचहरी और कानून की किताबों में न्याय की देवी की वो मूर्ति देखते आए हैं, जिसकी आँखों पर काली पट्टी बंधी होती है।

हमें सिखाया गया की ये पट्टी इसलिए है ताकि कानून किसी के साथ भेदभाव न करे। लेकिन आज के इस दौर में सच कहूं तो इस पट्टी का मतलब ही बदल चुका है।

अब ये पट्टी इसलिए बांधी गई है ताकि बहुसंख्यक समाज की आस्था को सरेआम कुचला जा सके और सिस्टम आराम से आँखें मूंदे बैठा रहे।

आज हमारे देश का कानून इतना अंधा और बहरा हो चुका है की उसे एक खास एजेंडे वालों की खरोंच भी दिख जाती है, लेकिन एक आम आदमी का पूरा वजूद मिट जाता है और ये सिस्टम टस से मस नहीं होता।

ये कैसी विडंबना है यार की जो लोग सरेआम हिन्दू देवी-देवताओं को भद्दी-भद्दी गालियां देते हैं, उन्हें हमारा सिस्टम ‘एक्टिविस्ट’ मानता है। आधी रात को उनके लिए अदालतें खुल जाती हैं, उन्हें ‘वीआईपी सुरक्षा’ का कवर दे दिया जाता है।

लेकिन वहीं दूसरी तरफ, कोई आम युवा जब किसी आपसी विवाद में घिरता है, तो पुलिस बिना सोचे-समझे उस पर SC/ST एक्ट जैसी गैर-जमानती धाराएं ठोक देती है।

हाल ही में निशु आज़ाद का जो मामला सामने आया है, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।

ये केस इस बात का सबसे खौफनाक सुबूत है की हमारे देश में कानून का इस्तेमाल अब न्याय देने के लिए नहीं, बल्कि एजेंडा सेट करने के लिए हो रहा है।

चलिए झूठे मुकदमों के उस दलदल में उतरते हैं, जिसने एक बेगुनाह को सलाखों के पीछे सड़ा दिया है और गालियां देने वालों को रातों-रात वीआईपी बना दिया है।

माँ दुर्गा पर अभद्र टिप्पणी और निशु आज़ाद के हाथों सोशल मीडिया पर सजाई गई नफरत की वो महफ़िल जिसे कानून ने चुपचाप देखा

इस पूरे बवाल की जड़ को समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे, यानी उस घटिया मानसिकता की तरफ जाना होगा जहाँ से ये पूरी नफरत शुरू हुई।

कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से जुड़ी हुई एक 14 साल की लड़की निशु आज़ाद और उसके पिता संजय कुमार आज़ाद ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जो ज़हर उगला, वो बर्दाश्त के बिल्कुल बाहर था।

इन लोगों ने खुलेआम X पर माँ दुर्गा के लिए ‘वेश्या’ जैसे नीच और घटिया शब्दों का इस्तेमाल किया था! क्या आप सोच सकते हैं की किसी और मज़हब के खिलाफ इस स्तर की बयानबाजी करने के बाद कोई इंसान इस देश में सुरक्षित घूम सकता है?

बात सिर्फ माँ दुर्गा तक नहीं रुकी। इन्होंने भगवान शिव, श्रीकृष्ण और विद्या की देवी माँ सरस्वती का भी भयानक और गंदा मज़ाक उड़ाया।

ये सब सरेआम हो रहा था, इंटरनेट पर लाखों लोग इसे देख रहे थे, लेकिन मजाल है की हमारे सिस्टम या ‘सुओ मोटो’ (Suo Moto) संज्ञान लेने वाली अदालतों की नींद टूटी हो!

जब सिस्टम बहरा हो गया, तब जाकर सुप्रीम कोर्ट की वकील अमिता सचदेवा ने हिम्मत दिखाई और इन ज़हरीले पोस्ट्स के खिलाफ बाकायदा FIR दर्ज करवाई।

लेकिन सवाल ये उठता है की क्या इस देश में हिन्दुओं की आस्था इतनी सस्ती हो गई है की कोई भी ‘कॉकरोच’ गैंग का सदस्य उठकर आएगा, हमारे भगवानों को गालियां बकेगा और उसे ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ कहकर छोड़ दिया जाएगा?

अगर यही आज़ादी है, तो फिर ये आज़ादी सिर्फ एक ही तरफ से क्यों काम कर रही है?

एक मामूली ज़मीन विवाद में विष्णु तिवारी पर ठोक दिया झूठा SC/ST और दुष्कर्म केस, जिसने एक बेगुनाह के जवानी के 20 साल जेल में सड़ा दिए

जब आप निशु आज़ाद को मिल रही अदालती हमदर्दी देखते हैं, तो ज़रा इसी देश के कानून की एक और खौफनाक तस्वीर देख लीजिए।

बात जब SC/ST एक्ट के भयानक दुरुपयोग की आती है, तो उत्तर प्रदेश के ललितपुर के रहने वाले विष्णु तिवारी का मामला रोंगटे खड़े कर देता है।

ये कोई किताबी बात नहीं, बल्कि हमारे इसी अंधे सिस्टम का वो काला सच है जिसे सुनकर किसी भी पत्थर दिल इंसान की आँखों में आंसू आ जाएं।

साल 2000 की बात है। ललितपुर के एक आम, सीधे-सादे नौजवान विष्णु तिवारी का गांव में ज़मीन और गाय बांधने को लेकर एक बेहद मामूली सा विवाद हो जाता है।

और सामने वाला महिला पक्ष क्या करता है? वो अपनी रंजिश निकालने के लिए विष्णु पर सीधे बलात्कार और SC/ST एक्ट जैसी भयंकर, गैर-जमानती धाराएं ठोक देता है।

पुलिस, जो हमेशा ऐसे मामलों में आँख बंद करके काम करती है, रातों-रात उस 23 साल के लड़के को गिरफ्तार कर लेती है। बिना किसी ठोस जांच के, बिना किसी सुबूत के विष्णु को जेल की कालकोठरी (आगरा सेंट्रल जेल) में धकेल दिया जाता है।

एक बेगुनाह इंसान जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी के पूरे 20 साल सड़ता रहता है! इस दौरान उस लड़के पर दर्द का वो पहाड़ टूटता है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

जेल में रहते हुए विष्णु के पिता की सदमे से मौत हो जाती है, माँ रो-रो कर दम तोड़ देती है, उसके दो भाई भी दुनिया से चल बसते हैं।

उसका पूरा खानदान, उसका घर-परिवार सब तबाह हो जाता है। और हमारा अंधा-बहरा सिस्टम 20 साल तक सिर्फ फाइलों पर तारीखें बढ़ाता रहता है।

अंत में 20 साल बाद, साल 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आता है। हाई कोर्ट के जज साहब कहते हैं की मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों से साफ साबित होता है की विष्णु तिवारी पर लगाया गया SC/ST और रेप का केस 100% झूठा और ज़मीन हड़पने के लिए रचा गया षड्यंत्र था!

कोर्ट उसे बाइज्जत बरी कर देता है। लेकिन ज़रा रुकिए और अपने दिल पर हाथ रखकर पूछिए… क्या ‘बाइज्जत बरी’ होना उस इंसान के खोए हुए 20 साल लौटा सकता है?

क्या ये सिस्टम उसके मरे हुए माँ-बाप को ज़िंदा कर सकता है? जब वो जेल से बाहर आया तो उसकी उम्र 43 साल हो चुकी थी, हाथ में बस 600 रुपये थे और जाने के लिए कोई घर नहीं बचा था।

एक आम इंसान की पूरी ज़िंदगी सिर्फ इसलिए खाक कर दी गई क्योंकि इस अंधे कानून में किसी ने ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर झूठा केस लाद दिया था।

गाज़ियाबाद में हमदर्दी बटोरने के लिए नीशू आज़ाद ने रचा फर्जी पथराव का ड्रामा और कैसे पड़ोसियों ने उतार दिया इस झूठ का नकाब

जब आप एक झूठ बोलते हैं, तो उसे छुपाने के लिए आपको सौ और झूठ बोलने पड़ते हैं। भगवानों को गाली देने के बाद इस नीशू आज़ाद को समझ आ गया था की सोशल मीडिया पर इनकी असलियत सामने आ रही है।

पब्लिक जान चुकी थी की गालियां किसने दीं और बवाल किसने शुरू किया। अब पब्लिक की सहानुभूति कैसे बटोरी जाए? इसका एक ही तरीका था- ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना।

निशु आज़ाद और उसके ईकोसिस्टम ने एक भयानक झूठ का सहारा लिया। रातों-रात एक झूठी खबर फैलाई गई की गाजियाबाद के शालीमार गार्डन इलाके में जहां निशु आज़ाद का घर है, वहां ‘कट्टरपंथियों’ की भीड़ ने उनके घर पर ईंट-पत्थर फेंके हैं, जानलेवा हमला किया है और उन्हें धमकियां दी जा रही हैं।

इनका मकसद एकदम साफ था- खुद को एक डरी हुई और बेचारी लड़की के रूप में पेश करना ताकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर मानवाधिकार आयोग तक सब इनके समर्थन में खड़े हो जाएं।

लेकिन भाई, कहते हैं ना की काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इस फर्जी पथराव वाले विक्टिम कार्ड की पोल उसी इलाके की पुलिस और वहां रहने वाले पड़ोसियों ने खुद ही खोल कर रख दी।

जब गाजियाबाद पुलिस ने मौके पर जाकर जांच की, तो पता चला की पथराव तो दूर की बात है, वहां किसी ने एक कंकड़ तक नहीं फेंका था! कोई भीड़ वहां गई ही नहीं थी।

सबसे बड़ा तमाचा तो उस सोसाइटी वालों और पड़ोसियों ने मारा। जब मीडिया ने वहां के स्थानीय लोगों से बात की, तो उनका साफ कहना था की यहां कोई हमला नहीं हुआ, ये लोग सिर्फ पब्लिसिटी और हमदर्दी के लिए झूठा ड्रामा कर रहे हैं।

हकीकत तो ये है यार की वहां के पड़ोसी खुद इस परिवार से तंग आ चुके हैं। जिस तरह से निशु और उसके पिता दिन-रात हिंदू आस्था और समाज के खिलाफ जहर उगलते हैं, उससे पूरी सोसाइटी का माहौल खराब हो रहा है।

सोसाइटी वाले तो खुद चाहते हैं की ये नफरती परिवार जल्द से जल्द वहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर कहीं और चला जाए। लेकिन सोचिए, जो लड़की अपने ही घर पर झूठा हमला करवा सकती है, वो सिस्टम की आंखों में कितनी आसानी से धूल झोंक रही है!

बहुसंख्यकों को गरियाने वालों के लिए यहाँ रातों-रात खुलते अदालत के दरवाजे, सुप्रीम कोर्ट ने दे दी नीशू आज़ाद को वीआईपी सुरक्षा

हमारे देश में न्याय की प्रक्रिया कितनी ‘निष्पक्ष’ है, उसका सबसे बड़ा और भद्दा मज़ाक 10 सितंबर 2026 को देखने को मिला। एक तरफ विष्णु तिवारी नाम का लड़का, जो एक झूठे SC/ST और दुष्कर्म केस में 20 साल जेल में सड़ता रहा।

उसकी कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। लेकिन दूसरी तरफ, वही निशु आज़ाद जिसने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ‘वेश्या’ जैसे शब्द कहकर गालियां दीं, उसके एक झूठे ‘पथराव’ वाले ड्रामे पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो फुर्ती दिखाई, वो सन्न कर देने वाली थी।

10 सितंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेंच ने निशु आज़ाद को मिल रही ‘कथित धमकियों’ का खुद संज्ञान ले लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्ती दिखाते हुए तुरंत दिल्ली और यूपी सरकार से स्टेटस रिपोर्ट तलब कर ली। आदेश दे दिया गया की इस लड़की को तुरंत ‘वीआईपी सुरक्षा’ मुहैया कराई जाए।

ज़रा एक मिनट रुक कर इस पर विचार कीजिए। जिस लड़की ने सरेआम समाज में नफरत का बीज बोया, उसे सजा देने या उस पर दर्ज एफआईआर (FIR) पर तुरंत एक्शन लेने के बजाय, हमारी सुप्रीम कोर्ट उसे सुरक्षा का कवच पहना रही है!

ये कौन सा न्याय है भाई? मतलब अगर आप हिंदू भगवानों को गालियां देंगे, तो आप ‘राष्ट्रीय धरोहर’ बन जाएंगे और सुप्रीम कोर्ट आधी रात को आपकी सुरक्षा के लिए सरकारों की क्लास लगा देगा?

लेकिन अगर आप एक आम आदमी हैं, जिसे बिना किसी पुख्ता सबूत के SC/ST एक्ट में फंसाकर जेल में डाल दिया गया है, तो आपके मानवाधिकारों के लिए कोई अदालत कभी संज्ञान नहीं लेगी?

न्याय के इस अंधे सिस्टम पर विजय माल्या का वो करारा तंज की क्या इंसाफ पाने के लिए अब भारत में एक कॉकरोच बनना पड़ेगा

इस पूरे ड्रामे और अंधे कानून का तमाशा जब अपनी हदें पार कर गया, तो एक ऐसी शख्सियत ने भारत के सिस्टम पर ऐसा तंज कसा, जिसने पूरे इकोसिस्टम की बखिया उधेड़ कर रख दी।

जी हां, हम बात कर रहे हैं विजय माल्या की। माल्या भारत से भगोड़ा है या नहीं, ये एक अलग बहस है, लेकिन 9 सितंबर 2026 को उसने X (ट्विटर) पर जो बात लिखी, उसने देश के न्याय सिस्टम की धज्जियां उड़ा दीं।

माल्या ने अपने पोस्ट में लिखा- “मैंने जितनी भी नाइंसाफियां झेली हैं और जो आज भी झेल रहा हूं, उन्हें देखते हुए मैं सोचता हूं की क्या मुझे ‘कॉकरोच’ बन जाना चाहिए? शायद कॉकरोच की जिंदगी इंसान से बेहतर हो।”

अगर आप इस बयान के पीछे की गहराई और टाइमिंग को समझेंगे तो आपका दिमाग हिल जाएगा। माल्या ने ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे ही हवा में नहीं किया था।

उसका सीधा-सीधा निशाना इसी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और भारत के उस लचर न्याय तंत्र पर था, जो ऐसे कॉकरोचों को पाल-पोस रहा है।

माल्या का कहने का मतलब एकदम साफ था- इस देश में चाहे आप अरबपति हों या कोई आम आदमी (जैसे विष्णु तिवारी), आपके लिए न्याय के कोई मायने नहीं हैं।

आपको झूठे SC/ST मुकदमों में फंसाकर आपकी जिंदगी नरक बना दी जाएगी।

लेकिन अगर आप इस देश में एक ‘कॉकरोच’ (CJP का हिस्सा) बन जाते हैं, खुलेआम गालियां देते हैं, सड़कों पर बवाल काटते हैं और फिर विक्टिम कार्ड खेलकर रोने का नाटक करते हैं, तो पूरा का पूरा सिस्टम आपके आगे दंडवत हो जाएगा।

भारत का कानून आपको सिर-आंखों पर बिठाएगा, पुलिस आपके घर के बाहर पहरा देगी और देश की सबसे बड़ी अदालत आपके लिए सुरक्षा के फरमान जारी करेगी।

माल्या का ये तंज सिर्फ एक ट्वीट नहीं था, ये हमारे देश के कानून की उस चिता पर पड़ी एक ऐसी चिंगारी थी, जो बता रही है की आज भारत में एक शरीफ आम इंसान की हैसियत सच में एक ‘कॉकरोच’ से भी बदतर कर दी गई है।

फर्जी मुकदमों में बर्बाद होती बेगुनाहों की ज़िंदगी और सालों बाद जब सच सामने आता है तो इस अंधे बहरे कानून को क्यों सूंघ जाता है सांप

अब ज़रा इस पूरे ड्रामे से बाहर निकलकर उस कड़वी और खौफनाक सच्चाई पर बात करते हैं जो हमारे और आपके जैसे किसी भी आम आदमी के घर का दरवाज़ा कभी भी खटखटा सकती है।

यह सच्चाई है0 SC/ST एक्ट (Prevention of Atrocities Act) का अंधाधुंध और निर्दयी दुरुपयोग।

कानून बनाया गया था उन लोगों को बचाने के लिए जो सच में हाशिए पर हैं, जिनके साथ सच में अन्याय होता है। लेकिन आज ज़मीनी हकीकत क्या है?

आज ये एक्ट न्याय का हथियार नहीं, बल्कि आपसी दुश्मनी निकालने, ज़मीन हड़पने, उगाही करने और सामने वाले की ज़िंदगी तबाह करने का सबसे बड़ा ‘ब्रह्मास्त्र’ बन चुका है।

विष्णु तिवारी का मामला तो सिर्फ एक बानगी है। आज देश के हर थाने और हर अदालत में आपको ऐसे हज़ारों बेगुनाह युवा मिल जाएंगे, जिनकी पूरी की पूरी जवानी इन फर्जी मुकदमों की फाइलों के बीच घुट कर रह गई है।

ज़रा सोचिए एक आम लड़के के बारे में, जिस पर किसी मामूली कहासुनी या झड़प के बाद अचानक SC/ST जैसी धारा लगा दी जाती हैं।

पुलिस बिना किसी पुख्ता जांच के, बिना किसी सबूत के रातों-रात उसे गिरफ्तार कर लेती है। क्यों? क्योंकि इस कानून में ऐसा ही प्रावधान बना दिया गया है की ‘पहले गिरफ्तारी होगी, जांच बाद में देखी जाएगी’।

उस बेगुनाह को महीनों तक ज़मानत नहीं मिलती। उसका करियर, उसकी पढ़ाई, उसकी नौकरी… सब कुछ एक झटके में खाक हो जाता है।

उसका पूरा परिवार रातों-रात समाज की नज़रों में ‘अपराधी’ और ‘अत्याचारी’ बन जाता है।

वो लड़का जेल की सलाखों के पीछे अपनी जवानी के सबसे कीमती साल बर्बाद कर रहा होता है और बाहर झूठा केस करने वाले ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर मौज काट रहे होते हैं।

और फिर शुरू होती है सिस्टम की असली लीपापोती। पांच साल, आठ साल या कभी-कभी दस साल तक कोर्ट में तारीख पे तारीख चलती है।

और एक दिन अचानक जज साहब एक कागज़ का पन्ना पढ़ते हुए कहते हैं की “सबूतों के अभाव में आरोपी को बाइज्ज़त बरी किया जाता है।”

वाह रे हमारे देश का अंधा कानून! बाइज्ज़त बरी? लेकिन उन 20 सालों का क्या जो उस लड़के ने जेल की कोठरी में काटे? उसके उस करियर का क्या जो अब कभी वापस नहीं आ सकता?

उसके परिवार के उस सम्मान और उस पैसे का क्या जो इस झूठी लड़ाई में बर्बाद हो गया? क्या अदालतें या ये सरकार उस बेगुनाह लड़के को उसकी बीती हुई जवानी वापस लौटा सकती हैं?

और सबसे बड़ा सवाल जो हर आम हिंदुस्तानी के सीने में आग लगाता है- जब ये साबित हो जाता है की केस झूठा था, तब इस पूरे ईकोसिस्टम को सांप क्यों सूंघ जाता है?

तब कहाँ छुप जाते हैं वो मानवाधिकार वाले जो रात के दो बजे न्याय की गुहार लगाने पहुँच जाते हैं? तब क्यों नहीं कोई सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेता? झूठा केस ठोककर एक बेगुनाह की ज़िंदगी बर्बाद करने वालों को उसी जेल में क्यों नहीं डाला जाता, जहाँ उन्होंने उस मासूम को सड़ाया था?

हकीकत तो ये है यार की झूठा केस करने वालों को पता है की उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। अगर केस साबित हो गया तो सामने वाला बर्बाद, और अगर झूठा निकल गया तो भी उनका कुछ नहीं जाना। उन्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी।

और यही वो लूपहोल है जिसने इस देश में फर्जी मुकदमों की एक पूरी की पूरी ‘इंडस्ट्री’ खड़ी कर दी है। विष्णु तिवारी इसी इंडस्ट्री और इस अंधे-बहरे कानून का सबसे बड़ा शिकार है।

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