आप सबसे बड़े मुर्ख हैं अगर आप ये सोचते हैं की ये हरामखोर मुगल हमारे भारत में सिर्फ दौलत लूटने आए थे, या फिर वो बस अपने इस्लाम का प्रचार करना चाहते थे।
अरे भाई, अगर तुम्हें सिर्फ अपने मज़हब का प्रचार करना था, अगर तुम्हें सिर्फ अपने अल्लाह के आगे सजदा करना था और नमाज़ ही पढ़नी थी, तो क्या इस विशाल भारतवर्ष में खाली ज़मीनों की कोई कमी पड़ गई थी?
ज़रा आंखें खोलकर और दिमाग लगाकर सोचिए! जिस दौर में ये खूंखार मुगल भारत में घुसे थे, उस वक्त देश की आबादी आज जैसी नहीं थी। लाखों हेक्टेयर खाली ज़मीनें पड़ी थीं। बड़े-बड़े खाली मैदान थे, बंजर ज़मीनें थीं, और न जाने कितने वीरान इलाके थे जहाँ कोई आता-जाता तक नहीं था।
ये मुगल और सुल्तान चाहते तो उन खाली मैदानों पर अपनी आलीशान मस्जिदें खड़ी कर सकते थे। ये चाहते तो नई ज़मीनों पर अपने मज़हब के झंडे गाड़कर वहां इबादत कर सकते थे।
लेकिन नहीं! इन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। इन गंदी नाली के कीड़ों ने जानबूझकर उन खाली ज़मीनों को छोड़ दिया और अपने नापाक कदम सीधे हमारे उन भव्य, सजे-धजे और हज़ारों साल पुराने मंदिरों की तरफ बढ़ाए, जो हमारी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र थे।
इन्होंने हमारे मंदिरों की दीवारों को हथौड़ों से तोड़ा, हमारी मूर्तियों को खंडित किया और उसी मलबे के ऊपर अपनी मस्जिदों के ढांचे खड़े कर दिए।
क्यों? कभी सोचा है आपने? क्योंकि नमाज़ पढ़ना तो महज़ एक बहाना था मेरे भाई! असली मकसद तो इस सनातन धर्म के वजूद को जड़ से मिटाना था। इनका टारगेट ज़मीन नहीं थी, इनका टारगेट हमारे सनातन का गौरव था।
ये जानते थे की एक खाली मैदान पर मस्जिद बनाने से हिंदुओं के दिल पे वो चोट नहीं पहुंचेगी जो हिंदुओं के सबसे पवित्र मंदिर को ज़मीनदोज़ करके उसके ऊपर अपना गुंबद चढ़ाने से मिलेगी।
अयोध्या से लेकर मथुरा और भोजशाला तक, नीच जिहादी मुगलों ने जानबूझकर सनातन के सबसे अहम स्थानों पर किये क्रूर प्रहार
अब ज़रा इन मुगलों की उस नीच और गिरी हुई सोच की गहराई में उतरते हैं। आप पूरे भारत का नक्शा उठा लीजिए और उन जगहों को देखिए जहाँ इन आक्रांताओं ने सबसे ज़्यादा बर्बरता दिखाई।
इन्होंने देश के किसी अनजान या छोटे-मोटे मंदिर को अपना पहला शिकार नहीं बनाया। इन्होंने बहुत ही चालाकी और खौफनाक साज़िश के तहत चुन-चुन कर उन मंदिरों को निशाना बनाया, जो करोड़ों हिंदुओं की आत्मा थे।
इन्होंने अयोध्या में हमारे रोम-रोम में बसने वाले प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान को चुना। इन्होंने मथुरा में हमारे कन्हैया, हमारे कृष्ण लला के पवित्र गर्भगृह को अपनी बर्बरता का शिकार बनाया।
इन्होंने काशी में तीनों लोकों के स्वामी आदि विशेश्वर महादेव के मंदिर की छाती चीरी। इन्होंने मध्य प्रदेश के धार में विद्या की देवी मां वाग्देवी की पवित्र ‘भोजशाला’ को निशाना बनाया और जौनपुर में अटाला देवी के भव्य मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद तान दी।
अरे भाई, ये कोई इत्तेफाक नहीं था! ये सीधे-सीधे सनातन धर्म के ‘दिल’ पर किया गया सबसे क्रूर और जानलेवा प्रहार था। अयोध्या, मथुरा और काशी- ये वो जगहें हैं जहाँ से इस पूरे सनातन की धड़कनें चलती हैं।
ये हमारी आस्था की वो जीवन रेखा हैं, जिनसे हिंदू समाज को ऊर्जा मिलती है। इन जिहादी मुगलों को बहुत अच्छे से पता था की अगर हिंदू समाज को हमेशा के लिए अपना गुलाम बनाना है, अगर इनकी रीढ़ की हड्डी तोड़नी है, तो सबसे पहले इनके इन सबसे बड़े अराध्य देवों के घरों को तोड़ना होगा।
इनका एजेंडा एकदम शीशे की तरह साफ था- हिंदुओं को ये बताना की “जिस राम और कृष्ण की तुम पूजा करते हो, देखो आज हमने उनके ही घरों को मटियामेट कर दिया है और तुम कुछ नहीं उखाड़ पाए।”
ये चाहते थे की जब भी कोई हिंदू काशी या मथुरा जाए, तो उसे अपने आराध्य का भव्य दरबार नहीं, बल्कि अपनी छाती पर गड़ा हुआ एक जिहादी गुंबद नज़र आए। इन मुगलों ने हमारे मंदिरों को हमारे धर्म में ‘अपना कब्ज़ा’ समझ के तोड़ा।
रामायण और गीता पर थोप दिया जिहादी गुंबद, आने वाली नस्लों को मानसिक गुलाम बनाने का इन मुग़लों का खतरनाक मंसूबा
ये जिहादी मुगल बहुत दूर की सोचते थे भाई! ये सिर्फ उस दौर के हिंदुओं को नहीं डराना चाहते थे, बल्कि ये भारत की आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों को हमेशा-हमेशा के लिए एक गहरी मानसिक गुलामी और हीन भावना के अंधेरे कुएं में धकेलना चाहते थे।
इसे ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ कहते हैं। ज़रा इनकी इस खौफनाक और ज़हरीली साइकोलॉजी को डिकोड कीजिए। इन मुगलों को पता था की ये हिंदुओं के घर से उनकी रामायण, महाभारत और पुराण तो नहीं छीन सकते।
इन्हें मालूम था की आने वाले सौ साल, दो सौ साल या पांच सौ साल बाद भी एक हिंदू बच्चा जब बड़ा होगा, तो वो अपने धर्मग्रंथ पढ़ेगा। वो पढ़ेगा की मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म अयोध्या की उस पवित्र सरयू नदी के किनारे हुआ था।
वो पढ़ेगा की भगवान कृष्ण ने मथुरा की उस पावन धरती पर जन्म लिया था। वो पढ़ेगा की काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है।
लेकिन साज़िश का सबसे भयानक हिस्सा तो इसके बाद शुरू होता है! जब वो हिंदू बच्चा अपनी रामायण और गीता पढ़कर, पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ उन पवित्र जन्मस्थानों पर माथा टेकने जाएगा, तो वहां ज़मीन पर उसे क्या मिलेगा?
वहां उसे अपने राम का कोई भव्य महल नहीं मिलेगा, वहां उसे अपने कन्हैया का कोई सुंदर गर्भगृह नहीं मिलेगा। वहां उसे मिलेगा एक बदसूरत, आक्रामक और थोपा हुआ मस्जिद का गुंबद!
जब वो हिंदू उस गुंबद को देखेगा, तो उसके बाल-मन पर, उसकी आत्मा पर क्या असर होगा? वो अंदर ही अंदर टूट जाएगा। उसके दिमाग में ये ज़हर बैठ जाएगा की “अगर मेरे भगवान अपने ही घर को इन मुगलों से नहीं बचा पाए, तो वो मेरी क्या रक्षा करेंगे?”
उसके अंदर एक ऐसी बेबसी, एक ऐसी लाचारी और एक ऐसी निराशा भर जाएगी की वो अपनी ही संस्कृति और अपने ही इतिहास से हार मान लेगा।
यही तो मुगलों की वो सबसे नीच और गिरी हुई साज़िश थी! वो चाहते थे की हम हिंदू कभी सीना तानकर खड़े ना हो सकें। वो चाहते थे की हम हमेशा अपने ही देश में एक हारे हुए, थके हुए और कुचले हुए समाज की तरह जिएं।
ये मंदिरों का विध्वंस नहीं था मेरे भाई, ये हमारी नस्लों का ‘मानसिक धर्मांतरण’ करने की वो खौफनाक फैक्ट्री थी जिसे इन मुगलों ने पूरे भारत में चप्पे-चप्पे पर लगा दिया था। ये चाहते थे की हर मस्जिद का गुंबद हमें रोज़ हमारी गुलामी और हमारी हार की याद दिलाता रहे, ताकि हम कभी इनके खिलाफ बगावत करने की हिम्मत ही ना जुटा पाएं।
प्रयाग को इलाहाबाद बनाया, शहरों के नाम बदलने और मंदिरों के ढांचे बिगाड़ने की वो गिरी हुई सोच
अब ज़रा इन मुगलों और जिहादी आक्रांताओं की उस नीचता और बेशर्मी की बात करते हैं, जिसे सोचकर ही किसी भी स्वाभिमानी हिन्दू की रूह कांप जाए। इनका मकसद सिर्फ हमारे भगवान की मूर्तियों को तोड़ना नहीं था।
इन्होंने तो बकायदा हमारी पूरी की पूरी पहचान, हमारे इतिहास और हमारी संस्कृति का सरेआम चीरहरण करने का ठेका ले रखा था। आप ज़रा इनके काम करने का तरीका देखिए।
जब ये विदेशी लुटेरे किसी हिंदू शहर पर कब्ज़ा करते थे, तो सबसे पहले क्या करते थे? ये उस हज़ारों साल पुराने बसे-बसाए शहर का नाम रातों-रात बदल देते थे।
भगवान राम के प्रयाग को इन्होंने ‘इलाहाबाद’ कर दिया। कर्णावती का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद’ कर दिया गया। भाग्यनगर को ‘अहमदाबाद’ और मुरादाबाद जैसे ना जाने कितने ही शहरों पर अपने मज़हब की मोहर लगा दी।
अरे भाई, अगर तुम्हें शहर बसाने का इतना ही शौक था, तो तुम खाली ज़मीनों पर अपने नए शहर बसा लेते! लेकिन नहीं, इन्हें तो बने-बनाए हिंदू शहरों पर कब्ज़ा करके वहां के मूल निवासियों को ज़लील करना था। ये हमारी ज़ुबान से हमारी संस्कृति का नाम तक मिटा देना चाहते थे।
लेकिन इनकी क्रूरता की सारी हदें तो तब पार हो गईं, जब इन्होंने हमारे मंदिरों के साथ सबसे अमानवीय और खौफनाक खिलवाड़ किया। इन मुगलों ने कई मंदिरों को पूरा नहीं तोड़ा।
इन्होंने बहुत ही गंदी और ज़हरीली साज़िश के तहत जानबूझकर मंदिर की दीवारों, नक्काशीदार खंभों और दरवाज़ों को वैसे ही आधा-अधूरा खड़ा रहने दिया और उनके ऊपर बस अपना एक भद्दा सा ‘गुंबद’ चढ़ा दिया।
ज्ञानवापी की उस पश्चिमी दीवार को जाकर देखिए, जहाँ आज भी हमारे साक्षात मंदिर के निशान चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं। दिल्ली की कुतुब मीनार (विष्णु स्तंभ) के उन खंभों को देखिए जहाँ हमारे भगवान गणेश और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को जानबूझकर उल्टा और पैरों के पास लगाया गया।
ये क्या था? क्या इन मुगलों के पास पत्थर और ईंटों की कमी थी जो इन्हें हमारे मंदिरों का मलबा इस्तेमाल करना पड़ा? बिल्कुल नहीं!
ये चाहते थे की जब एक हिंदू उस रास्ते से गुज़रे, तो वो अपनी ही देवी-देवताओं की मूर्तियों को उन जिहादियों के पैरों तले रौंदा जाता हुआ देखे। वो देखे की जिस गर्भगृह में वो कभी माथा टेकता था, आज वहां ये आक्रांता अपने गंदे पैर धो रहे हैं (जैसे ज्ञानवापी के वज़ूखाने में)।
ये हमें रोज़, हर पल, हर सेकंड जलील करने की एक क्रूर व्यवस्था थी। ये कोई इबादत गाहें नहीं थीं, ये वो कसाईखाने थे जिन्हें इन मुगलों ने ‘मस्जिद’ का नाम दे दिया था।
रेगिस्तान से आये अनपढ़ मुगलों की उस कायरता का सच जो हमारी सनातन कला को देखकर जल-भुन गए थे
ज़रा इन विदेशी दरिंदों के बैकग्राउंड को समझिए। ये गज़नवी, गोरी, बाबर, खिलजी और औरंगज़ेब- ये सब उस रेगिस्तान और बंजर ज़मीनों से आए हुए कबीलाई लुटेरे थे, जिनके पास अपनी कोई संस्कृति, कोई कला या कोई महान आर्किटेक्चर नहीं था।
जब इन जाहिलों ने भारत में कदम रखा और यहाँ के भव्य मंदिरों को देखा, जब इन्होंने एलोरा, सोमनाथ, काशी और तंजावुर के वो आसमान चूमते हुए नक्काशीदार मंदिर देखे, तो इनके अंदर एक भयंकर ‘हीन भावना’ और जलन पैदा हो गई।
इन जिहादी मुगलों को अपनी औकात समझ में आ गई थी की ये अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी भी भारत के कारीगरों जैसा एक खंभा भी नहीं तराश सकते। इसलिए, जो चीज़ तुम बना नहीं सकते, उसे तोड़ दो! ये इन कायरों की सबसे बड़ी निशानी थी।
किसी के हज़ारों सालों की मेहनत से बनाए गए मंदिर को तोड़कर वहां अपना गुंबद रख देना कोई बहादुरी नहीं है भाई, ये दुनिया की सबसे बड़ी और नीच कायरता है।
इनका असली और इकलौता मकसद था ‘गज़वा-ए-हिंद’। ये भारत के नक्शे से ‘सनातन’ और ‘हिंदू’ शब्द को हमेशा के लिए मिटा देना चाहते थे। ये इस देश की आत्मा पर एक ऐसा इस्लामिक खौफ बिठाना चाहते थे की कोई भी हिंदू सिर उठाकर आसमान की तरफ ना देख सके।
ये चाहते थे की हम मान लें कि हमारे भगवान भी इन मुगलों की तलवारों से डर गए। ये अपनी इबादत से ज़्यादा हमारी तड़प और हमारे आंसुओं से खुश होते थे। इन मुगलों की रगों में जो ज़हर दौड़ रहा था, वो किसी इंसान का नहीं, बल्कि एक ऐसे खूंखार जानवर का था जिसे सिर्फ खून और बर्बादी देखकर ही सुकून मिलता था।
रामलला के बाद अब ज्ञानवापी और मथुरा की है बारी, मुगलों के हर जिहादी पाप को मलबे में तब्दील करेगा हिन्दू समाज
लेकिन ये दरिंदे मुगल अपने घमंड में एक बहुत बड़ी बात भूल गए थे। ये भूल गए थे की जिस सनातन धर्म से ये टकरा रहे हैं, वो कोई कुछ सौ साल पुरानी कबीलाई सोच नहीं है। ये वो सनातन धर्म है जिसकी जड़ें पाताल से लेकर ब्रह्मांड तक फैली हुई हैं।
इन मुगलों ने हमारे मंदिर तोड़े, हमारी मूर्तियां तोड़ीं, हमारे विश्वविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया, हमारे शहरों के नाम बदल दिए, लेकिन ये कभी हमारे दिलों से हमारे राम, हमारे कृष्ण और हमारे महादेव को नहीं निकाल पाए।
इन जिहादियों ने सोचा था की गुंबद चढ़ा देने से हिंदू अपनी आस्था भूल जाएगा। लेकिन हमारे पूर्वजों ने घास की रोटियां खानी मंज़ूर कीं, अपने सीनों पर मुगलों की तलवारें खानी मंज़ूर कीं, हमारी रानियों ने धधकती हुई आग (जौहर) में कूदना मंज़ूर किया, लेकिन कभी इन दरिंदों के आगे अपना सनातन धर्म नहीं छोड़ा।
मुगलों की वो क्रूर सल्तनतें आज मिट्टी में मिल चुकी हैं। जो औरंगज़ेब खुद को ‘आलमगीर’ कहता था, उसकी कब्र पर आज कुत्ते भी नहीं जाते। लेकिन हमारा सनातन धर्म आज भी उसी शान और उसी स्वाभिमान के साथ सीना तानकर खड़ा है!
आज 500 सालों के लंबे और खूनी संघर्ष के बाद, अयोध्या में हमारे रामलला टेंट से निकलकर अपने उसी भव्य और दिव्य महल में वापस विराजमान हो चुके हैं। ये सिर्फ एक मंदिर का निर्माण नहीं है मेरे भाई!
ये राम मंदिर उन तमाम मुगल जिहादियों और आक्रांताओं की कब्र पर सनातन का वो खौफनाक ‘तांडव’ है जो चीख-चीख कर पूरी दुनिया को बता रहा है की हिंदू कभी हारता नहीं है। हम सोते ज़रूर हैं, लेकिन जब जागते हैं तो जिहादियों की निशानियों को जड़ से उखाड़ कर फेंक देते हैं।
अब वो दौर बीत चुका है जब हिंदू अपनी टूटी हुई मूर्तियों को देखकर सिर्फ आंसू बहाता था। आज का हिंदू अपनी आंखों में वो आग लेकर चल रहा है जो इन मुगलों के हर पाप को भस्म करने के लिए काफी है।
नमाज़ के नाम पर, इबादत के नाम पर जो ये अवैध गुंबद खड़े किए गए थे, अब उन सबका हिसाब होगा। ज्ञानवापी का वज़ूखाना हो, जहाँ हमारे महादेव का सदियों तक अपमान किया गया, या फिर मथुरा की वो शाही ईदगाह हो जो हमारे कन्हैया के गर्भगृह पर एक भद्दे कलंक की तरह बैठी है- अब हम एक इंच भी ज़मीन इन जिहादी ढांचों के लिए नहीं छोड़ेंगे।
धार की भोजशाला से लेकर जौनपुर के अटाला मंदिर तक, हर उस जगह का हिसाब होगा जहाँ मुगलों ने अपनी कायरता का नंगा नाच किया था। स्वतंत्र और सशक्त भारत में गुलामी की इन निशानियों के लिए कोई जगह नहीं है।
अब सिर्फ शंख बजेगा, और वो शंख इन मुगलों की हर उस गंदी मस्जिद को इस पवित्र भारतवर्ष से हमेशा के लिए मिटा देगा!
हर हर महादेव! जय श्री राम!
