सऊदी अरब ने जिसपर 'आतंक का द्वार' बताकर लगाया बैन, वो 'तबलीगी जमात' भारत में खुल्ले में ले रहा सांस, जिहाद की इस फैक्ट्री के सामने हाथ बांधे खड़ा हमारा सिस्टम

सऊदी अरब ने जिसपर ‘आतंक का द्वार’ बताकर लगाया बैन, वो ‘तबलीगी जमात’ भारत में खुल्ले में ले रहा सांस, जिहाद की इस फैक्ट्री के सामने हाथ बांधे खड़ा हमारा सिस्टम

इस देश के सिस्टम को आखिर कौन सा लकवा मार गया है? हम दिन-रात ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘भाईचारे’ का वो सड़ा हुआ चूरन फांक रहे हैं, जिसकी एक्सपायरी डेट बहुत पहले ही निकल चुकी है।

जिस देश में मक्का और मदीना है, जो देश खुद को इस्लाम का सबसे बड़ा ठेकेदार और गढ़ मानता है, उस सऊदी अरब ने जिस संगठन को अपने यहाँ से लात मारकर बाहर निकाल दिया, वो संगठन हमारे महान भारत में बैठकर खुल्लम-खुल्ला अपनी जिहादी फैक्ट्री चला रहा है।

अरे भाई, मैं बात कर रहा हूँ उस ‘तबलीगी जमात’ की! दिसंबर 2021 का वो ऐतिहासिक दिन याद कीजिए। सऊदी अरब ने अपने देश की हर मस्जिद से जुमे की नमाज़ के दौरान एक खौफनाक ऐलान करवाया था।

सऊदी सरकार ने डंके की चोट पर कहा की ये ‘तबलीगी जमात’ “समाज के लिए एक बहुत बड़ा खतरा” और “आतंकवाद का प्रवेश द्वार” है।

ज़रा सोचिए! जो सऊदी अरब पूरी दुनिया में इस्लाम का झंडा बुलंद करता है, जब उसे अपने ही देश की सुरक्षा और अपने समाज के लिए इस संगठन में आतंकवाद के बीज नज़र आ गए, तो उसने बिना किसी सेक्युलर नौटंकी के इसे हमेशा-हमेशा के लिए बैन कर दिया।

उन्होंने साफ कह दिया की हमारे देश में इस जमात से जुड़ा कोई भी आदमी दिखा तो उसे सीधा काल कोठरी में डाल दिया जाएगा।

लेकिन हमारे इस ‘महान’ भारत में क्या हो रहा है? यहाँ हमारे देश के नेता, हमारी पुलिस और हमारी जांच एजेंसियां इस संगठन पर हाथ डालने से ऐसे कांपती हैं जैसे कोई बच्चा आग को छूने से डरता हो।

सऊदी अरब ने तो इन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक दिया, लेकिन हमारे देश का सड़ा हुआ सिस्टम और वोटबैंक की भूखी सरकारें इन्हें सिर पर बिठाकर बिरयानी खिला रही हैं। ये जमात आज भी भारत के चप्पे-चप्पे में अपने जाल बिछा रही है।

जब दुनिया के बाकी इस्लामिक देश इस कैंसर को पहचान कर इसका परमानेंट इलाज कर चुके हैं, तो भारत का सिस्टम इन जिहादी आकाओं के सामने घुटने क्यों टेके हुए है? ये वो सवाल है जो आज हर सच्चे सनातनी का खून खौला रहा है।

मेवात से लेकर निज़ामुद्दीन मरकज़ तक, भारत में ही पैदा हुई थी जिहाद और ब्रेनवॉश की ये ‘तबलीगी जमात’ फैक्ट्री

अब ज़रा इतिहास के उस पन्ने को पलटते हैं जहाँ से इस खौफनाक जिहादी वायरस का जन्म हुआ था। अगर कोई आपको ये पट्टी पढ़ाए की तबलीगी जमात कोई विदेशी बीमारी है, तो उसे आईना दिखा दीजिएगा। इस जिहादी फैक्ट्री का जन्म कहीं और नहीं, बल्कि हमारे इसी भारत में हुआ था।

साल था 1926! हरियाणा का वो मेवात इलाका (जहाँ आज हिंदुओं का रहना मुहाल कर दिया गया है), वहीं से मौलाना इलियास कांधलवी नाम के एक आदमी ने इस जमात की शुरुआत की थी।

और इसका असली मकसद क्या था? उस वक्त मेवात के जो मुसलमान (मेव) थे, वो अपनी पुरानी हिंदू परंपराओं का पालन करते थे। उनके नाम भी हिंदुओं जैसे होते थे, वो हिंदू त्योहार मनाते थे और उनकी संस्कृति में सनातन की झलक थी।

मौलाना इलियास को यही बात कांटे की तरह चुभती थी। उसने ये ‘तबलीगी जमात’ (जिसका मतलब होता है धर्म का प्रचार करने वाला समूह) इसलिए बनाई ताकि इन मेव मुसलमानों के दिमाग से हिंदू संस्कृति का बचा-खुचा नामोनिशान भी धोकर निकाल दिया जाए और उन्हें 7वीं सदी के उस कट्टर अरब वाले इस्लाम का गुलाम बना दिया जाए।

और फिर क्या था? मेवात से जो ज़हर फैलना शुरू हुआ, वो आज दिल्ली के बीचों-बीच, देश की राजधानी की नाक के नीचे ‘निज़ामुद्दीन मरकज़’ के रूप में एक बहुत बड़े ग्लोबल हेडक्वार्टर में तब्दील हो चुका है।

ये निज़ामुद्दीन मरकज़ कोई आम मस्जिद या इबादतगाह नहीं है। ये दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों में फैले कट्टरपंथियों का ‘नर्व सेंटर’ है। यहाँ से रोज़ फरमान निकलते हैं, यहाँ से रोज़ दुनिया भर में मौलवियों की फौज भेजी जाती है।

इनका ये जो ब्रेनवॉश का मॉडल है ना भाई, ये दुनिया का सबसे खतरनाक मॉडल है। ये लोग टीवी नहीं देखते, अखबार नहीं पढ़ते, राजनीति की बात नहीं करते। ये ऐसा नाटक करते हैं जैसे इन्हें दुनियादारी से कोई लेना-देना ही नहीं है।

लेकिन बंद दरवाज़ों के अंदर, मस्जिदों के अंधेरे कोनों में ये आम मुसलमानों के दिमाग में जो सॉफ्टवेयर फीड करते हैं, वो बहुत ही खौफनाक है।

ये उनके दिमाग में भरते हैं की “तुम्हारा देश, तुम्हारा कानून, तुम्हारा संविधान सब झूठा है। असली चीज़ सिर्फ 1400 साल पुराना वो अरबी इस्लाम है, और जो इसे नहीं मानता, वो काफिर है।”

हथियार नहीं, पर दिमाग में भरते हैं बारूद, अल कायदा से लेकर खूंखार आतंकियों तक जुड़े इस जमात के तार

जब भी इस तबलीगी जमात पर बैन लगाने की बात आती है, तो हमारे देश के वामपंथी और अर्बन नक्सल तुरंत अपना माइक लेकर सामने आ जाते हैं। ये बड़ी बेशर्मी से दलील देते हैं की “अरे जनाब!

तबलीगी जमात वाले तो बहुत शांतिप्रिय लोग हैं। क्या आज तक आपने किसी तबलीगी के हाथ में AK-47 या बम देखा है? ये तो सिर्फ नमाज़ पढ़ने की बात करते हैं।”

ये बात बिल्कुल सच है की तबलीगी जमात का आदमी सीधा सड़क पर जाकर बम नहीं फोड़ता। लेकिन ये जो साइलेंट जिहाद कर रहे हैं, वो उस बम से भी ज़्यादा खतरनाक है।

ये खुद बंदूक नहीं उठाते, ये बस उस नौजवान के दिमाग में वो ‘जेहादी बारूद’ भर देते हैं जिसके बाद वो नौजवान खुद जाकर आतंकवादी संगठनों में भर्ती हो जाता है।

खुफिया एजेंसियों और ग्लोबल टेरर रिपोर्ट्स का डेटा उठाकर देख लीजिए, रूह कांप जाएगी। इस तबलीगी जमात को दुनिया भर में “आतंकवाद का एंट्री गेट” कहा जाता है।

अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-मुजाहिदीन जैसे दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी संगठनों के न जाने कितने ही टॉप कमांडर और आतंकवादी पहले इसी तबलीगी जमात का हिस्सा हुआ करते थे। ये जमात उस नर्सरी की तरह काम करती है जहाँ से चुन-चुन कर कट्टर लड़कों को आतंकी संगठनों में सप्लाई किया जाता है।

गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाने वाले हत्यारे हों, या फिर अमेरिका का 9/11 हमला करने वाले आतंकी, या फिर स्पेन और लंदन में बम फोड़ने वाले खूंखार जिहादी- इनमें से कईयों के तार सीधे तौर पर तबलीगी जमात से जुड़े हुए पाए गए हैं। ये जमात एक वाशिंग मशीन की तरह है।

यहाँ आम मुसलमान आता है, उसका ब्रेनवॉश किया जाता है, उसके अंदर काफिरों के लिए नफरत भरी जाती है, और फिर जब वो पूरा जिहादी बन जाता है, तो आतंकवादी संगठन उसे अपना सुसाइड बॉम्बर बना लेते हैं।

और भारत तो छोड़िए, दुनिया के कई देशों ने इस खतरे को बहुत पहले ही भांप लिया था। रूस, ईरान, उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देशों ने इस जमात को अपने यहाँ घुसने तक पर बैन लगा रखा है।

उन्हें पता है की जहाँ ये तबलीगी जाएंगे, वहां की शांति को जलाकर राख कर देंगे। पर हमारे सेक्युलर भारत में ये आज भी आराम से बिरयानी खा रहे हैं।

टूरिस्ट वीज़ा पर आते हैं विदेशी शांतिदूत, और भारत के चप्पे चप्पे में बोते हैं जिहाद का ज़हर

अब ज़रा इस पूरे खौफनाक नेटवर्क के उस फ्रॉड को समझिए जो भारत सरकार की नाक के नीचे दशकों से चल रहा है। हर साल इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश, किर्गिस्तान और ना जाने किन-किन अरब देशों से हज़ारों की तादाद में ये विदेशी शांतिदूत भारत आते हैं। और मजे की बात देखिए, ये आते किस वीज़ा पर हैं? ‘टूरिस्ट वीज़ा’ पर!

मतलब कागज़ों पर ये भारत सरकार को ये बताकर आते हैं की हम तो यहाँ ताजमहल देखने आए हैं, कुतुब मीनार देखने आए हैं, हम तो टूरिस्ट हैं। लेकिन भारत की ज़मीन पर कदम रखते ही ये सीधे दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ में घुस जाते हैं।

वहां से इनकी टीमें (जमातें) बनती हैं और फिर ये टूरिस्ट वीज़ा वाले विदेशी मुल्ले भारत के गांव-गांव, गली-गली की मस्जिदों में फैल जाते हैं। वहां ये 40-40 दिन तक कैंप लगाते हैं और हमारे देश के लोगों को कट्टरपंथ की ट्रेनिंग देते हैं।

और सबसे बड़ा नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट तो इनकी फंडिंग का है। ये जो विदेशी टूरिस्ट आते हैं, ये अपने साथ हवाला के ज़रिए करोड़ों रुपया भारत के अंदर लाते हैं।

ये पैसा कहां से आता है? किन आतंकी संस्थाओं से आता है? इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। ये पैसा सीधे भारत के अंदर मज़हबी कट्टरपंथ को पालने के लिए इस्तेमाल होता है।

ये विदेशी प्रचारक भारत के चप्पे-चप्पे की रेकी करते हैं, यहाँ के मुसलमानों को भड़काते हैं और फिर चुपचाप अपने देश लौट जाते हैं।

क्या देश की सुरक्षा से बड़ा वोटबैंक का डर, इस खौफनाक सिंडिकेट पर बैन लगाने से क्यों कांप रही सरकार

अब सबसे बड़ा और सीधा सवाल हमारी अपनी सरकारों, इस सिस्टम और सत्ता में बैठे उन नेताओं से है जो दिन-रात राष्ट्रवाद का दम भरते हैं।

अरे भाई, जब तुमने देश की सुरक्षा को खतरा मानकर SIMI जैसे संगठन पर बैन लगा दिया, तुमने खूंखार पीएफआई (PFI) को रातों-रात पूरे देश में बैन कर दिया… तो फिर इस तबलीगी जमात के नाम पर तुम्हारे हाथ क्यों कांपने लगते हैं?

संसद में बैठे हमारे हिंदूवादी नेताओं को ये बात अपने दिमाग में अच्छे से बैठा लेनी चाहिए की जब सऊदी अरब जैसा एक इस्लामिक देश अपने भविष्य और अपने समाज को बचाने के लिए इन तबलीगियों को “आतंकवाद का गेट” बताकर लात मार सकता है, तो फिर हमारा भारत तो इन जिहादियों के ‘गज़वा-ए-हिंद’ के निशाने पर सबसे ऊपर है! हमारे लिए तो ये खतरा सऊदी से सौ गुना ज़्यादा बड़ा और खौफनाक है।

अगर आज तुमने इस जिहादी फैक्ट्री पर परमानेंट ताला नहीं जड़ा, तो कल ये तुम्हारे मंदिरों पर ताला जड़ने के लिए सड़कों पर उतर आएंगे!

Scroll to Top