जो सत्ता से दूर रहकर सिर्फ किसान और मिट्टी के हक़ के लिए लड़े, जिनकी आवाज़ को अपना भगवान मानते थे देश भर के अन्नदाता, किसानों के उस निडर मसीहा ‘महेंद्र सिंह टिकैत’ जी को जयंती पर शत-शत नमन

जब भी हिंदुस्तान के खेतों, खलिहानों और असली किसान मसीहा का ज़िक्र आता है, तो आँखों के सामने एक ही तस्वीर उभरती है।

एक ऐसा इंसान जिसके माथे पर मिट्टी का तिलक हो, सिर पर सफेद गांधी टोपी, बदन पर ढीला-ढाला सा कुरता, हाथों में एक मज़बूत लाठी और पास रखा हो एक सुलगता हुआ हुक्का।

आज 6 अक्टूबर है। आज ही के दिन इस देश की मिट्टी ने एक ऐसे सपूत को जन्म दिया था, जिसके आगे दिल्ली का बड़ा से बड़ा सिंहासन भी हाथ जोड़कर खड़ा रहता था।

हम बात कर रहे हैं किसानों के सबसे बड़े, निडर और बेबाक मसीहा- चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जी की, जिन्हें पूरा देश प्यार और सम्मान से ‘बाबा टिकैत’ बुलाता है।

आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है। नेता लोग दो लोग भी इकट्ठा करते हैं, तो दस कैमरे लेकर चलते हैं। लेकिन बाबा टिकैत का वो दौर याद करो!

उन्हें किसी PR या ट्विटर ट्रेंड की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी। मुज़फ्फरनगर के सिसौली गांव की चौपाल पर रखे उनके हुक्के की एक गुड़गुड़ाहट और उनकी एक हुंकार ही काफी होती थी।

बस उनकी एक आवाज़ पर गांव-गांव से लाखों किसान अपने ट्रैक्टर और बैलगाड़ियां लेकर निकल पड़ते थे।

आजकल तो हर बात में राजनीति घुस गई है, लेकिन बाबा टिकैत एक शुद्ध अराजनैतिक (Apolitical) संत थे। उन्हें सत्ता की कुर्सी, लाल बत्ती या चुनाव लड़ने का रत्ती भर भी लालच नहीं था।

उनका बस एक ही उसूल था- खेती-बाड़ी बचेगी, तो किसान बचेगा, और किसान बचेगा तभी ये देश बचेगा।

सिर्फ 8 साल की उम्र में सिर पर बंधी बालियान खाप की पगड़ी और कंधों पर आ गया लाखों किसानों का भार

महेंद्र सिंह टिकैत के बचपन की कहानी एकदम अलग और रोंगटे खड़े कर देने वाली है। 6 अक्टूबर 1935 को मुज़फ्फरनगर के सिसौली गांव में उनका जन्म हुआ था।

घर में खेती-किसानी का माहौल था। लेकिन जब वो महज़ 8 साल के थे, तब अचानक उनके सिर से पिता चौधरी चौहल सिंह का साया हमेशा के लिए उठ गया।

पिता के निधन के बाद 1943 में उसी छोटी सी उम्र में इस बच्चे के सिर पर ‘बालियान खाप’ की पगड़ी बांध दी गई। अब आप पूछेंगे की ये खाप क्या होती है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बालियान खाप किसानों और जाट समाज की सबसे पुरानी और ताकतवर खापों में से एक मानी जाती है। जिसके सिर पर इसकी पगड़ी होती है, उसका हर एक फैसला लाखों परिवारों के लिए पत्थर की लकीर होता है।

महज़ 8 साल की उम्र में उस छोटे से बच्चे के कंधों पर लाखों किसानों के सुख-दुख का भार आ गया था। और कमाल की बात देखिए, उस बच्चे ने अपनी ज़िम्मेदारी को इतने शान और रौब से निभाया की वो आगे चलकर पूरे देश के किसानों का ‘बाबा’ बन गया।

वैसे, बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे की ‘टिकैत’ कोई जाति या सरनेम नहीं है। यह एक बहुत ही गौरवशाली उपाधि (Title) है। इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पता चलेगा की 7वीं शताब्दी में जब राजा हर्षवर्धन का शासन था, तब उन्होंने ही बालियान खाप के मुखिया को ‘टिकैत’ की उपाधि से नवाज़ा था।

इसका मतलब होता है वो व्यक्ति जिसके माथे पर सम्मान का ‘टीका’ हो। उस 8 साल के अनाथ बच्चे ने राजा हर्षवर्धन द्वारा दी गई इस 1200 साल पुरानी विरासत और उपाधि का ऐसा मान रखा की आज ‘टिकैत’ शब्द खुद-ब-खुद किसान आंदोलन का सबसे बड़ा पर्यायवाची बन चुका है।

करमूखेड़ी का वो बिजली आंदोलन जिसने खड़ी कर दी भारतीय किसान यूनियन की सबसे बड़ी फौज

अब बात करते हैं की सिसौली गांव का वो सीधा-साधा चौधरी आखिर पूरे हिंदुस्तान के किसानों की आवाज़ कैसे बन गया। ये बात है साल 1987 की।

उस दौर में किसानों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन सबसे बड़ा दर्द था बिजली! बिजली आती नहीं थी, और बिल इतने भारी-भरकम आते थे की बेचारा किसान अपना खेत बेचकर भी उन्हें नहीं भर पाता था।

शामली के पास एक जगह है- करमूखेड़ी। वहां के पावरहाउस पर बिजली के बढ़े हुए रेट्स और अंधाधुंध कटौतियों को लेकर किसानों ने धरना शुरू कर दिया।

यहीं से बाबा टिकैत ने अपने जीवन का पहला सबसे बड़ा और संगठित बिगुल फूंका। इस धरने में ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि सरकार के भी हाथ-पांव फूल गए।

इसी करमूखेड़ी के ऐतिहासिक आंदोलन की कोख से 17 अक्टूबर 1987 को जन्म हुआ ‘भारतीय किसान यूनियन’ (BKU) का।

एक ऐसा संगठन जिसने ना कभी कोई चुनाव लड़ा, और ना ही कभी सत्ता के सामने घुटने टेके, बल्कि इसने किसानों को वो ताकत दी जो उन्हें आज़ादी के बाद से कभी नहीं मिली थी।

करमूखेड़ी के बाद तो जैसे किसानों का सोया हुआ स्वाभिमान जाग उठा। कुछ ही महीनों बाद, 1988 की शुरुआत में, बाबा टिकैत ने मेरठ में कमिश्नर के दफ्तर का घेराव करने का ऐलान कर दिया।

उस वक़्त उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (ND Tiwari) की सरकार थी। प्रशासन को लगा की दो-चार सौ किसान आएंगे, थोड़ा हल्ला-गुल्ला करेंगे और चले जाएंगे। लेकिन जो नज़ारा मेरठ की सड़कों ने देखा, वो दुनिया में पहले कभी किसी ने नहीं देखा था!

लाखों की तादाद में किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में राशन-पानी लादकर मेरठ पहुँच गए। लगातार 25 दिन तक मेरठ की वो ऐतिहासिक कमिश्नरी किसानों के कब्ज़े में रही।

आप यकीन मानेंगे? 25 दिन तक लाखों की भीड़ एक ही जगह डटी रही, लेकिन वहां एक भी शीशा नहीं टूटा, किसी आम इंसान को कोई खरोंच नहीं आई।

एकदम गज़ब का अनुशासन! किसानों ने सड़कों पर ही अपने चूल्हे जला लिए, वहीं खाना पकता, वहीं हुक्का गुड़गुड़ाता और वहीं सरकार से बातचीत की रणनीतियां बनतीं।

प्रशासन और पुलिस की हिम्मत ही नहीं हो रही थी की वो बाबा टिकैत के एक भी आदमी पर लाठी उठा सकें। इस 25 दिन के घेराव ने पूरे देश को ये बता दिया था की सिसौली से उठा यह किसान नेता कोई मामूली इंसान नहीं है।

इसने खेती-किसानी करने वाले उस भोले-भाले इंसान को एक फौजी की तरह खड़ा कर दिया है।

राजपथ पर चूल्हे और संसद के बाहर किसानों का डे,रा जब बाबा टिकैत ने हिला दी थी दिल्ली की सत्ता

मेरठ का वो 25 दिन का घेराव तो बस एक ट्रेलर था दोस्त। असली फिल्म तो अभी दिल्ली में रिलीज़ होनी बाकी थी। साल 1988 आते-आते बाबा टिकैत का नाम पूरे उत्तर भारत में गूंजने लगा था।

अब बारी थी सीधे दिल्ली के तख़्त को हिलाने की, ताकि देश के हुक्मरानों को ये समझ आ जाए की किसान सिर्फ खेत में पसीना नहीं बहाता, बल्कि हक़ छिनने पर वो संसद का दरवाज़ा भी खटखटा सकता है।

तारीख थी 25 अक्टूबर 1988। बाबा टिकैत की बस एक पुकार पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान से करीब 5 लाख किसान अपने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और बैलगाड़ियों में भरकर दिल्ली की तरफ कूच कर गए।

मंज़िल थी दिल्ली का सबसे वीआईपी (VIP) इलाका- ‘बोट क्लब’। ये वही जगह है जो इंडिया गेट और संसद भवन के बिल्कुल करीब है, जहां आज कर्त्तव्य पथ की चकाचौंध दिखती है।

दिल्ली वालों ने अपनी ज़िंदगी में ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा था। जिन सड़कों पर सिर्फ मंत्रियों की लाल बत्ती वाली गाड़ियां सायरन बजाते हुए गुज़रती थीं, वहां अचानक मीलों लंबी ट्रैक्टरों की कतारें लग गईं।

इंडिया गेट के मखमली लॉन पर किसानों ने अपने तंबू गाड़ दिए। कुछ ही घंटों में वहां ईंटों के चूल्हे जल गए, कढ़ाइयों में दाल-रोटी पकने लगी और पूरे वीआईपी इलाके में हुक्के की गुड़गुड़ाहट और ढोल-नगाड़ों की थाप गूंजने लगी।

बाबा टिकैत ने अपने फक्कड़ अंदाज़ में वहीं ज़मीन पर बैठकर मंच लगा लिया।

लगातार 14 दिनों तक देश की राजधानी पूरी तरह से किसानों के कब्ज़े में रही। दिल्ली ठप पड़ गई थी, लेकिन कमाल की बात ये थी की 5 लाख की उस भारी भीड़ ने ना तो कोई दुकान लूटी, ना किसी से बदतमीज़ी की। वो बस अपनी मांगों को लेकर शांति से, लेकिन पूरी ज़िद के साथ डटे रहे।

आख़िरकार, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को इस किसान मसीहा के हठ के आगे झुकना ही पड़ा। सरकार ने गन्ने के रेट बढ़ाने से लेकर बिजली-पानी के बिलों में छूट तक, किसानों की सभी 35 मांगें मान लीं।

उस दिन पूरे देश ने देखा की जब एक सच्चा और निस्वार्थ नेता खड़ा होता है, तो दिल्ली की बड़ी से बड़ी सत्ता को भी उसके सामने अपने घुटने टेकने ही पड़ते हैं।

एक लाठी सफेद धोती और ठेठ बोली, बाबा टिकैत की वो सादगी जो आज भी हर किसान के दिल में ज़िंदा है

अगर आप कभी बाबा टिकैत की कोई पुरानी तस्वीर देखेंगे, तो आपको उनमें कोई नेता नहीं, बल्कि अपने ही घर का कोई बुज़ुर्ग दिखाई देगा।

उनकी सादगी ही उनका सबसे बड़ा हथियार थी।

उनकी भाषा में कोई बनावट या ‘डिप्लोमेसी’ नहीं थी। वो बड़े से बड़े आईएएस (IAS) अफसर या अंग्रेजी बोलने वाले मंत्रियों से भी अपनी उसी ठेठ ‘खड़ी बोली’ (जाटू भाषा) में बात करते थे। जो दिल में होता था, वही उनकी ज़बान पर होता था।

मिट्टी की वो खुरदरी सच्चाई उनकी बातों से झलकती थी, और शायद इसीलिए जब वो बोलते थे, तो सामने वाला अफसर भी चुपचाप सिर झुकाकर सुनता था।

ज़िंदगी भर मिट्टी और किसानों के हक़ के लिए लड़ने वाले इस महान संत ने 15 मई 2011 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

75 साल की उम्र में हड्डी के कैंसर से लड़ते हुए उन्होंने अपनी आख़िरी सांस ली।

आज 6 अक्टूबर है, उनकी जयंती का दिन।

जब तक हिंदुस्तान की मिट्टी में महक है, जब तक चौपालों पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट है और जब तक खेतों में किसान का पसीना गिर रहा है… तब तक ‘बाबा महेंद्र सिंह टिकैत’ का नाम इस देश के इतिहास में सुनहरे और अमर अक्षरों में चमकता रहेगा।

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