हमारे देश में बैठे इन इन ‘दिमागी नक्सलियों’ और प्रोटेस्ट ब्रिगेड ने तो भैया एडवांस में ही जश्न मनाने की पूरी तैयारी कर ली थी।
इन्हें पक्का यकीन था की आज तो ये सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, थोड़ा रोना-धोना करेंगे और सीधे चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) ज्ञानेश कुमार को कुर्सी से सस्पेंड करवा कर ही लौटेंगे।
इनका पूरा इकोसिस्टम ट्विटर से लेकर सड़कों तक माहौल बना चुका था की बस, अब तो चुनाव आयोग इनके इशारों पर नाचेगा।
लेकिन कहते हैं ना, ख्याली पुलाव पकाने से पेट नहीं भरता। सुप्रीम कोर्ट ने इनके इन सुनहरे अरमानों पर ऐसा ठंडा पानी फेरा है की अब इन्हें समझ नहीं आ रहा की अपना चेहरा कहाँ छुपाएं।
जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इनकी दलीलें सुनीं, तो मामला ही पलट गया।
कोर्ट ने बिना किसी लाग-लपेट के CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की मांग को सिरे से ख़ारिज कर दिया।
‘लोकतंत्र खतरे में है’ का बोर्ड गले में लटकाए घूमने वालों को देश की सबसे बड़ी अदालत ने बड़ी शालीनता से समझा दिया की भाई साहब, संवैधानिक संस्थाएं और उनके प्रमुख किसी अखबार की कटिंग या आपके मनगढ़ंत नैरेटिव से नहीं हटाए जाते, बल्कि देश के संविधान और पुख्ता सबूतों से चलते हैं।
13 करोड़ फर्जी वोटरों की सफाई से खिसकी ज़मीन तो लोकतंत्र खतरे में होने का शुरू हो गया रुदाली विलाप

अब सवाल ये उठता है की आख़िर इस इकोसिस्टम को अचानक चुनाव आयोग से इतनी भयंकर खुजली क्यों होने लगी? क्यों ये लोग रातों-रात ज्ञानेश कुमार के पीछे हाथ धोकर पड़ गए?
इसके पीछे का असली दर्द समझने के लिए आपको ज़मीन पर चल रहे चुनाव आयोग के असली काम को देखना होगा।
दरअसल, चुनाव आयोग (ECI) इन दिनों पूरे देश में मतदाता सूचियों की एक महा-सफाई का अभियान चला रहा है, जिसे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (Special Intensive Revision – SIR) कहा जाता है।
आयोग का सीधा सा फंडा है की भैया जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं, जिनके नाम दो-दो जगहों पर दर्ज़ हैं, या जो बॉर्डर पार से आए ‘अवैध घुसपैठिए’ हैं, उनके नाम वोटर लिस्ट में क्या कर रहे हैं?
आयोग ने ऐसे नामों को चुन-चुन कर वोटर लिस्ट से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया।
आंकड़े सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। इस सफाई अभियान के तहत पूरे देश से लगभग 13 करोड़ संदिग्ध, डुप्लीकेट और फर्जी वोटरों के नाम उड़ा दिए गए हैं।
हाँ, पूरे 13 करोड़! अब आप ही बताइए, जब 13 करोड़ फर्जी वोटरों की सफाई होगी, तो किसी न किसी का तो फिक्स वोट बैंक हिलेगा ना?
और जैसे ही इस ‘खास’ वोट बैंक में सेंध लगी, वैसे ही हमारे इस दिमागी नक्सल वाले इकोसिस्टम के पेट में भयंकर मरोड़ उठने लगे।
यही वो असली वजह है जिसकी वजह से ये पूरी प्रोटेस्ट ब्रिगेड बौखला कर CEC ज्ञानेश कुमार को कुर्सी से हटाने की साज़िश रच रही थी।
इनकी परेशानी चुनाव की पारदर्शिता नहीं है, इनकी असली परेशानी वो फर्जी वोटर हैं जिनके दम पर ये चुनाव जीतने के सपने देखते आए हैं।
देश जल जाएगा जैसी गीदड़ भभकियों पर सुप्रीम कोर्ट का करारा प्रहार और अखबार की रिपोर्ट पर CEC को सस्पेंड करने से साफ इंकार

अब आप सोच रहे होंगे की आखिर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में ऐसा क्या छप गया था जिसे लेकर इस इकोसिस्टम के वकील सुप्रीम कोर्ट में सीधे ब्रह्मोस मिसाइल दागने पहुँच गए थे?
चलिए, उस अख़बार की कटिंग का असली सच भी जान लीजिए, जिसे ये लोग कोर्ट में अपना सबसे बड़ा सबूत बनाकर लहरा रहे थे।
दरअसल, इस वामपंथी इकोसिस्टम ने अख़बार में एक ‘एक्सक्लूसिव’ रिपोर्ट छपवाई थी। इस रिपोर्ट में बड़े-बड़े अक्षरों में दावा किया गया की चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग को अपनी जागीर बना लिया है और वहां वो तानाशाही चला रहे हैं।
अख़बार ने अपनी थ्योरी गढ़ते हुए लिखा कि ज्ञानेश कुमार ने बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) को पूरी तरह से किनारे कर दिया है।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया की नए वोटर्स को जोड़ने वाले ‘फॉर्म 6’ में ज्ञानेश कुमार ने अकेले ही मनमाने बदलाव कर दिए, ताकि एक खास वर्ग के वोटरों को बाहर किया जा सके।
बात यहीं नहीं रुकी, अख़बार ने यह भी दावा कर डाला की 13 करोड़ फर्जी वोटरों को हटाने का जो अभियान चल रहा है, उसके पीछे भी ज्ञानेश कुमार ने बिना कोई औपचारिक मीटिंग (Quorum) बुलाए 14 बड़े प्रशासनिक फैसले बिल्कुल एकतरफा ले लिए हैं।
मतलब, इस रिपोर्ट का सीधा सा लब्बोलुआब ये था की देश का चुनाव आयोग अब तीन लोगों की संस्था नहीं रहा, बल्कि एक ही आदमी अपनी मर्जी से सारे नियम बदल रहा है।
इसी अख़बार की कटिंग को गीता और कुरान की तरह हाथ में पकड़कर याचिकाकर्ताओं के वकील विकास सिंह सुप्रीम कोर्ट के भीतर खड़े हुए।
वहां जो ड्रामा हुआ, वो किसी बॉलीवुड की बी-ग्रेड फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं था। विकास सिंह ने जज साहब से भारी और नाटकीय आवाज़ में कहा, “अगर आपने इस रिपोर्ट के आधार पर तुरंत एक्शन नहीं लिया, तो देश जल उठेगा!”
अरे! देश जल उठेगा? क्या मज़ाक चल रहा है? तुम देश की सबसे बड़ी अदालत में खड़े होकर दलीलें दे रहे हो या सरेआम धमकी दे रहे हो?
ये वही पुरानी ‘गीदड़ भभकी’ है जो ये पीआईएल (PIL) गैंग हमेशा से आज़माता आया है। इन्हें लगता है की अखबार में एक आर्टिकल प्लांट करवाओ, फिर जज साहब को देश में दंगे भड़कने का खौफ दिखाओ और फैसला अपने हक में करा लो।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें ऐसा आईना दिखाया की इनकी बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।
CJI सूर्यकांत की बेंच ने साफ शब्दों में कह दिया की ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी किसी पत्रकार की थ्योरी और अख़बार की कटिंग के आधार पर हम भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को हवा में कैसे सस्पेंड कर सकते हैं?
कोर्ट ने इन्हें बहुत ही प्यार से समझा दिया की संवैधानिक संस्थाएं अखबार के पन्नों से नहीं चलतीं। अगर कोई आरोप है, तो हम चुनाव आयोग से आधिकारिक रिकॉर्ड मांगेंगे।
कोर्ट ने चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और बाकी चुनाव आयुक्तों को एक नोटिस थमाया है और एक हफ्ते में जवाब माँगा है।
लेकिन जहाँ तक CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की हवाबाजी थी, उस मांग को कोर्ट ने सीधा कूड़ेदान का रास्ता दिखा दिया।
इस ड्रामे से एक बात तो साफ हो गई की देश जलने का डर दिखाकर न्यायपालिका को ब्लैकमेल करने और अख़बार की कटिंग पर सुप्रीम कोर्ट को नचाने का इनका ये दांव इतनी बुरी तरह फ्लॉप हुआ है की अब ये वकील साहब भी बाहर आकर बगलें झांकते नज़र आ रहे हैं।
फॉर्म 6 और एकतरफा फैसलों का मनगढ़ंत बहाना कैसे बना विरोधी वकीलों के लिए गले की फांस
कोर्ट में दलील दी गई थी की नए वोटर्स के लिए जो ‘फॉर्म 6’ होता है, उसमें ज्ञानेश कुमार ने अकेले ही बदलाव कर दिए और बिना बाकी दो चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) की मर्जी के 14 बड़े फैसले एकतरफा ले लिए।
सुनने में तो ये बात ऐसे लग रही थी जैसे चुनाव आयोग में कोई बहुत बड़ा तख्तापलट हो गया हो।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही सधे हुए लहज़े में कहा था की देखिए, चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है और संविधान के मुताबिक फैसले बहुमत से ही होने चाहिए।
हम चुनाव आयोग का रिकॉर्ड मंगाकर चेक कर लेंगे। अगर कोई फैसला गलत नीयत से या बिना बहुमत के लिया गया होगा, तो हम उस ‘फैसले को रद्द’ कर देंगे।
ज़रा बात की गहराई समझिए! कोर्ट कह रहा है की अगर प्रोसीजर (Procedure) में कोई गलती है, तो हम उस फैसले को सुधार देंगे।
लेकिन हमारे ये पीआईएल वाले वकील क्या चाह रहे थे? ये चाह रहे थे की बस इस छोटी सी बात पर सीधे चीफ इलेक्शन कमिश्नर को ही कुर्सी से उठाकर बाहर फेंक दिया जाए।
मतलब ये तो वही बात हो गई की स्कूल के प्रिंसिपल ने अगर वाइस-प्रिंसिपल से बिना पूछे टाइम-टेबल बदल दिया, तो तुम सीधा प्रिंसिपल को ही फांसी पर लटकवाने पहुँच गए!
सुप्रीम कोर्ट ने भी मन ही मन सोचा होगा की ये लोग बाल की खाल निकालने आए हैं या कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करने।
कोर्ट ने साफ कर दिया की प्रोसीजरल बातों पर किसी भी संवैधानिक प्रमुख को सस्पेंड नहीं किया जाता। विपक्षी वकीलों का यह मनगढ़ंत दांव भी उन्हीं के गले की फांस बन गया।
कैमरों के सामने AISA की नेहा बोरा और कॉकरोच मूवमेंट का फ्लॉप ड्रामा, तानाशाही का नैरेटिव गढ़ने वालों को न्यायपालिका का तगड़ा सबक

इधर कोर्ट के अंदर विकास सिंह पसीने पोछ रहे थे, और उधर दिल्ली की सड़कों पर एक अलग ही नौटंकी चल रही थी। जंतर-मंतर और अशोक रोड पर अचानक से ‘कॉकरोच मूवमेंट’ वाले इस ग्रुप ने अपना तमाशा शुरू कर दिया।
ये वही जानी-पहचानी वामपंथी भीड़ थी जो हर मुद्दे पर झंडा उठाकर सड़क पर आ जाती है।
इस पूरे ड्रामे में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रही थीं AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की नेता नेहा बोरा।
भई वाह! क्या सीन था। कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे, और नेहा बोरा पुलिस के बैरिकेड्स पर ऐसे चढ़कर पोज़ दे रही थीं जैसे आज़ादी की कोई नई लड़ाई लड़ रही हों।
इनका एक सूत्रीय एजेंडा था की CEC ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। जब दिल्ली पुलिस ने माहौल बिगड़ता देख इन तथाकथित क्रांतिकारियों को हिरासत में लिया, तो तुरंत इनका पुराना ‘विक्टिम कार्ड’ एक्टिवेट हो गया।
कैमरों के सामने चिल्ला-चिल्ला कर ‘पुलिस की बर्बरता’ और ‘तानाशाही’ का नैरेटिव गढ़ा जाने लगा। जेल से छूटते ही मोहतरमा ने जादवपुर यूनिवर्सिटी और लेफ्ट के बाकी गढ़ों में जाकर जो क्रांतिकारी ज्ञान बांटा, उसे सुनकर असली क्रांतिकारियों को भी शर्म आ जाए।
लेकिन इस ‘क्रांति’ का असली पाखंड तब सरेआम हो गया, जब महिला सुरक्षा का ज्ञान देने वाली इन्हीं नेहा बोरा के गैंग ने वहां ड्यूटी कर रही एक महिला पत्रकार (रुचि तिवारी) के साथ बदसलूकी कर डाली।
मतलब सोचिए, जो लोग माइक पर महिलाओं के अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, उन्हीं की भीड़ एक महिला पत्रकार को सिर्फ इसलिए घेरकर परेशान कर रही थी क्योंकि वो पत्रकार इनसे तीखे सवाल पूछ रही थी।
यह है इन दिमागी नक्सलियों का असली चेहरा! ये प्रोटेस्ट ब्रिगेड सोच रही थी की वे बैरिकेड फांदकर, गाड़ियां रोककर और सड़कों पर दंगा करके सुप्रीम कोर्ट के जजों पर कोई मनोवैज्ञानिक दबाव बना लेंगे।
इन्हें लग रहा था की इनका यह ‘कॉकरोच मूवमेंट’ देख कर कोर्ट डर जाएगा। लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट से खबर आई की ज्ञानेश कुमार अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं, इन सड़कों के क्रांतिकारियों की सारी हवा एक सेकेंड में निकल गई।
इनका पूरा का पूरा फ्लॉप ड्रामा ताश के पत्तों की तरह वहीं बिखर गया।
संवैधानिक संस्थाओं को हाईजैक करने का पीआईएल टूलकिट हुआ एक्सपोज और आगे के लिए सेट हो गया कड़ा नियम
इस पूरे घटनाक्रम को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो आपको इस वामपंथी इकोसिस्टम का असली ‘टूलकिट’ समझ आ जाएगा। इनका फंडा बहुत ही क्लियर है-देश की हर संवैधानिक संस्था (चाहे वो चुनाव आयोग हो, कैग हो या सुप्रीम कोर्ट खुद) इनके इशारों पर नाचनी चाहिए।
जब तक सिस्टम इनके मनमुताबिक काम करता है, तब तक सब चंगा है। लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग ईमानदारी से काम करते हुए 13 करोड़ फर्जी वोटरों का कचरा साफ करता है, वैसे ही ये लोग बौखला कर कोर्ट पहुँच जाते हैं और सड़कों पर बैरिकेड तोड़ने लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक्शन लेने से इंकार करके सिर्फ एक फैसला नहीं सुनाया है, बल्कि भविष्य के लिए एक बहुत कड़ा नियम (Precedent) सेट कर दिया है।
कोर्ट ने इस पूरे इकोसिस्टम को बता दिया है की मीडिया ट्रायल्स, सड़कों पर हो रहे ड्रामेबाज़ी और अखबारों की कटिंग से भारत का चुनाव आयोग नहीं चलाया जा सकता।
पीआईएल के ज़रिए देश के सिस्टम को हाईजैक करने का जो धंधा सालों से चल रहा था, उसे इस फैसले ने एक बहुत बड़ा डैमेज किया है।
अब अगली बार जब ये दिमागी नक्सल किसी भी संवैधानिक प्रमुख को सस्पेंड कराने का सपना लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर जाएंगे, तो उन्हें याद रहेगा की सिर्फ हवा-हवाई आरोपों और ‘देश जल जाएगा’ जैसे फिल्मी डायलॉग्स से कुछ नहीं होने वाला।
कम से कम अगली बार कोई पुख्ता सबूत लेकर जाना यार, वर्ना ऐसे ही दुनिया के सामने अपना और अपने इस खोखले नैरेटिव का मज़ाक बनवाते रहोगे।
फिलहाल तो प्रोटेस्ट ब्रिगेड को चाहिए कि वो चुपचाप अपने झंडे लपेटें और किसी नए मुद्दे की तलाश में निकल पड़ें, क्योंकि यहाँ तो इनकी दाल गलने से रही!
