आज के ज़माने में अगर किसी को साइंटिस्ट या इंजीनियर बनना हो, तो सबसे पहले दिमाग में क्या आता है? किसी बड़ी विदेशी यूनिवर्सिटी की डिग्री या फिर आईआईटी (IIT) का ठप्पा।
बिना इसके तो लोग आपको किसी लैब के बाहर खड़े भी न होने दें। लेकिन आज हम जिस हिंदुस्तानी की कहानी आपको बताने जा रहे हैं, उसने हाई स्कूल के बाद कोई फॉर्मल पढ़ाई नहीं की।
ना कोई बड़ी डिग्री, ना कोई फैंसी लैब, लेकिन फिर भी इस बंदे ने अमेरिका और लंदन में बैठकर ऐसे-ऐसे अविष्कार कर डाले जो बड़े बड़े वैज्ञानिक भी नहीं कर पाते।
हम बात कर रहे हैं शंकर आबाजी भिसे की। 29 अप्रैल 1867 को बंबई के एक सी.के.पी. (CKP) मराठी परिवार में जन्मे इस इंसान का दिमाग ऐसा चलता था की अमेरिका के सबसे बड़े अखबार ‘न्यू यॉर्क अमेरिकन’ ने बाकायदा उन्हें “भारत का एडिसन” (Edison of India) का ख़िताब दे डाला था।
अभी हाल ही में एक्टर आर. माधवन ने भी इनका एक वीडियो शेयर करके देश को बताया था की हमारे पास कैसा-कैसा टैलेंट था जिसे हमने भुला दिया।
चलिए, आज इस ‘बिना डिग्री वाले जीनियस’ की कहानी आपको बताते हैं।

बचपन से ही था मशीनों का कीड़ा और महज़ 14 साल की उम्र में घर पर ही बना डाला ‘कोल गैस प्लांट’
अब होता क्या है ना की हर मिडिल क्लास परिवार की तरह भिसे जी के पिता भी यही चाहते थे की बेटा पढ़-लिखकर कोई कानून-वानून की पढ़ाई कर ले या फिर अकाउंटेंट बन जाए।
पिता की बात मानकर इन्होने 1888 से 1897 तक अकाउंटेंट जनरल के ऑफिस में नौकरी भी की, लेकिन भाई इनका दिमाग फाइलों में थोड़ी लगता था। इनके अंदर तो बचपन से ही मशीनों का कीड़ा कुलबुलाता रहता था।
ज़रा सोचिए, जब ये महज़ 6 साल के थे, तो इन्होने घर में रखी एक महंगी मूर्ति वाली घड़ी के सारे पुर्जे खोलकर बाहर रख दिए!
घर वालों ने पूछा की ये क्या किया, तो मासूमियत से बोले की मैं बस ये देखना चाहता था की घड़ी के पेंडुलम के साथ उस मूर्ति की आंखें कैसे घूमती हैं।
और जब आज के बच्चे 14 साल की उम्र में वीडियो गेम खेलते हैं या रील्स स्क्रॉल करते हैं, तब भिसे जी ने घर पर ही अपने देसी जुगाड़ से एक ऐसा उपकरण बना डाला था जो ‘कोल गैस’ (Coal Gas) बनाता था।
अब आप सोच रहे होंगे की बिना किसी कॉलेज गए इस बंदे ने ये सब सीखा कहाँ से? तो सच बताऊँ, इनका सबसे बड़ा उस्ताद कोई प्रोफेसर नहीं, बल्कि ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ नाम की मैगज़ीन थी।
ये दिन-रात उसी मैगज़ीन को पढ़ते और घर में कबाड़ से नई-नई मशीनें बनाते रहते।
जब एक प्रतियोगिता में अंग्रेजों को चटाई धूल और लंदन तक गूंज उठा एक हिंदुस्तानी का नाम
इनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आया साल 1897 में। उस वक्त इंग्लैंड की एक बहुत ही मशहूर मैगज़ीन हुआ करती थी ‘इन्वेंटर रिव्यू’।
इस मैगज़ीन ने दुनियाभर के इन्वेंटर्स के लिए एक तगड़ी प्रतियोगिता रखी। शर्त ये थी की एक ऐसी मशीन का डिज़ाइन बनाना है जो दुकान पर अपने आप चीनी, आटा और राशन तौल सके।
मतलब एक तरह से ऑटोमैटिक वेइंग मशीन (Automatic weighing machine)।
बस फिर क्या था, भिसे जी ने भारत में बैठे-बैठे अपना डिज़ाइन तैयार किया और इंग्लैंड भेज दिया। वहां बड़े-बड़े ब्रिटिश इंजीनियर अपना डिज़ाइन लेकर पहुंचे थे, लेकिन जब रिज़ल्ट आया तो सारे अंग्रेज़ों की बोलती बंद हो गई।
हमारे इस मराठी मानूस ने सबको पछाड़ते हुए पहला इनाम जीत लिया और 10 पाउंड की इनामी राशि अपने नाम कर ली।
इस जीत ने पूरे हिंदुस्तान के अखबारों में तहलका मचा दिया। लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था की भारत का कोई आदमी अंग्रेजों को इंजीनियरिंग में हरा सकता है!
इसी दौरान दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा जैसे हमारे बड़े राष्ट्रवादी नेताओं की नज़र भिसे जी के इस कमाल के टैलेंट पर पड़ी।
उन्हें लगा की इस बंदे को लंदन भेजना चाहिए ताकि दुनिया को पता चले की हम हिंदुस्तानी मशीनें बनाना भी जानते हैं। नेताओं ने फंडिंग का जुगाड़ किया और भिसे जी को इंग्लैंड भेज दिया।
इस मराठी जीनियस के मुरीद हो गए रतन टाटा और लंदन में खड़ी कर दी पूरी की पूरी टाटा भिसे इन्वेंशन सिंडिकेट
लंदन पहुंचकर तो भिसे जी ने जैसे कमाल ही कर दिया। वहां उन्होंने एक के बाद एक ऐसे धाकड़ आविष्कार किए की दुनिया के बड़े-बड़े इन्वेस्टर दांतों तले उंगली दबाने लगे।
इन्हीं इन्वेस्टर्स में से एक बहुत बड़ा नाम था- सर रतन टाटा (Ratan Tata)।
रतन टाटा उस समय लंदन में ही थे और जब उन्होंने भिसे जी के इस जादुई दिमाग को देखा, तो वो पूरी तरह से उनके मुरीद हो गए।
टाटा साहब को समझ आ गया था की इस हिंदुस्तानी में कुछ तो ऐसी बात है जो दुनिया की तस्वीर बदल सकती है।
फिर क्या था, 1910 में रतन टाटा ने भिसे जी के टैलेंट पर सीधा दांव खेला और उनके आविष्कारों को ग्लोबल मार्केट में उतारने के लिए बाकायदा लंदन में ही एक पूरी की पूरी कंपनी खड़ी कर दी।
इस कंपनी का नाम रखा गया ‘टाटा-भिसे इन्वेंशन सिंडिकेट’ (Tata-Bhise Invention Syndicate)।
ये सिंडिकेट बहुत ही ज़बरदस्त तरीके से काम कर रहा था। भिसे जी डिज़ाइन बनाते और टाटा की तरफ से शाहपुरजी सकलतवाला लंदन में उस बिज़नेस को संभालते।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। जैसे ही पहला विश्व युद्ध (World War-I) शुरू हुआ, दुनिया भर के बाज़ार धड़ाम से गिर गए और मज़बूरन टाटा को ये सिंडिकेट बंद करना पड़ा।
लेकिन तब तक शंकर आबाजी भिसे का नाम लंदन से लेकर अमेरिका तक के कोने-कोने में गूंजने लगा था। अंग्रेज़ इंजीनियर भी मानते थे की इस आदमी के दिमाग में साक्षात सरस्वती बसती है।
लोकल ट्रेन इंडिकेटर से लेकर जादुई ‘भिसेटाइप’ मशीन तक, वो 200 आविष्कार जिन्होंने दुनिया में कर दिया उनका नाम बुलंद
भिसे जी ने अपनी ज़िंदगी में 200 से ज़्यादा आविष्कार किए और दुनिया भर में 40 ग्लोबल पेटेंट अपने नाम दर्ज करवाए।
इनका सबसे बड़ा आविष्कार था- ‘भिसेटाइप’ (Bhisotype)। ये छपाई (Printing) की दुनिया में एक ऐसा भूचाल था जिसने लंदन के इंजीनियरों की नींद उड़ा दी थी।
ये एक ऐसी जादुई मशीन थी जो एक मिनट में 1200 अक्षर टाइप कर सकती थी! और कमाल की बात देखिए, ये मशीन एक ही समय में 32 अलग-अलग मेटल टाइप (धातु के अक्षरों) का इस्तेमाल कर सकती थी।
लंदन की मशहूर ‘कास्टन टाइप फाउंड्री’ के बड़े-बड़े अंग्रेज़ इंजीनियर जब इस मशीन को देखते थे, तो वो अपना सिर खुजाते रह जाते थे की आखिर एक हिंदुस्तानी ने इतना तगड़ा मैकेनिज़्म सोच कैसे लिया!
और हां, अगर आप कभी मुंबई गए हैं और वहां की लोकल ट्रेन में सफर किया है, तो आपने स्टेशन बताने वाला इंडिकेटर तो ज़रूर देखा होगा।
आपको जानकर हैरानी होगी की मुंबई की लोकल ट्रेनों के लिए स्टेशन बताने वाला वो पहला ऑटोमैटिक इंडिकेटर किसी और ने नहीं, बल्कि 1898 में भिसे जी ने ही बनाया था!
इनके दिमाग की कोई लिमिट नहीं थी यार। 1901 में इन्होने ‘वर्तोस्कोप’ (Vertoscope) नाम की एक मशीन बनाई। ये विज्ञापन (Advertising) दिखाने वाली एक रंगीन लाइट वाली मशीन थी जो सड़कों पर लगाई जाती थी।
सिर्फ बड़ी मशीनें ही नहीं, भिसे जी ने डेली यूज़ के भी ऐसे-ऐसे जुगाड़ बनाए जो आज हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं। इन्होने ऑटोमैटिक वॉशरूम फ्लश बनाया।
रसोई के ढेरों स्मार्ट गैजेट्स बनाए, और यहाँ तक की कपड़े धोने के लिए एक बहुत ही खास वॉशिंग कम्पाउंड (Washing compound) भी तैयार कर दिया।
जब फ्रांस में मौत के मुंह से लौटे और ‘एटोमिडीन’ दवा बनाकर अमेरिका में भी गाड़ दिया अपना झंडा
बात 1910 के आस-पास की है। भिसे जी फ्रांस में थे और वहां उन्हें भयंकर मलेरिया हो गया। हालत इतनी खराब हो गई की लगा अब बचना मुश्किल है।
तभी वहां एक लोकल इलाज के तौर पर उन्हें समुद्री घास (Seaweed) का एक अर्क दिया गया और उनकी जान बच गई।
अब कोई आम आदमी होता तो भगवान का शुक्रिया अदा करके घर बैठ जाता। लेकिन भिसे जी का खुराफाती दिमाग वहीं से दौड़ पड़ा। उन्होंने सोचा की यार, इस समुद्री घास में ऐसा क्या है जो इसने मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया?
सालों तक इस पर रिसर्च करने के बाद, 1932 में इन्होने अमेरिका में आयोडीन का एक बिल्कुल नया लिक्विड फॉर्मूला तैयार किया।
इन्होने इस दवा का नाम रखा- ‘एटोमिडीन’ (Atomidine)। ये दवा इतनी असरदार थी की अमेरिका के बड़े-बड़े डॉक्टर इसे आंतों से लेकर स्किन की बीमारियों में प्रेस्क्राइब करने लगे।
यहाँ तक कि उस समय के अमेरिका के सबसे मशहूर साइकिक (Psychic) और मेडिकल हीलर एडगर केयस (Edgar Cayce) भी इस हिंदुस्तानी दवा के फैन हो गए थे। एडगर केयस ने अपने पर्चों में 600 से ज़्यादा बार लोगों को भिसे जी की ये ‘एटोमिडीन’ दवा खाने की सलाह दी थी।
गुमनामी के अंधेरे में खो गया हमारा असली ‘एडिसन’ जिसे इतिहास के पन्नों से बाहर निकालने की है जरुरत
लेकिन हर महान कहानी का अंत हमेशा खुशनुमा नहीं होता। अपनी पूरी ज़िंदगी विज्ञान और भारत का नाम रोशन करने में खपा देने वाले इस जीनियस ने 7 अप्रैल 1935 को न्यूयॉर्क (अमेरिका) में 68 साल की उम्र में अपनी आख़िरी सांस ली।
अमेरिका के अख़बारों ने उन्हें याद किया, उनके सम्मान में लेख छापे, लेकिन हमारे अपने देश ने क्या किया?
आज वक्त आ गया है की इस ‘दसवीं पास इंजीनियर’ की कहानी भारत के हर बच्चे तक पहुंचे।
ताकि कल को जब हमारे देश का कोई बच्चा अपने घर के किसी कोने में कबाड़ से कोई जुगाड़ बना रहा हो, तो उसे ये न लगे की वो बिना डिग्री के कुछ नहीं कर सकता।
