खेजड़ी के नीचे एक थान काफी होता है। संगमरमर नहीं माँगता। सिंहासन नहीं माँगता। एक नीला कपड़ा माँगता है। कभी पत्थर पर नाग। कभी बाँस पर झंडा। कभी घोड़े वाला चेहरा। गाँव उसी को गोगा जी कहता है।
शहर अक्सर यहीं रुक जाता है। साँप का देवता। भादों की नवमी। काटे की दवा। फाइल भर जाती है। कथा अधूरी रह जाती है।
उत्तर भारत ने इस सवार को एक नाम से नहीं पहचाना। राजस्थान गोगा जी कहता है। बागड़ वाला कहता है। पंजाब और हरियाणा गुग्गा कहते हैं। जाहरवीर रण का नाम है। जाहर पीर उस उपस्थिति का नाम है जो धाम में रह गई। बोली बदलती है। घोड़ा नहीं बदलता। भाला नहीं बदलता।
ददरेवा जन्म का आँगन है। गोगामेड़ी समाधि की मेड़ है। हरियाणा और पंजाब की मेड़ियाँ बीच का पुल हैं। सहारनपुर की छड़ियाँ वजन रखती हैं। हिमाचल, गुजरात, जम्मू अपनी मढ़ी रखते हैं। बिहार और झारखंड बाहरी घेरा हैं। समुदायों के साथ चला। प्राचीन राजधानी नहीं। सबूत है कि ध्वज रक्षक के साथ चला।
यह लेख साँप मिटाने नहीं आया। साँप को उसकी जगह पर रखने आया है। नाग बाद की भाषा है। पहले एक चौहान मुखिया था। उसने गाय नहीं जाने दी। सीमा के मौसम में रास्ता नहीं छोड़ा। धरती ने उसे लिया। तब जाकर फन उठा। क्रम यही है। उलटा मत करो।
गोगा नवमी पर गोगामेड़ी की हवा सूरज से पहले बदल जाती है। रेत के ऊपर नीले झंडे उठते हैं। ढोल आवाज से आगे चलते हैं। परिवार गाँवों से पैदल आते हैं। वे अब भी धन को गाय और बच्चों से नापते हैं। वे मन्नतें लेकर आते हैं। नारियल लेकर आते हैं। उस सवार के पुराने नाम लेकर आते हैं जो एक जिले में बँधकर नहीं रहा। कोई इसलिए आता है क्योंकि बच्चा बच गया। कोई इसलिए आता है क्योंकि बैल कठिन मौसम से निकल आया। कोई इसलिए आता है क्योंकि बाप आया करते थे। यही काफी है।
हनुमानगढ़ से बहुत दूर वही रंग दिखता है। हरियाणा की किसी मेड़ी में खेजड़ी के नीचे डंडा गाड़ा जाता है। पंजाब के गाँव में छड़ी घर-घर घूमती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर की म्हाड़ी पर आदमी इतनी भारी छड़ियाँ उठाते हैं कि दो लोगों को साथ चलना पड़ता है। नीला निशान। मोरपंख। सिरे पर नारियल। वही ध्वज। वही महीना। वही पुकार।
एक सवार छह राज्यों को पार करता है। शहरों ने उसे सुविधा के लिए एक खाने में रख दिया: साँपों का देवता। गाँव अब भी भाला पहचानता है। गोगा जी को गुग्गा, जाहरवीर, जाहर पीर और गोगा बाप्पा भी कहते हैं। गाँव उन्हें संत मानता है। साँप काटे से रक्षा करने वाला मानता है। यह आस्था सच्ची है और पुरानी है। यह कोई भूल नहीं है। केवल इसी चश्मे से देखना बड़ी स्मृति को छिपा देता है। पहले वे ददरेवा, बागड़ और जांगलदेश के चौहान मुखिया हैं। स्वदेश, गाय, मान और मंदिर के लिए खड़े हुए योद्धा हैं। वह समय प्रारंभिक तुर्क हमलों का समय है। वे उसी राजस्थानी युद्ध-धर्म के हैं जो बाद में पाबूजी और तेजाजी में दिखाई दिया। घाग्गर-सतलज देश से लेकर पश्चिमी गंगा के मैदान तक जिसे आज भी पुकारा जाता है, वह केवल चमत्कार के बल पर इतनी दूर नहीं गया।
एक सवार, अनेक नाम, एक मिट्टी
नाम लोगों के साथ चलते हैं। राजस्थान में वे गोगा जी और जाहरवीर चौहान हैं। पंजाब और हरियाणा में गुग्गा हैं। बहुत से मुस्लिम घरों में गोगा पीर या जाहर पीर हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसी पुरुष को निशान और छड़ी से पुकारते हैं। गुजरात के राबारी उन्हें गोगा महाराज कहकर याद रखते हैं। हिमाचल की मढ़ियों में वही सवार गुग्गा बनकर बैठता है। ये उपाधियाँ एक-दूसरे को मिटाती नहीं। ये बताती हैं कि सीमा का योद्धा अलग-अलग रसोई में कैसे घुसा, और अपनी मिट्टी नहीं छोड़ी।
नाम बदलना भूल नहीं है। नाम काम बताता है। गोगा और गुग्गा जन्म और घर का नाम है। जाहरवीर रण का नाम है। जाहर पीर उस उपस्थिति का नाम है जो लड़ाई के बाद धाम में रह गई। बागड़ वाला उस सूखी पट्टी का नाम है जहाँ मुखिया का काम पहले गाय और सीमा था, फिर पूजा। शहर एक नाम चुनकर बाकी फेंक देता है। गाँव सारे नाम एक साथ रखता है, क्योंकि गाँव को सवार के एक ही रूप से काम नहीं चलता।
जाहर शब्द को बाद में केवल संत का तमगा बना दिया गया। पुरानी स्मृति में जाहर का अर्थ प्रकट होना भी है। वह पुरुष जो जरूरत के समय दिख जाए। रण में भी। थान में भी। साँप काटे की रात भी। पीर कह देने से भाला नहीं गिरता। पीर उस इलाके की भाषा है जहाँ रक्षक को दरगाह और मंदिर दोनों से पुकारा जा सकता था। जाहरवीर और जाहर पीर एक ही सवार के दो दरवाजे हैं। एक दरवाजा बंद करके दूसरे को सच नहीं बनाया जा सकता।
उन्हें आज के चूरू जिले के ददरेवा का चौहान राजपूत योद्धा-मुखिया माना जाता है। पिता जेवर हैं। जेवर, जेवाड़ या जीवराज भी कहा जाता है। माता रानी बाछल हैं। बहुत सी कथाओं में बाछल या बाच्छल नाम आता है। पत्नी बहुत से गानों में सिरियल हैं। कुछ गीत उनके घर को राठौड़ देश से भी जोड़ते हैं। कोलू और बाड़मेर की ओर की वह कथा पाबूजी के संसार से हाथ मिलाती है। इसीलिए बाद के गायक गोगा को पाबूजी वाली उसी मान-भूमि के पास रखते हैं। यह विवाह-सूची को सजाने के लिए नहीं। यह बताने के लिए कि दोनों घर एक ही सवाल पूछते थे। गाय गई तो क्या करोगे। वचन टूटा तो कहाँ खड़े रहोगे।
सवारी नीला घोड़ा है। शस्त्र भाला है। पवित्र चिह्न कुंडली मारे नाग, नीला निशान और छड़ी हैं। ये पाँच चीजें एक पुरुष को छह राज्यों में पहचानने देती हैं:
- घोड़ा: गति है।
- भाला: काम है।
- नाग: उस मिट्टी का संकेत है जिसने सवार को लिया।
- निशान: गाँव का झंडा है।
- छड़ी: यात्रा है।
भले पुजारी की बोली बदल जाए। जहाँ नीला कपड़ा और नारियल दिखे, वहाँ वही घर याद आ जाता है। जहाँ छड़ी उठे, वहाँ वही सवार चलता हुआ दिख जाता है। बाद की स्मृति में बाछल राजपूत माता का नाम रखते हैं। यह भी एक तरह का अभिलेख है। जो कुल रानी का नाम बचाए रखता है, वह उस घर को बचाए रखता है जिसने सवार को जन्म दिया। पुरुष का यश अक्सर पिता की तलवार से लिखा जाता है। यहाँ माता का नाम कुल के साथ चलता है। तपस्या वाली स्त्री बिना घर के नहीं रहती। गोरखनाथ का वर भी उसी आँगन में गिरा। गोगा का जन्म केवल किले की घटना नहीं। वह रानी की राह और गुरु की राख दोनों से बना।
यह स्मृति सूखी सीमा की मिट्टी की है। पुरानी बात में बागड़ और जांगलदेश सतलज पट्टी से हांसी-हिसार की ओर फैले हैं। यह चित्रित साम्राज्य नहीं है। यह चरागाह है। तालाब है। पशुओं की पगडंडी है। छोटे किले हैं। यहाँ बादशाहत संगमरमर से नहीं नापी जाती थी। यहाँ मुखिया को इस बात से नापा जाता था कि वह गाय कैसे रखता है, पाहुन कैसे रखता है, और दी हुई बात कैसे रखता है। बागड़ वाला कहना पदवी से अधिक पेशा है। सूखे देश का स्वामी वही है जो कुएँ और झुंड दोनों देखे।
जांगलदेश नाम सुनकर कोई घने वन की कल्पना कर ले। पुरानी भाषा में यह काँटे और घास का देश भी है। ऊँट और गाय का देश भी है। किले यहाँ दूर-दूर होते थे। रक्षा पास से करनी पड़ती थी। इसीलिए इस पट्टी के देवता घोड़े पर हैं। पैदल सिंहासन यहाँ देर से पहुँचता। घोड़ा सुबह निकलता और शाम को लौट आता। गोगा की सवारी सजावट नहीं। भूगोल की मजबूरी है।
जन्मस्थान अब भी ददरेवा है। मुख्य समाधि हनुमानगढ़ की गोगामेड़ी है। ये दो ध्रुव हैं। एक वह जगह जहाँ सवार जन्मा। एक वह जगह जहाँ धरती ने उसे लिया। दोनों के बिना कथा अधूरी रहती है। केवल जन्म लो तो वीर बालक रह जाते हैं। केवल समाधि लो तो साँपों के स्वामी रह जाते हैं। दोनों लो तो वही पुरुष बनता है जिसे उत्तर भारत आज भी पुकारता है।
राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के गाँव-गाँव में थान, मेड़ी और मढ़ी हैं। अक्सर खेजड़ी के नीचे। खेजड़ी मरु की छाया है। उसके नीचे बैठना दरबार नहीं, गाँव की न्याय-पीठ है। थान बड़ा मंदिर नहीं माँगता। एक पत्थर काफी है। एक नीला कपड़ा काफी है। एक डंडा काफी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उपस्थिति गहरी है, खासकर सहारनपुर की म्हाड़ी और गुग्घल छड़ी परंपरा। वहाँ छड़ी इतनी भारी होती है कि उसे देखकर समझ में आता है: यह खिलौना नहीं, ध्वज है।
हिमाचल की पहाड़ियों में मढ़ी छोटे रूप में बैठती है। गुजरात में राबारी यात्रा के साथ नाम ले जाते हैं। मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से और जम्मू भी उन्हें रखते हैं। एक मिट्टी कई मौसमों में बोलती है। बिहार और झारखंड भक्ति का बाहरी जीवित घेरा हैं। यह घेरा किसान और पशुपालक समुदायों के साथ चला। ब्याह के साथ चला। मजदूरी और नई खेती के साथ चला। यह उनके राज्य की प्राचीन राजधानी नहीं है। इसे राजधानी मत बनाओ। इसे सबूत मानो। ध्वज उन लोगों के साथ चला जिन्हें अभी भी रक्षक चाहिए था। नया खेत पुराना डर नहीं मिटाता। साँप नया इलाका भी काटता है। गाय नई सीमा पर भी खोती है। इसीलिए नाम सीमा पार गया। घोड़ा पीछे नहीं छूटा।
एक मिट्टी का अर्थ यह नहीं कि सारी पूजा एक जैसी है। राजस्थान भाला और चौहान घर ज्यादा जोर से गाता है। पंजाब गुग्गा को मेड़ी और भादों के मेले में रखता है। हरियाणा जांगलदेश की पुरानी साँस रखता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश छड़ी और निशान को शहर की गली तक ले आता है। मुस्लिम घर पीर कहकर दीपक जलाते हैं। सिख गाँव मढ़ी पर सेवइयाँ रख देते हैं। विधि बदलती है। सवार नहीं बदलता। यही एक मिट्टी है। बोली अलग, घोड़ा वही।
यही वजह है कि नामों की भीड़ भ्रम नहीं, नक्शा है। जो पुरुष ददरेवा से निकला, वह केवल चूरू का देवता रहकर नहीं रुक सका। सीमा का योद्धा सीमा के लोगों के साथ चलता है। लोग जहाँ बैठे, थान वहाँ उठ खड़ा हुआ। शहर इसे लोकधर्म की फैलती लहर कह सकता है। गाँव इसे साफ कहता है। एक सवार था। कई नाम पड़ गए। मिट्टी एक रही।

बाछल का पुत्र और गोरखनाथ का वर
लोक परंपरा जन्म को विक्रम संवत 1003 के आसपास रखती है। लेखक अक्सर इसे लगभग 946 ईस्वी कहते हैं, या 1003 ईस्वी कहते हैं। अंतिम युद्ध लगभग 1024 ईस्वी के आसपास रखा जाता है। कड़े दफ्तरी कालक्रम का निश्चय नहीं है। लोकस्मृति की तिथियाँ राजपत्र की तरह नहीं चलतीं। फिर भी ग्यारहवीं शताब्दी वाला पाठ सम्मान का हकदार है। राजस्थान की सबसे पुरानी विद्वत लाइन और सबसे मजबूत लोक सहमति उन्हें बाद के सल्तनत चक्र में नहीं, गजनवी क्षितिज पर रखती है।
तिथि पर झगड़ा कथा को रद्द नहीं करता। गाँव भादों की नवमी याद रखता है। ददरेवा जन्म का ठिकाना याद रखता है। गोरखनाथ का वर याद रखता है। ये तीन बातें कागज की मुहर से पहले चलती हैं। इतिहासकार शताब्दी नापते हैं। भक्त वह घर नापते हैं जहाँ रानी ने राह देखी।
जन्म कथा सजावट नहीं है। यह बताती है कि एक क्षत्रिय साधक कैसे बना। बाछल को पुत्र चाहिए था। चौहान घर बिना वारिस अधूरा रहता। सीमा का किला बिना अगली पीढ़ी काँपता है। उन्होंने गुरु गोरखनाथ के आगे लंबी तपस्या की। कई गाने बारह वर्ष कहते हैं। संख्या कम हो या अधिक, बात एक है। वर माँगा गया। जल्दी नहीं माँगा गया। राख और भूख और प्रतीक्षा से माँगा गया।
आम कथन में बहन वर चुरा ले जाना चाहती है। कहीं उसे काछल कहते हैं। कहीं आछल। वह बाछल के वस्त्र पहनकर गुरु के सामने पहुँचती है। गुरु पहले उसी को फल दे देते हैं। बाछल बाद में आती है और कहती है कि उसे कुछ नहीं मिला। गुरु देख लेते हैं कि छल हुआ। फिर भी बाछल की सुनते हैं। यह दृश्य केवल बहनों का झगड़ा नहीं। यह बताता है कि वर चोरी से टिकता नहीं। जो स्त्री राह देखती है, उसी के आँगन में नाम पड़ता है।
गुरु गुगल देते हैं। वही गोंद और फल जिसे गाँव की दवा पहले से जानती थी। मरु की झाड़ी से निकलता है। बांझपन की पुरानी चिकित्सा में आता है। हवन में जलता है। उसी दान से बच्चे का नाम पड़ा। गोगा। गुग्गा। गुगल और गोरख के वचन से जन्मा। कुछ गाँव दूसरी व्युत्पत्ति भी गाते हैं। गाय की सेवा से नाम पड़ा। दोनों बातें एक दिशा में चलती हैं। नाम दरबार से नहीं आया। रसोई, दवा और गोशाला से आया।
कुछ कथाएँ कहती हैं कि बाछल ने वह प्रसाद और स्त्रियों में बाँटा। यहाँ तक कि उस घोड़ी तक पहुँचा जिससे बाद का नीला घोड़ा जुड़ता है। यह विवरण हर जिले में एक जैसा नहीं। इसे फौजी रिपोर्ट मत बनाओ। इसे संकेत मानो। जिस घर में वर बँटा, वहाँ केवल राजकुमार नहीं जन्मा। सवारी भी जन्मी। घोड़ा बाद की तसवीर की सजावट नहीं रह गया। वह उसी आशीष का हिस्सा बन गया।
नाथ संबंध मायने रखता है। उत्तर भारत में योद्धा बहुत हैं। योगी भी बहुत हैं। गोगा दोनों हैं। भाले ने भभूत को काटा नहीं। भभूत ने भाले को काटा नहीं। सीमा का मुखिया गोरखनाथ के पास बैठ सकता था। गरीब पर दया कर सकता था। धावे पर कठोर हो सकता था। एक ही जीवन में। नाथ पंथ राजस्थान की सीमा पर केवल गुफा का धर्म नहीं था। वह किसान और राजपूत दोनों के पास चलता था। कान में कुंडल। माथे पर भभूत। हाथ में कभी चिमटा, कभी सलाह। गोगा उसी संसार के शिष्य माने जाते हैं।
नाम भी यही समझाता है। गुगल दरबारी रत्न नहीं है। मरु की राल है। गाँव की दवा है। हवन की चीज है। उन स्त्रियों की चीज है जिन्होंने संतान की राह देखी। जो नायक इस दान से नाम पाए, वह केवल किले का नहीं। वह रसोई और थान का भी है। बाद की पूजा में भभूत साँप काटे पर इसलिए लगता है कि जन्म से ही राख उनके साथ है। गुरु की निशानी युद्ध के बाद गायब नहीं हुई। वह गाँव की दवा बन गई।
पिता जेवर का घर चौहान था। माता की तपस्या नाथ द्वार पर थी। दो धाराएँ एक बच्चे में मिलीं। एक धारा कहती है: भूमि रखो, गाय रखो, मान रखो। दूसरी धारा कहती है: इच्छा कम करो, सत्य देखो, धरती से डरो मत। बाद का गोगा दोनों धाराओं से लड़ता है। गाय के लिए निकलता है। अंत में धरती में समा जाता है। जन्म कथा पहले से अंत बता देती है। जो गुरु की राख से जन्मा, वह मिट्टी से परे नहीं जाएगा। वह मिट्टी का स्वामी बनेगा।
गाँव ने बाद में उन्हें देवता इसलिए बनाया कि यह मेल रक्षा जैसा लगा। इसलिए नहीं कि पहले साँप गढ़ा गया और फिर घोड़ा जोड़ा गया। नाथ गुरु के पास बैठने वाला क्षत्रिय किसान के काम का है। घोड़े पर चढ़ सकने वाला साधक सीमा के काम का है। जन्म कथा का सार यही दोहरी शिक्षा है। गोरखनाथ हटा दो तो गोगा केवल एक मुखिया रह जाते हैं। चौहान घर हटा दो तो केवल एक योगी रह जाते हैं। देश ने दोनों जानबूझकर रखे।
इसीलिए ददरेवा केवल जन्मस्थान नहीं। वह वह आँगन है जहाँ रानी ने राह देखी और गुरु ने कहा कि पुत्र होगा। मेले में लोग बच्चा माँगने इसलिए आते हैं कि कथा का पहला अध्याय बच्चा माँगने का है। गाय का रक्षा-गीत बाद में आता है। साँप का थान और बाद में आता है। पहले बाछल खड़ी है। पहले गोरखनाथ का वर है। पहले गुगल है। बिना इस तीन के नीला घोड़ा खाली चित्र रह जाता है।

देवता बनने से पहले बागड़ के मुखिया
थानों से पहले एक स्थानीय मुखिया थे। यह वाक्य सरल है। कथा का सबसे जरूरी वाक्य भी यही है। देवता बाद में बनते हैं। पहले काम होता है। काम बिना समझे पूजा खाली रह जाती है।
ददरेवा पुरानी हिसार-बीकानेर राह पर बैठता है। आज का चूरू जिला उस राह को नक्शे में बाँध देता है। पुराना देश नक्शे से बड़ा था। वहाँ से एक चौहान घर सूखे देश को देखता था। वह देश दरबारी कवियों से अधिक गड़रियों के काम का था। ऊँट की लाइन। गाय की पगडंडी। तालाब की प्यासी मिट्टी। छोटे किले जो दूर-दूर दिखते थे। यहाँ राजा वह नहीं जो सिंहासन पर सबसे ऊँचा बैठे। यहाँ राजा वह है जो सुबह झुंड गिन सके और शाम को सीमा देख सके।
गोगा गरीब पर उदार माने जाते हैं। पशुपालक और किसान जीवन के रक्षक माने जाते हैं। बाद की पूजा को चमत्कारों की सूची से अधिक ये दो बातें समझाती हैं। उदारता यहाँ दान की तसवीर नहीं। सूखे साल में अनाज खोलना है। पाहुन को लौटाना नहीं। माँगने वाले को द्वार से खाली न छोड़ना। सीमा पर ऐसा मुखिया याद रहता है। क्योंकि सूखा मंदिर से पहले पेट पर गिरता है।
बागड़ का मुखिया संगमरमर से नहीं चलता था। वह झुंड सुरक्षित रखकर चलता था। कुआँ खुला रखकर। पाहुन खिलाकर। सीमा देखकर। बाद के गायक जब उन्हें बागड़ वाला कहते हैं तो संत को सजा नहीं रहे। पेशा बता रहे हैं। बागड़ पदवी से अधिक इलाका है। इलाका काम माँगता है। काम पूरा हो तो नाम चलता है। काम टूटे तो झंडा भी नहीं बचता।
जांगलदेश उसी काम का दूसरा नाम है। सतलज की ओर से हांसी-हिसार तक याद की गई पट्टी। घना वन नहीं। काँटा और घास और गर्मी। किले यहाँ देर से मदद भेजते। घोड़ा सुबह निकलता। यही वजह है कि इस पट्टी के रक्षक घोड़े पर बैठे दिखते हैं। पैदल दरबार यहाँ देर से पहुँचता। मुखिया देर से पहुँचे तो बछड़ा पहले उठ चुका होता।
मुखिया का धर्म चार बातों में बँधता था:
- गाय बचे।
- वचन रहे।
- स्त्री का मान रहे।
- देवस्थान बचा रहे।
ये चार बातें बाद में पाबूजी और तेजाजी के गीतों में साफ गूँजती हैं। गोगा उन गीतों से पहले के चेहरे हैं। देवता बनने से पहले वे इन्हीं चार की रखवाली करते हैं। इसलिए गाँव उन्हें दूर का अवतार मानकर नहीं पूजता। अपने काम का आदमी मानकर पूजता है।
ददरेवा जन्म का घर है। राजधानी कह देना आसान है। सच इससे छोटा और कठिन है। एक स्थानीय चौहान पीठ। इतनी शक्ति कि झुंड छुड़ाया जा सके। इतनी मर्यादा कि गरीब द्वार पर आ सके। इससे बड़ा साम्राज्य गढ़ने की जरूरत नहीं। इससे छोटा करके उन्हें केवल साँप-संत बना देना भी गलत है। बीच की यह नाप ही बागड़ है।
इसीलिए गाँव ने बाद में उन्हें देवता बनाया। जो देवता केवल दूर के मंदिर में बैठे रहें, वे संध्या को साँप काटने पर नहीं पहुँचते। भोर से पहले बछड़ा उठ जाए तो नहीं पहुँचते। जो मुखिया गाय के लिए निकला, वह गाँव के थान तक आधा रास्ता पहले ही चल चुका। खेजड़ी के नीचे थान महल से गिरा हुआ दर्जा नहीं है। वह महल है जिसे देहात रख सकता था।
देवता बनने का अर्थ मुखिया मिटना नहीं। अर्थ यह है कि काम इतना सच्चा लगा कि मृत्यु के बाद भी गाँव ने उसे नहीं छोड़ा। नीला निशान उसी काम का झंडा है। छड़ी उसी सवारी की याद है। भभूत उसी घर की राख है जहाँ गुरु का वर गिरा और मुखिया का भाला उठा। पहले बागड़ का आदमी। बाद में छह राज्यों का रक्षक। क्रम उलटा मत करो।
गायों का युद्ध कभी छोटा युद्ध नहीं था
परिवार का झगड़ा कथा की कुंडी है। गोगा का मामा के घर के भाइयों अर्जन और सुरजन से भूमि और पशु को लेकर झगड़ा हुआ। चचेरे नहीं, मौसेरे भाई। उन्होंने बल से झुंड दबोचा। कुछ कथनों में दावे को दबाने के लिए बाहर की शक्ति भी साथ ली। गोगा बेटों और कुटुंब के साथ गाय छुड़ाने निकले। गीत कानून की दलील पर नहीं टिकते। उस क्षण पर टिकते हैं जब मुखिया को बताया जाता है कि जानवर उठ गए, और वह उठ खड़ा होता है।
इस संस्कृति में गाय की लड़ाई छोटी लड़ाई नहीं होती। गाय दूध है। गाय हल है। गाय दहेज और पाहुन का भोजन है। बुरे साल के बाद भी खड़े रहने वाले घर का मान है। झुंड खोना एक रात में गाँव का भविष्य खोना है।
पुराने चारण कथन, और बाद के राजस्थानी गानों का वह स्वर जो गोगा जी रा रसावाला जैसी परंपरा में बचा है, इस दृश्य को जमीन के पास रखते हैं। गोगा पहले ब्रह्मांड के नाग नहीं बनाए गए। वे उस पुरुष बनाए गए जिसने गाय नहीं जाने दी। चक्र का सबसे पुराना धर्म यही है। बाद की नाग-स्वामी छवि उस मिट्टी से उगती है जिसने उन्हें ले लिया। वह झुंड की वापसी की जगह नहीं लेती।
शहर जब गौ-रक्षा सुनते हैं तो कभी नारा सुन लेते हैं। बागड़ की सीमा पर यह खाता था। दूध नहीं तो बच्चे नहीं बढ़ते। बैल नहीं तो खेत नहीं। खेत नहीं तो मंदिर का नैवेद्य नहीं। जिस मुखिया ने गाय छुड़ाई, उसने पूरी श्रृंखला बचाई।
झगड़ा केवल धावा नहीं, कुटुंब-कलह के रूप में याद रहता है। इसका कारण है। रिश्तेदार कुएँ जानते हैं। रास्ते जानते हैं। कौन सा जानवर किस घर का है, यह भी जानते हैं। अपने का चोराना अजनबी के चोराने से गहरा काटता है। वह उस घेरे को तोड़ता है जो थामना था। कथन में गोगा का उत्तर अर्जी नहीं है। सवारी है। बाद के गाँवों ने अपने झुंड इन्हीं के भरोसे इसलिए दिए। जो देवता कभी अपनी गाय के पीछे गए, वे उस किसान को समझेंगे जो रात को टूटी रस्सी और गायब बछड़े के साथ आता है।
वह स्मृति जो उन्हें महमूद गजनवी के सामने रखती है
जेम्स टॉड ने उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में राजस्थानी चारण स्मृति से लिखा। उन्होंने गोगा को महमूद गजनवी के समय में रखा। उन्होंने बठिंडा के गुगा की बात लिखी जो बेटों और भतीजों के साथ सतलज पर गिरा। टॉड की गिनती को हाजिरी पंजी मत बनाओ। उनकी काल-रेखा फेंक भी मत दो। वे वही सुन रहे थे जो देश अभी गा रहा था।
दशरथ शर्मा ने बाद के जैन और राजस्थानी स्रोतों से काम लिया। श्रवक-वित्तूड़ी-अतिचार और कायमखान रासौ जैसे ग्रंथ। उन्होंने भी गोगा को महमूद की शताब्दी में रखा। पेमाराम और अधिकांश राजस्थानी विद्वान इसी पंक्ति पर चलते हैं। आर. सी. टेम्पल ने भी यही किया।
लोकस्मृति उन्हें सोमनाथ काल के धावों के प्रतिरोध से जोड़ती है। कहती है कि भूमि और पवित्र व्यवस्था की रक्षा करते हुए उन्होंने लगभग 1024 में वीरगति पाई। महमूद के भारतीय अभियान पंजाब गलियारे से पश्चिम के बड़े मंदिरों की ओर बढ़े। उस शताब्दी में स्थानीय मुखिया को यह जानने के लिए इतिहासग्रंथ की जरूरत नहीं थी कि सड़क अब केवल व्यापारी और तीर्थयात्री की नहीं रही। बागड़-जांगलदेश पट्टी उन्हीं राहों पर बैठती थी। जो पुरुष वहाँ गाय और देवस्थान रखता था, वह धावों के उसी मौसम में जीता था। भले किसी दरबारी लेखक ने उसका नाम किसी प्रसिद्ध लड़ाई के साथ न लिखा हो।
कोई उनके मुँह से रणभूमि का भाषण मत गढ़ो। कोई सटीक सेना की गिनती मत गढ़ो। कोई महमूद के मुँह में चमकीला वचन मत रखो। स्मृति को उस नाटक की जरूरत नहीं। उसे केवल वह दावा चाहिए जिसे इलाका छोड़ने को राजी नहीं। सूखे उत्तर का एक चौहान रास्ते में खड़ा हुआ, जब प्रारंभिक तुर्क धावे सतलज-हांसी देश और उसके पार के मंदिर संसार पर दबे।
टॉड का सतलज वाला चित्र चारण भूगोल है। नापी हुई नक्शे की रेखा नहीं। बठिंडा, नदी, बेटे और भतीजे: सीमा इसी भाषा में याद रखती है कि लड़ाई एक आँगन का निजी झगड़ा नहीं थी। उसका क्षितिज था। शर्मा का जैन और राजस्थानी ग्रंथों वाला काम शांत काम है। उन्हें नदी के दृश्य की फिल्म नहीं चाहिए। उन्हें शताब्दी सही चाहिए। उनके बाद अधिकांश राजस्थानी विद्वानों ने माना कि वह सही है।
गोगामेड़ी की एक फारसी लेख परंपरा महमूद की गोगा के प्रति श्रद्धा की बात करती है। इसे धाम की स्मृति मानो। रण का समाचार मत मानो। धाम पत्थर में मान रखते हैं जैसे गाँव गीत में मान रखते हैं। दोनों स्मरण के प्रमाण हैं। कोई युद्ध की रोजनिशी नहीं।
अभिलेख क्या कह सकते हैं, लोग क्या भूलने से इनकार करते हैं
ईमानदारी कथा में होनी चाहिए। कोई एक बंद दफ्तर नहीं जो गोगा की तिथि उस तरह बाँधे जैसे ताम्रपत्र दान की तिथि बाँधता है। स्रोत हर समकालीन पर एक नहीं हैं। कुछ कथन बाद के दिल्ली सुल्तानों की ओर मुड़ जाते हैं। विलियम क्रुक और कुछ औपनिवेशिक लोकवेत्ता उन्हें तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में धकेलते हैं। बाद के सल्तनत चक्रों में रखते हैं। मुख की संस्कृति अक्सर स्थानीय नायक को अपने युग के आक्रमणकारी के सामने दोबारा खड़ा कर देती है। जिस गाँव ने एक सदी में कष्ट सहा, वह पुराने सवार को निकट के शत्रु के सामने गा सकता है। यह स्वभाव मानवीय है। इसे एक बार कह देना चाहिए।
फिर राजस्थान की सबसे मजबूत विद्वत और लोक सहमति को खड़ा रहने दो। गजनवी क्षितिज का सीमा चौहान। यह पाठ सम्मान क्यों पाए? क्योंकि घर, भूगोल और धर्म ग्यारहवीं शताब्दी से अधिक मेल खाते हैं, बाद की दरबारी कथा से कम। ददरेवा और बागड़ मुगल मंच नहीं हैं। जांगलदेश सतलज से हरियाणा की ओर याद किया गया पुराना सीमा-विचार है। नाथ वर उस दुनिया में सहज बैठता है जहाँ गोरखनाथ का नाम पहले से चल चुका था। गौ-रक्षा का झगड़ा किसी एक सुल्तान से पुराना है। और राजस्थानी इतिहासकारों का वह समूह जिसने चौहान सामग्री पर सचमुच काम किया, टॉड की सुनवाई से शर्मा के ग्रंथ तक, पेमाराम के गोगाजी पिर्रा चंद, गुगापेड़ी और गोगाजी चौहान री निसानी वाले पाठ तक, बार-बार महमूद की शताब्दी पर लौटता है।
जो लोग भूलने से इनकार करते हैं, वह विद्वानों की बहस से सरल है। एक मुखिया निकला। गायें उठ गईं। मंदिर और भूमि दबाव में थे। अंत में धरती खुली। सवार गायब नहीं हुआ। उसने रूप बदला।
वही आग जिसने पाबूजी और तेजाजी को जलाया
राजस्थान ने एक अकेला नायक बनाकर काम नहीं रोका। पाबूजी ब्याह छोड़कर गाय के लिए दी हुई बात निभाने निकले। तेजाजी राह पर वचन रखा और आज भी साँप काटने पर पुकारे जाते हैं। दोनों खेतों में पूजे जाते हैं। पशु मेलों में पूजे जाते हैं। साधारण पेड़ों के नीचे पूजे जाते हैं। दोनों उस धर्म के हैं जिसे नाम देना आसान है और जीना कठिन: गोचर, दिया वचन, स्त्री का मान, गाय और मंदिर।
गोगा उस धर्म का पहला चेहरा हैं। वे बाद वाले दोनों की नकल नहीं। आत्मा में बड़े भाई हैं। एक ही आग तीनों को जलाती है। पुरुष इस बात से नापा जाता है कि झुंड हँकाया जाए तो वह किसके लिए निकलेगा। गाँव इस बात से नापा जाता है कि सवार गिरने के बाद उसे किसे याद रखेगा। इस धर्म में मंदिर गाय से अलग फाइल नहीं है। गाय उस घर को पालती है जो मंदिर रखता है। मंदिर उस घर को आशीष देता है जो गाय रखता है। दोनों पर धावा एक ही धावा है।
गोगा को पाबूजी और तेजाजी के पास रखो तो साँप-देवता वाली पट्टिका पतली लगने लगती है। तीनों मृत्यु के बाद ढाल बने। तीनों से वह रक्षा माँगी जाती है जो दूर का राज्य संध्या को नहीं दे सकता। तीनों स्थानीय इसलिए रहे क्योंकि खतरा स्थानीय रहा। चोरी। सूखा। घास में जहर। रिश्तेदार के आँगन में टूटा मान।
अंतिम युद्ध से रोज की ढाल तक
परंपरा कहती है कि अंतिम दृश्य पुरोहितों द्वारा बनाया मकबरा नहीं था। गोगामेड़ी में धरती खुली और घोड़े समेत सवार को जीवित ले गई। क्योंकि वे धरती में गए, वे उन सर्पों के स्वामी बने जो वहीं रहते हैं। समाधि कब्र भी है और विजय भी।
साँप-रक्षक परंपरा मिटाओ मत। उसे उस रक्षक की बाद की भाषा मानो जो धरती में समाया। जो योद्धा धूप में लाश नहीं छोड़ता, वह मिट्टी में मौजूदगी बन जाता है। नाग वही मौजूदगी है जिसे गाँव ने उस देह में देखा जिसे वह पहले से डरता था और पहले से मानता था। साँप काटे पर भभूत भाले का इनकार नहीं है। वह भाला है जो दवा और मन्नत बनकर चलता रहा। विधि दोनों स्मृतियों को रखती है।
गोगा नवमी भाद्रपद में आती है। सामान्य पालन में कृष्ण पक्ष की नवमी। बहुत जगहों पर आसपास के दिन भी भरे रहते हैं। त्योहार एक तिथि से लंबा लगता है। नीले निशान के डंडों पर नारियल और मोरपंख रहते हैं। छड़ी की यात्रा गलियों से निकलती है। हल पर गोगा की नौ गाँठ वाली रखड़ी बाँधी जाती है ताकि खेत उनके नाम से चले। भजन डमरू, बीन और चिमटे के साथ उठते हैं। पंजाब में भोग सेवइयाँ और पूरी-मट्ठी का भी हो सकता है। राजस्थान में खेजड़ी के नीचे थान काफी है, यदि झंडा सही हो।
हिंदू, मुसलमान और सिख अलग-अलग जिलों में उनके लिए जगह रखते आए हैं। गोगामेड़ी साझा धाम की तरह याद की जाती है। धाम की स्मृति मेले के कुछ मौसमों में मुस्लिम सेवा और हिंदू पूजा को साथ भी रखती है। यह साझेदारी ऐतिहासिक रूप से सच है। इसे कहना चाहिए। इसे योद्धा स्मृति धोने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। साझा आँगन का अर्थ यह नहीं कि सवार कभी लड़ा ही नहीं। अर्थ यह है कि देहात ने रक्षा को संप्रदाय की गिनती से जरूरी माना।
ददरेवा जन्म मेला रखता है। गोगामेड़ी बड़ा जमावड़ा रखती है। गाँव की मेड़ियाँ रोज की ढाल रखती हैं। सहारनपुर में छड़ियाँ इतनी ऊँची और भारी हैं कि पुराना ध्वज दूर से दिख जाए। यह सजावट वाला लोकधर्म नहीं है। यह वह समाज है जो वही रंग अभी उठा रहा है जिसके नीचे सीमा कभी दौड़ी थी।
मंदिरों के रक्षक को लोककथा में क्यों डाल दिया गया
राष्ट्रीय स्मृति असमान है। जो दरबारी इतिवृत्त में बैठते हैं वे इतिहास बन जाते हैं। जो गाँव के गीत में बैठते हैं वे लोककथा बन जाते हैं। पुस्तकालय में यह बाँट साफ लगती है। जमीन पर यह अन्याय है। गोगा ने वह बचाया जो किसान के पास सचमुच था। चलकर नापी जा सकने वाली भूमि। दूध दे सकने वाली गाय। पैदल पहुँच सकने वाला देवस्थान। ये चीजें शाही गजट में कम जाती हैं। थान में जाती हैं।
औपनिवेशिक संग्रहक अक्सर उन्हें साँप-संत के रूप में मिले क्योंकि एक हफ्ते के दौरे में जीवित विधि यही दिखती थी। उन्होंने गुग्गा नौमी सुनी। दीवार पर काला नाग देखा। छड़ी गाँव घूमती देखी। और खाना भर दिया। चौहान घर, बागड़ की मुखियाई और गजनी वाली स्मृति एक मौसम में जाँचना कठिन थी। इसलिए भाला फन के पीछे सरक गया।
आधुनिक शहर की बात ने वही फाइल दोहराई। साँप देवता बच्चे को समझाना आसान है। कैलेंडर पर छापना आसान है। अनिश्चित तिथि वाला सीमा चौहान कठिन है। अनिश्चय को समतल करने का बहाना बना लिया गया। समतल करना अध्ययन नहीं है।
एक कारण और है। बहुत से जिलों में हिंदू, मुस्लिम और सिख घरों की साझी श्रद्धा तथ्य है। कुछ लेखक इस तथ्य को विलायक बना देते हैं। क्षत्रिय धोकर केवल पीर छोड़ देते हैं। देश ने वह धुलाई नहीं चुनी। देश ने दोनों नाम इसलिए रखे कि दोनों काम के थे। जाहर पीर फिर भी जाहरवीर रह सकते हैं। धरती में समाया पुरुष फिर भी रास्ते में खड़ा हुआ रह सकता है।
गोगा को लोककथा में इसलिए नहीं डाला गया कि वे छोटे थे। इसलिए डाला गया कि वे स्थानीय थे। और स्थानीय रक्षक उस इतिहास को शर्मिंदा करते हैं जो बादशाहों को पसंद करता है।
छह राज्य, एक निशान
नक्शा फिर से देखो। साम्राज्य का दावा करके नहीं। जीवित पूजा का दावा करके। राजस्थान जन्म और समाधि रखता है। ददरेवा और गोगामेड़ी दो ध्रुव हैं। दोनों के बीच थान साधारण गाँवों में सवार को रखते हैं। पंजाब गुग्गा को मेड़ियों में रखता है। भादों के पुराने महीने में रखता है। मीठी सेवइयाँ और मट्ठी अब भी पहुँचती हैं। सिख भी हिंदू भी उन जिलों में नाम रखते आए जहाँ गाँव की मढ़ी ने आने वाले से संप्रदाय का पासपोर्ट नहीं माँगा।
हरियाणा पुरानी जांगलदेश स्मृति पर बैठता है। हांसी और हिसार बाद की सजावट नहीं। उसी सूखी पट्टी की पूर्वी साँस हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर सहारनपुर, छड़ी और निशान ऐसे उठाता है जैसे घोड़ा घाग्गर पर थमा हो और फिर चल दिया हो। म्हाड़ी पर डंडे ऊँचे और भारी हैं। यात्राएँ मोहल्लों से निकलती हैं जो पीढ़ियों से यही कर रहे हैं। स्थानीय स्मृति कहती है कि नीला झंडा इसलिए गाड़ा गया कि मंदिरों और घरों का रक्षक पुरानी सड़क के गंगा वाले छोर पर भी ठहराव पाए। उस गाड़ने की हर बात की तिथि बैठे या न बैठे, चलन उससे बड़ा है। म्हाड़ी का मेला गोगामेड़ी की नकल नहीं। वही निशान दूसरे जिले की भाषा बोल रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो परिवार आज भी निशान बाँधता है, वह दिखाने के लिए राजस्थानी आयात नहीं कर रहा। वह उत्तर भारतीय आदत बचा रहा है जो राज्य की सीमा पर मरने को राजी नहीं हुई।
हिमाचल, गुजरात, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से और जम्मू अपनी मेड़ियाँ जोड़ते हैं। राबारी और दूसरे पशुपालक जाल उन्हें वैसे ले गए जैसे झुंड ले जाते हैं। बिहार और झारखंड बाहरी घेरा हैं। वहाँ की भक्ति समुदायों के साथ चली। किसी दरबार के साथ नहीं जो राजधानी गाड़ दे। यह साफ कहो। घेरा फिर भी मायने रखता है। जो नाम नए खेत में गायन बन सके, वह नाम काम आया।
छह राज्य विशाल मध्यकालीन राज्य सिद्ध नहीं करते। विशाल जरूरत सिद्ध करते हैं। जो लोग भूमि, काम, ब्याह और चराई के लिए चले, वे रक्षक साथ ले गए। नीला झंडा उठकर चल सकता है। इसीलिए बचा।
एक कथा नहीं, कई परतें
गोगा जी की लोककथा एक कहानी नहीं। एक चक्र है। नीचे उसी चक्र का विश्लेषण है: परतें, मकसद, और वह काम जो इतिहासग्रंथ नहीं कर पाता। गोगा जी की लोककथा को एक ही किताब की तरह मत पढ़ो। उसमें कम से कम चार परतें बैठती हैं:
- पहली परत: जन्म की है। बाँझ रानी। नाथ गुरु। छला हुआ वर। गुगल। नाम।
- दूसरी परत: घर की है। मौसेरे भाई। भूमि। गाय। सवारी।
- तीसरी परत: क्षितिज की है। धावा। सीमा। मंदिर। वीरगति।
- चौथी परत: धरती की है। खुली जमीन। घोड़ा साथ। नाग। थान। निशान।
शहर अक्सर चौथी परत को पूरी कथा मान लेता है। गाँव चारों रखता है। विश्लेषण का पहला काम यही है। नाग को कथा मत बनाओ। नाग को अंत मानो।
जन्म कथा क्या काम करती है
बाछल और गोरखनाथ वाली कथा केवल चमत्कार नहीं। वह बताती है कि योद्धा कहाँ से आया। बांझपन की कथा उत्तर भारत में आम है। यहाँ फर्क गुगल है। वर रत्न नहीं। मरु की राल है। गाँव की दवा है। नाम रसोई से पड़ता है। इससे नायक किले का अजनबी नहीं रह जाता। वह उसी घर का हो जाता है जहाँ संतान माँगी जाती है। आज मेले में लोग बच्चा इसलिए माँगते हैं कि कथा का पहला अध्याय बच्चा माँगने का है।
बहन का छल भी सजावट नहीं। काछल या आछल वर चुराती है। गुरु देख लेते हैं। फिर भी बाछल को देते हैं। लोकधर्म कह रहा है: वर दिखाने से नहीं टिकता। राह देखने से टिकता है। बाद का कुटुंब-झगड़ा यहीं से बीज लेता है। घर के भीतर दावा पहले जन्म में ही बैठ जाता है। नाथ संबंध कथा को दोहरा बनाता है। क्षत्रिय अकेला रह जाए तो केवल मुखिया है। योगी अकेला रह जाए तो केवल साधक है। लोक दोनों रखना चाहता है। भाला और भभूत एक जीवन में। यही मेल बाद में साँप काटे की दवा बनता है। राख युद्ध के बाद गायब नहीं होती। गाँव के काम आती है।
गाय वाली कथा सबसे पुरानी नैतिक परत है
चारण और रासौ वाली परंपरा गोगा को पहले नाग नहीं बनाती। गाय छुड़ाने वाले पुरुष बनाती है। यह विश्लेषण की कुंजी है। अर्जन और सुरजन मौसेरे भाई हैं। झगड़ा भूमि और पशु का है। कुछ कथन बाहर की शक्ति भी साथ लाते हैं। मूल दृश्य फिर भी घर का है। अपने ने झुंड दबोचा। मुखिया उठा।
लोककथा यहाँ कानून नहीं पढ़ाती। नाप पढ़ाती है। गाय दूध है। हल है। पाहुन है। मान है। झुंड खोना भविष्य खोना है। रिश्तेदार का चोराना अजनबी से गहरा है क्योंकि वह घेरा तोड़ता है जो थामना था। उत्तर अर्जी नहीं। सवारी है। इस परत को हटा दो तो गोगा केवल चमत्कार रह जाते हैं। इसी परत पर पाबूजी और तेजाजी से हाथ मिलता है। पाबूजी ब्याह तोड़कर गाय पर निकले। तेजाजी राह का वचन निभाकर विष लिया। तीनों की कथा एक आग से जलती है। वचन। झुंड। मान। देवस्थान। बागड़ इन्हीं चार से देवता बनाता है।
क्षितिज वाली कथा समय को बाँधती है
गजनवी वाला प्रसंग लोककथा को निजी झगड़े से बाहर निकालता है। टॉड सतलज पर गिरना गाते हैं। शर्मा और पेमाराम महमूद की शताब्दी रखते हैं। गाँव सोमनाथ काल की हवा गाता है। लगभग 1024 की वीरगति गाता है।
यहाँ ईमानदारी जरूरी है। लोककथा इतिहास की नकल नहीं। वह स्मृति की भाषा है। विलियम क्रुक उन्हें बाद की सल्तनत में धकेलते हैं। मुख की संस्कृति पुराने नायक को अपने युग के शत्रु के सामने दोबारा खड़ा कर देती है। यह दोष नहीं। यह लोक का स्वभाव है। हर पीढ़ी अपने डर का चेहरा पुराने सवार पर चढ़ा देती है।
विश्लेषण का काम गिनती गढ़ना नहीं। पूछना है कि गाँव किसे नहीं भूलना चाहता। उत्तर साफ है। सीमा का चौहान रास्ते में खड़ा रहा। भाषण गढ़ो मत। सेना गढ़ो मत। महमूद के मुँह में वचन मत रखो। धाम की फारसी लेख परंपरा श्रद्धा गाती है। वह रण की रोजनिशी नहीं। स्मरण का पत्थर है।
समाधि कथा मृत्यु को जीत में बदलती है
गोगामेड़ी वाली धरती कथा चक्र की सबसे शक्तिशाली छवि है। पृथ्वी फटती है। घोड़ा और सवार जीवित भीतर जाते हैं। लाश नहीं रहती। शवयात्रा नहीं निकलती। मुखिया मिट्टी हो जाता है।
लोक यहाँ हार नहीं गा रहा। रह जाना गा रहा है। जो जमीन में समाए, जमीन का स्वामी बना। सर्प उसी जमीन में रहते हैं। इसलिए नाग बाद की भाषा है। पहले सवार गया। फिर फन उठा। शीश मेड़ी और धुर मेड़ी जन्म और अंत को दो धाम दे देते हैं। कथा एक गाँव में बंद नहीं होना चाहती।
नाग को मिटाना भी गलत है। नाग को पूरा नायक बना देना भी गलत है। विश्लेषण दोनों भूलों के बीच बैठता है। साँप-रक्षक आस्था सच्ची है। वह योद्धा की जगह नहीं लेती। वह योद्धा का दूसरा शरीर है।
नामों की भीड़ भ्रम नहीं, नक्शा है
गोगा जन्म का नाम है। जाहरवीर रण का है। जाहर पीर उपस्थिति का है। बागड़ वाला इलाके का है। गुग्गा पंजाब-हरियाणा की बोली है। शहर एक नाम चुनकर बाकी फेंक देता है। गाँव सारे नाम रखता है क्योंकि उसे एक रूप से काम नहीं चलता। जाहर का एक अर्थ प्रकट होना भी है। जरूरत के समय दिखना। रण में। थान में। काटे की रात। पीर कह देने से भाला नहीं गिरता। दो दरवाजे एक सवार के हैं। साझा आँगन योद्धा नहीं धोता। बताता है रक्षा संप्रदाय की गिनती से जरूरी थी।
यह साझेदारी कथा को कमजोर नहीं करती। कथा को चलने देती है। हिंदू, मुस्लिम, सिख घर अलग विधि रखते हैं। सवार एक रहता है। लोकधर्म का यह लचीलापन दरबारी धर्मग्रंथ से अलग है। वह बाँटता है। यह काम देखता है।
भूगोल कथा का प्रमाण है
ददरेवा जन्म। गोगामेड़ी समाधि। खेजड़ी के नीचे थान। सहारनपुर की छड़ी। पंजाब की मेड़ी। हिमाचल की मढ़ी। बिहार-झारखंड बाहरी घेरा।
छह राज्य विशाल राज्य सिद्ध नहीं करते। विशाल जरूरत सिद्ध करते हैं। लोककथा यात्रा कर सकती है क्योंकि उसमें पोर्टेबल चिह्न हैं। नीला झंडा। नारियल। मोरपंख। छड़ी। नाग। इन्हें नए खेत में गाड़ा जा सकता है।
कहावत खुद विश्लेषण है: गाँव-गाँव गोगो, गाँव-गाँव खेजड़ी। पेड़ मंदिर है। छाया दरबार है। मूर्ति के बिना भी कथा खड़ी रह सकती है।
कथा क्या छिपाती है, क्या बचाती है
लोककथा सटीक तिथि छिपा सकती है। सेना की पंक्ति छिपा सकती है। वह वह चीज बचाती है जिसे गजट नहीं रखता। किसान के पास क्या था। गाय। हल। देवस्थान। वचन। सूखा। कांटा। अपनों का झगड़ा।
कथा का सार
गोगा जी की लोककथा चमत्कार की माला नहीं। नाप की पाठशाला है। वह सिखाती है मुखिया पहले होता है। देवता बाद में। वर राह देखने से मिलता है। गाय छोटी लड़ाई नहीं। अपने का टूटना सबसे गहरा घाव है। सीमा का मौसम घर के झगड़े को बड़ा कर देता है। जो धरती में समाए, मिटता नहीं। नाग उसी मिट्टी की भाषा है। झंडा उसी सवारी का बचा हुआ रंग है।
वीरगति का अर्थ
वीरगति गिरकर मिटना नहीं। गिरकर याद रह जाना है। बागड़ में मृत्यु दो तरह की होती है। एक वह जो घर में बुझा देती है। एक वह जो गाँव को झंडा दे देती है। गोगा जी की कथा दूसरी वाली है। परंपरा कहती है वे रण से लौटकर चारपाई पर नहीं लेटे। धरती ने उन्हें लिया। घोड़ा साथ था। समाधि कब्र भी बनी। विजय भी बनी। इसलिए इस प्रसंग को केवल मृत्यु-लेख मत पढ़ो। इसे उस क्षण की चर्चा मानो जहाँ मुखिया देवता हो गया।
कब और किस क्षितिज पर
लोकस्मृति अंतिम युद्ध को लगभग 1024 ईस्वी के आसपास रखती है। जन्म विक्रम संवत 1003 के घेरे में गाया जाता है। दफ्तरी मुहर पतली है। गाँव की तिथि मोटी है।
जेम्स टॉड ने चारण स्मृति से उन्हें महमूद गजनवी के समय में रखा। बठिंडा का गुगा बेटों और भतीजों के साथ सतलज पर गिरा। टॉड की गिनती हाजिरी पंजी नहीं। उनकी सुनवाई फेंकने लायक भी नहीं। वे वही सुन रहे थे जो देश गा रहा था।
दशरथ शर्मा ने श्रवक-वित्तूड़ी-अतिचार और कायमखान रासौ से उन्हें महमूद की शताब्दी में रखा। पेमाराम ने गोगाजी पिर्रा चंद, गुगापेड़ी और गोगाजी चौहान री निसानी पढ़कर वही पंक्ति पकड़ी। आर. सी. टेम्पल भी यहीं टिके। अधिकांश राजस्थानी विद्वान इसी क्षितिज पर हैं।
लोकस्मृति सोमनाथ काल के धावों से जोड़ती है। भूमि और देवस्थान दबाव में थे। बागड़-जांगलदेश उन्हीं राहों के मौसम में बैठा था। स्थानीय मुखिया को ग्रंथ की जरूरत नहीं थी यह जानने के लिए कि सड़क अब केवल व्यापारी की नहीं रही। यहाँ वह रेखा खींचो जिसे कथाकार अक्सर लाँघ जाते हैं। रण का भाषण मत गढ़ो। सटीक सेना मत गढ़ो। महमूद के मुँह में वचन मत रखो। स्मृति को नाटक की जरूरत नहीं। उसे दावा चाहिए। सूखे उत्तर का एक चौहान रास्ते में खड़ा हुआ।
दो लड़ाइयाँ, एक अंत
वीरगति अचानक नहीं आती। कथा में दो मोर्चे पहले चलते हैं:
- पहला मोर्चा घर का है: अर्जन और सुरजन से भूमि और गाय का झगड़ा। झुंड दबोचा गया। गोगा बेटों और कुटुंब लेकर निकले। यह लड़ाई छोटी नहीं। गाय दूध है। हल है। मान है। अपने का चोराना अजनबी से गहरा काटता है।
- दूसरा मोर्चा क्षितिज का है: सतलज-हांसी देश। गजनवी हवा। मंदिर और सीमा एक मौसम में। टॉड नदी के किनारे गिरना गाते हैं। गाँव भूमि और पवित्र व्यवस्था की रक्षा गाते हैं। दोनों स्वर एक दिशा में हैं। मुखिया आँगन में नहीं रुका। बाहर निकला। बाहर ही याद रहा।
विलियम क्रुक उन्हें बाद की सल्तनत में धकेलते हैं। मुख की संस्कृति पुराने नायक को अपने युग के शत्रु के सामने दोबारा खड़ा कर देती है। यह स्वभाव मानवीय है। एक बार कह दो। फिर बागड़ की मजबूत सहमति को खड़ा रहने दो। गजनवी क्षितिज का सीमा चौहान।
धरती क्यों खुली
गोगामेड़ी वाला अंत सबसे अलग है। परंपरा कहती है पृथ्वी फटी। घोड़ा और सवार जीवित भीतर गए। लाश धूप में नहीं पड़ी। शवयात्रा नहीं निकली। मुखिया मिट्टी का हो गया।
इस दृश्य को जादू कहकर हल्का मत करो। बागड़ की भाषा यह कह रही है: योद्धा हारा नहीं। योद्धा उठा नहीं भी गया। योद्धा रह गया। जो पुरुष जमीन में समाए, वह जमीन का स्वामी बना। सर्प उसी जमीन में रहते हैं। इसलिए नाग बाद में आया। पहले सवार गया। फिर फन उठा। भभूत इसीलिए साँप काटे पर लगता है। गुरु की राख जन्म से साथ थी। वीरगति ने उसे गाँव की दवा बना दिया। भाला गिरा नहीं। रूप बदला।
शीश और धड़
कुछ गाँव दो जगह गाते हैं। ददरेवा से शीश मेड़ी जुड़ती है। गोगामेड़ी से धुर मेड़ी या धड़ वाली भूमि जुड़ती है। जन्म एक छोर। समाधि दूसरा छोर। कथा सिर और धड़ को दो धाम दे देती है। इसका अर्थ शस्त्र-शास्त्र की रिपोर्ट नहीं। इसका अर्थ यह है कि बागड़ एक गाँव में योद्धा को बंद नहीं करना चाहता था। जन्म जहाँ हुआ, वहाँ स्मृति रही। अंत जहाँ माना गया, वहाँ मेला उठा।
गोगामेड़ी ऊँची मेड़ पर बैठी है। नाम में ही मेड़ी है। समाधि भीतर। कभी संगमरमर पर घोड़े वाला चित्र। गले पर नाग। साथ नाहरसिंह पांडे और भज्जू कोतवाल की आकृतियाँ भी कटी बताई जाती हैं। मुखिया अकेला नहीं गिरा। घर और सेवा साथ याद रहे। ज्योति बाद में जली। नाहरसिंह वाली बाती समाधि के बाद की पहली रोशनी गाई जाती है। पत्थर रुका। दीया चला।
धाम की फारसी लेख परंपरा महमूद की श्रद्धा गाती है। इसे रण का समाचार मत मानो। धाम की स्मृति मानो। गाँव गीत में मान रखता है। धाम पत्थर में। दोनों प्रमाण हैं। कोई रोजनिशी नहीं।
वीरगति के बाद पूजा
जो अंत अधूरा रह जाता है, वह मेला नहीं बनता। गोगा नवमी इसलिए भादों में आती है कि गाँव गिरने को त्योहार बना बैठा। नीला निशान उसी सवारी का झंडा है जो धरती में गई। छड़ी उसी यात्रा है जो अब घर-घर चलती है। हल पर रखड़ी उसी हाथ की गाँठ है जिसने भाला पकड़ा था।
हिंदू जाहरवीर कहते हैं। कई मुस्लिम घर जाहर पीर कहते हैं। जाहर का एक अर्थ प्रकट होना भी है। जो रण में दिखे। जो थान में दिखे। जो काटे की रात दिखे। पीर कह देने से भाला नहीं गिरता। दो दरवाजे एक सवार के हैं।
क्या नहीं कहना चाहिए
वीरगति को फिल्म मत बनाओ। सेना की पंक्ति मत खड़ी करो। महमूद को संवाद मत दो। गोगा को मंच पर भाषण मत दो। ये चीजें कथा को बड़ा नहीं करतीं। कथा को झूठा करती हैं। जो कहा जा सकता है, वह काफी है। एक चौहान मुखिया गाय और भूमि के लिए निकला। राजस्थान उसे गजनवी हवा में रखता है। अंत गोगामेड़ी की मिट्टी में माना गया। घोड़ा साथ था। नाग बाद में आया। झंडा अब भी नीला है।
गोगा जी का महत्त्व मूर्ति के रंग में नहीं बैठता। वह उस काम में बैठता है जो बागड़ ने उन्हें सौंपा और छह राज्यों ने नहीं छोड़ा।
रक्षा का महत्त्व
सबसे पहला महत्त्व रक्षक का है। गोगा जी गाय, भूमि, वचन और देवस्थान के लिए निकले। यह चार बातें किसान के घर की रीढ़ हैं:
- दूध।
- हल।
- मान।
- मंदिर का नैवेद्य।
जिस मुखिया ने झुंड नहीं जाने दिया, उसने पूरे गाँव की श्रृंखला बचाई। इसलिए वे केवल राजपूत स्मृति नहीं। पशुपालक, जाट, राबारी, खेतिहर घर के देवता बने। साँप का महत्त्व इसी रक्षा से उगता है। जो धरती में समाए, जमीन के स्वामी बने। काटे की रात वही नाम पुकारा जाता है। भभूत भाले का इनकार नहीं। भाला दवा बनकर चला। नाग कथा मिटाता नहीं। कथा का दूसरा शरीर है।
सीमा का महत्त्व
दूसरा महत्त्व क्षितिज का है। राजस्थान उन्हें गजनवी हवा में रखता है। टॉड, शर्मा, पेमाराम, टेम्पल वही शताब्दी पकड़ते हैं। लोकस्मृति सोमनाथ काल के धावों से जोड़ती है। लगभग 1024 की वीरगति गाती है। अभिलेख पतले हैं। दावा मोटा है। सूखे उत्तर का एक चौहान रास्ते में खड़ा रहा।
यह महत्त्व राष्ट्रगीत का नारा नहीं। सीमा के मुखिया का सबक है। मंदिर और गाय एक मौसम में दबे तो घर का झगड़ा भी बड़ा हो गया। गोगा उस सबक को चेहरा देते हैं।
साझा आँगन का महत्त्व
तीसरा महत्त्व दरवाजे का है। हिंदू जाहरवीर कहते हैं। कई मुस्लिम घर जाहर पीर कहते हैं। सिख गाँव मढ़ी पर सेवइयाँ धरते हैं। गोगामेड़ी साझा धाम गाया जाता है। पीर कह देने से भाला नहीं गिरता। साझा आँगन बताता है रक्षा संप्रदाय की गिनती से जरूरी थी। उत्तर भारत के लोकधर्म का यह लचीलापन दरबारी बाँट से अलग है।
नाथ और क्षत्रिय का मेल
चौथा महत्त्व दो धाराओं का है। बाछल की तपस्या गोरखनाथ के द्वार पर हुई। पुत्र चौहान घर में जन्मा। भभूत और भाला एक जीवन में। योग बिना भूमि के अधूरा। भूमि बिना सत्य के अंधी। लोक दोनों रखना चाहता है। जन्म कथा यही सिखाती है। मेले में बच्चा इसलिए माँगा जाता है कि पहला अध्याय माँगने का है।
स्मृति का महत्त्व
पाँचवाँ महत्त्व याद रखने का है। शहर उन्हें लोकदेवता की फाइल में रख देता है। फाइल छोटी पड़ जाती है। ददरेवा जन्म है। गोगामेड़ी समाधि है। खेजड़ी के नीचे थान है। सहारनपुर की छड़ी है। पंजाब की मेड़ी है। बिहार-झारखंड बाहरी घेरा है। छह राज्य साम्राज्य नहीं सिद्ध करते। जरूरत सिद्ध करते हैं।
आज का महत्त्व
आज का महत्त्व संग्रहालय का नहीं। हाजिरी का है। नीला निशान उठे तो सवार चलता है। डेरू बजे तो कथा उठती है। हल पर रखड़ी बँधे तो हाथ याद रखता है। औपनिवेशिक फाइल ने साँप देख लिया। आधुनिक शहर ने वही फाइल दोहराई। गाँव भाला नहीं भूला। गोगा जी का महत्त्व यह है कि वे देवता बनने से पहले मुखिया थे। पूजा बाद में आई। काम पहले आया।
कथा में भाला रखो
इन्हें लोकदेवता कहो तो कहो। शब्द अपमान नहीं। लोक का अर्थ है कि अदालतों ने छोटे किले भूल दिए तब भी लोगों ने इन्हें रखा। यह मत भूलो कि यह देवता देवता होना पहले कैसे सीखा। रास्ते में खड़े होकर सीखा।
वे माता की लंबी तपस्या और गुरु के कठिन वर के लिए खड़े हुए। उस सूखे देश के लिए खड़े हुए जिसे उपदेश से अधिक मुखिया चाहिए था। उन गायों के लिए खड़े हुए जो नारा नहीं थीं। राजस्थान की पसंदीदा स्मृति में महमूद गजनवी के क्षितिज पर खड़े हुए, जब भूमि और पवित्र स्थल अपने आप सुरक्षित नहीं थे। तब तक खड़े रहे जब तक धरती से कहा गया कि इन्हें भीतर ले लो।
उत्तर भारत ने गोगा जी को साँप बनाकर नहीं गढ़ा। उसने एक योद्धा को याद रखा। साँप उस मिट्टी के साथ आया जिसने उन्हें भीतर लिया।
अगली गोगा नवमी पर झंडे देखो। चिमटे की आवाज सुनो। बच्चे को निशान की ओर उठाते देखो। फिर पुरानी तसवीर में भाला देखो। नीला घोड़ा देखो। वह कुंडली देखो जो फन भी है और विजय भी। अब नीले घोड़े के पास लौटो। मूर्ति पढ़ो तो चार चीजें ढूँढो:
- घोड़ा
- भाला
- नाग
- निशान
तीन मिल जाएँ तो सवार पहचाना जा सकता है। केवल नाग हो तो थान है। केवल घोड़ा हो तो योद्धा अधूरा है। दोनों हों तो कथा पूरी है। उन्हें लोकदेवता कहो तो कहो। शब्द छोटा नहीं। शब्द ईमानदार है। लोक ने उन्हें उठाया। दरबार ने नहीं। पर लोकदेवता कहकर काम मत बंद करो। पूछो कि देवता बनने से पहले वे क्या थे। उत्तर बागड़ देता है। मुखिया थे। गरीब के द्वार पर उदार थे। झुंड के पीछे घोड़ा दौड़ाते थे।
पाबूजी ब्याह तोड़कर निकले। तेजाजी वचन निभाकर विष लिया। गोगा धरती में समाए। तीनों एक ही पाठ छोड़ते हैं। गाय बचे। वचन रहे। मान रहे। देवस्थान बचा रहे। बागड़ इन्हीं चार से देवता बनाता है।
ददरेवा राह देखती रानी का घर है। गोगामेड़ी खुली मिट्टी का घर है। दोनों के बिना झंडा खाली कपड़ा रह जाता है। छह राज्य उसी झंडे को इसलिए उठाते हैं कि नया खेत पुराना डर नहीं मिटाता। साँप नया इलाका भी काटता है। गाय नई सीमा पर भी खोती है। नाम इसीलिए चला।
उत्तर भारत ने गोगा जी को साँप की कथा बनाकर नहीं गढ़ा। उसने एक योद्धा याद रखा। साँप उस मिट्टी के साथ आया जिसने उन्हें लिया। कथा में भाला रखो। अंत में भी। बिना भाले के देवता सजता है। रक्षक नहीं बचता। रक्षक बचा रहे तो देवता खुद खड़ा रह जाएगा।
