बचपन में जब काले बादल घिर कर आते थे और बारिश की पहली बूंद मिट्टी पर गिरती थी, तो चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान ला देती थी।
हम कागज़ की नावें बनाते थे, पकोड़े खाते थे और मानसून का जमकर जश्न मनाते थे।
लेकिन आज? आज जैसे ही आसमान में बादल गरजते हैं, आम आदमी के दिल में एक खौफ छा जाता है।
उसे बारिश की बूंदों में कागज़ की नाव नहीं, बल्कि EMI पर ली गई अपनी वो कार तैरती हुई नज़र आती है जो उसने अपनी खून-पसीने की कमाई से खरीदी थी।
उसे अपने घर में घुसता हुआ गटर का वो काला पानी नज़र आता है जो पल भर में उसकी पूरी गृहस्थी को सड़ा कर रख देता है।
सच पूछो तो आज हमारे देश में मानसून कोई मौसम नहीं रह गया है, ये एक खौफनाक ‘राष्ट्रीय आपदा’ बन चुका है।
हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकॉनमी हैं। हम चाँद के उस हिस्से पर अपना चंद्रयान उतार चुके हैं जहाँ दुनिया का कोई देश नहीं पहुँच पाया।
हम 5G और डिजिटल इंडिया के मामले में अमेरिका और यूरोप को टक्कर दे रहे हैं। हम ‘Smart Cities’ की बातें करते हैं।
लेकिन भाईसाहब, जैसे ही मानसून की दो-चार झमाझम बारिशें होती हैं, हमारे इस ‘न्यू इंडिया’ का सारा वर्ल्ड क्लास इन्फ्रास्ट्रक्चर गटर के पानी में डूबते-उतराते हुए नज़र आता है।
आखिर कब तक चलेगा ये सब? कब तक हम ‘स्मार्ट सिटी’ के झूठे पोस्टरों के नीचे अपनी असली बर्बादी देखते रहेंगे?
आज वक़्त आ गया है की इस जुगाड़ वाले सिस्टम को उखाड़ फेंका जाए और जापान जैसी उस अंडरग्राउंड ‘परमानेंट’ टेक्नोलॉजी को भारत लाया जाए, जिसने बाढ़ नाम की बीमारी को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है।
पहली ही बारिश में गटर बन जाती हैं सड़कें और तैरने लगती हैं गाड़ियां, भारत में मानसून आखिर कब तक लाएगा तबाही का खौफ
आप किसी भी बड़े शहर का नाम ले लीजिए। क्या दिल्ली, क्या मुंबई, क्या चेन्नई और क्या पटना… कहानी सबकी बिल्कुल एक जैसी है, बस किरदारों के नाम बदल जाते हैं।
जैसे ही मानसून दस्तक देता है, करोड़ों रुपये खर्च करके बनाई गई चमचमाती सड़कें रातों-रात गटर में तब्दील हो जाती हैं।
जो अंडरपास ट्रैफिक को स्मूथ करने के लिए बनाए गए थे, वो मौत के स्विमिंग पूल बन जाते हैं।
आम आदमी का दर्द ज़रा करीब से महसूस करके देखिए। एक नौकरीपेशा इंसान सुबह अपने ऑफिस के लिए निकलता है।
अचानक भयंकर बारिश शुरू हो जाती है। आधे घंटे के अंदर सड़कें समंदर बन जाती हैं और उसका स्कूटर या कार बीच सड़क पर बंद पड़ जाती है।
वो इंसान घुटनों तक भरे गंदे सीवर के पानी में अपनी गाड़ी को धक्का लगा रहा होता है। आस-पास गाड़ियां तैर रही होती हैं, खुले हुए गड्ढे मौत का मुंह फाड़े किसी शिकार का इंतज़ार कर रहे होते हैं।
ये हमारे हिंदुस्तान के हर शहर की सालाना हकीकत है!
आखिर ऐसा क्यों होता है? आज़ादी के 75 साल से ऊपर हो गए, लेकिन ड्रेनेज (Drainage) के नाम पर आज भी हम वही सड़ी-गली और पुरानी व्यवस्था ढो रहे हैं।
हमारे सिस्टम ने शहरों को कंक्रीट का ऐसा भद्दा जंगल बना दिया है जहाँ पानी को ज़मीन के अंदर रिसने की एक इंच जगह नहीं मिलती।
जो तालाब और झीलें कभी बारिश का पानी सोखती थीं, उनको मिट्टी से पाटकर वहां बड़े-बड़े मॉल और पॉश सोसायटियां खड़ी कर दी गई हैं।
जब पानी को जाने का कोई रास्ता ही नहीं मिलेगा, तो वो सड़क पर नहीं बहेगा तो और कहाँ जाएगा?
सिस्टम की नाकामी का आलम ये है की हमारे प्लानर्स आज भी 50 साल पुरानी उन सीवर लाइनों के भरोसे बैठे हैं जो अंग्रेज़ों के ज़माने में या उसके कुछ साल बाद बिछाई गई थीं।
शहर की आबादी 10 गुना बढ़ गई, गाड़ियां 50 गुना बढ़ गईं, इमारतें आसमान छूने लगीं, लेकिन उस नाली और ड्रेनेज का साइज़ आज भी वही का वही है!
ऊपर से उसमें प्लास्टिक और दुनिया भर का कचरा फंसा रहता है। हर साल मानसून से पहले करोड़ों रुपये नालों की ‘सफाई’ के नाम पर पास होते हैं, टेंडर निकलते हैं, और वो सारा पैसा अफसरों और ठेकेदारों की जेब में जाकर ड्रेनेज की तरह ही ‘चोक’ हो जाता है।
2026 के मानसून का खौफनाक तांडव, असम में बह रही लाशें और दिल्ली-मुंबई से लेकर गुरुग्राम तक पानी में डूबकर सिस्टम की जल रही चिता
अगर आपको लगता है की मैं बातों को बढ़ा-चढ़ा कर बोल रहा हूँ, तो ज़रा अभी हाल ही के यानी इसी साल जुलाई 2026 के मानसून के आंकड़े उठाकर देख लीजिए।
इस बार बारिश ने जो कोहराम मचाया है, उसने सिस्टम के गाल पर ऐसा तमाचा जड़ा है की उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है।
सबसे पहले बात करते हैं असम की। भाईसाहब, असम का जो हाल हुआ है वो वो एक ऐसी त्रासदी है जिसे देखकर किसी भी पत्थर दिल इंसान की आँखों से आंसू बह निकलें।
जुलाई 2026 के ताज़ा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, असम में बाढ़ की वजह से 78 से ज़्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। शिवसागर, चराईदेव और गोलाघाट जैसे ज़िले तो मानो दुनिया के नक़्शे से ही मिटने की कगार पर आ गए।
3 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हो गए यार! जिन किसानों ने दिन-रात एक करके अपनी फसलें उगाई थीं, उनकी 45,000 हेक्टेयर से ज़्यादा की लहलहाती फसलें एक झटके में पानी के नीचे दफन हो गईं।
और तो और, हमारे काजीरंगा नेशनल पार्क का तो सीना ही छलनी हो गया। 11,000 से ज़्यादा बेज़ुबान जानवर इस बाढ़ की चपेट में आ गए।
गैंडे, हिरण… सब उस मटमैले पानी में अपनी जान बचाने के लिए तड़पते रहे और हमारा सिस्टम बस हेलीकॉप्टर से एरियल सर्वे करने में लगा रहा।
अब आ जाइए देश की दिल कही जाने वाली राजधानी दिल्ली पर। 28 जुलाई 2026 का वो दिन दिल्ली वाले शायद ही कभी भूल पाएंगे। चंद घंटों की बारिश ने पूरे दिल्ली मॉडल को धोकर रख दिया।
एशिया के सबसे बड़े थोक बाज़ार सदर बाज़ार में व्यापारियों का करोड़ों का माल पानी में तैर रहा था। जिस कनॉट प्लेस (CP) को दिल्ली का प्राइड कहा जाता है, जहाँ देश के सबसे महंगे शोरूम हैं, वहां सड़कों पर कमर-कमर तक पानी भर गया।
लाल किले के आस-पास का इलाका ऐसा लग रहा था जैसे आप समंदर के बीचों-बीच खड़े हों। करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट्स सिर्फ एक बारिश में कागज़ की नाव की तरह बह गए।
और हमारी मायानगरी मुंबई? वहां तो हर साल का यही ड्रामा है। इस बार तो मुंबई ने 27 साल का रिकॉर्ड ही तोड़ दिया।
अँधेरी सबवे, जो शहर की एक अहम लाइफलाइन है, वो पूरा का पूरा पानी में डूब गया। लोकल ट्रेनें पटरियों पर खड़ी रह गईं और हज़ारों लोग स्टेशनों पर रात गुज़ारने को मजबूर हो गए।
लेकिन सबसे बड़ा मज़ाक तो हमारे उन तथाकथित आईटी हब्स (IT Hubs) का बना है, जिन्हें हम विदेशी कंपनियों को ‘सिलिकॉन वैली’ कहकर बेचते हैं।
गुरुग्राम (गुड़गांव) और बेंगलुरु का हाल देखा आपने? चमचमाती कांच की गगनचुंबी इमारतें और उनके नीचे बहता हुआ सड़ांध मारता गटर का पानी!
जिन सड़कों पर ऑडी और मर्सिडीज़ दौड़नी चाहिए थीं, वहां ट्रैक्टर और नावें चल रही थीं। लाखों रुपये महीने की सैलरी पाने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स ट्रैफिक जाम में 6-6 घंटे फंसे रहे।
आख़िरकार प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए और वही अपना पुराना घिसा-पिटा झुनझुना थमा दिया- ‘वर्क फ्रॉम होम’ (WFH) कर लो भाई!
मतलब सोचिए, हमारे पास सड़कों से पानी निकालने की कोई टेक्नोलॉजी नहीं है, कोई विज़न नहीं है।
हम बस यही दुआ करते हैं की बारिश रुक जाए और धूप निकल आए ताकि पानी खुद-ब-खुद सूख जाए। क्या एक ग्लोबल सुपरपावर बनने का सपना देखने वाले देश को ये सब शोभा देता है? बिल्कुल नहीं!
बारिश तो जापान में भी हिंदुस्तान जितनी ही होती है फिर क्यों टोक्यो सुरक्षित है और दिल्ली से लेकर मुंबई तक डूब जाता है
अब यहाँ बहुत से लोगों के दिमाग में एक बात खटक रही होगी। हमारे सिस्टम के बचाव में ज्ञान बांटने वाले कुछ लोग अक्सर कह देते हैं की “अरे भाई, भारत में बारिश ही इतनी ज़्यादा होती है की कोई सिस्टम क्या कर लेगा!”
अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो ज़रा रुकिए और दुनिया का नक्शा उठाकर देख लीजिए।
जापान कोई रेगिस्तान नहीं है दोस्त। वहां भी झमाझम बारिश होती है और मानसून आता है। बल्कि जापान की भौगोलिक स्थिति तो ऐसी है की वहां हर साल भयंकर से भयंकर टाइफून (Typhoons) यानी समुद्री तूफान आते हैं, जो अपने साथ समंदर का पानी और खौफनाक बारिश लेकर सीधे शहरों में घुसते हैं।
अगर सिर्फ बारिश के पानी के हिसाब से देखें, तो टोक्यो के डूबने के चांस हमारी दिल्ली या मुंबई से कहीं ज़्यादा हैं।
लेकिन क्या आपने कभी न्यूज़ में सुना है की टोक्यो की सड़कों पर गाड़ियां तैर रही हैं या वहां के लोग अंडरपास में डूबकर मर गए? नहीं ना!
आखिर ऐसा क्यों? बारिश वहां भी है, बारिश यहाँ भी है। फर्क बादलों का नहीं, फर्क ‘माइंडसेट’ (Mindset) का है।
हमारे और जापान के सिस्टम में ज़मीन-आसमान का अंतर है। हमारे यहाँ का सिस्टम हमेशा ‘रिएक्टिव’ (Reactive) है।
मतलब, जब सड़क पर सीने तक पानी भर जाएगा, हाहाकार मच जाएगा, न्यूज़ चैनल वाले माइक लेकर चिल्लाने लगेंगे, तब जाकर हमारा प्रशासन नींद से जागेगा।
फिर सड़कों से पानी निकालने के लिए हज़ारों लीटर डीज़ल फूंक कर वाटर पंप लगाए जाएंगे। ये शुद्ध रूप से ‘जुगाड़’ है!
वहीं दूसरी तरफ, जापानियों का सिस्टम ‘प्रोएक्टिव’ (Proactive) है। उन्होंने समस्या के आने का इंतज़ार नहीं किया।
उन्होंने ये सोच लिया की यार, चाहे आसमान फट जाए और बादल सीधा ज़मीन पर गिर पड़ें, हमें सड़कों पर एक बूंद पानी नहीं रुकने देना है।
उन्होंने जुगाड़ पर भरोसा करने के बजाय एक ‘परमानेंट विज़न’ तैयार किया और अपने शहरों के नीचे एक ऐसी दुनिया बसा दी, जिसकी कल्पना करना भी हमारे नेताओं और सिस्टम के लिए किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा है।
1991 की वो खौफनाक बाढ़ जिसने जापान को सोचने पर मजबूर कर दिया और ज़मीन के नीचे खड़ा कर दिया गया दुनिया का सबसे बड़ा ‘फ्लड कंट्रोल सिस्टम’
जापान भी हमेशा से इतना सुरक्षित नहीं था। आज जो हम टोक्यो का भौकाल देखते हैं, उसके पीछे एक बहुत बड़े दर्द और तबाही की कहानी छिपी है।
चलिए आपको थोड़ा पीछे लेकर चलते हैं। बात है 1991 की। उस साल जापान में ऐसा भयंकर तूफान और बाढ़ आई थी की टोक्यो शहर की सांसें उखड़ गई थीं।
बारिश ने ऐसा तांडव मचाया की शहर की नदियां उफान पर आ गईं और पानी लोगों के घरों में घुस गया।
उस एक बाढ़ में टोक्यो और उसके आस-पास के 30,000 से ज़्यादा घर पूरी तरह तबाह हो गए थे। अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। सड़कों पर नावें चलानी पड़ी थीं।
तबाही बिल्कुल वैसी ही थी जैसी आज हम असम, मुंबई या चेन्नई में देखते हैं।
लेकिन जापानियों की यही बात तो उन्हें पूरी दुनिया से अलग बनाती है। उस तबाही के बाद वहां की सरकार ने हमारे यहाँ की तरह सिर्फ हवाई सर्वे नहीं किए।
उन्होंने मीडिया के सामने आकर ये नहीं कहा की “ये तो प्राकृतिक आपदा है, हम क्या कर सकते हैं।” उन्होंने फाइलों में लीपापोती करके जनता को मुआवज़े के चंद चेक नहीं बांटे।
इसके बजाय, वहां के इंजीनियर्स, साइंटिस्ट्स और अर्बन प्लानर्स एक कमरे में बैठे और कसम खाई की आज के बाद टोक्यो कभी नहीं डूबेगा।
उसी बाढ़ की तबाही से जन्म हुआ दुनिया के सबसे खतरनाक और अकल्पनीय फ्लड कंट्रोल प्रोजेक्ट का, जिसे नाम दिया गया- G-Cans (Metropolitan Area Outer Underground Discharge Channel)।
1992 में इस महा-प्रोजेक्ट की नींव रखी गई। ये कोई छोटा-मोटा नाला या सीवर लाइन बनाने का काम नहीं था दोस्त। ये शहर के ठीक नीचे एक पूरी की पूरी अंडरग्राउंड दुनिया बसाने का काम था।
इसे बनाने में कोई एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे 17 साल की लंबी तपस्या लगी। 17 साल तक जापान के इंजीनियर्स ज़मीन के नीचे दिन-रात मिट्टी खोदते रहे, कंक्रीट बिछाते रहे।
और इस प्रोजेक्ट की लागत कितनी आई? करीब 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर (यानी आज के हिसाब से लगभग 16 से 17 हज़ार करोड़ रुपये)।
साल 2006 में जाकर ये इंजीनियरिंग का अजूबा पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। और कसम से, 2006 के बाद से टोक्यो ने कभी बाढ़ की वो खौफनाक शक्ल दोबारा नहीं देखी।
17 साल की मेहनत और अरबों डॉलर का खर्च, जापान की ‘G-Cans टेक्नोलॉजी’ जो एक झटके में पी जाती है बाढ़ का पानी
अब आपको बताते हैं की आखिर ये 16 हज़ार करोड़ रुपये और 17 साल की मेहनत गई कहाँ? ये जी-कैन्स काम कैसे करता है?
इसे समझने के लिए आपको अपनी सोच का दायरा थोड़ा बढ़ाना होगा, क्योंकि ये हमारे मोहल्ले की उस नाली जैसा बिल्कुल नहीं है जिसे सफाई कर्मचारी एक डंडे से साफ़ कर देता है।
जब टोक्यो में भयंकर बारिश होती है और वहां की छोटी नदियां (जैसे नाका, कुरामात्सु आदि) उफान पर आने लगती हैं, तो पानी सड़कों पर फैलने के बजाय सीधे ज़मीन के नीचे बने 5 महा-विशाल कुओं (Silos) में गिरना शुरू हो जाता है।
भाईसाहब, ये कोई मामूली कुएं नहीं हैं! अगर आप इन कुओं के अंदर झांकेंगे तो आपका दिमाग चकरा जाएगा। ये कुएं ज़मीन से 70 मीटर (करीब 230 फुट) गहरे हैं और इनकी चौड़ाई 30 मीटर है।
इनकी विशालता का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिए की अगर आप अमेरिका के ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ या अमेरिका के स्पेस शटल को इस कुएं में खड़ा कर दें, तो वो भी इसके अंदर पूरा का पूरा समा जाएगा और ऊपर से जगह भी बच जाएगी!
अपने कुतुब मीनार को भी अगर इसके अंदर डाल दें तो वो भी लगभग फिट हो जाएगा। ऐसे एक नहीं, पूरे पांच महा-कुएं टोक्यो के अलग-अलग हिस्सों में ज़मीन के नीचे बने हुए हैं।
जब बारिश का पानी इन कुओं में भरता है, तो वहां से शुरू होता है असली मैजिक। ये पांचों कुएं आपस में ज़मीन से 50 मीटर (करीब 165 फुट) नीचे बनी एक भयंकर अंडरग्राउंड सुरंग (Tunnel) से जुड़े हुए हैं।
ये सुरंग 6.3 किलोमीटर लंबी और 10 मीटर चौड़ी एक ऐसी महा-सुरंग है जिसके अंदर आप आराम से दो बसें अगल-बगल दौड़ा सकते हैं।
जैसे ही शहर में बाढ़ का पानी बढ़ता है, वो सारा का सारा पानी सड़कों पर फैलने की बजाय सीधे इन कुओं में गिरता है और फिर इस 6.3 किलोमीटर लंबी सुरंग से बहता हुआ एक खास जगह पर पहुँचता है।
6.3 किलोमीटर लंबी उस सुरंग से बहने के बाद बाढ़ का पानी जिस जगह पर पहुँचता है, उसे जापानी लोग सम्मान से ‘अंडरग्राउंड टेम्पल’ (Underground Temple) यानी पाताल में बसा मंदिर कहते हैं।
इसे तकनीकी भाषा में ‘प्रेशर-एडजस्टिंग टैंक’ कहा जाता है। इस महा-विशाल टैंक के अंदर 59 भीमकाय खंभे (Pillars) लगे हुए हैं।
एक-एक खंभा 18 मीटर (करीब 60 फुट) ऊंचा है और एक खंभे का वज़न 500 टन है! ये भीमकाय खंभे उस भयंकर बाढ़ के पानी के प्रेशर को कंट्रोल करने का काम करते हैं, ताकि पानी की ताकत से शहर के नीचे की ज़मीन न हिल जाए।
ज़रा इस टैंक की कैपेसिटी (क्षमता) का अंदाज़ा लगाइए। जब टोक्यो में ऊपर आसमान से आफत बरस रही होती है, तो यह अंडरग्राउंड टैंक एक ही झटके में 67 करोड़ लीटर पानी अपने अंदर समा लेने की ताकत रखता है।
67 करोड़ लीटर! हमारे यहाँ तो दो लाख लीटर पानी भर जाए तो कॉलोनियों में नावें चलने लगती हैं।
लेकिन इस जापानी अजूबे का असली क्लाइमैक्स तो अब शुरू होता है। पानी जमा तो कर लिया, अब इसे निकालना कैसे है?
पानी को बाहर धकेलने के लिए यहां 14,000 हॉर्सपावर (Horsepower) वाले चार महा-ताकतवर इंजन लगाए गए हैं।
ये मॉडिफाइड एयरक्राफ्ट टरबाइन हैं-मतलब वो इंजन जो बड़े-बड़े हवाई जहाज़ों (Aeroplanes) को उड़ाने के काम आते हैं, उन्हें मॉडिफाई करके पानी खींचने के लिए ज़मीन के नीचे फिट किया गया है।
जब ये 14 हज़ार हॉर्सपावर वाले इंजन चालू होते हैं, तो इनकी ताकत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की ये 200 टन पानी प्रति सेकंड की स्पीड से खींचते हैं।
ये भयंकर टरबाइन इस बाढ़ के पानी को पूरी ताकत से खींचते हैं और टोक्यो शहर से दूर बहने वाली एक विशाल और सुरक्षित नदी (Edo River) में धकेल देते हैं।
बाढ़ का पानी शहर की सड़कों को छू तक नहीं पाता और ज़मीन के नीचे ही नीचे बहकर सुरक्षित तरीके से नदी में चला जाता है।
यही वो अचूक टेक्नोलॉजी है जिसके दम पर 2006 के बाद से लेकर आज तक, टोक्यो शहर में कभी बाढ़ का एक कतरा भी लोगों के घरों में नहीं घुस पाया।
आज़ादी के इतने दशक बाद भी आखिर क्यों फेल है भारत का ड्रेनेज सिस्टम, आखिर कब हमारे देश में आएगी जापान जैसे टेक्नोलॉजी
अब ज़रा जापान की उस 14 हज़ार हॉर्सपावर वाली टेक्नोलॉजी से बाहर निकलिए और अपने हिंदुस्तान की सड़कों पर आ जाइए।
कहाँ टोक्यो के नीचे बसा वो एयरक्राफ्ट इंजनों वाला सिस्टम, और कहाँ हमारी सड़कों पर एक लंबे से बांस के डंडे से नाली का कचरा साफ़ करता हुआ वो बेचारा सफाई कर्मचारी! ये है हमारे सिस्टम की असली औकात।
आखिर क्या वजह है की हम चाँद और मंगल तक पहुँच गए, लेकिन ज़मीन पर अपनी ही सड़कों को गटर बनने से नहीं रोक पा रहे?
इसका सबसे बड़ा कारण है हमारे अर्बन प्लानिंग (Urban Planning) का वो लालफीताशाही वाला सिस्टम, जिसकी आँखों पर सिर्फ और सिर्फ ‘प्रॉफिट’ और ‘कमीशन’ की पट्टी बंधी है।
और फिर अगर इस प्रशाशन से सवाल करो तो इनका यही जवाब आता है की “अरे भाई, जापान तो बहुत अमीर देश है।
वहां 2 बिलियन डॉलर का प्रोजेक्ट बन सकता है, भारत जैसे विकासशील देश में एक शहर को बाढ़ से बचाने के लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा?”
अगर आपको भी ये तर्क सही लगता है, तो ज़रा रुकिए! आज हम इन बाबुओं के इस ‘पैसों के गणित’ का पूरा पोस्टमार्टम कर देते हैं।
ज़रा ईमानदारी से सोचिए, क्या हमारे पास सच में पैसों की कमी है या फिर ये सिर्फ ‘नीयत’ का टोटा है?
आप 16-17 हज़ार करोड़ रुपये सुनकर घबरा रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी हिसाब लगाया है की हर साल मानसून में हमारा देश बाढ़ की तबाही में कितने लाख करोड़ रुपये पानी में बहा देता है? चलिए, ज़रा इसी साल (2026) का ही हिसाब जोड़ लेते हैं।
असम में हर साल बाढ़ आती है। वहाँ टूटे हुए पुल, बहे हुए घर, बर्बाद हुई लाखों हेक्टेयर फसलें और सरकार की तरफ से बांटे जाने वाले ‘रिलीफ फंड’ (SDRF/NDRF) को जोड़ लें, तो हर साल का नुकसान ही हज़ारों करोड़ के पार चला जाता है।
मुंबई में जब बारिश के कारण लोकल ट्रेनें एक दिन के लिए भी रुकती हैं, तो देश की इस आर्थिक राजधानी को एक दिन में कई सौ करोड़ का फटका लगता है।
और उन सड़कों का क्या, जिन्हें हर साल मानसून के बाद पैच-वर्क करके दोबारा बनाया जाता है? देश भर के नगर निगम हर साल बारिश में बह चुकी सड़कों की मरम्मत और ‘गड्ढा-मुक्ति’ अभियानों के नाम पर हज़ारों-लाखों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाते हैं।
अगर आप पूरे हिंदुस्तान का 5 साल का बाढ़ का नुकसान जोड़ लें, तो वो इतना बैठेगा की उसमें जापान के जी-कैन्स (G-Cans) जैसे एक-दो नहीं, बल्कि 10 अंडरग्राउंड सिस्टम खड़े किए जा सकते हैं!
मतलब गणित बिल्कुल साफ़ है! जापान का सिस्टम महंगा नहीं है, बल्कि हमारा ये ‘जुगाड़ू’ सिस्टम बहुत महंगा पड़ रहा है।
अगर सरकार एक बार हिम्मत दिखाकर, 20-25 हज़ार करोड़ रुपये खर्च करके दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे किसी भी बड़े शहर के नीचे ये जापानी अंडरग्राउंड सुरंगें और 14 हज़ार हॉर्सपावर वाले पंप लगा दे, तो आने वाले 100 साल के लिए बाढ़ का किस्सा ही ख़त्म!
ना सड़कें टूटेंगी, ना गाड़ियां डूबेंगी और ना ही हर साल रिलीफ फंड बांटना पड़ेगा।
लेकिन अफ़सोस, सिस्टम में बैठे उस ‘टेंडर माफिया’ को ये परमानेंट इलाज कभी रास नहीं आएगा।
सोचो, अगर एक बार परमानेंट सिस्टम बन गया, तो हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर जो करोड़ों के टेंडर पास होते हैं, वो कैसे होंगे?
हर साल जो सड़कें टूटती हैं और नए सिरे से डामर बिछाने का ठेका मिलता है, वो कैसे मिलेगा?
जब तक नेताओं, बाबुओं और ठेकेदारों का ये नापाक सिंडिकेट अपनी जेबें गरम करता रहेगा, तब तक जनता यूं ही गटर के पानी में गोते खाने को मजबूर रहेगी।
