सेना को रोका, शेख अब्दुल्ला को कश्मीर सौंपा, नेहरू की हिन्दुओं के खिलाफ उस गद्दारी का नंगा सच जिसने कश्मीरी पंडितों को शांतिदूतों के हाथों कटने को लावारिस छोड़ा

सेना को रोका, शेख अब्दुल्ला को कश्मीर सौंपा, नेहरू की हिन्दुओं के खिलाफ उस गद्दारी का नंगा सच जिसने कश्मीरी पंडितों को शांतिदूतों के हाथों कटने को लावारिस छोड़ा

अगर आप सोचते हैं की कश्मीरी पंडितों का ये नरसंहार सिर्फ 1990 में शुरू हुआ था, तो आप दुनिया के सबसे बड़े धोखे में जी रहे हैं।

1990 में तो इन जिहादियों के हाथों में सिर्फ हथियार आए थे, असल में कश्मीरी हिंदुओं की छाती में सबसे पहला और सबसे ज़हरीला खंजर तो 1947 में ही घोंप दिया गया था।

और वो खंजर किसी पाकिस्तानी ने नहीं, बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने घोंपा था! जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना।

कश्मीर आज जो दशकों तक खून के आंसू रोया है, वो सिर्फ और सिर्फ नेहरू की उस ऐतिहासिक गद्दारी और अंधे मुस्लिम प्रेम का नतीजा था, जिसने एक पूरे के पूरे हिंदू राज्य को जानबूझकर जिहादियों का कसाईखाना बनने के लिए लावारिस छोड़ दिया। आज हम उसी कांग्रेसी गद्दारी का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलेंगे।

जब हमारी सेना को नेहरू ने ज़ंजीरों में बांधा और आधा कश्मीर जिहादियों को सौंपकर की हिन्दुओं से सबसे बड़ी गद्दारी

बात अक्टूबर 1947 की है। अंग्रेज़ देश छोड़कर जा चुके थे, और पाकिस्तान अपनी जिहादी फितरत दिखाते हुए कश्मीर को निगलने के लिए तड़प रहा था।

जब जिन्ना को लगा की वो सीधी तरह से कश्मीर नहीं ले सकता, तो उसने पाकिस्तानी सेना और खूंखार कबाइलियों की एक बड़ी जिहादी फौज कश्मीर में घुसा दी।

इन दरिंदों ने मुजफ्फराबाद और बारामूला में घुसते ही हिंदुओं और सिखों का वो कत्लेआम शुरू किया की नदियां खून से लाल हो गईं। हिन्दू औरतों का सरेआम बलात्कार किया जा रहा था और छोटे-छोटे बच्चों को भाले की नोक पर उछाला जा रहा था।

उस वक्त कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने बिना किसी देरी के भारत के साथ ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (पूर्ण विलय पत्र) पर साइन कर दिए। यानी कश्मीर कानूनी और संवैधानिक तौर पर पूरी तरह से भारत का एक अटूट हिस्सा बन गया।

इसके बाद जो हुआ, वो हमारे भारतीय सैनिकों का वो खूंखार शौर्य था जिसे सुनकर आज भी सीना चौड़ा हो जाता है। हमारी सिख रेजिमेंट और डोगरा वीरों ने श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते ही उन जिहादी सुअरों को काटना शुरू कर दिया।

हमारे वीर सैनिक उन जिहादियों को कुत्तों की तरह खदेड़ रहे थे। भारतीय सेना पूरे जोश में थी और वो मुजफ्फराबाद को पार करके पूरे के पूरे कश्मीर (जो आज का PoK है) को आज़ाद कराने ही वाली थी। मुश्किल से 3 या 4 दिन का वक्त और लगता, और पाकिस्तान का कश्मीर से हमेशा के लिए नामोनिशान मिट जाता।

लेकिन ठीक उसी वक्त, दिल्ली में बैठे जवाहरलाल नेहरू ने वो काम किया जिसे कोई गद्दार ही कर सकता है! जब हमारी सेना जीत के मुहाने पर खड़ी थी, जब हमारे जवानों के खून में उबाल था, तब नेहरू ने अचानक से ‘सीज़फायर’ (Ceasefire) यानी युद्धविराम का ऐलान कर दिया! अरे भाई, ये कौन सी समझदारी थी?

जब तुम जीत रहे हो, दुश्मन दुम दबाकर भाग रहा है, तो तुमने अपनी ही सेना के पैरों में ज़ंजीरें क्यों डाल दीं?

और बात सिर्फ सीज़फायर तक नहीं रुकी। नेहरू ने अपने अंग्रेज़ आका लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर इस पूरे घरेलू मुद्दे को उठाकर ‘संयुक्त राष्ट्र’ (UN) के दरबार में डाल दिया! मतलब, हमारा घर, हमारी ज़मीन, हमारे लोग, और फैसला वो गोरे अंग्रेज़ करेंगे?

नेहरू की इस एक बेवकूफी और गद्दारी ने जीती हुई बाज़ी को उलझा कर रख दिया और कश्मीर का वो एक बड़ा हिस्सा (PoK – Pakistan Occupied Kashmir) सीधे-सीधे जिहादियों की थाली में सजाकर परोस दिया गया।

आज जो हमारे जवान बॉर्डर पर शहीद हो रहे हैं, वो सिर्फ और सिर्फ नेहरू के उस एक गद्दार फैसले की कीमत चुका रहे हैं।

हिन्दू राजा का अपमान और जिहादी शेख अब्दुल्ला से याराना, नेहरू के खौफनाक मुस्लिम प्रेम ने कश्मीर को बना दिया नरक

अब ज़रा नेहरू की इस गद्दारी के पीछे की उस घटिया राजनीति और व्यक्तिगत नफरत को समझिए जिसने कश्मीरी हिंदुओं की कब्र खोदी थी। नेहरू को दरअसल एक देशभक्त हिंदू डोगरा राजा (महाराजा हरि सिंह) से बेतहाशा नफरत थी।

महाराजा हरि सिंह वही हिंदू शेर थे जिन्होंने कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए अपनी गद्दी तक दांव पर लगा दी थी। अगर हरि सिंह ना होते, तो कश्मीर कबका पाकिस्तान बन चुका होता।

लेकिन नेहरू को हरि सिंह नहीं पसंद थे, उन्हें पसंद था अपना ‘जिगरी यार’- शेख अब्दुल्ला! ये शेख अब्दुल्ला कौन था? ये वो कट्टरपंथी मुसलमान था जिसने कश्मीर में ‘मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ (जो बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस बनी) खड़ी की थी और जो कश्मीर में एक इस्लामिक राज का सपना देखता था। शेख अब्दुल्ला वो सांप था जो मीठी-मीठी बातें करके नेहरू के दिमाग में ज़हर घोल रहा था।

नेहरू ने अपने अंधे ‘शेख प्रेम’ में आकर महाराजा हरि सिंह का वो अपमान किया जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। जिस राजा ने कश्मीर को भारत को सौंपा, नेहरू ने उसी महाराजा हरि सिंह को ज़बरदस्ती कश्मीर से बाहर निकाल फेंका और उन्हें निर्वासित (Exile) कर दिया। और पूरे कश्मीर की सत्ता एक थाली में सजाकर अपने उसी जिगरी यार शेख अब्दुल्ला के हाथों में सौंप दी।

शेख अब्दुल्ला ने सत्ता में आते ही प्रशासन, पुलिस और ज़मीनों पर इस्लामी कब्ज़ा शुरू कर दिया। उसने कश्मीरी पंडितों को चुन-चुन कर नौकरियों से निकाला और ‘लैंड रिफॉर्म्स’ के नाम पर हिंदुओं की पुश्तैनी ज़मीनें छीनकर मुसलमानों में बांट दीं।

नेहरू की बोई जिहादी फसल का खौफनाक नतीजा, मस्जिदों से गूंजती मौत की धमकियां और कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम

नेहरू ने जो ज़हरीला बीज कश्मीर की ज़मीन में बोया था, वो 1980 के दशक के आखिर तक आते-आते एक खौफनाक जिहादी पेड़ बन चुका था। कश्मीर घाटी के अंदर पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले हुए आतंकियों और कश्मीरी अलगाववादियों का कब्ज़ा हो गया।

पुलिस उनकी, प्रशासन उनका और सड़कें उनकी। और इस पूरे खौफनाक मंज़र में सबसे आसान शिकार कौन था? वो निहत्था और शांतिप्रिय कश्मीरी हिंदू, जो अपने ही देश में एक लावारिस कीड़े की तरह छोड़ दिया गया था।

1989 के आते-आते इन जिहादियों ने अपने खूनी खेल का नंगा नाच शुरू कर दिया। सबसे पहले इन्होंने हमारे उन नेताओं और बड़े लोगों को निशाना बनाया जो समाज की आवाज़ थे।

सरेआम दिनदहाड़े बीजेपी के बड़े नेता पंडित टीका लाल टपलू को श्रीनगर की सड़कों पर गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद जिहादियों ने कश्मीर के उस जज, जस्टिस नीलकंठ गंजू को सरेआम बाज़ार में मार डाला, जिन्होंने खूंखार आतंकी मकबूल भट को फांसी की सज़ा सुनाई थी। दूरदर्शन के डायरेक्टर लस्सा कौल को भी मौत के घाट उतार दिया गया।

इन हत्याओं का सीधा सा मकसद था कश्मीरी पंडितों के दिलों में खौफ पैदा करना। इसके बाद जो हुआ, उसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है और इंसानियत खून के आंसू रोती है।

ज़रा हमारी उस मासूम बहन गिरिजा टिक्कू के बारे में सोचिए। वो एक स्कूल में काम करती थी। जिहादियों ने उसे अगवा किया, कई दिनों तक उस बेचारी हिंदू बेटी का बलात्कार किया गया, और फिर जब उनका दरिंदगी से मन नहीं भरा, तो ज़िंदा गिरिजा टिक्कू को लकड़ी काटने वाले आरे से बीच में से चीर डाला!

और बीके गंजू का वो खौफनाक वाकया! जब जिहादी आतंकवादी बीके गंजू को मारने उनके घर घुसे, तो वो अपनी जान बचाने के लिए चावल के ड्रम (कंटेनर) में छुप गए थे।

लेकिन उसी के एक मुस्लिम पड़ोसी ने गद्दारी करते हुए जिहादियों को बता दिया की गंजू ड्रम में छुपा है। उन दरिंदों ने उस चावल के ड्रम को गोलियों से छलनी कर दिया। और हद तो तब हो गई जब उन जिहादी कुत्तों ने बीके गंजू की पत्नी को उसी खून से सने हुए चावलों को खाने के लिए मजबूर किया!

जब कश्मीरी पंडितों की बहन-बेटियों का सरेआम बलात्कार हो रहा था, जब सड़कों पर हिन्दुओं की लाशें बिछ रही थीं, तब दिल्ली में बैठी वो कांग्रेसी जमात और सेक्युलर इकोसिस्टम क्या कर रहा था? वो मूकदर्शक बनकर बैठे थे।

दशकों तक कश्मीर में राज करने वाली कांग्रेस ने अपने मुस्लिम वोटबैंक के लालच में इन जिहादियों को इतनी खुली छूट दे रखी थी की कश्मीर का हिंदू अपनी ही ज़मीन पर कटने के लिए मजबूर हो गया।

अब PoK वापस लेकर नेहरू के गद्दार इतिहास को हमेशा के लिए मिटाने का वक्त

हमारे 1990 के जो कश्मीरी हिन्दू भाई-बहन अपनी जान गंवा चुके हैं, उनका श्राप हमें तब तक चैन से नहीं बैठने देगा जब तक हम उनके घरों को वापस नहीं ले लेते।

और सबसे बड़ी बात! नेहरू ने अपनी उस ऐतिहासिक गद्दारी के चलते जो आधा कश्मीर (PoK – Pakistan Occupied Kashmir) उन पाकिस्तानियों और जिहादियों की थाली में परोस दिया था, अब उसे वापस छीनने का वक्त आ गया है।

जब तक हमारी सेना एलओसी (LoC) पार करके मुजफ्फराबाद और गिलगित-बाल्टिस्तान में तिरंगा नहीं गाड़ देती, जब तक हम पाकिस्तान नाम के इस जिहादी नासूर को हमेशा-हमेशा के लिए नक्शे से मिटा नहीं देते, तब तक ये सनातन का धर्मयुद्ध रुकने वाला नहीं है।

नेहरू की वो भूल अब ब्याज समेत सुधारी जाएगी। कश्मीरी पंडितों का वो खून आज भी हमसे इंसाफ मांग रहा है, और वो इंसाफ सिर्फ बयानों से नहीं, बल्कि जिहादियों की कब्र खोदकर ही पूरा होगा!

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