कभी-कभी अकेले बैठकर सोचता हूँ तो जेहन में एक अजीब सा सवाल कौंधता है। सवाल ये की अगर आज़ादी के बाद देश की सत्ता इस ‘कांग्रेस’ नाम की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के हाथों में ना गई होती, तो आज हमारा हिंदुस्तान कैसा होता?
आज जो लोग बार-बार कहते हैं की “हमने देश बनाया है”, अगर उन्होंने सच में देश बनाया होता, तो आज हमें कदम-कदम पर 70 सालों के वो गहरे जख्म क्यों भरने पड़ रहे हैं जो इन्होंने खोदे थे?
सत्ता के बिना आज ये लोग पानी से निकाली गई मछली की तरह छटपटा रहे हैं। प्रधानमंत्री को गालियां दे रहे हैं, सड़कों पर तमाशा कर रहे हैं और खुद का वजूद तलाश रहे हैं।
लेकिन आज वक़्त आ गया है की इस छटपटाहट के पीछे के असली इतिहास का पर्दाफाश किया जाए। आइए ज़रा उस शीशे से धूल हटाते हैं और देखते हैं की अगर कांग्रेस ना होती तो हमारा देश कैसा होता।
ना देश का वो खूनी बंटवारा होता और ना कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास जाता
बात अगर 1947 से ही शुरू करें तो तस्वीर एकदम साफ हो जाती है। आज़ादी का जश्न था, लेकिन उस जश्न के पीछे जो खून की नदियां बह रही थीं, उसका ज़िम्मेदार कौन था?
सिर्फ दिल्ली की गद्दी पर बैठने की वो भयंकर जल्दी, वो कुर्सी की लालसा, जिसने रातों-रात भारत पर बंटवारे की वो खूनी लकीर खींच दी।
लाखों बेगुनाह लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, घर जल गए, बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूट ली गई, और ये लोग सत्ता के गलियारों में गुलाब का फूल लगाकर शांति का संदेश बांट रहे थे।
और कश्मीर का वो नासूर? जब हमारी हिंदुस्तानी फौज 1947-48 में पाकिस्तानी जिहादियों को जहन्नुम भेजते हुए खदेड़ रही थी, पूरा कश्मीर हमारे कब्ज़े में आने ही वाला था..
तब अचानक दिल्ली से फरमान जाता है की सीज़फायर कर दो! मामला संयुक्त राष्ट्र (UN) की चौखट पर ले जाकर रख दिया गया।
मतलब अपनी ज़मीन, अपनी लड़ाई, और फैसला करेंगे विदेशी? इसी एक ऐतिहासिक ब्लंडर का नतीजा है की आज हमारे ही कश्मीर का एक बहुत बड़ा हिस्सा ‘पीओके’ (POK – Pakistan Occupied Kashmir) बनकर रह गया।
पीढ़ियां गुज़र गईं, लेकिन नेहरू जी की उस एक सनक की कीमत आज तक हमारे फौजी बॉर्डर पर अपनी शहादत देकर चुका रहे हैं।
रातों-रात लोकतंत्र की हत्या ना होती और 1975 में वो मनहूस इमरजेंसी ना लगती जिसने पूरे देश को जेलखाना बना दिया
आजकल हर दूसरे दिन कांग्रेस के नेता हाथ में संविधान की लाल किताब लहराते हुए दिख जाते हैं। ये लोग चिल्लाते हैं की “देश में लोकतंत्र खतरे में है!
ये लोग शीशा देखना भूल गए हैं क्या? जिस लोकतंत्र की दुहाई आज ये दे रहे हैं, उस लोकतंत्र का गला तो इन्होने खुद अपने हाथों से घोंटा था।
25 जून 1975 की वो मनहूस आधी रात कोई कैसे भूल सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया, तो कुर्सी खिसकती देख पूरे देश को ही जेलखाना बना दिया गया।
रातों-रात इमरजेंसी लगा दी गयी और मीडिया की आज़ादी को जूतों तले कुचल दिया गया, अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि अगली सुबह कोई सच ना छाप सके।
ये वही लोग हैं जिन्हें आज ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का भयंकर बुखार चढ़ा हुआ है!
जयप्रकाश नारायण (JP) जैसे वयोवृद्ध नेता, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर सड़कों पर आवाज़ उठाने वाले लाखों युवा छात्रों को मीसा (MISA) नाम के काले कानून के तहत रातों-रात काल कोठरियों में ठूंस दिया गया।
पुलिस को खुली छूट दे दी गई थी की जो भी सरकार के खिलाफ मुँह खोले, उसे सीधे अंदर डाल दो। और वो जबरन नसबंदी का खौफनाक दौर?
गांव-गांव से आम आदमियों को जानवरों की तरह ट्रकों में भरकर ले जाया गया। लोगों में ऐसा खौफ बैठ गया था की सरकारी जीप देखते ही लोग जंगलों में भाग जाया करते थे।
ज़रा सोचिए, महज़ एक परिवार की सत्ता बचाने के लिए पूरे हिंदुस्तान की आज़ादी को बंधक बना लिया गया था। और आज यही कांग्रेस हमें और आपको लोकतंत्र और संविधान बचाने का पाठ पढ़ा रही है?
ये तो वही बात हो गई की कोई 100 चूहे खाकर बिल्ली हज को निकल पड़ी हो। इनके मुंह से लोकतंत्र शब्द बिल्कुल वैसा ही लगता है जैसे किसी डकैत के मुंह से कानून का प्रवचन।
स्विस बैंकों में देश का खजाना ना दफन होता और चारा घोटाले से लेकर 2G तक जनता की गाढ़ी कमाई ना लुटती
अब ज़रा बात कर लेते हैं उस ‘स्वर्ण युग’ की, जिसे कांग्रेस के नेता आज तक अपने भाषणों में भुनाते हैं। सच कहूं तो वो विकास का नहीं, बल्कि ‘घोटालों का स्वर्ण युग’ था।
आज़ादी के तुरंत बाद जीप घोटाले से जो लूट का सिलसिला शुरू हुआ, वो 80 के दशक में बोफोर्स की तोपों तक पहुँचा और फिर यूपीए (UPA) सरकार के उन 10 सालों (2004-2014) में तो लूट का ऐसा नंगा नाच हुआ जिसने पूरी दुनिया में हिंदुस्तान को शर्मसार कर दिया।
ज़रा याद कीजिए वो दिन, जब हर सुबह अख़बार खोलते ही एक नए घोटाले की खबर आंखों के सामने होती थी। 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, जिसमें हवा की तरंगें तक बेच खाई गईं।
कोयला घोटाला (Coal Scam), जहां खदानों की बंदरबांट ऐसे हुई जैसे किसी के पिताजी की जागीर बंट रही हो। कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) में तो इन्होंने देश की इज़्ज़त को ही दांव पर लगा दिया।
टिश्यू पेपर से लेकर स्टेडियम के सामान तक में करोड़ों डकार गए। और तो और, करगिल के शहीदों की विधवाओं के लिए बनी ‘आदर्श सोसाइटी’ के फ्लैट्स तक इन नेताओं और अफसरों ने अपने रिश्तेदारों के नाम कर लिए। क्या यही था इनका देश प्रेम?
यही वो दौर था जब जनता खून-पसीना एक करके टैक्स भर रही थी और ये नेता उस पैसे को लूट-लूट कर स्विस बैंकों की तिजोरियों में भर रहे थे।
विदेशी बैंकों में भारत की गाढ़ी कमाई दफन होती रही और यहाँ देश का गरीब एक-एक निवाले को मोहताज था।
और जब कोई इस लूट के खिलाफ आवाज़ उठाता, तो जांच एजेंसियों का क्या हाल किया जाता था? भूल गए क्या सुप्रीम कोर्ट की वो ऐतिहासिक टिप्पणी?
देश की सबसे बड़ी अदालत ने सरेआम सीबीआई (CBI) को ‘पिंजरे का तोता’ (Caged Parrot) कह दिया था। जो सीबीआई आज इन्हें ‘तानाशाही’ लगती है, उसे इन्होने अपनी जेब का रुमाल बना रखा था, जो सिर्फ आकाओं के इशारे पर बोलता था।
सत्ता की लालसा इतनी भयंकर थी की कुर्सी बचाने के लिए किसी भी घोटालेबाज़ को गले लगाने से इन्हें कोई परहेज़ नहीं था।
बिहार का वो मशहूर ‘चारा घोटाला’ तो याद ही होगा? लालू यादव ने जानवरों का चारा तक नहीं छोड़ा, करोड़ों डकार गए, लेकिन कांग्रेस ने उसी भ्रष्ट सिस्टम को अपनी आंखों का तारा बनाए रखा। क्यों? क्योंकि बस दिल्ली की सत्ता हाथ से नहीं जानी चाहिए।
वोट बैंक के लिए घुसपैठियों का भंडारा ना लगता और देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ ना होता
अब आते हैं उस पाप पर, जिसकी सज़ा आज पूरा देश भुगत रहा है- तुष्टिकरण की वो नीच राजनीति जिसने हमारी डेमोग्राफी को ही बदलकर रख दिया।
सिर्फ अपना एक फिक्स मुस्लिम वोट बैंक तैयार करने के लिए इन्होंने देश की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया। असम से लेकर पश्चिम बंगाल और देश के कोने-कोने में बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं के लिए रेड कार्पेट बिछाए गए।
अरे भाई, जो लोग इस देश के नागरिक ही नहीं हैं, जो अवैध तरीके से तार काटकर सीमा पार से घुसे, रातों-रात उनके फर्जी राशन कार्ड, वोटर आईडी और आधार कार्ड कैसे बन गए?
सिस्टम में बैठे इनके दलालों ने घुसपैठियों को देश का ‘दामाद’ बनाकर बसाया। क्यों? ताकि चुनाव के दिन ये मुश्त होकर पंजे वाले बटन पर मोहर लगा सकें।
आज जब कोई राष्ट्रवादी सरकार इन घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात करती है, NRC की बात करती है, तो इन्ही कांग्रेसियों के पेट में सबसे तेज़ मरोड़ उठता है। ‘मानवाधिकार’ का रोना शुरू हो जाता है।
क्या आपको पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का वो कुख्यात बयान याद है? भरी सभा में उन्होंने कह दिया था की “देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है।”
मतलब बहुसंख्यक हिंदू समाज जो दिन-रात पसीना बहाकर टैक्स दे रहा है, वो क्या बेवकूफ है? एक आम हिंदुस्तानी के हक़ का पैसा सिर्फ और सिर्फ एक खास वर्ग को खुश करने के लिए लुटा दिया गया।
और इस तुष्टिकरण की सबसे खौफनाक मिसाल है ‘वक्फ बोर्ड’ को दिए गए असीमित अधिकार। 1995 का वो वक्फ कानून (Draconian Waqf Act) और फिर यूपीए सरकार में किए गए बदलाव…
इन्होने वक्फ बोर्ड को एक ऐसा भस्मासुर बना दिया जो देश की किसी भी ज़मीन, किसी भी मंदिर, किसी भी किसान के खेत पर उंगली रखकर कह दे की ये वक्फ की संपत्ति है, तो बेचारा असली मालिक कोर्ट के चक्कर काट-काटकर मर जाए।
ना कोई सबूत, ना कोई कागज़, बस बोर्ड ने कह दिया तो ज़मीन उनकी। ये जो पूरा का पूरा इकोसिस्टम खड़ा किया गया ना, ये अनजाने में नहीं हुआ था।
ये बहुत सोची-समझी साज़िश थी ताकि सत्ता हमेशा मुट्ठी में रहे, चाहे उसके लिए देश को खोखला ही क्यों ना करना पड़े।
लीटर में आटा नापने वाला कोई नेता ना होता और पूरे देश के सामने ये सियासी कॉमेडी ना होती
जो पार्टी कभी पूरे देश की राजनीति का केंद्र हुआ करती थी, वो आज एक ऐसी सियासी कॉमेडी में तब्दील हो चुकी है जिसका स्क्रिप्ट राइटर खुद कनफ्यूज़ है।
आज इनके शीर्ष नेतृत्व का ज्ञान और ज़मीनी हकीकत से उनका कटाव देखकर जनता सिर्फ अपना माथा ही पीट सकती है।
ज़रा सोचिए, जिस पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा, जो खुद को देश का अगला प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करता हो, उसे ये तक ना पता हो की ‘आटा’ किलो में बिकता है या लीटर में!
भरी जनसभा में जब नेता जी ‘लीटर में आटा’ नापते हैं, तो ये सिर्फ कोई जुबान फिसलना (Slip of tongue) नहीं है।
ये दिखाता है की आप ज़मीन से, गांव से, किसानी से और आम आदमी की बुनियादी ज़िंदगी से कितना कटे हुए हैं। जिन्हें हिंदुस्तान की मिट्टी का ही नहीं पता, वो दिल्ली के AC कमरों में बैठकर देश चलाने का ख्वाब देख रहे हैं!
और उस ख्वाब को पूरा करने के लिए क्या-क्या ढोंग नहीं रचे जा रहे? जनता को लुभाने के लिए बड़ी-बड़ी ‘यात्राएं’ निकाली जाती हैं।
भाड़े की भीड़ जुटाई जाती है, ताकि नेता जी की छवि चमकाई जा सके। लेकिन हकीकत क्या है? हकीकत ये है की कांग्रेस का असली ज़मीनी कार्यकर्ता आज हताश होकर घर बैठा है।
वो देख रहा है की ये कोई जनांदोलन नहीं, बल्कि सिर्फ एक फ्लॉप होती हुई फिल्म का री-लॉन्च है। आप जनता को एक बार बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन बार-बार नहीं।
आज का वोटर लीटर वाले आटे की क्लिप देखकर हंसता तो बहुत है, लेकिन वोट देने के टाइम वो EVM पर किसी समझदार को ही चुनता है।
ना बैसाखियों के सहारे ठगबंधन की नौटंकी होती और ना सत्ता की तड़प में प्रधानमंत्री को गालियां दी जाती
जब इंसान अपनी नाकामी बर्दाश्त नहीं कर पाता, तो वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। कांग्रेस और उसके इंडी (I.N.D.I.A) गठबंधन के साथ बिल्कुल यही हुआ है। आज कांग्रेस की हालत क्या हो गयी है?
आज ये क्षेत्रीय दलों की चौखट पर जाकर सीटों के लिए मिन्नतें करने पर मजबूर हैं। यूपी में समाजवादी पार्टी, बंगाल में टीएमसी (TMC), दिल्ली-पंजाब में आम आदमी पार्टी… इन सबके सामने कांग्रेस आज गिड़गिड़ाती नज़र आती है।
सच कहूं तो ये कोई गठबंधन नहीं है, ये बैसाखियों के सहारे चल रहे ‘ठगबंधन’ की घुड़साल है। सब के सब भ्रष्टाचार के एक ही मटमैले दलदल में धंसे हुए हैं और सिर्फ मोदी नाम के खौफ ने इन सबको एक मंच पर ला खड़ा किया है।
कांग्रेस की हालत तो आज ‘अंधों में काने राजा’ वाली हो गई है, जिसका अपना खुद का वजूद मिटने की कगार पर है, लेकिन गुरूर आज भी सातवें आसमान पर है।
और जब इन बैसाखियों के बाद भी जनता इन्हें लगातार सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाती है, तो हार की इसी छटपटाहट में इनके मुंह से जो ज़हर निकलता है, वो पूरी सियासत को गंदा कर देता है।
आपके पास जनता को देने के लिए कोई विज़न नहीं है, कोई नीति नहीं है, तो आप क्या करते हैं? आप देश के चुने हुए प्रधानमंत्री को सरेआम भद्दी गालियां देना शुरू कर देते हैं।
याद कीजिए, शुरुआत मणिशंकर अय्यर के उस ‘नीच इंसान’ वाले बयान से हुई थी। फिर ‘मौत का सौदागर’, ‘चौकीदार चोर है’, ‘कब्र खुदेगी’ से लेकर पता नहीं क्या-क्या!
राजनीति में आलोचना होती है, नीतियों का विरोध होता है, लेकिन जब आप देश के प्रधानमंत्री को ऐसी ओछी गालियां देते हैं, तो आप मोदी का नहीं, बल्कि उन करोड़ों हिंदुस्तानियों का अपमान करते हैं जिन्होंने उन्हें वोट देकर कुर्सी पर बैठाया है।
आज का वोटर बहुत स्मार्ट है। वो जानता है की किसने देश की सुरक्षा को मज़बूत किया और किसने घुसपैठियों का भंडारा लगाकर डेमोग्राफी बर्बाद की।
वो जानता है की किसने राम मंदिर बनवाकर सनातन का गौरव लौटाया और किसने वक्फ बोर्ड को असीमित ताक़त देकर ज़मीनों पर कब्ज़े करवाए।
अब ये चाहे जितने गठबंधन बना लें, जितनी मर्जी जनयात्राएं कर लें, या हताशा में आकर जितनी मर्जी गालियां बक लें, भारत का पहिया अब बहुत आगे निकल चुका है।
परिवारवाद, तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार वाली ये राजनीति अब देश पर दोबारा कभी हावी नहीं हो पाएगी।
