जब भी हमारे देश में विज्ञान और आविष्कारों की बात होती है, तो एक नाम ऐसा है जिसके बिना भारत का इतिहास एकदम अधूरा है।
आज 7 नवंबर का है। आज ही के दिन 1888 में तमिलनाडु की धरती पर उस बच्चे ने जन्म लिया था जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया को रोशनी का असली रंग दिखाया।
हम बात कर रहे हैं सर सी.वी. रमन की, आज उनकी जयंती है।
सिर पर साफ़ा (पगड़ी), गले में बंद कोट और चेहरे पर वो गज़ब की चमक… सी.वी. रमन की यही सादगी उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

बचपन से ही दिखने लगी थी एक महान वैज्ञानिक की चमक और किताबों से उनका अनोखा इश्क
7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में पैदा हुए रमन साहब के घर में बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई का ज़बरदस्त माहौल था। उनके पिता खुद फिजिक्स और मैथ्स के लेक्चरर थे।
ऐसे में किताबों से उनका इश्क होना तो लाज़िमी था।
लेकिन उनकी प्रतिभा ऐसी थी जो किसी को भी हैरान कर दे। ज़रा सोचिए, मात्र 11 साल की उम्र में उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास कर ली थी।
और बात यहीं नहीं रुकी! सिर्फ 15 साल की उम्र में उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन (BA) पूरे कॉलेज में टॉप करके पास कर लिया।
साइंस और मैथ्स का जुनून उन पर इस कदर हावी था की 18 साल की उम्र में उन्होंने फिजिक्स में अपनी मास्टर डिग्री (MA) पूरी कर ली और यूनिवर्सिटी के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए गोल्ड मेडल अपने गले में सजा लिया।
वो सच में एक अद्भुत टैलेंट लेकर पैदा हुए थे।
विज्ञान के जुनून में ठुकरा दी मोटी पगार वाली सरकारी नौकरी और चुन लिया मुश्किल रास्ता
आजकल के युवाओं से पूछो तो हर कोई एक पक्की और मोटी पगार वाली सरकारी नौकरी के सपने देखता है। रमन साहब के ज़माने में भी साइंस में करियर बनाना कोई आसान काम नहीं था। मौके बहुत कम थे।
ऐसे में उन्होंने ‘इंडियन फाइनेंस डिपार्टमेंट’ का बड़ा ही मुश्किल एग्जाम दिया। और जैसा की उनका रिकॉर्ड था, उन्होंने इसे भी टॉप कर लिया! उन्हें कलकत्ता में ‘असिस्टेंट अकाउंटेंट जनरल’ की बेहद रुतबे और VIP पावर वाली सरकारी नौकरी मिल गई।
लेकिन जिसके रगों में विज्ञान बहता हो, वो इंसान फाइलों और हिसाब-किताब में कैसे बंध सकता है? नौकरी तो वो बहुत शानदार कर रहे थे, लेकिन उनका मन ऑफिस से ज़्यादा कलकत्ता की ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ (IACS) की एक छोटी सी लैब में लगता था।
ऑफिस की ड्यूटी खत्म होते ही वो सीधे लैब भागते और रात-रात भर अपने प्रयोग (Experiments) करते रहते।
फिर साल 1917 में उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में एक साधारण प्रोफेसर बनने के लिए अपनी उस आलीशान और मोटी पगार वाली सरकारी नौकरी को हँसते-हँसते ठोकर मार दी।
उनके लिए पद, रुतबा या पैसा कभी मायने नहीं रखता था। उन्हें तो बस अपनी आज़ादी चाहिए थी ताकि वो दिन-रात अपनी रिसर्च कर सकें। ये अपने आप में विज्ञान के प्रति किसी भी इंसान का सबसे बड़ा और सच्चा समर्पण था।

समंदर की लहरों ने जगाई वो चिंगारी जिसने दुनिया की विज्ञान की समझ को ही बदल डाला
अब आता है उनकी ज़िंदगी का वो टर्निंग पॉइंट, जिसने हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास रच दिया। बात 1921 की है। रमन साहब पहली बार पानी के जहाज़ से यूरोप के सफर पर जा रहे थे।
जब जहाज़ भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से गुज़र रहा था, तो समंदर के उस गहरे नीले पानी को देखकर उनके दिमाग में एक सवाल कौंध गया। समंदर का पानी आखिर इतना नीला क्यों है?
उस वक़्त दुनिया के सबसे बड़े और नामी वैज्ञानिक लॉर्ड रेले (Lord Rayleigh) का ये मानना था की समंदर का पानी नीला इसलिए दिखता है क्योंकि आसमान नीला है।
मतलब पानी पर आसमान का अक्स (Reflection) पड़ता है। पूरी दुनिया इसी बात को सच मानकर बैठी थी।
लेकिन रमन साहब का खोजी दिमाग इस थ्योरी को मानने को राज़ी नहीं था। उन्हें लगा की भई, इसमें कुछ तो अलग विज्ञान छिपा है।
उन्होंने जहाज़ पर ही अपनी जेब से एक छोटा सा प्रिज़्म (Prism) निकाला और समंदर के पानी के साथ अपने प्रयोग शुरू कर दिए।
सफर के दौरान ही उन्होंने ठान लिया था की वो इस नीलेपन का असली वैज्ञानिक कारण खोजकर पूरी दुनिया के सामने रखेंगे।
महज़ 200 रुपये के देसी जुगाड़ से कर दिया वो चमत्कार जिसे आज पूरी दुनिया ‘रमन इफेक्ट’ कहती है
जब रमन साहब यूरोप की उस यात्रा से भारत लौटे, तो उनके दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी- समंदर के पानी का रंग!
कलकत्ता की अपनी लैब में उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। उस वक़्त यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिक लाइट (प्रकाश) की थ्योरी पर रिसर्च करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की बड़ी-बड़ी लैबोरेट्री और महंगी मशीनों में सिर खपा रहे थे।
लेकिन हमारे रमन साहब के पास क्या था? महज़ 200 रुपये का देसी जुगाड़!
जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। 28 फरवरी 1928 का वो ऐतिहासिक दिन था, जब रमन साहब ने सिर्फ एक मरकरी लैंप (Mercury Lamp), एक पॉकेट स्पेक्ट्रोस्कोप और कुछ साधारण से लेंस के इस्तेमाल से दुनिया को वो दिखा दिया जो किसी ने सोचा भी नहीं था।
उन्होंने अपनी रिसर्च से पूरी दुनिया के सामने साबित कर दिया की जब रोशनी (Light) किसी पारदर्शी चीज़ या पानी से टकराकर गुज़रती है, तो वो बिखर जाती है (Scattering of light) और उसका रूप बदल जाता है।
इसी बिखराव की वजह से समंदर का पानी हमें नीला दिखाई देता है, ना की आसमान के अक्स की वजह से।
महज़ 200 रुपये के खर्चे में की गई इस महान खोज को साइंस की दुनिया ने ‘रमन इफेक्ट’ (Raman Effect) का नाम दिया।
ये खोज इतनी बड़ी और ज़बरदस्त थी की आज भी पूरी दुनिया की साइंस में इसका इस्तेमाल होता है। और हां, 28 फरवरी के उसी ऐतिहासिक दिन को हम और आप आज पूरे देश में ‘नेशनल साइंस डे’ (राष्ट्रीय विज्ञान दिवस) के रूप में बड़े ही गर्व से मनाते हैं।

जब नोबेल पुरस्कार लेते वक्त इस महान वैज्ञानिक की आंखों से छलक पड़े थे अपने देश के लिए आंसू
इस चमत्कारी खोज के बाद तो जैसे पूरी दुनिया में रमन साहब का डंका बज गया। साल 1930 में जब फिजिक्स के नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) का ऐलान हुआ, तो उसमें विजेता के तौर पर सर सी.वी. रमन का नाम गूंज उठा।
ये कोई मामूली बात नहीं थी यार! ये पहली बार था जब साइंस के क्षेत्र में किसी एशियन (Asian) इंसान या किसी अश्वेत (Non-white) व्यक्ति को दुनिया का ये सबसे बड़ा सम्मान मिल रहा था।
उन्होंने पूरी दुनिया को बता दिया था की साइंस सिर्फ गोरे लोगों की बपौती नहीं है।
लेकिन नोबेल पुरस्कार समारोह का एक ऐसा भावुक किस्सा है, जो रमन साहब के अंदर के एक सच्चे देशभक्त को दिखाता है।
बात स्वीडन की है, जहां उन्हें ये सम्मान दिया जा रहा था। नियम के मुताबिक, वहां हर नोबेल विजेता के पीछे उसके देश का झंडा लगाया जाता था।
जब रमन साहब मंच पर गए और उन्होंने ऊपर देखा, तो वहां भारत का तिरंगा नहीं, बल्कि अंग्रेजों का ‘यूनियन जैक’ (Union Jack) लहरा रहा था, क्योंकि हमारा देश उस वक़्त गुलाम था।
उस ब्रिटिश झंडे को देखकर रमन साहब का दिल भर आया और वो उस भरे मंच पर फूट-फूटकर रो पड़े।
बाद में उन्होंने बताया था की नोबेल जीतने की खुशी से कहीं ज़्यादा बड़ा दुख उन्हें इस बात का था की वो अपने एक आज़ाद मुल्क के नागरिक के तौर पर ये सम्मान नहीं ले पा रहे हैं।
उनके वे आंसू साबित करते हैं की वो सिर्फ एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि अपनी मिट्टी से बेइंतहा प्यार करने वाले एक सच्चे हिंदुस्तानी थे।
भारतीय वाद्य यंत्रों में खोजा विज्ञान और भारत रत्न से सम्मानित होकर बने देश का असली गौरव
ये बात बहुत कम लोग जानते हैं की रमन साहब को साइंस के अलावा अगर किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा इश्क था, तो वो था हमारा भारतीय संगीत।
उन्होंने हमारे देसी वाद्य यंत्रों जैसे तबला और मृदंगम पर भी बहुत गहरी रिसर्च की थी। उस समय पश्चिमी दुनिया के लोग हमारे वाद्य यंत्रों को बहुत साधारण मानते थे।
लेकिन रमन साहब ने अपनी रिसर्च (Acoustics) से दुनिया को ये साबित कर दिया की हमारे तबले और मृदंगम से निकलने वाली ध्वनियां विदेशी ड्रम्स से कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक और सुरीली हैं।
वो अपनी भारतीय संस्कृति को हर मंच पर सबसे ऊपर रखते थे।
रिटायरमेंट के बाद भी साइंस से उनका नाता नहीं टूटा। 1948 में उन्होंने बेंगलुरु में खुद की कमाई से ‘रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (Raman Research Institute) की स्थापना की, ताकि आने वाली पीढ़ियों को रिसर्च के लिए भटकना ना पड़े।
आज़ाद भारत ने भी अपने इस लाडले सपूत को पूरा सम्मान दिया। साल 1954 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा गया।
1970 में अपनी आखिरी सांस तक वो बस इसी कोशिश में लगे रहे की भारत साइंस की दुनिया में सबसे आगे खड़ा रहे।
आज रमन साहब की ज़िंदगी हमारे देश के हर उस युवा के लिए एक जीती-जागती मिसाल है, जो ये सोचकर हार मान लेता है की उसके पास पैसे या संसाधन नहीं हैं।
रमन साहब ने बता दिया की अगर आपके अंदर लगन, सच्चा जुनून और कुछ कर गुज़रने की आग है, तो कोई भी कमी आपके सपनों को उड़ने से नहीं रोक सकती।
आज सी.वी. रमन जयंती के इस बेहद खास मौके पर पूरा देश इस महानायक को दिल से नमन करता है।
