श्री राम की 14 साल बाद अयोध्या में वापसी से लेकर समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी का आगमन और जैन गुरु महावीर का निर्वाण, सनातन का वो स्वर्णिम इतिहास जिसने एक ‘दीपावली’ में देखे 6 भव्य कीर्तिमान

दीपवाली के ये दिन.. बाज़ारों की ये रौनक.. और हर घर के दरवाज़े पर जलते हुए दीये… सच में, इस माहौल में एक अलग सा जादू है।

दुनिया में शायद ही कोई और ऐसा त्योहार हो जो एक साथ करोड़ों लोगों के दिलों में इतनी खुशी और उम्मीद भर देता हो।

बचपन से हम अपने घर पर सुनते आए हैं की इसी दिन हमारे राम जी 14 साल का वनवास काटकर घर लौटे थे। और यह सच भी है की भगवान राम का अयोध्या आगमन ही दीपावली का हृदय है, इसकी आत्मा है।

बिना राम के तो सनातन के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन हमारी सनातन संस्कृति इतनी असीम और विशाल है की इस एक पावन दिन ने हज़ारों सालों का स्वर्णिम इतिहास अपने भीतर समेटा हुआ है।

क्या आपको पता है की अलग-अलग युगों में, इसी दीपवाली के दिन ऐसे अद्भुत कीर्तिमान रचे गए, जिन्होंने दीपावली को सनातन का एक बेहद जरुरी अंग बना दिया?

भगवान राम की उस दिव्य रोशनी में नहाया हुआ यह दिन, माँ लक्ष्मी के पहली बार प्रकट होने से लेकर भगवान महावीर के ज्ञान तक का गवाह है।

चलिए आज इतिहास के पन्नों में थोड़ा पीछे चलते हैं और महसूस करते हैं उन 6 महा-पराक्रमों को, जो दीपावली के ही दिन देखने को मिले थे।

त्रेतायुग का सबसे बड़ा महापराक्रम जब रावण का वध करके अपने घर अयोध्या लौटे थे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम

वो रात कितनी खूबसूरत, कितनी भावुक रही होगी! 14 साल का वो कठोर वनवास, सीता माँ का हरण, वानर सेना के साथ मिलकर रामसेतु का निर्माण और फिर लंकापति रावण जैसे महा-ज्ञानी पर महा-अहंकारी असुर का वध।

इन सब महा-पराक्रमों को सिद्ध करने के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अपनी अर्धांगिनी माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या की ओर चले होंगे, तो सरयू किनारे क्या माहौल रहा होगा!

उधर नंदीग्राम में भाई भरत की बेकरारी सोचिए, जो 14 सालों से अपने भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे।

महर्षि वाल्मीकि की रामायण में बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है की राम जी के आने की खबर सुनते ही पूरी अयोध्या नगरी खुशी से झूम उठी थी। प्रजा ने अपने राजा के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उस कार्तिक अमावस्या की घोर काली रात को अयोध्यावासियों ने गाय के शुद्ध घी के करोड़ों दीयों से ऐसा रोशन किया की आसमान के तारे भी ज़मीन की उस भव्यता को देखकर शर्मा गए होंगे।

हर घर के बाहर दरवाज़े सजाए गए, रंगोलियां बनाई गईं, और जब आकाश मार्ग से पुष्पक विमान ने अयोध्या की धरती को छुआ, तो जो जयघोष गूंजा होगा, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

यह सिर्फ एक राजा की अपने घर वापसी नहीं थी भाई, यह तो उस ‘रामराज्य’ की स्थापना का पहला दिन था, जहाँ कोई गरीब नहीं था, कोई दुखी नहीं था, और जहाँ हर तरफ सिर्फ धर्म और न्याय का राज था।

दीपावली का असली और सबसे बड़ा आधार यही वो महा-पराक्रम है, जिसने हमें सदियों तक हर संकट में उम्मीद का दीया जलाना सिखाया।

समुद्र मंथन का वो अलौकिक पल जब साक्षात माँ लक्ष्मी प्रकट हुईं और धन धान्य से भर गया पूरा संसार

दीपावली की रात हम सब अपने घरों में माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की बहुत ही श्रद्धा से पूजा करते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है की माँ लक्ष्मी की पूजा इसी दिन सबसे खास क्यों होती है?

इसके पीछे सतयुग का एक ऐसा भव्य कीर्तिमान है जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में बहुत ही शानदार तरीके से किया गया है।

कथा है उस अलौकिक ‘समुद्र मंथन’ की। जब क्षीर सागर को मथने के लिए देवताओं और असुरों ने वासुकी नाग को रस्सी और मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया था। उस भयंकर मंथन से 14 अनमोल रत्न निकले थे।

सबसे पहले वो हलाहल विष निकला जिसे हमारे महादेव ने पीकर नीलकंठ का रूप धारण किया। और फिर, इसी पवित्र कार्तिक अमावस्या के दिन वो चमत्कार हुआ जिसका इंतज़ार पूरी सृष्टि कर रही थी।

क्षीर सागर की लहरों के बीच एक विशाल और खूबसूरत कमल के पुष्प पर विराजमान होकर साक्षात धन, ऐश्वर्य, वैभव और पवित्रता की देवी माँ लक्ष्मी प्रकट हुई थीं।

उनके आते ही दसों दिशाएं रोशन हो गईं। उन्होंने अपने हाथ में वरमाला ली और सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया।

इसलिए याद रखिए, दीपावली पर हम जब लक्ष्मी पूजन करते हैं, तो हम सिर्फ ‘कागज़ के नोटों’ या सोने-चांदी की पूजा नहीं करते।

हम उस ‘श्री’ का उत्सव मनाते हैं, उस वैभव को नमन करते हैं जो हमारे घर को शांति और बरकत से भर देता है।

इसी दिन माँ लक्ष्मी का धरती पर आगमन हुआ था, और इसीलिए हर सनातनी अपने घर को पूरी तरह साफ करके, उसे दीयों से सजाकर माँ लक्ष्मी से अपने घर में विराजमान होने की प्रार्थना करता है।

भगवान महावीर स्वामी का महानिर्वाण जिसने पावापुरी से लेकर पूरे विश्व में जलाई ज्ञान और अहिंसा की अमर ज्योति

हमारा सनातन धर्म एक बहुत विशाल वटवृक्ष है और जैन धर्म उसी की एक बेहद पवित्र, तपस्वी और गौरवशाली शाखा है।

दीपावली का दिन केवल युद्ध जीतने या घर लौटने का दिन नहीं है, बल्कि यह खुद पर, अपनी इंद्रियों पर विजय पाने का भी दुनिया का सबसे बड़ा दिन है।

इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो 527 ईसा पूर्व (BCE) के आसपास पहुंचेंगे। जगह थी आज के बिहार का बेहद पावन तीर्थस्थल- पावापुरी।

इसी कार्तिक अमावस्या की सुबह, जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर, भगवान महावीर ने अपने घोर तप, त्याग और ध्यान से वो अवस्था प्राप्त की जिसे ‘निर्वाण’ (मोक्ष) कहा जाता है।

उन्होंने अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह का वो ज्ञान दिया जिसने लाखों भटके हुए जीवों को सही रास्ता दिखाया।

जब शाम के वक्त उनके भौतिक शरीर का दीपक बुझ गया और उन्होंने महा-प्रयाण किया, तो वहां मौजूद हज़ारों लोगों और राजाओं के दिल में एक ही भाव था।

उन्होंने तय किया की महावीर स्वामी के शरीर का प्रकाश भले ही चला गया हो, लेकिन उनके ‘ज्ञान का प्रकाश’ इस दुनिया से कभी भी बुझने नहीं दिया जाएगा।

और बस, उसी ज्ञान की ज्योति को हमेशा ज़िंदा रखने के लिए पावापुरी से लेकर पूरे आर्यावर्त में उस रात अनगिनत दीये जलाए गए।

आज भी जैन समाज के लिए दीपावली का दिन भगवान महावीर की उसी ज्ञान रूपी रोशनी का सबसे बड़ा उत्सव है।

द्वापर युग में श्रीकृष्ण और माता सत्यभामा का वो शौर्य जिसने 16 हज़ार कन्याओं को दी खूंखार नरकासुर से आज़ादी

त्रेतायुग और सतयुग के बाद जब हम द्वापर युग के पन्ने पलटते हैं, तो वहाँ भी हमें दीपावली के इस पावन पर्व पर एक ऐसा शौर्य देखने को मिलता है, जो नारी के सम्मान और उसकी रक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक है।

कहानी है प्राग्ज्योतिषपुर (जिसे आज हम असम कहते हैं) के एक बेहद क्रूर और खूंखार असुर नरकासुर की। भाई, इस असुर ने तीनों लोकों में ऐसा भयंकर हाहाकार मचा रखा था की देवता भी कांपते थे।

इसके पापों का घड़ा तब भर गया जब इसने 16,100 मासूम राजकन्याओं को बंदी बनाकर अपने कारागार में डाल दिया। उन कन्याओं की चीख-पुकार जब द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण तक पहुंची, तो उन्होंने तय कर लिया की अब इस असुर का अंत निश्चित है।

लेकिन इस महा-विजय की सबसे खूबसूरत बात क्या थी पता है? श्रीकृष्ण अकेले युद्ध में नहीं गए। उनके साथ उनकी पत्नी माता सत्यभामा भी गईं, जो युद्ध के मैदान में साक्षात रणचंडी बन गई थीं।

दीपावली से ठीक एक दिन पहले, जिसे आज हम नरक चतुर्दशी या ‘छोटी दिवाली’ कहते हैं, श्रीकृष्ण और माता सत्यभामा ने मिलकर उस खूंखार असुर का वध कर दिया।

उन्होंने उन 16,100 कन्याओं को सम्मान सहित आज़ाद कराया और समाज में उन्हें उनका खोया हुआ रुतबा वापस दिलाया।

जब इस महा-विजय की खबर द्वारका और पूरे आर्यावर्त में पहुंची, तो अगले दिन (कार्तिक अमावस्या को) लोगों ने खुशी में झूम कर पूरे देश में अनगिनत दीये जलाए।

ये सनातन धर्म में नारी के सम्मान और उसकी आज़ादी की सबसे बड़ी विजय का उत्सव था।

तेरह वर्ष का कठोर वनवास काटकर हस्तिनापुर लौटे थे पांडव और न्याय की जीत पर प्रजा ने जलाए थे अनगिनत दीये

महाभारत का वो जुए (चौसर) वाला प्रसंग तो हम सबको याद है, जब कौरवों ने छल-कपट से पांडवों को हरा दिया था। उस हार की कीमत युधिष्ठिर और उनके भाइयों को 12 साल के कठोर वनवास और 1 साल के अज्ञातवास के रूप में चुकानी पड़ी।

ज़रा सोचिए उन 13 सालों के संघर्ष को! जो पांडव राजमहलों में पले-बढ़े थे, उन्हें जंगलों की खाक छाननी पड़ी, अपना भेष छिपना पड़ा और हर कदम पर मौत का सामना करना पड़ा।

लेकिन उन्होंने धर्म का रास्ता नहीं छोड़ा। उन भयंकर 13 सालों की तपस्या और कष्टों को पार करने के बाद, जब पांडव अपनी राजधानी हस्तिनापुर वापस लौटे, तो वो दिन कोई और नहीं, बल्कि यही कार्तिक अमावस्या का पवित्र दिन था!

हस्तिनापुर की प्रजा अपने पांडवों से बेइंतहा प्यार करती थी। जब उन्होंने सुना की उनके चहेते राजा और धर्मराज युधिष्ठिर सारे कष्टों को हराकर वापस आ रहे हैं, तो पूरी प्रजा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा।

कौरवों के लाख अत्याचारों के बावजूद, जनता ने अपने असली नायकों के स्वागत में पूरे हस्तिनापुर को दीपों की रोशनी से नहला दिया।

उस रात जले हुए उन दीयों ने यह साबित कर दिया की छल और कपट का अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों ना हो, न्याय और सत्य की रोशनी एक न एक दिन वापस लौटकर आती ही है।

भारत के स्वर्णिम युग की शुरुआत जब शकों को धूल चटाकर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने पहना था राजमुकुट

अब तक हमने पुराणों और युगों की बात की, लेकिन अब बात करते हैं हमारे गौरवशाली इतिहास की।

प्राचीन भारत का वो समय जब खूंखार विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को लूटने और यहाँ कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। उन आक्रमणकारियों को ‘शक’ कहा जाता था।

लेकिन उन्हें यह नहीं पता था की उनका पाला उज्जैन के सबसे प्रतापी, न्यायप्रिय और शूरवीर राजा- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से पड़ने वाला है।

सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी तलवार के दम पर उन शकों को ऐसी धूल चटाई की उन्हें भारत की सीमा से बाहर खदेड़ कर ही दम लिया। उनकी इस ऐतिहासिक और प्रचंड विजय ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा भर दी थी।

और आपको जानकर हैरानी होगी की शकों पर इसी महा-विजय के बाद, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का भव्य ‘राज्याभिषेक’ (Coronation) इसी दीपावली के पावन दिन हुआ था!

जिस दिन उनके सिर पर राजमुकुट सजा, उसी दिन से हमारे सनातन धर्म का अपना पवित्र कैलेंडर ‘विक्रम संवत’ शुरू हुआ, जिसे आज भी हम अपने हर शुभ काम में मानते हैं।

दीपावली का वो दिन भारत के उस ‘स्वर्णिम युग’ (Golden Era) की शुरुआत था, जब हमारा देश ज्ञान, विज्ञान, धन और शौर्य के मामले में पूरी दुनिया का सिरमौर बन गया था।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जलने वाला वो एक दीया जो अपने भीतर समेटे हुए है हज़ारों सालों का सनातनी गौरव

सच कहूं तो यार, आज जब हम बाज़ार से वो छोटे-छोटे मिट्टी के दीये खरीदकर लाते हैं, तो वो सिर्फ तेल, मिट्टी और रुई की बाती का खेल नहीं होता। उस एक छोटे से दीये के अंदर हमारा हज़ारों सालों का गौरवशाली इतिहास धड़क रहा होता है।

मुगलों के भयानक अत्याचार आए, अंग्रेज़ों की चालें आईं, और ना जाने कितने बाहरी लोगों ने हमारी संस्कृति को मिटाने की कोशिश की, लेकिन क्या वो हमारे घर की चौखट पर जलने वाले इस दीये को बुझा पाए? नहीं!

हमारे पूर्वजों ने चाहे कितनी भी गरीबी देखी हो, कितने भी संकट सहे हों, लेकिन उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ी को दीपावली मनाना नहीं भुलाया।

दीपावली का यह दीया हमारे ‘सरवाइवल’ और हमारे अजेय होने की सबसे बड़ी निशानी है।

जब हम दीपावली की शाम को अपने घर के बाहर पहला दीया जलाएंगे, तो याद रखिएगा की उस एक दीये की लौ में हम मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के शौर्य को नमन करेंगे, उसी लौ में हम माँ लक्ष्मी के वैभव का स्वागत करेंगे, भगवान महावीर के अमर ज्ञान को याद करेंगे, श्रीकृष्ण के पराक्रम, पांडवों के न्याय और सम्राट विक्रमादित्य के उस गौरवशाली राजमुकुट को एक साथ महसूस करेंगे।

सनातन धर्म की यही तो सबसे बड़ी खूबसूरती है दोस्त! यहाँ हर त्योहार आपको आपके महाबली होने का अहसास कराता है।

तो इस बार जब आप दीये जलाएं, तो पूरे गर्व, पूरे जोश और पूरी आस्था के साथ जलाएं। आसमान तक ये संदेश जाना चाहिए की सनातन की यह स्वर्णिम रोशनी ना कभी बुझी थी, ना कभी बुझेगी!

लोगसभा के सभी पाठकों को दीपावली के इस महा-उत्सव की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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