जिसने दुश्मनों के बीच देश की रक्षा में खपा दी अपनी पूरी जवानी, उस ‘अजीत डोभाल’ को BRICS मीटिंग में थका हुआ देखकर हँस रही ट्रोल्स की फौज, अपने ही देशभक्तों पर कीचड़ उछालने का ये कैसा घिनौना खेल

सच कहूं तो आज सोशल मीडिया इतना गंदा हो चुका है की कभी-कभी लगता है इंसानियत और शर्म नाम की चीज़ लोगों के जमीर से पूरी तरह मर चुकी है।

राजनीति में किसी नेता का विरोध करना, उसकी नीतियों से असहमत होना लोकतंत्र का हिस्सा है। आपको सत्ता में बैठे लोगों से चिढ़ हो सकती है, आप उन्हें वोट मत दीजिए।

लेकिन राजनीतिक विरोध की आग में अंधे होकर जब इस देश के कुछ लोग अपने ही देश के रक्षकों, अपने ही सेनापतियों का मज़ाक उड़ाने लगें, तो समझ लीजिए की उस समाज की मानसिकता में बहुत गहरे कीड़े पड़ चुके हैं।

हाल ही में भारत में हुए ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान सोशल मीडिया पर विपक्ष का एक ऐसा ही बेहद घटिया, शर्मनाक और घिनौना ट्रेंड देखने को मिला।

निशाना कौन था? भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और देश के असली ‘जेम्स बॉन्ड’ माने जाने वाले अजीत डोभाल!

उस इंसान को मीम (Meme) मटेरियल बना दिया गया जिसने अपनी पूरी जवानी भारत को दुशमनों से बचाने में गुज़ार दी। चलिए आज इन ‘कीबोर्ड वॉरियर्स’ (Keyboard Warriors) और तथाकथित ‘लिबरल ट्रोल्स’ के दोगलेपन का पूरा चीरफाड़ करते हैं।

81 साल की उम्र, थकी हुई आँखें और पूरे देश का बोझ… BRICS की टेबल पर डोभाल की एक झपकी दिखा गयी समाज की गिरती मानसिकता

इस पूरे मामले को समझिये। दिल्ली में दुनिया भर के टॉप लीडर्स का जमावड़ा लगा था। ब्रिक्स की मीटिंग चल रही थी। वहां कोई कॉलेज का फेस्ट नहीं चल रहा था, बल्कि दुनिया की जिओपॉलिटिक्स (Geopolitics), युद्धों और कूटनीति के सबसे उलझे हुए मुद्दों पर भविष्य तय किया जा रहा था।

इसी मीटिंग की कुछ सेकंड की कटी-फटी वीडियो क्लिप्स विपक्षी तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर वायरल कर दी जाती हैं।

इन क्लिप्स में क्या था? क्लिप्स में दिखता है की 81 साल के अजीत डोभाल ब्रिक्स की मीटिंग में पुतिन के ठीक पीछे बैठे हैं। उनके चेहरे पर एक गहरी थकान है, उनकी आँखें थोड़ी भारी हो रही हैं और एक पल के लिए उनकी आँख लग जाती है (वो झपकी ले लेते हैं)।

एक दूसरी क्लिप में वो टेबल पर रखे थोड़े से ड्राई फ्रूट्स खाते हुए दिखते हैं।

बस! इतना ही काफी था उन देश विरोधी ट्रोल्स के लिए जो पिछले 10 सालों से सिर्फ इस मौके की ताक में बैठे थे की कैसे भारत के इस ‘सुपरकॉप’ को नीचा दिखाया जाए।

धड़ाधड़ मीम्स बनने लगे। जो लड़के दिन भर घर में पड़े रहकर बाप की कमाई की रोटियां तोड़ते हैं, वो ट्विटर (X) और इंस्टाग्राम पर अजीत डोभाल की थकान का मज़ाक उड़ाने लगे। कोई उन्हें ‘थका हुआ बूढ़ा’ कह रहा था, तो कोई उनके ड्राई फ्रूट्स खाने पर ताने मार रहा था।

अरे भाई, तुम लोग किस बात पर हँस रहे हो? उस इंसान की 81 साल की उम्र पर? जब तुम्हारे और हमारे घरों में बुज़ुर्ग 80 साल की उम्र में बिस्तर पकड़ लेते हैं, उन्हें सहारा देकर इधर-उधर ले जाना पड़ता है, तब यह इंसान 12-12 घंटे पूरे ब्रिक्स की सुरक्षा का जिम्मा अपने सर पर लेकर घूमता है।

वो वहां व्लादिमीर पुतिन जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं के साथ टेबल पर बैठकर भारत की सुरक्षा की गारंटी तय कर रहा है।

उसकी थकी हुई आँखें कोई मज़ाक का विषय नहीं हैं यार, वो इस बात का सुबूत हैं की एक 81 साल का बुज़ुर्ग इस देश के 140 करोड़ लोगों को चैन की नींद सुलाने के लिए अपने शरीर की आख़िरी सीमाएं लांघ रहा है!

लेकिन इस देश के कुछ ‘मोदी-विरोध’ में अंधे हो चुके कीड़ों को ये सब कहाँ समझ आएगा! उन्हें तो बस अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए एक टूलकिट चलानी थी। उन्होंने ‘देश के रक्षक’ और ‘राजनीतिक नेता’ के बीच का फर्क ही मिटा दिया।

55 साल के युवा नेता की संसद में खर्राटे वाली नींद पर चुप्पी और 81 साल के देश-सेवी की झपकी पर बवाल

अब ज़रा इस वामपंथी इकोसिस्टम का दोगलापन देखिए। इनका हिप्पोक्रेसी का लेवल इतना हाई है की आप अपना सिर पीट लेंगे।

इस देश की संसद जिसे हम लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं, जहाँ देश का भविष्य तय होता है, वहां इनका एक तथाकथित 55 साल का ‘युवा नेता’ हर दूसरे दिन सोता हुआ पाया जाता है।

बकायदा कैमरे में उनके खर्राटे लेते हुए वीडियो कैद हैं। जब 55 साल का एक पूरी तरह से स्वस्थ और जवान नेता संसद की गंभीर बहसों के बीच मुंह खोलकर सोता है, तब इस ट्रोल्स की फौज की आँखों में मोतियाबिंद हो जाता है।

तब मजाल है की कोई एक मीम भी बना दे! तब ये ट्रोल्स सफाई देते फिरते हैं की “अरे वो सो नहीं रहे थे, वो तो बहुत गहराई से सोच रहे थे” या “वो भारत जोड़ो यात्रा की थकान मिटा रहे थे।”

अब ज़रा बायोलॉजिकल हकीकत को समझिए दोस्तों। आप घर में एक छोटी सी शादी का फंक्शन होस्ट करते हैं तो हफ्तों तक आपकी नींद पूरी नहीं होती।

यहाँ हम एक ऐसे शख्स की बात कर रहे हैं जिसने मेज़बान देश के NSA के तौर पर सारी इंटरनेशनल सिक्योरिटी का ढांचा संभाला, दुनिया भर से आए दर्जनों राष्ट्राध्यक्षों (रूस, चीन आदि) के साथ कूटनीतिक चक्रव्यूह खेला।

वो इंसान वहां कोई मज़े लूटने नहीं, भारत के लिए कूटनीतिक जंग लड़ने बैठा था।

मुफ़्त की रोटियां तोड़ने वालों को ‘ड्राई फ्रूट्स’ में भी दिखा पाप, सीढ़ियों पर तंज कसने वाले भूल गए की इन कंधों पर क्या है

अरे, इन कीबोर्ड वॉरियर्स के मज़ाक का लेवल तो देखिए। एक दूसरी क्लिप को लेकर ये लोग सोशल मीडिया पर रोना-धोना कर रहे थे की “देखो-देखो, ये तो मीटिंग में बैठकर फ्री के ड्राई फ्रूट्स (Snacks) खा रहे हैं!”

भाईसाहब, ये तंज वो लोग कस रहे हैं जो दिन भर अपने बाप की कमाई का मुफ्त पिज़्ज़ा और बर्गर ठूंसते हुए गद्दे पर पड़े रहते हैं। ज़रा डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल (Diplomatic Protocol) को समझिए।

ब्रिक्स जैसी ग्लोबल मीटिंग्स कोई शादी का रिसेप्शन नहीं होतीं जहाँ आप प्लेट लेकर बफर सिस्टम में टूट पड़ें। वहां बैक-टू-बैक मीटिंग्स होती हैं।

एक मीटिंग ख़त्म हुई नहीं की दूसरे देश के डेलीगेशन के साथ फाइलें खुल जाती हैं। ऐसे में इन बड़े अधिकारियों और कूटनीतिज्ञों को ढंग से लंच करने तक का समय नहीं मिलता।

ऐसे थकाऊ शेड्यूल में बॉडी का ग्लूकोज़ और एनर्जी लेवल बनाए रखने के लिए ही टेबल पर स्नैक्स, काजू-बादाम या ड्राई फ्रूट्स रखे जाते हैं।

डोभाल सर अगर वो खा रहे थे, तो वो अपनी ड्यूटी के बीच खुद को एक्टिव रखने के लिए खा रहे थे। वो वहां तुम्हारी तरह मुफ़्त की रोटियां तोड़ने नहीं गए थे!

लेकिन क्या करें, जिनके दिमाग में ही कचरा भरा हो, उन्हें कूटनीति की टेबल पर रखे काजू में भी ‘देश का पतन’ नज़र आने लगता है।

और तो और, हद तो तब हो गई जब कुछ ट्रोल्स ने उनका सीढ़ियां चढ़ते हुए एक वीडियो शेयर किया।

वीडियो में डोभाल सर सीढ़ियां चढ़ते वक्त थोड़े धीमे और लड़खड़ाते हुए नज़र आ रहे थे। इस पर भी मज़ाक उड़ाया गया की “बूढ़ा चल भी नहीं पा रहा, ये क्या देश संभालेगा।”

अरे ट्रोल्स! शर्म करो! जिन 81 साल के कंधों पर इस देश के 140 करोड़ लोगों की सुरक्षा का भार टिका हो, जिन घुटनों ने इस देश के लिए जंगलों से लेकर दुश्मनों की ज़मीन तक की ख़ाक छानी हो, उन पर उम्र का थोड़ा तो असर दिखेगा ही ना!

सीढ़ियों पर उनकी वो धीमी चाल उनकी कमज़ोरी नहीं है, बल्कि वो इस बात का प्रमाण है की शरीर के जर्जर होने के बावजूद वो इंसान रिटायरमेंट लेकर घर में बैठने के बजाय, आज भी हिंदुस्तान की ढाल बनकर सीना ताने खड़ा है।

जिस इंसान ने 7 साल तक लाहौर में मौत की आँखों में आँखें डालकर जासूसी की, उसे सोशल मीडिया के कीड़े क्या राष्ट्रभक्ति सिखाएंगे

अगर तुम सच में भूल गए हो की तुम किस इंसान का मज़ाक उड़ा रहे हो, तो चलो आज तुम्हारे दिमाग के जाले थोड़े साफ़ कर देते हैं।

आइए आपको इतिहास की उस टाइमलाइन में ले चलते हैं जब शायद आज मीम बनाने वाले इन ट्रोल्स के माता-पिता की भी शादी नहीं हुई होगी।

ये बात 1980 के दशक की है। भारत के एक अंडरकवर जासूस को पाकिस्तान भेजा जाता है। हॉलीवुड की फिल्मों वाले जेम्स बॉन्ड तो फिर भी फाइव स्टार होटलों में रुकते हैं और सूट-बूट पहनकर जासूसी करते हैं।

लेकिन भारत का ये असली जेम्स बॉन्ड पूरे 7 साल तक (1983 से 1987 के मुख्य दौर में) पाकिस्तान के लाहौर की गलियों में एक पाकिस्तानी मुस्लिम बनकर रहा।

उन्होंने बाकायदा अपनी पहचान छिपाई, दाढ़ी बढ़ाई और 7 सालों तक मस्जिदों में जाकर नमाज़ भी अदा की। सोचिए, एक छोटी सी चूक, ज़ुबान से निकला एक गलत शब्द, और अंजाम होता- ISI के टॉर्चर रूम में रूह कंपा देने वाली मौत!

लेकिन डोभाल वहां सिर्फ ज़िंदा नहीं रहे, बल्कि ऐसी खुफिया जानकारी निकाली जिसने भारत का इतिहास बदल दिया।

क्या आपको ‘कहुता (Kahuta) न्यूक्लियर प्लांट’ का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला किस्सा पता है? उस समय पाकिस्तान चोरी-छिपे अपना परमाणु बम (Nuclear Bomb) बना रहा था और भारत को इसका कोई पक्का सबूत नहीं मिल रहा था।

कहुता प्लांट के अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

तब डोभाल ने क्या किया? उन्होंने एक भिखारी का भेष बनाया और कहुता प्लांट के ठीक बाहर मौजूद एक नाई की दुकान पर पहुँच गए।

ये वो दुकान थी जहाँ उस न्यूक्लियर प्लांट के पाकिस्तानी वैज्ञानिक बाल कटवाने आते थे। डोभाल ने उस नाई की दुकान से उन वैज्ञानिकों के कटे हुए बालों के सैंपल (Hair samples) चुपचाप उठाए और उन्हें खुफिया तरीके से भारत भेज दिया।

जब भारत में उन बालों की टेस्टिंग हुई, तो उन बालों में ‘रेडिएशन’ (Radiation) के कण मिले! ये पहला और सबसे बड़ा पक्का सबूत था जिससे भारत और दुनिया को पता चला की पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है।

ज़रा सोचकर देखिए इस लेवल की जासूसी और हिम्मत को! जो कीबोर्ड वॉरियर्स आज डोभाल को गालियां दे रहे हैं, जिन्हें गली के कुत्ते के भौंकने पर पसीना आ जाता है… वो उस इंसान को राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं जिसने 7 साल तक दुश्मन की ज़मीन पर मौत के साये में भारत का तिरंगा अपने दिल में ज़िंदा रखा।

अगर तुम्हारे अंदर रत्ती भर भी गैरत बची है ना, तो ऐसे इंसान का मज़ाक उड़ाने से पहले तुम्हारे हाथ कांपने चाहिए थे।

मोदी विरोध की आग में जलते-जलते देश के नायकों को मत जलाओ

अंत में, इन ट्रोल्स और उस पूरे राजनीतिक इकोसिस्टम से बस एक ही बात कहनी है। तुम्हें मोदी से नफरत है? शौक से करो।

तुम्हें उनकी नीतियां पसंद नहीं हैं? बिल्कुल मत पसंद करो।

लेकिन अपनी इस अंधी राजनीतिक नफरत के गंदे खेल में देश के उन असली नायकों को मत घसीटो, जिन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाने का रिस्क लेकर तुम्हारी और हमारी रातों की नींद सुरक्षित की है।

तुम जिस आज़ादी का लुत्फ़ उठाते हुए अपने कीबोर्ड पर बैठकर देश के जासूसों का मज़ाक उड़ाते हो ना, वो आज़ादी मुफ़्त में नहीं मिली है। वो आज़ादी अजीत डोभाल जैसे हज़ारों गुमनाम सिपाहियों के पसीने और खून की बदौलत तुम्हें खैरात में मिली है।

एक बात हमेशा याद रखना। जिस देश में, जिस समाज में अपने ही देशभक्तों को बुढ़ापे में मज़ाक का पात्र बना दिया जाए, जिस देश में टेबल पर रखे दो काजू-बादाम को लेकर 81 साल के एक राष्ट्र-रक्षक को सरेआम ज़लील किया जाए… उस देश में फिर कभी नए नायक पैदा नहीं होते।

आने वाली पीढ़ियां कभी भी देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगी, क्योंकि वो देखेंगी की जिन लोगों के लिए हम अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं, वही लोग कल हमारे बुढ़ापे का मज़ाक उड़ाएंगे।

अजीत डोभाल ने कभी किसी ‘पार्टी सिंबल’ या किसी ‘नेता’ की चाकरी नहीं की। उन्होंने अपनी पूरी जवानी, अपना पूरा जीवन सिर्फ और सिर्फ ‘तिरंगे’ को सर्व करने में दे दिया।

उन्होंने कांग्रेस सरकार के अंडर रहकर भी उसी वफ़ादारी से देश को बचाया, और आज मोदी सरकार में भी उसी वफ़ादारी से भारत माता की सेवा कर रहे हैं।

ये ‘कृतघ्नता’ (नमक-हरामी) का खेल अब बंद होना चाहिए। अजीत डोभाल सर की वो झपकी, उनकी वो थकान, उनके वो लड़खड़ाते कदम हमारी और आपकी आज़ादी की कीमत हैं।

अगर आप उनके सम्मान में दो शब्द नहीं बोल सकते, तो कम से कम अपना मुंह बंद रखिए।

इतिहास जब लिखा जाएगा, तो अजीत डोभाल का नाम सुनहरे अक्षरों में ‘भारत के रक्षक’ के रूप में दर्ज़ होगा, और तुम्हारा नाम उस पन्ने पर कीड़े-मकोड़ों की तरह ‘ट्रोल्स’ के रूप में दफ़न हो जाएगा।

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