आज हम उस प्रलयंकारी हिंदू योद्धा की शौर्य गाथा पर बात करने जा रहे हैं, जिसकी दहाड़ सुनकर दिल्ली की सल्तनत के तंबू उखड़ जाया करते थे।
ये उस अकेले शेर की कहानी है जिसने अपने पुरखों के खून और माता पद्मिनी के जौहर की राख हाथ में लेकर कसम खाई थी, और फिर जिहादी सुल्तानों से वो खौफनाक बदला लिया की उनकी आने वाली पुश्तें भी चित्तौड़ की तरफ आंख उठाने से कांपती थीं।
हम बात कर रहे हैं ‘विषम घाटी पंचानन’ यानी मुसीबतों की घाटी में दहाड़ने वाले साक्षात् शेर- महाराणा हम्मीर सिंह की!
ये वो नाम है जिसने अगर अपनी तलवार म्यान से ना निकाली होती, तो शायद मेवाड़ की धरती पर कभी महाराणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे प्रलयंकारी हिन्दू शूरवीर जन्म ही नहीं लेते।
हम्मीर सिंह ने उस वक्त बगावत का झंडा उठाया था, जब पूरे उत्तर भारत को इस्लामी आक्रांताओं ने अपने खूनी पंजों में जकड़ रखा था।
सुल्तानों और तुगलकों के उस खौफनाक दौर में इस अकेले राजपूत शेर ने जो तांडव मचाया, वो सनातन धर्म के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और धधकता हुआ पन्ना है।
1303 का वो काला अध्याय जब मेवाड़ पर छा गया था जिहादी सुल्तानों का खौफनाक अंधेरा
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है 1303 के उस खौफनाक साल से। दिल्ली में बैठा वो क्रूर और अय्याश सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी मेवाड़ की शान चित्तौड़गढ़ पर नज़रें गड़ाए बैठा था।
उसने एक विशाल जेहादी फौज लेकर चित्तौड़ के किले को चारों तरफ से घेर लिया था। रावल रतन सिंह और उनके वीरों ने महीनों तक किले को बचाए रखा, लेकिन जब रसद खत्म हो गई, तो राजपूती खून ने केसरिया बाना पहनकर ‘शाका’ करने का फैसला किया।
‘शाका’ का मतलब है वो अंतिम युद्ध जिसमें हार निश्चित होने पर हिन्दू योद्धाओं द्वारा प्राणों की बाजी लगा दी जाती है
उधर किले के अंदर माता पद्मिनी के नेतृत्व में हजारों क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व और सनातन धर्म की रक्षा के लिए धधकती हुई आग में कूदकर वो पवित्र ‘जौहर’ किया, जिसकी लपटें आज भी हमारे दिलों में जलती हैं।
चित्तौड़ के उस खौफनाक युद्ध में मेवाड़ का बच्चा-बच्चा कट मरा था। खिलजी के जेहादियों ने किले में घुसकर जो नंगा नाच किया, मासूमों का खून बहाया, वो इतिहास का वो काला दिन था जिसे हम कभी भूल नहीं सकते।
लेकिन रुकिए! उस महासंग्राम में एक गांव ऐसा भी था जिसने अपनी पूरी नस्ल दांव पर लगा दी थी। वो था मेवाड़ का ‘सिसोदा’ गांव। सिसोदा के जागीरदार थे राणा लक्ष्मण सिंह।
जब चित्तौड़ पर संकट आया, तो लक्ष्मण सिंह अपनी जागीर और ऐशो-आराम छोड़कर अपने सातों बेटों के साथ चित्तौड़ की रक्षा के लिए दौड़ पड़े।
आपको जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे की उस भयंकर युद्ध में लक्ष्मण सिंह और उनके सातों के सातों बेटे एक-एक करके जेहादियों को जानवरों की तरह काटते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।
उनके सबसे बड़े बेटे का नाम था अरि सिंह, जो हम्मीर सिंह के पिता थे। अरि सिंह भी मुगलों की छाती चीरते हुए मातृभूमि के लिए कुर्बान हो गए।
उस वक्त हम्मीर सिंह महज एक छोटे से बच्चे थे। उनके चाचा अजय सिंह किसी तरह उस नन्हे हम्मीर को लेकर केलवाड़ा के जंगलों में भाग निकले, ताकि लक्ष्मण सिंह के खून का वो आखिरी चिराग बुझने ना पाए।
चित्तौड़ पर अब अल्लाउद्दीन खिलजी और उसके जेहादियों का पूरा कब्जा हो चुका था। मेवाड़ की वो पवित्र धरती, जहाँ कभी रावल बप्पा रावल के जयकारे गूंजते थे, वहां अब इस्लामी आक्रांताओं और उनके पालतू गद्दारों (जैसे जालौर का मालदेव चौहान) का राज चल रहा था।
लेकिन उस नन्हे हम्मीर की आंखों में जो बदले की आग सुलग रही थी, वो किसी ज्वालामुखी से कम नहीं थी।
उसने बचपन में ही कसम खा ली थी की जब तक वो अपने पुरखों के खून का बदला नहीं ले लेता और चित्तौड़ पर वापस भगवा नहीं फहरा देता, तब तक वो चैन की सांस नहीं लेगा।
अरावली की पहाड़ियों से उठा ‘हम्मीर सिंह’ नाम का वो बवंडर जिसने जेहादी सूबेदारों की गर्दनें काटकर दिल्ली के सुल्तानों में भर दिया खौफ
हम्मीर सिंह कोई महलों में पले-बढ़े राजकुमार नहीं थे। उनकी परवरिश अरावली के उन बीहड़ जंगलों और घाटियों में हुई थी, जहाँ कदम-कदम पर मौत नाचती थी।
बड़े होते-होते वो एक ऐसे खूंखार और चतुर योद्धा बन गए जिनकी रगों में सिर्फ और सिर्फ जेहादियों के संहार का जुनून दौड़ता था।
जब हम्मीर ने तलवार उठाई, तो उन्हें पता था की दिल्ली सल्तनत की उस लाखों की सेना से सीधे मैदान में टकराना बेवकूफी होगी। उनके पास ना तो बड़ी फौज थी और ना ही खजाना।
तब उन्होंने वो तरीका अपनाया जिसने आगे चलकर मुगलों की जड़ें हिला दीं- ‘गुरिल्ला युद्ध’ यानी छापामार लड़ाई! हम्मीर सिंह ने मेवाड़ के असली भूमिपुत्रों, यानी वीर भील आदिवासियों को अपने साथ जोड़ा।
भील योद्धाओं ने हम्मीर सिंह को अपना सरदार मान लिया और फिर अरावली की पहाड़ियों से ऐसा बवंडर उठा जिसने दिल्ली तक की नींदें हराम कर दीं।
हम्मीर सिंह और उनके भील धनुर्धर रात के घने अंधेरे में जिहादी आक्रांताओं की चौकियों पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़ते थे।
जेहादी सूबेदार जब तक अपनी तलवारें निकालते, तब तक हम्मीर के योद्धा उनकी गर्दनें काटकर जंगलों में गायब हो जाते थे।
सुल्तान की रसद लूट ली जाती, उनके घोड़ों को मार दिया जाता और उनके टैक्स वसूलने वाले खजांचियों को बीच सड़क पर टांग दिया जाता।
जिहादियों को जूतों तले कुचलकर मेवाड़ की धरती ने वापस ओढ़ा ‘भगवा’ और रखा गया ‘सिसोदिया साम्राज्य’ का प्रचंड आधार
साल बीतते गए और दिल्ली की गद्दी पर बैठे सुल्तानों के चेहरे भी बदलते गए। खिलजी मर चुका था और अब दिल्ली की सल्तनत पर तुगलकों का राज आ गया था।
इधर चित्तौड़ में गद्दार मालदेव चौहान भी मर गया और उसका बेटा बनवीर चित्तौड़ की गद्दी पर बैठ गया। बनवीर तुगलकों का ही टुकड़खोर था जो उनके टुकड़ों पर पल रहा था।
हम्मीर सिंह बस इसी सही मौके की ताक में थे। 1326 के आस-पास, जब दिल्ली सल्तनत अपनी अंदरूनी लड़ाइयों में उलझी हुई थी, तब हम्मीर सिंह ने चित्तौड़गढ़ पर वो ऐतिहासिक और खौफनाक प्रहार किया।
ये कोई छोटी-मोटी झड़प नहीं थी, ये सदियों का दबा हुआ वो गुस्सा था जो लावा बनकर फट पड़ा था। हम्मीर की सेना ने चित्तौड़ के किले को घेर लिया। उन जेहादियों और गद्दारों को किले के अंदर ही चूहों की तरह फंसा लिया गया।
किले के दरवाज़े टूटे और राजपूती तलवारों ने अंदर घुसकर वो तांडव मचाया की आक्रांताओं की रूहें कांप उठीं। गद्दार बनवीर को हम्मीर सिंह ने जूतों तले कुचलकर चित्तौड़ से लात मारकर भगा दिया।
जो जेहादी सैनिक वहां बचे थे, उन्हें काटकर चित्तौड़ की धरती को उनके अपवित्र खून से धो दिया गया। सालों बाद, चित्तौड़गढ़ के उस पवित्र किले पर एक बार फिर गर्व से भगवा झंडा लहरा रहा था!
जिस किले में माता पद्मिनी ने जौहर किया था, जिस किले के दरवाज़ों पर हम्मीर के दादा और सातों पिताओं ने अपनी छातियां छलनी करवाई थीं, आज उसी किले पर उनका खून, उनका वंशज हम्मीर सिंह सीना ताने खड़ा था।
और बस यहीं से, इतिहास के पन्नों में एक नए और प्रचंड युग की शुरुआत हुई- ‘सिसोदिया वंश’ की हुंकार!
चूंकि हम्मीर सिंह सिसोदा गांव के जागीरदार के पोते थे, इसलिए उनके द्वारा स्थापित किए गए गुहिल वंश की इस नई शाखा को ‘सिसोदिया वंश’ कहा गया।
अगर हम्मीर सिंह उस दिन वो बाजी ना पलटते, अगर वो जंगलों में छुपकर बैठ जाते, तो शायद सिसोदिया वंश कभी वजूद में ही ना आता।
और अगर सिसोदिया वंश ना होता, तो बाद में राणा कुंभा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महामानव मुगलों की छाती पर चढ़कर तांडव कैसे मचाते?
हम्मीर सिंह ने सिर्फ एक किला नहीं जीता था, उन्होंने सनातन धर्म को वो अभेद्य दीवार दे दी थी, जिससे टकराकर आगे चलकर बड़े-बड़े सुल्तानों और बादशाहों के घमंड चकनाचूर हो गए।
चित्तौड़ पर भगवा लहराते ही दिल्ली में बैठे उस क्रूर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के तंबू में आग लग गई थी। उसे लगा की एक छोटे से राजपूत सरदार ने उसकी नाक काट दी है।
वो अपने गुरूर में अंधा होकर लाखों की जेहादी फौज लेकर मेवाड़ को कुचलने के लिए निकल पड़ा। उसे नहीं पता था की वो हम्मीर सिंह से लड़ने नहीं, बल्कि अपनी मौत के मुंह में जा रहा है।
सिंगोली का वो प्रलयंकारी युद्ध जब मुहम्मद बिन तुगलक की जेहादी फौज को काटकर भेजा सीधे जहन्नुम
मध्य प्रदेश के पास ‘सिंगोली’ के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं। एक तरफ तुगलक की वो अंधी जेहादी फौज थी, और दूसरी तरफ महाराणा हम्मीर सिंह के वो मुट्ठी भर राजपूत और भील लड़ाके, जिनकी आंखों में अपने पुरखों के खून का बदला खौल रहा था।
हम्मीर दा ने यहां कोई सीधी बेवकूफी वाली जंग नहीं लड़ी। उन्होंने अपनी चतुर गुरिल्ला रणनीति से तुगलक की उस भारी-भरकम फौज को सिंगोली की उन घाटियों और संकरे रास्तों में फंसा लिया जहाँ उनके हाथी और घुड़सवार कुछ नहीं कर सकते थे।
और फिर शुरू हुआ वो प्रलयंकारी तांडव! पहाड़ों की चोटियों से भील धनुर्धरों ने ज़हरीले तीरों की ऐसी बारिश की कि सुल्तान की सेना में भगदड़ मच गई।
और नीचे मैदान में महाराणा हम्मीर की राजपूती तलवारों ने सुल्तानों को वो खौफनाक मौत दी जिसे शब्दो में बयान करना मुश्किल है।
जेहादियों की लाशों के अंबार लग गए। जो सेना कुछ देर पहले ‘अल्लाह-हू-अकबर’ चिल्ला रही थी, वो अब अपनी जान की भीख मांगते हुए उल्टे पैर भागने लगी। सिंगोली का वो युद्ध मुगलों के लिए ऐसा खौफनाक सपना बन गया जिसे वो सदियों तक नहीं भूल पाए।
हम्मीर सिंह के हाथों मुहम्मद बिन तुगलक की खौफनाक दुर्दशा, चित्तौड़ की जेल में 6 महीने तक जानवरों की तरह जंजीरों में सड़ाया
सिंगोली के उस खूनी मैदान में तुगलक भाग नहीं पाया था। जब उसकी पूरी सेना कट गई या दुम दबाकर भाग गई, तब महाराणा हम्मीर सिंह ने उस घमंडी सुल्तान को युद्ध के मैदान से जिंदा दबोच लिया!
जी हाँ, दिल्ली का सुल्तान, जिसके नाम से बड़े-बड़े राजा कांपते थे, वो हम्मीर सिंह के कदमों में पड़ा अपनी जान की भीख मांग रहा था।
हम्मीर सिंह ने उसे वहीं नहीं मारा। उन्होंने ऐसा खौफनाक बदला लिया की आने वाली कई पुश्तों तक सुल्तानों ने मेवाड़ की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं की।
उस तुगलक को भारी लोहे की जंजीरों में बांधा गया। उसे किसी आम चोर-उचक्के की तरह घसीटते हुए चित्तौड़ लाया गया।
महाराणा हम्मीर ने उसे सीधे कालकोठरी में फिंकवा दिया। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं… पूरे 6 महीने! पूरे 6 महीने तक दिल्ली का वो सबसे ताकतवर सुल्तान चित्तौड़ की उस अंधेरी जेल में चूहों और कीड़ों के बीच सड़ाया गया।
रोज़ उसे घसीटकर महाराणा के दरबार में पेश किया जाता और वो घुटनों के बल बैठकर अपनी जान बख्शने के लिए गिड़गिड़ाता था।
उसका सारा गुरूर, सारा जेहादी जुनून उन 6 महीनों में जूतों तले ऐसा कुचला गया की वो एक कुत्ते से भी बदतर हालत में आ गया था। इतिहास में शायद ही किसी इस्लामी सुल्तान की इतनी भयानक दुर्गति हुई होगी।
जब 6 महीने जेल में सड़ने के बाद तुगलक की हालत एकदम खस्ता हो गई और दिल्ली की सल्तनत बिना सुल्तान के चरमराने लगी, तब उसने महाराणा हम्मीर के पैरों में गिरकर किसी भी कीमत पर अपनी जान छोड़ने की गुहार लगाई।
महाराणा ने फरमान सुनाया की अगर इस कीड़े को जिंदा छोड़ना है, तो इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। और वो कीमत क्या थी? 50 लाख रुपये नकद!
1336 के उस दौर में 50 लाख रुपये की क्या अहमियत रही होगी, इसका आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते। ये वो पैसा था जो इन लुटेरों ने हमारे मंदिरों से लूटा था। हम्मीर सिंह ने ब्याज समेत वो पूरा खजाना वापस अपनी तिजोरी में रखवा लिया।
महाराणा ने उससे 100 खूंखार जंगी हाथी भी छीन लिए। और तो और, तुगलक को मजबूर किया गया की वो अजमेर, रणथंभौर, नागौर और शिवपुरी जैसे विशाल और अहम इलाके हमेशा-हमेशा के लिए मेवाड़ को सौंप दे।
जब तुगलक ने रोते-चीखते हुए इन सारी शर्तों पर मोहर लगा दी और सारा खजाना चित्तौड़ पहुंच गया, तब जाकर हम्मीर सिंह ने उस सुल्तान को लात मारकर चित्तौड़ से बाहर निकाला और दिल्ली भगाया।
इस खौफनाक बेइज्जती के बाद तुगलक की ऐसी रूह कांपी की उसने अपनी पूरी जिंदगी में दोबारा कभी मेवाड़ की तरफ आंख उठाकर देखने की जुर्रत नहीं की।
सिर्फ तुगलक ही नहीं, उसके मरने के बाद जो बाकी सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठे, वो भी हम्मीर सिंह के नाम से थर-थर कांपते थे।
