NASA और चीन की 'अंतरिक्ष' में दादागिरी खत्म करने आया भारत का पहला 'प्राइवेट' ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1', हमको 'सपेरों का देश' बोलने वाले अमेरिका के अरबों डॉलर के 'स्पेस धंधे' पर सबसे बड़ा 'स्वदेशी' हंटर

NASA और चीन की ‘अंतरिक्ष’ में दादागिरी खत्म करने आया भारत का पहला ‘प्राइवेट’ ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’, हमको ‘सपेरों का देश’ बोलने वाले अमेरिका के अरबों डॉलर के ‘स्पेस धंधे’ पर सबसे बड़ा ‘स्वदेशी’ हंटर

हम हिंदुस्तानियों ने दशकों तक इन पश्चिमी देशों, अमेरिका और यूरोप के उन गोरे लोगों का घमंड झेला है जो सोचते थे की विज्ञान, टेक्नोलॉजी और अंतरिक्ष तो सिर्फ उनके बाप की जागीर है।

आपको अमेरिका के उस मशहूर और घमंडी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का वो सड़ा हुआ कार्टून तो याद ही होगा ना?

जब भारत ने अपना मंगलयान भेजा था, तो इन गोरों ने कार्टून छापा था जिसमें ‘एलीट स्पेस क्लब’ के अंदर कुछ सूट-बूट वाले ‘गोरे’ बैठे थे और बाहर एक गरीब भारतीय किसान अपनी गाय लेकर दरवाज़ा खटखटा रहा था।

इन्होंने हमें सपेरों का देश कहा! इन्होंने हमारा मज़ाक उड़ाया की जो देश अपने लोगों को पेट भर खाना नहीं खिला सकता, वो अंतरिक्ष में क्या खाकर जाएगा।

लेकिन आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है की वही अमेरिका, वही नासा (NASA) और वो चीन का ड्रैगन आज भारत के पैरों की धूल फांकने पर मजबूर हो गए हैं।

कल सुबह ठीक 11:30 बजे भारत के इतिहास का वो स्वर्णिम अध्याय लिखा जाएगा जिसे देखकर इन विदेशी ताकतों की हेकड़ी निकल जाएगी।

18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित ‘फर्स्ट लॉन्च पैड’ से भारत का पहला स्वदेशी और ‘प्राइवेट’ ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ (Vikram-1) आसमान को चीरता हुआ अंतरिक्ष में दहाड़ेगा।

ये कोई मामूली रॉकेट नहीं है भाई! ये उन पश्चिमी देशों के मुंह पर जड़ा गया वो करारा स्वदेशी तमाचा है जिसकी गूंज वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक सुनाई देगी।

कल का दिन ये साबित कर देगा की अब अंतरिक्ष पर किसी नासा या एलन मस्क की बपौती नहीं रही, अब वहां भी भारत के युवाओं का भगवा लहराएगा!

स्टील से 5 गुना हल्का और ‘3D प्रिंटिंग’ से तैयार ‘स्वदेशी’ ऑर्बिटल रॉकेट, ‘विक्रम-1’ की वो दहाड़ जिससे कांप रही अमेरिका की SpaceX

अब ज़रा इस ‘विक्रम-1’ रॉकेट की उस स्वदेशी ताकत को समझिए जिसने एलन मस्क की स्पेसएक्स (SpaceX) और चीन की सरकारी एजेंसियों की रातों की नींद हराम कर दी है।

ये रॉकेट सरकार ने नहीं बनाया है। इसे बनाया है हैदराबाद के हमारे दो नौजवान शेरों ने- पवन चंदाना और नागा भरत डाका!

ये वो युवा हैं जो इसरो की अपनी आराम की सरकारी नौकरी छोड़कर बाहर आए और अपनी खुद की कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ (Skyroot Aerospace) खड़ी कर दी।

इनका एक ही पागलपन था की हमें अमेरिका को उसके ही घर में घुसकर उसी की भाषा में जवाब देना है।

ज़रा इस 24 मीटर ऊंचे स्वदेशी बाहुबली (विक्रम-1) की तकनीक देखिए। पश्चिमी देश अपने रॉकेट बनाने के लिए सालों-साल लगाते हैं, अरबों डॉलर फूंकते हैं और भारी-भरकम स्टील का इस्तेमाल करते हैं।

लेकिन हमारे इन देसी लड़कों ने क्या किया? इन्होंने पूरे के पूरे रॉकेट को ‘कार्बन-कंपोजिट’ (Carbon Composite) से बना डाला!

अरे भाई, ये कार्बन-कंपोजिट स्टील से 5 गुना ज़्यादा हल्का होता है और कई गुना ज़्यादा मज़बूत होता है। रॉकेट जितना हल्का होगा, वो अंतरिक्ष में उतना ही ज़्यादा वज़न (Payload) लेकर जा सकेगा।

और तो और, इसके इंजनों का नाम रखा गया है- ‘कलाम’ और ‘रमन’ (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और सी.वी. रमन के नाम पर)।

इन इंजनों को किसी बड़ी फैक्ट्री में महीनों तक लोहे को पिघलाकर नहीं बनाया गया है, बल्कि इन्हें ‘3D प्रिंटिंग’ तकनीक से कुछ ही घंटों में प्रिंट करके निकाल लिया जाता है!

ज़रा सोचिए इस स्वदेशी जुगाड़ और हाइटेक दिमाग को! जहाँ अमेरिका की कंपनियों को एक रॉकेट तैयार करने में महीनों लग जाते हैं, वहां स्काईरूट जैसी भारतीय कंपनियां 3D प्रिंटर से इंजन छाप कर रातों-रात रॉकेट तैयार कर लेती हैं।

इस तकनीक ने विक्रम-1 को दुनिया के सबसे सस्ते, सबसे तेज़ और सबसे घातक रॉकेटों की लिस्ट में लाकर खड़ा कर दिया है।

एलन मस्क जो अपनी सस्ती लॉन्चिंग का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटता था, आज उसकी कंपनी की पूरी की पूरी रिसर्च टीम सिर खुजा रही है की भारत के ये 30-35 साल के लड़के इतनी खौफनाक तकनीक इतनी सस्ते में कैसे बना रहे हैं!

अमेरिका और चीन के अरबों डॉलर के स्पेस धंधे पर स्वदेशी सर्जिकल स्ट्राइक, अब सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए भारत के आगे गिड़गिड़ाएंगे विदेशी

अगर किसी को लग रहा है की ये सिर्फ एक साइंस का एक्सपेरिमेंट है, तो वो बहुत बड़ी गलतफहमी में है। ये सीधे तौर पर अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने वाली एक स्वदेशी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है।

आज की तारीख में छोटे सैटेलाइट (Small Satellites) को अंतरिक्ष में भेजने का दुनिया भर का मार्केट करीब 30 से 40 बिलियन डॉलर (अरबों डॉलर) का है।

अभी तक इस पूरे मार्केट पर कुछ गिने-चुने पश्चिमी गिद्धों का कब्ज़ा था। अमेरिका की SpaceX, रॉकेट लैब (Rocket Lab) और चीन की सरकारी एजेंसियां पूरी दुनिया से सैटेलाइट लॉन्च करने के नाम पर मुंहमांगी रकम वसूलती थीं।

अगर किसी देश या प्राइवेट कंपनी को अपना सैटेलाइट भेजना होता था, तो उसे इन गोरे लोगों के सामने महीनों तक हाथ जोड़ने पड़ते थे, करोड़ों डॉलर की फीस देनी पड़ती थी और फिर भी लॉन्च के लिए दो-दो साल की वेटिंग लिस्ट में लगना पड़ता था।

लेकिन विक्रम-1 के आते ही इन गोरों के इस अरबों डॉलर के धंधे पर सीधा हथौड़ा बज गया है। विक्रम-1 दुनिया का वो इकलौता रॉकेट बनने जा रहा है जो ‘ऑन-डिमांड लॉन्च’ (On-Demand Launch) की सुविधा देगा।

ऑन-डिमांड का मतलब समझते हैं? इसका सीधा सा मतलब है की अगर किसी देश या कंपनी को अपना सैटेलाइट भेजना है, तो उसे 2 साल इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है।

उसे बस स्काईरूट को फोन घुमाना है और भारत के ये युवा सिर्फ 24 से 72 घंटे की तैयारी के अंदर रॉकेट को लॉन्च पैड पर खड़ा करके सैटेलाइट को सीधे अंतरिक्ष की कक्षा में फेंक देंगे!

जैसे हम सड़क पर OLA-Uber कैब बुक करते हैं, वैसे ही अब अंतरिक्ष के लिए कैब बुक होगी, और उसका स्टीयरिंग भारत के हाथ में होगा।

यही कारण है की आज यूरोप, अमेरिका और पूरी दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां अब नासा और एलन मस्क को छोड़कर हैदराबाद में भारत के इन युवा स्टार्टअप्स की तरफ देख रही हैं।

उन्हें पता है की भारत का ये स्वदेशी रॉकेट ना सिर्फ सस्ता है, बल्कि दुनिया में सबसे ज़्यादा भरोसेमंद है। हमने पश्चिमी देशों के उस घमंड को तोड़ दिया है की ‘बेस्ट क्वालिटी’ सिर्फ अमेरिका में मिलती है।

अब सैटेलाइट उनका होगा, लेकिन उसे अंतरिक्ष तक पहुंचाने की चाबी हमारे पास होगी। ये भारत का वो आर्थिक महा-विस्फोट है जो आने वाले 10 सालों में पूरी दुनिया के स्पेस धंधे का कब्ज़ा भारत के हाथों में सौंप देगा।

अंतरिक्ष में गूंजेगा भारत के महान वैज्ञानिकों का डंका, विक्रम-1 के साथ आसमान में जा रहा कलाम और साराभाई का स्वर्ण राजतिलक

और भाई! कल 18 जुलाई को जब ये विक्रम-1 रॉकेट श्रीहरिकोटा से उड़ान भरेगा, तो ये खाली हाथ नहीं जाएगा। ये अपने साथ वो लेकर जा रहा है जो हर सच्चे हिंदुस्तानी की आंखों में गर्व के आंसू ला देगा।

विक्रम-1 इस उड़ान में धरती से लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (LEO) में जा रहा है।

ये अपने साथ करीब 350 से 480 किलो तक का भारी-भरकम पेलोड ले जाने की ताकत रखता है। इस बार ये अपने साथ Grahaa Space, Cosmoserve और DCubed जैसी विदेशी और देसी कंपनियों के सैटेलाइट्स लेकर जा रहा है।

लेकिन इन सैटेलाइट्स से भी बड़ी और सबसे ज़्यादा सीना चौड़ा कर देने वाली बात कुछ और है। इस ऐतिहासिक रॉकेट के अंदर एक 18 कैरेट सोने (18 Carat Gold) का ‘माइक्रो-आर्ट’ (Micro-Art) बनाकर रखा गया है।

इस सोने की कलाकृति पर भारत माता के उन तीन सबसे महान सपूतों की मूर्तियां और चेहरे उकेरे गए हैं जिन्होंने इस देश को दुनिया के सामने सीना तानकर खड़े होने की ताकत दी।

इस स्वर्ण राजतिलक में भारत के पहले नोबेल विजेता वैज्ञानिक ‘सी.वी. रमन’, हमारे स्पेस प्रोग्राम के पितामह ‘डॉ. विक्रम साराभाई’ और भारत के मिसाइल मैन ‘डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम’ की तस्वीरें हैं।

ज़रा सोचिए इस विज़न को! हमारे युवा आज अंतरिक्ष में रॉकेट भेज रहे हैं, लेकिन वो अपनी जड़ों को, अपने पुरखों को और अपने गुरुओं को भूले नहीं हैं।

ये 18 कैरेट सोने का माइक्रो-आर्ट पूरी दुनिया को भारत का वो कड़क संदेश है की हम सपेरों के देश वाले नहीं हैं! हम वो लोग हैं जिन्होंने दुनिया को शून्य (Zero) दिया था, जिन्होंने सबसे पहले ग्रहों और नक्षत्रों की सटीक चाल खोजी थी।

आज हम फिर से अपने उसी सनातन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के दम पर अंतरिक्ष पर राज करने निकल पड़े हैं। कल जब 11:30 बजे काउंटडाउन शुरू होगा, तो आसमान भी भारत माता की जय के नारों से गूंज उठेगा!

देश के युवाओं के लिए खुले अंतरिक्ष के दरवाज़े, भारत सरकार का वो मास्टरस्ट्रोक जिसने ‘प्राइवेट’ कंपनियों और इंजीनियरों को दी पूरी आज़ादी

अब ज़रा इस पूरे गेम-चेंजर मूवमेंट के पीछे की उस ज़मीनी हकीकत को समझिए जिसने इस असंभव सपने को मुमकिन कर दिखाया है।

आज से कुछ साल पहले, यानी 2020 से पहले तक अगर आप इस देश में किसी से भी ‘अंतरिक्ष’ या ‘रॉकेट’ की बात करते थे, तो दिमाग में सिर्फ एक ही नाम आता था- इसरो (ISRO)!

इस देश में एक ऐसा सड़ा हुआ और पुराना सिस्टम चला आ रहा था जहाँ रॉकेट बनाना और सैटेलाइट लॉन्च करना सिर्फ और सिर्फ सरकार के हाथ में था।

अगर कोई प्राइवेट कंपनी या कोई नौजवान इंजीनियर अपना रॉकेट बनाना भी चाहे, तो उसे सरकारी फाइलों, बाबूगिरी और लाइसेंस राज के उस चक्रव्यूह में उलझा कर रख दिया जाता था।

लेकिन भाई, जब नीयत साफ हो और सीने में देश को सुपरपावर बनाने की आग हो, तो सारे नियम बदल दिए जाते हैं।

भारत सरकार ने 2020 के बाद और फिर ‘इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023’ के ज़रिए एक ऐसा ऐतिहासिक मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने रातों-रात भारत के स्पेस सेक्टर की जंजीरें तोड़ कर रख दीं।

सरकार ने IN-SPACe नाम की एक नई संस्था बनाई और डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “अब भारत का अंतरिक्ष सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि इस देश के हर उस युवा का है जिसके अंदर आसमान चीरने का जज़्बा है!”

और सबसे ज़्यादा सीना चौड़ा तो तब होता है जब हम अपने इसरो (ISRO) का बड़प्पन देखते हैं। दुनिया के बाकी देशों में क्या होता है?

अमेरिका में जब एलन मस्क ने स्पेसएक्स (SpaceX) शुरू की थी, तो नासा (NASA) और वहां की पुरानी कंपनियों ने उसे कुचलने की पूरी कोशिश की थी।

लेकिन हमारे भारत में देखिए! हमारा इसरो किसी घमंडी राजा की तरह नहीं, बल्कि एक ‘पिता’ की तरह इन प्राइवेट स्टार्टअप्स का हाथ पकड़कर उन्हें चलना सिखा रहा है।

कल 18 जुलाई को जब स्काईरूट का विक्रम-1 लॉन्च होगा, तो वो किसी प्राइवेट मैदान से नहीं, बल्कि इसरो के श्रीहरिकोटा वाले उसी ऐतिहासिक ‘फर्स्ट लॉन्च पैड’ से उड़ान भरेगा जहाँ से हमारे सरकारी रॉकेट जाते हैं।

इसरो ने अपनी सालों की रिसर्च, अपनी टेस्टिंग सुविधाएं और अपना पूरा लॉन्च पैड इन 25-30 साल के लड़कों के लिए खोल कर रख दिया है।

ये कोई छोटी बात नहीं है! इसरो जानता है की अगर भारत को अंतरिक्ष का सरताज बनना है, तो हमें एक नहीं, बल्कि 100 नए इसरो खड़े करने होंगे।

ये उस ‘न्यू इंडिया’ का सच है जहाँ सरकार और प्राइवेट युवा मिलकर विदेशी ताकतों से लड़ने के लिए एक साथ खड़े हैं।

चीन के खौफनाक सरकारी स्पेस प्रोग्राम की उड़ी नींद, भारत के स्वदेशी ‘स्टार्टअप्स’ ने ड्रैगन के छक्के छुड़ा कर आसमान में गाड़ा तिरंगा

अगर अमेरिका और नासा की हालत खराब है, तो ज़रा उस लाल ड्रैगन यानी चीन की बौखलाहट भी देख लीजिए।

चीन का जो पूरा का पूरा स्पेस प्रोग्राम है, वो पूरी तरह से वहां की खूंखार मिलिट्री- ‘पीएलए’ (PLA – People’s Liberation Army) की मुट्ठी में कैद है।

वहां की कोई प्राइवेट कंपनी अपनी मर्ज़ी से एक सुई भी अंतरिक्ष में नहीं भेज सकती। चीन का सारा सिस्टम एकदम बंद, तानाशाही और खौफ से भरा हुआ है।

वो दुनिया से अपना डेटा छुपाते हैं और सस्ते के नाम पर कबाड़ रॉकेट लॉन्च करके दुनिया भर के देशों को अपने कर्ज़ के जाल में फंसाने की साज़िश रचते हैं।

चीन को लगता था की छोटे सैटेलाइट लॉन्च करने के मार्केट में वो अमेरिका को पछाड़ कर ‘मोनोपॉली’ बना लेगा।

लेकिन ड्रैगन की इस पूरी की पूरी चालाकी पर हमारे भारतीय लड़कों ने ऐसा हथौड़ा मारा है की बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग के पसीने छूट गए हैं।

चीन को सपने में भी अंदाज़ा नहीं था की भारत के स्वदेशी स्टार्टअप्स इतनी भयंकर स्पीड से आगे बढ़ेंगे।

ज़रा याद कीजिए, मई 2024 में ही भारत की एक और धाकड़ प्राइवेट कंपनी ‘अग्निकुल कॉसमॉस’ (Agnikul Cosmos) ने दुनिया का पहला 3D प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन वाला रॉकेट (अग्निबाण) लॉन्च करके इतिहास रच दिया था।

चीन के वैज्ञानिक मुंह फाड़े देखते रह गए की भारत के लड़कों ने ये कैसी अचूक तकनीक बना ली। और अब सिर्फ दो साल के अंदर, स्काईरूट की टीम अपना ऑर्बिटल रॉकेट (विक्रम-1) सीधे अंतरिक्ष की कक्षा में डाल रही है।

भारत का मॉडल चीन की तरह खौफनाक और छुपा हुआ नहीं है। हमारा मॉडल पूरी तरह से पारदर्शी है।

हमारे युवा दुनिया को अपनी तकनीक दिखा रहे हैं और यही कारण है की आज दुनिया भर के देश चीन के सरकारी और सैन्य रॉकेटों पर भरोसा करने के बजाय भारत की इन प्राइवेट कंपनियों के पास आने को तैयार हैं।

चीन को सबसे बड़ा डर ये सता रहा है की भारत की ये स्वदेशी तकनीक इतनी सस्ती और मारक है की ये आने वाले 5 सालों में चीन के पूरे कमर्शियल स्पेस धंधे का दिवाला निकाल कर रख देगी।

ड्रैगन जो आसमान पर कब्ज़ा करना चाहता था, आज भारत के इन स्वदेशी शेरों की दहाड़ सुनकर अपनी गुफा में दुबकने पर मजबूर हो गया है।

बदलने वाली है ‘अंतरिक्ष’ की दुनिया में भारत की तकदीर

जब कल सुबह 11:30 बजे काउंटडाउन शुरू होगा, तो ये लॉन्च उन करोड़ों भारतीय युवाओं के लिए एक सीधी ललकार है जो आज भी सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) जाकर किसी अमेरिकी कंपनी में नौकर बनने का सपना देखते हैं।

अरे दोस्त, अमेरिका की गुलामी छोड़ो, असली क्रांति तो यहाँ हो रही है। यहाँ के युवा अपने ही देश में रहकर, अपने ही संसाधनों से ऐसे रॉकेट बना रहे हैं जो दुनिया के बड़े-बड़े अरबपतियों की नींदें उड़ा रहे हैं।

आने वाला दशक सिर्फ और सिर्फ भारत का है। चाहे वो इंटरनेट के लिए सैटेलाइट लॉन्च करना हो, सेना के लिए सर्विलांस (Surveillance) सैटेलाइट लगाना हो, या फिर आसमान से दुश्मन पर नज़र रखना हो।

हमें हमेशा ये कहकर ज़लील किया जाता था की हम ‘थर्ड वर्ल्ड’ (Third World) के गरीब लोग हैं। हम तो बस दूसरों की बनाई हुई तकनीक को खरीदने वाले लोग हैं।

कल विक्रम-1 उस पूरे विदेशी इकोसिस्टम के गाल पर वो हंटर मारेगा जो सालों तक हमारा मज़ाक उड़ाता रहा।

अब हमें किसी NASA या यूरोपीय एजेंसी के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। अब हमारे पास अपना ISRO भी है और हमारे पास Skyroot और Agnikul जैसे हमारे खुद के प्राइवेट बाहुबली भी हैं।

वंदे मातरम!

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