देवभूमि में 'लैंड-जिहाद' का मकड़जाल, हरिद्वार से केदारनाथ की पहाड़ियों तक अवैध मजारों की बाढ़, क्या उत्तराखंड को 'मिनी पाकिस्तान' बनाने की तैयारी

देवभूमि में ‘लैंड-जिहाद’ का मकड़जाल, हरिद्वार से केदारनाथ की पहाड़ियों तक अवैध मजारों की बाढ़, क्या उत्तराखंड को ‘मिनी पाकिस्तान’ बनाने की तैयारी

क्या आपने कभी सोचा था की जिस उत्तराखंड की देवभूमि की मिट्टी को हम माथे से लगाते हैं, जहाँ हर कदम पर देवी-देवताओं का पहरा है, वहां रातों-रात सड़कों के किनारे मज़ारें उग आएंगी? ये कोई डरावना सपना नहीं है, ये आज का कड़वा सच है।

हमारे शांत पहाड़ों पर, जहाँ सिर्फ गंगा की लहरों और मंदिर की घंटियों की आवाज़ आती थी, वहां मुसलमानों का खामोश कब्जा चल रहा है। और हम? हम तो ‘भाईचारे’ की अफीम खाकर सोए हुए हैं।

सीधी और सपाट बात ये है की उत्तराखंड में लैंड जिहाद अब कोई ढकी-छिपी बात नहीं रही। ये एक ऐसा जाल है जो बहुत ही शातिर तरीके से बिछाया गया है। इसे आप ‘मज़ार जिहाद’ कहिए या जमीन हड़पने का इस्लामिक तरीका, पर असलियत तो यही है की हमारी देवभूमि के भूगोल को बदलकर ‘मिनी पाकिस्तान’ बनाने की पूरी तैयारी हो गयी है।

नैनीताल के घने जंगलों से लेकर हरिद्वार की पवित्र गलियों तक, जहाँ देखो वहां हरे कपड़े वाली मज़ारें खड़ी कर दी गई हैं। सच तो ये है की अगर आज हम नहीं चेते, तो आने वाली नस्लें हमसे पूछेंगी की जब केदारनाथ की पहाड़ियों तक ये चादरें पहुँच रही थीं, तब हम क्या कर रहे थे?

रातों-रात उग आती हैं अवैध मज़ारें और फिर शुरू होता है हिन्दुओं की ज़मीन लूटने का ”लैंड-जिहाद”

अगर आप सोच रहे हैं की कोई मुसलमान आता है और पैसे देकर ज़मीन खरीद कर कब्ज़ा कर लेता है, तो आप बहुत भोले हैं। ये पूरी स्क्रिप्ट किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। इनका काम करने का तरीका बिल्कुल स्लीपर सेल जैसा होता है। शुरुआत होती है एकदम खामोशी से।

मान लीजिए की जंगल के बीचों-बीच या किसी हाईवे के किनारे एक खाली सरकारी ज़मीन पड़ी है। वहां रातों-रात कुछ ईंटें रखी जाएंगी। अगले दिन आप देखेंगे की उन ईंटों के ऊपर एक हरी चादर चढ़ा दी गई है और अगरबत्ती जल रही है।

अब मज़ाक देखिए, कुछ ही दिनों में आस-पास के गांवों में ये अफवाह फैला दी जाती है की ये तो किसी ‘प्राचीन पीर बाबा’ की मज़ार है! मन्नतें पूरी होती हैं जी यहां! अब हमारा हिंदू समाज ठहरा स्वभाव से ही भावनात्मक और बेवक़ूफ़। जहां दो अगरबत्ती दिखीं, वहां हाथ जोड़ लिए। बस, इसी भोलेपन का फायदा उठाया जाता है।

जब कोई इस ढांचे का विरोध नहीं करता, तो धीरे-धीरे वहां कंक्रीट और सीमेंट का पक्का निर्माण शुरू हो जाता है। एक बड़ा सा दान-पात्र लग जाता है। फिर मज़ार की देखभाल के नाम पर कहीं बाहर से एक ‘खादिम’ आता है और वहीं डेरा डाल लेता है।

देखते ही देखते उसके रिश्तेदार भी आ जाते हैं, आस-पास छोटी-छोटी दुकानें-वुकानें खुल जाती हैं, और जो ज़मीन कभी वन विभाग या सरकार की थी, वहां मुस्लिम समुदाय की पूरी की पूरी बस्ती बस जाती है।

फिर शुरू होता है वोट बैंक का खेल। तुष्टिकरण वाली पिछली सरकारें इन लोगों के फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड ऐसे बांटती थीं जैसे प्रसाद बंट रहा हो। एक बार कागज़-वागज़ बन गए, तो फिर प्रशासन भी इन्हें हटाने से कतराने लगता है।

कमाल की बात तो तब सामने आई जब पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने इन मज़ारों पर अपना एक्शन शुरू किया। ज़रा सोचिए, जब प्रशासन ने बुलडोज़र चलाकर इन सैकड़ों तथाकथित ‘प्राचीन’ मज़ारों को तोड़कर गिराया और नीचे खुदाई की, तो क्या मिला? कंकाल तो दूर की बात है, इंसान की एक हड्डी का टुकड़ा तक नहीं निकला!

मतलब, ये कोई पुराने मज़ार या कब्रिस्तान थे ही नहीं। ये शुद्ध रूप से जिहादियों का ज़मीन हड़पने का एक निहायत ही घटिया जुगाड़ था। धर्म की आड़ लो, हरी चादर ओढ़ाओ, और करोड़ों की सरकारी ज़मीन डकार जाओ। इसे लैंड जिहाद न कहें तो और क्या कहें?

केदारनाथ से लेकर हरिद्वार तक मुस्लिम घुसपैठ और देवभूमि में मज़ार जिहाद का खौफनाक जाल

पहले तो लोगों को लगता था की ये समस्या सिर्फ मैदानी इलाकों की है। हरिद्वार, हल्द्वानी या उधम सिंह नगर तक ही सीमित है। लेकिन अब जो आंकड़े और घटनाएं सामने आ रही हैं, वो सच में किसी की भी रातों की नींद उड़ा दें। ये ‘मज़ार जिहाद’ अब खिसकते-खिसकते सीधे ऊपरी हिमालय तक पहुंच गया है।

चार धाम यात्रा के रूट को ही ले लीजिए। बद्रीनाथ और केदारनाथ के जिन रास्तों पर कभी सिर्फ ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ गूंजता था, वहां आज आपको अचानक कई अपरिचित मुस्लिम चेहरे ढाबे और पंक्चर की दुकानें चलाते हुए मिल जाएंगे।

इन दुकानों के ठीक पीछे आपको कोई न कोई इस्लामिक ढांचा खड़ा दिख जाएगा। ये शुद्ध रूप से सनातन धर्म की भूमि है! वहां इतिहास में कभी कोई इस्लामी साया तक नहीं रहा, फिर ये अचानक वहां से कैसे प्रकट हो रहे हैं?

यही वजह है की बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) को आखिरकार एक कड़ा फैसला लेना पड़ा। उन्होंने प्रस्ताव पास कर दिया की उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले 47 मंदिरों और परिसरों में नॉन-हिंदुओं (गैर-सनातनियों) की एंट्री पर पूरी तरह से बैन लगेगा।

और ये बिल्कुल सही फैसला है! जब मक्का-मदीना में आप गैर-मुस्लिमों को फटकने नहीं देते, तो हिंदू अपने पवित्रतम धामों को बचाने के लिए कड़े नियम क्यों न बनाएं? ये कोई असहिष्णुता नहीं है, ये आत्मरक्षा है।

और जंगलों का हाल तो पूछिए ही मत। उत्तराखंड के फॉरेस्ट लॉ इतने सख्त हैं की कोई आम पहाड़ी अपनी ज़रूरत के लिए जंगल से सूखी लकड़ी भी उठा ले, तो वन विभाग वाले उसका चालान काट देते हैं, कोर्ट-कचहरी के चक्कर कटवा देते हैं।

लेकिन कॉर्बेट नेशनल पार्क (Jim Corbett) और कालसी के जंगलों के बीचों-बीच रातों-रात पक्की मज़ारें और ‘कब्रिस्तान’ खड़े हो गए, और किसी को भनक तक नहीं लगी! आम आदमी तो बिना परमिट वहां परिंदा भी नहीं मार सकता, तो फिर ये ट्रकों भर कंक्रीट और ईंटें जंगल के अंदर कैसे पहुंच गईं? साफ़ है की सिस्टम के अंदर बैठे कुछ जयचंदों की पूरी मिलीभगत थी।

आपको देहरादून के पॉश ‘दून स्कूल’ वाला किस्सा तो याद ही होगा। नवंबर 2024 में इस हाई-फाई और वीआईपी स्कूल के कैंपस के ठीक अंदर से एक अवैध मज़ार पकड़ी गई।

ज़रा सोचिए, जहां देश के बड़े-बड़े नेताओं और अरबपतियों के बच्चे पढ़ते हैं, जहां की सिक्योरिटी इतनी टाइट होती है, वहां भी इनका जिहादी इकोसिस्टम पहुंच गया! वो तो भला हो हमारे बजरंग दल और स्थानीय हिंदू संगठनों के युवाओं का, जिन्होंने वहां ज़बरदस्त बवाल काटा और प्रशासन को मजबूर कर दिया की उस ढांचे को उखाड़ फेंके।

आंकड़े गवाह हैं कि कैसे मज़ार जिहाद और लव जिहाद के जरिए सीधे हिन्दू समाज पर हमला किया गया

वामपंथी और छद्म-सेक्युलर गैंग हमेशा कहता है की “ये भाजपाइयों का फैलाया हुआ भ्रम है, ऐसा कुछ नहीं हो रहा।” तो चलो, ज़रा आंकड़ों पर बात कर लेते हैं। आंकड़े तो झूठ नहीं बोलते ना? मई 2023 तक धामी सरकार ने जब सर्वे कराया, तो पूरे राज्य में 3,793 अवैध इस्लामिक ढांचे पकड़े गए।

नैनीताल में अकेले 1,433 केस! हरिद्वार में 1,149 अवैध कब्ज़े! चलिए, ये तो फिर भी नीचे के इलाके हैं, लेकिन चमोली जैसे एकदम शुद्ध पहाड़ी और बॉर्डर वाले ज़िले में 423 मामले सामने आए! अल्मोड़ा और टिहरी तक में ये घुसपैठ पहुंच चुकी है। मतलब हद ही हो गई है!

ये सिर्फ एक ज़मीन के टुकड़े का जाना नहीं है। ये सीधे तौर पर पहाड़ की डेमोग्राफी को बदलने का एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है। आप पहाड़ के किसी भी छोटे कस्बे में चले जाइए, आज आपको वहां फेरी लगाने वाले, कबाड़ी वाले, नाई और फल बेचने वाले ज़्यादातर लोग बाहरी राज्यों से आए हुए मुसलमान ही मिलेंगे। इनमें से कई तो संदिग्ध रोहिंग्या और बांग्लादेशी तक हैं जिन्हें कोई पूछने वाला नहीं।

इस भारी घुसपैठ ने पहाड़ में दो नई बीमारियों को जन्म दिया है- ‘व्यापार जिहाद’ और ‘लव जिहाद’। पहले ये लोग छोटे-मोटे काम करके वहां की इकॉनमी पर कब्ज़ा जमाते हैं, मार्केट में सिंडिकेट बना लेते हैं। और फिर शुरू होता है पहाड़ की भोली-भाली बेटियों को अपने जाल में फंसाने का गंदा खेल। नाम बदलकर या पैसे का लालच देकर हिंदू लड़कियों को फंसाया जाता है।

उत्तरकाशी के पुरोला में जो कुछ भी हुआ, वो इसी का नतीजा था। वहां लव जिहाद की घटनाओं ने पानी सिर के ऊपर कर दिया था। अब आप ही बताइए, जब कोई बाहरी इंसान आकर आपकी बहन-बेटियों की इज़्ज़त पर हाथ डालेगा, तो क्या पहाड़ का आदमी चुपचाप तमाशा देखेगा? पुरोला वालों का खून खौल उठा।

उन्होंने बाकायदा एक्स (X) के निशान लगाकर इन जिहादियों को अल्टीमेटम दे दिया की “या तो पहाड़ छोड़ो, या फिर अंजाम भुगतने को तैयार रहो।” दिल्ली के लुटियंस मीडिया ने पुरोला के हिंदुओं को विलेन बनाने की बहुत कोशिश की, उन्हें ‘अत्याचारी’ कहा, लेकिन हकीकत यही है की जब राज्य और कानून सो रहे होते हैं, तो समाज को अपनी रक्षा के लिए खुद ही डंडा उठाना पड़ता है।

हिन्दुओं के रक्षक धामी का गरजा बुलडोज़र और मज़ार जिहाद की कमर तोड़ता ऐतिहासिक प्रहार

खैर, देर आए दुरुस्त आए। जब हालात बद से बदतर हो रहे थे, तब पुष्कर सिंह धामी के रूप में उत्तराखंड को एक ऐसा मुख्यमंत्री मिला जिसने तुष्टिकरण की राजनीति को सीधा कूड़ेदान में डाल दिया।

धामी जी ने साफ कर दिया की “उत्तराखंड में लैंड जिहाद और मज़ार जिहाद किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” और ये सिर्फ कोई खोखला राजनीतिक बयान नहीं था। इसके बाद ज़मीन पर जो एक्शन हुआ, उसने वाकई पूरे देश को हिला कर रख दिया।

धामी सरकार ने राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा एंटी-एन्क्रोचमेंट (अतिक्रमण हटाओ) अभियान चलाया। बिना किसी की परवाह किए, प्रशासन ने वन विभाग और राजस्व विभाग की 5000 एकड़ से ज़्यादा सरकारी ज़मीन को इन जिहादी भू-माफियाओं के चंगुल से छुड़ा लिया!

5000 एकड़ कोई मज़ाक नहीं होता दोस्त! ये वो ज़मीनें थीं जिन पर सालों-साल से कुंडली मारकर बैठे ये लोग खुद को खुदा समझने लगे थे।

सरकार ने ड्रोन और सैटेलाइट की मदद से जंगलों में छुपी हुई 500 से ज़्यादा अवैध मज़ारों को ढूंढ निकाला और उन पर सीधा बुलडोज़र चला दिया। एकदम क्लीन बोल्ड! मज़ारें ऐसे ढहीं जैसे ताश के पत्ते। और ये एक्शन कोई हवा-हवाई नहीं था। बाकायदा कानूनी प्रक्रिया फॉलो की गई।

प्रशासन ने नोटिस दिया की भाई, अगर ये जगह तुम्हारी है तो रजिस्ट्री दिखाओ, कागज़-वागज़ दिखाओ। ज़ाहिर सी बात है, 99 प्रतिशत लोगों के पास कोई कागज़ था ही नहीं क्योंकि ज़मीन तो चोरी की थी। जब दस्तावेज़ नहीं मिले, तभी सुप्रीम कोर्ट के नियमों के हिसाब से बुलडोज़र गरजे।

इतना ही नहीं, धामी सरकार ने देश का सबसे तगड़ा एंटी-कन्वर्जन लॉ (धर्मांतरण विरोधी कानून) भी लागू कर दिया। अब अगर कोई मुस्लिम धोखे से या ज़बरदस्ती किसी हिन्दू लड़की का धर्म बदलवाता पकड़ा गया, तो सीधा 10 साल के लिए अंदर जाएगा।

साथ ही, दंगा रोधी कानून भी आ गया है। अब अगर कोई दंगाई सरकारी या प्राइवेट प्रॉपर्टी तोड़ेगा, तो उसके बाप की संपत्ति कुर्क करके भरपाई की जाएगी। अब उत्तराखंड इनके लिए कोई सॉफ्ट टारगेट नहीं रहा।

मुस्लिम घुसपैठियों के बचाव में वामपंथियों का रोना और वक्फ बोर्ड का भयानक हिंदू-विरोधी पाखंड

अब ज़ाहिर सी बात है, जब भी सनातनी समाज अपने हक और अपनी ज़मीन के लिए खड़ा होता है, तो एक खास इकोसिस्टम के पेट में दर्द शुरू हो ही जाता है।

जैसे ही देवभूमि में बुलडोज़र चले, लुटियंस दिल्ली के पत्रकार, उनके एनजीओ और वो जो विदेशी फंड पर पलने वाले ‘बुद्धिजीवी’ हैं, सब एक सुर में रोने लगे। दशकों तक जब मुस्लिमों द्वारा पहाड़ की ज़मीन हड़पी जा रही थी, जनसांख्यिकी बदली जा रही थी, जिम कॉर्बेट के इकोसिस्टम की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब इन पर्यावरण प्रेमियों और सेक्युलर पत्रकारों की ज़बान पर ताला लगा था।

लेकिन जैसे ही अवैध मज़ारों पर हथौड़ा चला, अचानक इन्हें ‘इस्लामोफोबिया’ दिखने लगा। रातों-रात इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ अभियान करार दे दिया गया। ये इनका सबसे पुराना और घिनौना ‘विक्टिम कार्ड’ है।

पहले गैरकानूनी तरीके से कब्ज़ा करो, वहां एक धार्मिक ढांचा तान दो, और जब पुलिस डंडा लेकर आए तो अल्पसंख्यक होने का रोना रोने लगो। मुख्यमंत्री धामी ने बिल्कुल सटीक बात कही थी की पिछली कांग्रेस सरकारों ने सिर्फ अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए इन अतिक्रमणकारियों को सिर पर बिठा रखा था।

और इसमें एक और बहुत खतरनाक खेल चल रहा है ‘वक्फ बोर्ड’ का। इन कट्टरपंथी संगठनों की हिम्मत तो देखिए, हर खाली पड़ी ज़मीन और पुरानी मज़ार को अपनी प्रॉपर्टी बता देते हैं! भारत का वक्फ कानून अपने आप में इतना अजीब है की ये किसी भी चीज़ पर उंगली रखकर उसे वक्फ की संपत्ति घोषित कर सकते हैं।

मज़ार जिहाद का अल्टीमेट गोल यही होता है की पहले जंगल में मज़ार बनाओ, और कुछ साल बाद उसे वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दो। एक बार वक्फ की मुहर लग गई, तो फिर भारत सरकार के पसीने छूट जाते हैं उसे वापस लेने में। लेकिन वामपंथी मीडिया इस भयानक साजिश पर कभी चर्चा नहीं करेगा। उन्हें तो बस हिंदुओं को असहिष्णु साबित करने की सुपारी मिली हुई है।

जाग जाओ हिन्दू समाज क्योंकि मज़ार जिहाद के खिलाफ अपनी देवभूमि बचाने का असली युद्ध अभी बाकी है

ये सच है की धामी सरकार का एक्शन ज़बरदस्त है, लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए की ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। ये जिहादी भू-माफिया और कट्टरपंथी ताकतें इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं। ये नए तरीके खोजेंगे, नए जुगाड़ लगाएंगे।

इसलिए सनातनी समाज को अब हमेशा के लिए जागना होगा। हमारे स्थानीय हिंदू संगठनों, बजरंग दल और ‘उत्तराखंड रक्षा अभियान’ जैसे लोगों ने गांव-गांव जाकर जो जागरूकता फैलाई है, उसे रुकने नहीं देना है।

आज उत्तराखंड का हर युवा एक ही मांग कर रहा है- हमें एक बहुत ही तगड़ा और सख्त भू-कानून चाहिए। बिल्कुल वैसा ही जैसा हिमाचल प्रदेश में है (धारा 118)। जब तक बाहरी लोगों के अंधाधुंध ज़मीन खरीदने पर पूरी तरह से रोक नहीं लगेगी, तब तक देवभूमि का मूल स्वरूप नहीं बचेगा।

इसके साथ ही, पुलिस और प्रशासन को चेकिंग-वेकिंग का अभियान बहुत सख्त करना होगा। बाहर से जो भी मज़दूर, फेरी वाला या दुकानदार पहाड़ पर आ रहा है, उसका पूरा पुलिस वेरिफिकेशन होना चाहिए।

उसका बैकग्राउंड चेक करो की कहीं वो जिहादी रोहिंग्या या घुसपैठिया तो नहीं! मकान मालिकों को भी समझना होगा यार, चंद रुपयों के लालच में किसी भी अनजान आदमी को कमरा किराए पर मत दो। कल को वही आदमी तुम्हारे ही घर की शांति भंग करेगा।

खैर, आखिरकार ये बात सबको समझनी होगी की उत्तराखंड कोई धर्मशाला नहीं है जहां जो चाहे, जब चाहे आकर कब्ज़ा कर ले। ये देवताओं की भूमि है, वीरों और तपस्वियों की भूमि है। कश्मीर का जो हाल हुआ, वो हम सबने देखा है।

जब डेमोग्राफी बदलती है ना, तो सबसे पहले आपकी संस्कृति और सभ्यता ही तबाह होती है। अगर हिमालय की शांति और पवित्रता छिन गई, तो पूरे भारत में सनातन धर्म के लिए कोई सुरक्षित कोना नहीं बचेगा।

धामी जी ने जो 5000 एकड़ ज़मीन छुड़ाई है और जो 500 से ज़्यादा मज़ारें तोड़ी हैं, वो सिर्फ एक शुरुआत है। जब तक ये लैंड जिहाद, लव जिहाद और व्यापार जिहाद जड़ से खत्म नहीं हो जाते, हमें आंखें खुली रखनी होंगी। देवभूमि अपनी रक्षा करना जानती है, और अब पहाड़ शांत नहीं बैठेगा!

जय बद्रीविशाल! जय केदार! जय देवभूमि!

Scroll to Top