UP में बुलडोज़र चला, अब देश चलाने की बारी, योगी ही हैं भारत की अगली जरुरत

बुलडोज़र चलेगा, तभी तो भारत बढ़ेगा! जिहादियों की कमर तोड़ने, देश को आगे बढ़ाने के लिए योगी ही देश की अगली जरुरत

सच कहूं तो आज हमारा देश एक बहुत ही अहम मोड़ पर खड़ा है। हमें ये तय करना है की क्या हम अपनी असली हिन्दू पहचान और जड़ों से जुड़कर दुनिया पर राज करेंगे, या फिर उसी पुराने तुष्टिकरण, जातिवाद और फर्जी सेक्युलरिज्म के भंवर में गोते लगाते रहेंगे?

यूपी का बदलना सिर्फ एक राज्य के विकास की कहानी नहीं है। ये इस बात का सबसे बड़ा सबूत है की जब किसी सूबे की कमान एक ऐसे संन्यासी के हाथ में होती है- जिसका आगे-पीछे कोई नहीं है, जिसे न तो अपना घर भरना है, न अपनी आने वाली सात पुश्तों के लिए बैंक बैलेंस बनाना है, और जिसके लिए पूरा का पूरा राज्य ही उसका परिवार है- तो ज़मीन पर कैसे चमत्कार होते हैं। 

बाहरी दुश्मनों से तो हमारी सेना निपट लेगी, लेकिन देश के भीतर जो जयचंद बैठे हैं, जो जिहादी मानसिकता पनप रही है, उनसे निपटने के लिए योगी आदित्यनाथ जैसा ही निडर नेतृत्व चाहिए। 

योगी जी ने ये साबित कर दिया है की सत्ता की कुर्सी मलाई खाने के लिए नहीं होती, बल्कि समाज के अंदर घुसे कीड़ों और कंटकों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए होती है। उनका जो हिंदुत्व के प्रति कमिटमेंट है, विकास का जो विज़न है, और इंसाफ करने का जो ठेठ ‘बुलडोज़र तरीका’ है- कुल मिलाकर यही वो पूरा पैकेज है, जिसकी आज पूरे देश को सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

आज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘बुलडोज़र मॉडल’ पूरे देश के लिए राष्ट्रवाद, कड़े प्रशासन, सनातनी गौरव और बेखौफ विकास का एक जीता-जागता और एकदम परफेक्ट ‘टेम्पलेट’ बन चुका है। 

जो लोग ‘नेशन फर्स्ट’ यानी राष्ट्र-प्रथम की नीति में यकीन रखते हैं, उनका साफ मानना है की अब भारत को इसी योगी मॉडल की सख्त ज़रूरत है।

मुस्लिम माफियाओं का गुरूर, खौफ का वो दौर और योगी का बुलडोज़र वाला इंसाफ

बुलडोज़र… आज की तारीख में ये सिर्फ कोई लोहे और भारी-भरकम टायरों वाली मशीन थोड़ी रह गया है! ये तो भारतीय राजनीति में इंसाफ, ऑन-द-स्पॉट एक्शन और सरकार के ‘खौफ’ का सबसे बड़ा सिंबल बन चुका है।

ज़रा याद कीजिए 2017 से पहले का वो उत्तर प्रदेश। कैसा माहौल था तब? सत्ता के गलियारों में मुस्लिम बाहुबलियों, गुंडे-मवालियों और अपराधियों की ही तूती बोलती थी। लाल बत्ती की गाड़ियों में बैठकर जब ये माफिया निकलते थे, तो थानों में बैठे पुलिसवालों के हाथ-पांव फूल जाते थे।

अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे नाम तो बस बानगी भर थे। इन लोगों ने सिर्फ अपना खौफ ही कायम नहीं किया था, बल्कि बाकायदा एक पैरेलल सरकार चला रखी थी।

आम जनता, सीधे-सादे व्यापारियों और खासकर हिन्दू समाज की ज़मीनें दिनदहाड़े कब्ज़ा ली जाती थीं और सिस्टम चुपचाप मुंह सिलकर तमाशा देखता रहता था। सबसे ज्यादा खून तो तब खौलता था, जब सेक्युलर राजनीति के नाम पर इन क्रिमिनल्स को बाकायदा राजनीतिक संरक्षण मिलता था। इन्हें ‘रॉबिनहुड’ बनाकर पेश किया जाता था।

लेकिन फिर गेम पलटा। योगी जी ने कुर्सी संभाली और आते ही सिस्टम की खटिया खड़ी कर दी। उन्होंने एकदम साफ कर दिया की क्रिमिनल चाहे किसी भी मज़हब का हो, किसी भी जाति का हो या उसकी राजनीतिक पहुंच कितनी भी ऊपर तक क्यों न हो- अब हिसाब बराबर होगा। क्राइम और क्रिमिनल्स के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की ऐसी नीति आई की बड़े-बड़े तुर्रम खानों के पसीने छूट गए।

देखते ही देखते, दशकों से जमे इन माफियाओं के अरबों के साम्राज्य मिट्टी में मिला दिए गए। प्रयागराज हो, मऊ हो, गाजीपुर हो या लखनऊ… जहां-जहां अवैध संपत्तियां खड़ी की गई थीं, वहां-वहां सरकार का बुलडोज़र ऐसा गरजा की उसकी आवाज़ पूरे देश में सुनी गई।

और सबसे कमाल की बात क्या रही? सरकार ने सिर्फ इन जमीनों को खाली ही नहीं कराया, बल्कि उन पर गरीबों के लिए घर बनवा दिए। ये कोई छोटी बात नहीं थी। ये उस अहंकार को चकनाचूर करना था जो दशकों की तुष्टिकरण की कोख से पैदा हुआ था।

इस तगड़े और बेखौफ एक्शन का ज़मीन पर ऐसा असर दिखा की जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। जिन अपराधियों के नाम से कभी इलाके में कर्फ्यू लग जाता था, वो खुद गले में तख्ती लटका कर थानों में सरेंडर करने पहुंचने लगे की “भैया, हमें गिरफ्तार कर लो, हमें जेल में डाल दो, बस हमारा एनकाउंटर मत करना!” ये वो खौफ था, ये वो राज्य का इकबाल था, जो दशकों से गायब था।

दंगाइयों का घर नीलाम कर भारत को जगाने वाला इकलौता भगवा शासक

ये तो बहुत सीधी सी बात है की जहां गुंडा-गर्दी, दंगे-फसाद और फिरौती का धंधा चलेगा, वहां कोई भी इन्वेस्टर अपना पैसा क्यों लगाएगा? क्यों कोई वहां फैक्ट्री खोलेगा? दशकों तक यूपी की इमेज पूरे देश में एक ‘बीमारू’ राज्य की रही।

कोई यूपी वाला अगर काम की तलाश में मुंबई या दिल्ली जाता, तो उसे अजीब नज़रों से देखा जाता था। आए दिन होने वाले दंगे, किडनैपिंग का पूरा का पूरा उद्योग और महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़- इन सबने राज्य की इमेज को रसातल में पहुंचा दिया था।

पर आज तस्वीर देखिए। एकदम पलट चुकी है। “ना कर्फ्यू, ना दंगा, यूपी में सब चंगा”- ये लाइन अब सिर्फ नेताओं के भाषणों में तालियां पीटने के लिए नहीं है, बल्कि ज़मीन पर सच में दिख रही है।

सीएम बनते ही योगी जी ने सबसे पहले पुलिस के हाथ खोले। उन्हें फ्री हैंड दिया गया। दशकों से फाइलों में अटकी पड़ी पुलिस की भर्तियों को निकाला गया और बिना किसी सिफारिश या घूसखोरी के डेढ़ लाख से ज्यादा भर्तियां हुईं। पीएसी (PAC) की जिन कंपनियों को पिछली सरकारों ने अपने मुस्लिम वोट-बैंक को खुश करने के लिए बंद कर दिया था, उन्हें दोबारा चालू किया गया।

और महिलाओं की सुरक्षा? इसके लिए तो ‘एंटी-रोमियो स्क्वॉड’ ही काल बन गया। पहले लड़कियों का शाम को ट्यूशन जाना या बाज़ार निकलना मुहाल था। चौराहे पर खड़े मनचले फब्तियां कसते थे और कोई कुछ नहीं बोलता था। आज यूपी की लड़कियां रात में भी टेंशन-फ्री होकर घर से बाहर निकल सकती हैं। मजे की बात ये है कि अब चौराहे पर पुलिस खड़ी होती है और मनचले गायब हैं।

दंगाइयों का तो योगी जी ने ऐसा परमानेंट इलाज किया है की आज देश का हर राज्य उस फॉर्मूले को कॉपी करना चाहता है। पहले दंगे होते थे, पब्लिक प्रॉपर्टी जलाई जाती थी, बसें फूंकी जाती थीं और सरकारें मुआवजा बांटकर मामला रफा-दफा कर देती थीं।

योगी जी ने एक नया कानून ला दिया- जो दंगा करेगा, जो पब्लिक या प्राइवेट प्रॉपर्टी का नुकसान करेगा, उसकी भरपाई उसी दंगाई के घर की कुर्की करके की जाएगी। 

चौराहों पर बकायदा दंगाइयों के होर्डिंग लगा दिए गए। इस एक झटके ने पेशेवर दंगाइयों की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। पब्लिक को समझ आ गया की पत्थर फेंका तो घर बिक जाएगा। यही वजह है की पिछले इतने सालों में यूपी में एक भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। और जब ऐसा शांतिपूर्ण माहौल बनता है, तभी बाहर का पैसा और इन्वेस्टमेंट राज्य में आता है।

जातियों का ज़हर मिटाकर हर हिन्दू को पिलाई कट्टर राष्ट्रवाद की घुट्टी

हमेशा से यह माना जाता रहा है की जो देश या जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, वो कभी दुनिया को लीड नहीं कर सकता। भारत की असली आत्मा उसकी सनातन संस्कृति में बसती है।

और इस बात को योगी आदित्यनाथ से बेहतर कौन समझ सकता है? वे कोई ठेठ राजनेता तो हैं नहीं। वे एक भगवाधारी संन्यासी हैं, गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर हैं। उनके लिए राजनीति कोई करियर नहीं है, बल्कि ‘राष्ट्र धर्म’ है।

पिछली सरकारों का नैरेटिव बड़ा अजीब था। इफ्तार पार्टियों में जाकर टोपी पहन लेना और फोटो खिंचवाना ही उनके लिए सेक्युलरिज्म का सर्टिफिकेट था। लेकिन वही नेता किसी मंदिर में जाने से या माथे पर तिलक लगाने से ऐसे घबराते थे जैसे कोई गुनाह कर रहे हों।

बहुसंख्यक हिन्दू समाज को तो जैसे दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रख दिया गया था। योगी जी ने आते ही इस पूरी हिपोक्रेसी की बखिया उधेड़ कर रख दी। उन्होंने उस “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” वाली भावना को सत्ता के गलियारों में पूरी शान से स्थापित किया।

आज अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर की कोई बिल्डिंग नहीं है। ये हमारे भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सबसे बड़ा प्रतीक है।

काशी विश्वनाथ धाम का जो कायाकल्प हुआ है, मथुरा-वृंदावन में जो डेवलपमेंट चल रहा है, विंध्याचल कॉरिडोर से लेकर प्रयागराज के दिव्य कुंभ तक- ये सब साफ-साफ बता रहा है की कैसे एक संन्यासी ने इस देश की सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगा दिया है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमज़ोरी हमेशा से जात-पात रही है। और इसी का फायदा उठाकर कई क्षेत्रीय दल सालों तक अपनी रोटियां सेंकते रहे। जातियों का ज़हर घोलकर हिंदुओं को बांटो और फिर एक मुश्त वोट-बैंक के साथ मिलकर सरकार बना लो- यही खेल चलता था।

योगी जी ने इस तिलिस्म को भी तोड़ दिया। उनका वो नारा याद है? “बंटेंगे तो कटेंगे।” ये सिर्फ कोई राजनीतिक स्लोगन नहीं था, बल्कि एक बहुत गहरी चेतावनी थी।

उन्होंने बार-बार राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं का ज़िक्र करते हुए जनता को समझाया है की जब-जब हम जातियों के नाम पर बंटे हैं, तब-तब बाहरी आक्रांताओं ने, विदेशियों ने इस देश को बुरी तरह लूटा है। “एक रहेंगे तो नेक रहेंगे” के मंत्र ने उस जातिवादी इकोसिस्टम को बुरी तरह हिला कर रख दिया है।

उनके शासन में कल्याणकारी योजनाएं बिना किसी भेदभाव के सब तक पहुंच रही हैं। न वहां जाति पूछी जाती है, न मज़हब। लेकिन हां, अगर किसी के दिमाग में जिहादी फितूर है या जो राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल है, उसके लिए यूपी में अब कोई जगह नहीं बची है।

इकॉनमी, एक्सप्रेस-वे और ‘प्रो-डेवलपमेंट’ वाला भगवा- वामपंथियों के गाल पर करारा तमाचा है योगी मॉडल का यह आक्रामक विकास तंत्र

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने सालों तक एक झूठ बहुत ही सलीके से बेचा। उनका कहना था की जो लोग हिंदुत्व की बात करते हैं, जो भगवा पहनते हैं, वो विकास के विरोधी होते हैं, वो देश को पीछे ले जाएंगे। योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ ने इस फालतू के नैरेटिव की धज्जियां उड़ा दी हैं।

इस मॉडल ने साबित कर दिया है की अगर आपकी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत हैं, तभी आप असल मायने में तरक्की कर सकते हैं।

ज़रा आंकड़ों पर नज़र डालिए। 2017 से पहले जिस यूपी की इकॉनमी रेंग रही थी, आज वो देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर सीना ताने खड़ी है। 2017 में यूपी की जीसडीपी (GSDP) करीब 13 लाख करोड़ रुपये के आस-पास थी। आज वो जंप मारकर 25 लाख करोड़ के पार जा चुकी है और योगी जी का टारगेट इसे 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 80 लाख करोड़ रुपये) बनाने का है।

आज यूपी को ‘एक्सप्रेस-वे प्रदेश’ कहा जाता है। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे हो, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे हो, या फिर गंगा एक्सप्रेस-वे… पूरे राज्य में शानदार सड़कों का ऐसा जाल बिछ चुका है की बड़े-बड़े विकसित राज्य भी रश्क करें।

जेवर में एशिया का सबसे बड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बन रहा है। बुंदेलखंड जो कभी सूखे और भुखमरी के लिए जाना जाता था, वहां अब डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बन रहा है, जहां तोपें और मिसाइलें बनेंगी।

जब लखनऊ में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट हुआ, तो देश और दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने 35 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के इन्वेस्टमेंट का वादा किया। क्यों? क्योंकि अब उन सेठ-साहूकारों और कॉर्पोरेट्स को डर नहीं लगता। उन्हें पता है कि यूपी में अब ‘कानून का राज’ है। कोई लोकल गुंडा उनसे हफ्ता या रंगदारी मांगने की हिम्मत नहीं कर सकता।

और हां, ये विकास सिर्फ शहरों की चमचमाती सड़कों तक सीमित नहीं है। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) योजना ने छोटे-छोटे गांवों और कस्बों के उन कारीगरों की ज़िंदगी बदल दी है, जिनका काम लगभग ठप पड़ चुका था।

‘हर घर नल’ योजना से लेकर गरीबों को पक्के मकान, टॉयलेट, फ्री राशन और आयुष्मान कार्ड- ये सब बिना किसी बिचौलिए के सीधे ज़मीन पर पहुंच रहा है। यूपी का ये विकास ‘तुष्टिकरण’ के मॉडल पर नहीं, बल्कि ‘संतुष्टिकरण’ के मॉडल पर चल रहा है।

एक कट्टर हिन्दू संन्यासी के हाथों में ही सुरक्षित है अखंड भारत का भविष्य

आज की स्थिति देखिए। ‘बुलडोज़र मॉडल’ अब यूपी के बॉर्डर पार करके पूरे देश में सुशासन का दूसरा नाम बन चुका है। बीजेपी के चुनावी अभियानों में आप खुद नोटिस कीजिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अगर पब्लिक किसी नेता को सबसे ज्यादा सुनना चाहती है, तो वो योगी आदित्यनाथ ही हैं।

चाहे मध्य प्रदेश हो, राजस्थान हो, हरियाणा हो या फिर अभी हाल ही में हुए महाराष्ट्र के चुनाव- जहां भी योगी जी की रैली होती है, वहां जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

आखिर क्यों? क्योंकि आम हिंदुस्तानी अब ‘सॉफ्ट स्टेट’ (कमजोर और ढुलमुल रवैये वाले राष्ट्र) से पूरी तरह ऊब चुका है। पब्लिक को अब गोल-मोल बातें करने वाले नेता नहीं चाहिए। जनता को एक ऐसा ‘आयरन-मैन’ चाहिए जो जिहादियों की आंखों में आंखें डालकर सीधा एक्शन ले सके। जो देश के दुश्मनों को उन्हीं की भाषा में, बिना किसी कूटनीतिक ड्रामे के, मुंहतोड़ जवाब दे सके।

आप देखिए, आज बाकी राज्य भी यूपी के इस मॉडल को कॉपी कर रहे हैं। चाहे सरकारी ज़मीनों से अवैध कब्ज़े हटाना हो, दंगाइयों से वसूली करनी हो, या लव-जिहाद और जबरन धर्मांतरण के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाना हो- योगी जी ने जो लकीर यूपी में खींच दी है, वो अब पूरे भारत के लिए एक स्टैंडर्ड बन गई है।

राजनीतिक गलियारों में तो अब खुलेआम कहा जाने लगा है की ‘मोदी-योगी’ की जोड़ी एकदम अजेय है। मोदी जी जहां इंटरनेशनल लेवल पर भारत को एक सुपरपावर बनाने में लगे हैं, वहीं योगी जी देश के अंदर की सुरक्षा, सनातन संस्कृति की रक्षा और प्रशासनिक पकड़ के मोर्चे पर एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े हैं।

यूपी में जो सुशासन का सूरज उगा है, उसकी धूप अब पूरे देश में फैलनी चाहिए। एक मजबूत, सुरक्षित और सच में विकसित हिन्दू राष्ट्र के लिए आज योगी आदित्यनाथ सबसे बड़ी मांग बन चुके हैं।

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