Sankalp

राम मंदिर और पी.वी. नरसिम्हा राव: वो कहानी जो इतिहास के पन्नों में दब गई

अयोध्या का गर्भगृह 22 जनवरी 2024 को खुला. कैमरे पत्थर पर थे. मंत्र प्राण प्रतिष्ठा पर थे. भीड़ राम नाम पर थी. उस भीड़ में एक नाम लगभग नहीं था. पी.वी. नरसिम्हा राव 2004 में चल बसे. उनकी सरकार 1996 में गिर चुकी थी. उनकी पार्टी ने शव को 24, अकबर रोड के अंदर नहीं […]

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पहले मुखिया, बाद में देवता, गोगा जी की असली कथा नाग से नहीं, गाय से शुरू होती है

खेजड़ी के नीचे एक थान काफी होता है। संगमरमर नहीं माँगता। सिंहासन नहीं माँगता। एक नीला कपड़ा माँगता है। कभी पत्थर पर नाग। कभी बाँस पर झंडा। कभी घोड़े वाला चेहरा। गाँव उसी को गोगा जी कहता है। शहर अक्सर यहीं रुक जाता है। साँप का देवता। भादों की नवमी। काटे की दवा। फाइल भर

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जिस ख्वाजा की किताबों और ज़ेवियर के पत्रों में दर्ज सनातन को मिटाने का कड़वा सच, उन्हीं के पर्व पर सरकारें पढ़ रही भाईचारे के कसीदे, वर्तमान को खुश रखने की दौड़ में दर्दनाक स्मृति की जा रही दफन

दो वाक्य, एक मेज एक मेज पर दो सरकारी वाक्य रखिए और देखिए वे बैठते नहीं। एक अजमेर शरीफ के उर्स की चादर है, ताकि अवसर सुख, शांति, प्रेम और भाईचारा लाए। यह वार्षिक राज-रीति है। दूसरा सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर के पर्व का वाक्य है। 3 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री ने लिखा कि यह अवसर

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कर्तव्य या नियति? गीता बनाम कुरान की कक्षा-बहस एक झूठा विकल्प क्यों है

गीता का कर्मयोग अधिकतर लोग कर्मयोग को एक नारा समझकर छोड़ देते हैं: काम करो, फल की चिंता मत करो। नारा दफ्तर की दीवार पर सुंदर लगता है। मैदान में वह अधूरा है। गीता उस जगह शुरू होती है जहाँ काम पहले से दूषित दिख रहा है। अर्जुन का संकट आलस नहीं है। वह यह

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बाड़ के पार देवता, बंदूक के पार गाँव: गाईडिनल्यु का हेराका

पुलोमी की वह सुबह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं थी। वह उस लड़की की आखिरी खुली साँस थी जिसे साम्राज्य ने आतंक कहा था, और जिसे गाँवों ने बेचा नहीं था। सोलह वर्ष की गाईडिनल्यु हथकड़ी में चली, पर उसके पीछे पहाड़, आस्था और हेराका की रीढ़ चलती रही। यह लेख उसी चलते रहने की कहानी

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जिस अफसर ने अफवाह पर संख्या लिखी

तुकाराम मुंढे, 11.05 बनाम 325, और दिल्ली को गया पत्र तुकाराम मुंढे को जनता सिंघम कहती है। उपनाम फिल्मी है। काम फाइल वाला है। 2005 बैच के आईएएस। इक्कीस साल में करीब पच्चीस तबादले। मई 2026 के अंत में महाराष्ट्र एफडीए संभाला। पहले महीने खाद्य सुरक्षा पर गए। फिर विभाग के दूसरे अक्षर तक पहुँचे:

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1912 का अखबार, 1914 का भाषण: मौलाना आजाद का छिपा हुआ मुखपत्र

जावेद अख्तर ने स्रोत माँगा क्योंकि 1914 का भाषण उनके नायक से मेल नहीं खाता था, आनंद रंगनाथन ने अल-हिलाल खोलकर बता दिया कि वह भाषण अचानक नहीं गिरा, दो साल की संपादकीय स्याही से निकला था। जब स्रोत आ गया जावेद अख्तर ने स्रोत माँगा क्योंकि 1914 का मौलाना उनके याद किए हुए नायक

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क्या मैं कॉकरोच बन जाऊं? विजय माल्या का वह सवाल जो भारत पूछना नहीं चाहता

उंगली का फर्क भारत दो उंगलियां उठाता है। एक उंगली दस साल से एक आदमी पर टिकी है। दूसरी उंगली चार महीने में भीड़ बन गई और मंत्रालय तक पहुंच गई। पहली उंगली का नाम विजय माल्या है। 9 सितंबर 2026 को लंदन में वह लिखता है कि नाइंसाफी इतनी हो चुकी कि शायद कॉकरोच

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PM Modi ने पुतिन को भेंट की तिरुक्कुरल: 2000 साल पुराने इस ग्रंथ में जीवन, शासन और रिश्तों का वो ज्ञान जो आज भी प्रासंगिक है

शिखर सम्मेलन के कमरे में एक छोटी सी तमिल किताब, और वो ज्ञान जो अब रूसी भाषा में चल निकला किताब पहले, शिखर बाद में कुछ किताबें मेज की सजावट बनती हैं। कुछ किताबें मेज का सवाल बन जाती हैं। तिरुक्कुरल दूसरी तरह की है। दो पंक्तियां। सात मात्राएं। फिर भी पूरा जीवन। घर। राज्य।

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जो राजा प्रतीक्षा करने से इनकार कर गया: लांगुला नरसिंह देव

तेरहवीं सदी के अधिकतर राजा प्रतीक्षा करना सीख गए। दिल्ली के सूबेदार गंगा के साथ उतरे। किले बंद हुए। कर की बात चली। कलिंग के शासक ने उलटी सड़क चुनी। लांगुला नरसिंह देव प्रथम ने युद्ध उत्तर ले लिया। कटासिन उनकी विधि थी। गजपति उनका दावा था। कोणार्क वह वाक्य था जो उन्होंने पत्थर में

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