सोने का सिंहासन छोड़ पहनी ’10 पैरा कमांडो’ की वर्दी, 1971 में बिना टैंक और हवाई मदद के पाकिस्तान में 80 किलोमीटर अंदर घुसकर दुश्मनों की कब्र खोदने वाले भारत के अंतिम महाराजा ‘सवाई भवानी सिंह’

5 दिसंबर 1971 की रात थार का रेगिस्तान चुप था। जोंगा और जीपों की एक पतली कतार सीमा पार कर अंदर घुस रही थी। इंजन धीमे थे। रोशनी बंद थी। अस्सी किलोमीटर दुश्मन के इलाके में वे लोग जा रहे थे जिनके पास न टैंक था, न हवाई छत्र।

कतार के आगे बैठे अफसर को जवान टाइगर कहते थे। वही आदमी जयपुर का आखिरी आधिकारिक महाराजा भी था। महल की विरासत एक तरफ थी। बटालियन का कर्तव्य दूसरी तरफ। उस रात दोनों में से एक ही चीज मायने रखती थी। रेत, अंधेरा, और आगे बढ़ते रहना।

यह कहानी उसी चुनाव की है। एक राजकुमार ने सिंहासन की आसानी छोड़कर रेगिस्तान की कठिनाई चुनी। और चार दिनों में साबित कर दिया कि असली पहचान खिताब से नहीं, नेतृत्व से बनती है।

एक सदी बाद जन्मा राजकुमार

22 अक्टूबर 1931 को जयपुर में एक ऐसा पुत्र पैदा हुआ जिसका इंतजार रियासत ने पीढ़ियों से किया था। सवाई भवानी सिंह महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय और उनकी पहली पत्नी, जोधपुर की महारानी मरुधर कंवर, के घर आए। वे कछवाहा राजपूत वंश के वारिस थे। जयपुर के राजाओं को सवाई कहा जाता था। यह उपाधि साधारण पुरुष से डेढ़ गुना शक्ति और समझ रखने वाले शासक का संकेत मानी जाती थी। उस सुबह यह शब्द सिर्फ वंश का नाम नहीं रह गया। वह एक जीवित उत्तराधिकारी का नाम बन गया।

जयपुर में यह घटना सामान्य राजसी जन्म नहीं थी। लगभग सौ वर्षों से राज्य के राज करने वाले महाराजा के घर सगा पुत्र नहीं हुआ था। 1880 के आसपास से एक के बाद एक शासक गोद लिए गए थे। स्वयं मान सिंह द्वितीय भी गोद आए थे। वे मूल रूप से एक छोटे ठिकाने के कुलीन थे, फिर जयपुर की गद्दी पर बैठे। इसलिए जब महारानी मरुधर कंवर ने पुत्र को जन्म दिया, महल और नगर दोनों ने उसे दुर्लभ वरदान समझा।

जश्न वैसा ही हुआ जैसा उस समय के जयपुर में बड़े समाचार पर होता था। महलों में शैम्पेन की बोतलें खुलीं। कुछ ब्यौरों के अनुसार फव्वारों तक में जश्न की चमक दिखी। बुलबुले इतने थे कि बच्चे का उपनाम जिंदगी भर चला। परिवार और अंग्रेज आयाएँ उसे बबल्स कहने लगीं। नाम राजसी नहीं था। लेकिन वह नाम उस उत्सव की याद बन गया जिसने एक सदी की कमी को एक रात में भर दिया।

उनसे दो वर्ष पहले, 1929 में, शिमला में बहन राजकुमारी प्रेम कुमारी का जन्म हुआ था। परिवार उसे मिकी कहता था। भवानी सिंह घर के पहले पुत्र थे, लेकिन अकेले संतान नहीं। पिता की तीन रानियाँ थीं। बाद के वर्षों में कूच बिहार की गायत्री देवी उस घर की सबसे चर्चित महारानी बनीं।

भवानी सिंह का बचपन इसलिए एक साधारण राजकुमार वाले कमरे तक सीमित नहीं रहा। वह सिटी पैलेस की रीति, रामबाग की खुली हवा, और एक बड़े राजघराने की कई परछाइयों के बीच पला।

माता मरुधर कंवर जोधपुर से आई थीं। उनका स्वभाव पारंपरिक बताया जाता है। पिता पोलो के खिलाड़ी थे, सैनिक स्वभाव के, और यूरोप की सभाओं में भी सहज। घर में राजस्थान की मर्यादा और बाहरी दुनिया की चमक साथ चलती थीं। भवानी सिंह उसी संधि पर बड़े हुए जहाँ विरासत दबाव भी थी और अवसर भी।

शिक्षा ने उन्हें महल से बाहर निकाला। आरंभ श्रीनगर के शेषबाग स्कूल में हुआ। फिर देहरादून के दून स्कूल ने अनुशासन और साथियों की बराबरी सिखाई। इसके बाद वे इंग्लैंड के हैरो गए। ये स्कूल राजघरानों के युवकों के लिए सामान्य रास्ते थे। लेकिन भवानी सिंह के लिए वे सिर्फ शिष्टाचार की पाठशाला नहीं बने। वहाँ समय, नियम और मेहनत का अर्थ साफ हुआ।

राजकुमार का खिताब कक्षा में काम नहीं आता था। अंक, खेल और आचरण काम आते थे।

युवावस्था में वे पिता की तरह घोड़ों और मैदान की ओर झुके। पोलो जयपुर घराने की भाषा थी। मान सिंह द्वितीय को दुनिया इस खेल से जानती थी। बेटा उसी मैदान को समझता था। फिर भी वह केवल खिलाड़ी राजकुमार नहीं बना। उसके भीतर एक दूसरा आकर्षण पहले से चल रहा था। सेना की वर्दी महल की गद्दी से अधिक वास्तविक लगती थी।

10 मार्च 1966 को दिल्ली में उनका विवाह सिरमूर की राजकुमारी पद्मिनी देवी से हुआ। पद्मिनी नाहन की थीं। उनके पिता महाराजा राजेंद्र प्रकाश मान सिंह द्वितीय के पोलो मित्र थे। माता महारानी इंदिरा देवी थीं। यह रिश्ता दो पुराने घरानों को जोड़ता था। एक तरफ जयपुर का रेगिस्तानी वैभव था। दूसरी तरफ पहाड़ी सिरमूर की परंपरा। विवाह स्वतंत्र भारत के राजघराने वाले ढंग से हुआ। धूम थी, लेकिन पुरानी रियासत वाले असीम खर्च का समय बीत चुका था।

पति-पत्नी की एकमात्र संतान बनी। 30 जनवरी 1971 को पुत्री दिया कुमारी का जन्म हुआ। उस समय भवानी सिंह सेना में थे। घर में उत्तराधिकार की बातें चलती रहीं, लेकिन उनका रोज़ का जीवन छावनी, टुकड़ी और ड्यूटी का था। राजकुमार का घर और अफसर का घर एक ही छत के नीचे रहने लगे।

24 जून 1970 को वह छत अचानक भारी हो गई। पिता सवाई मान सिंह द्वितीय इंग्लैंड के सिरेंसेस्टर में पोलो खेलते हुए गिरे और चल बसे। दिन धुंधला और बरसता हुआ बताया जाता है। भवानी सिंह और विमाता गायत्री देवी दर्शकों में थे। जयपुर का अंतिम राज करने वाला महाराजा उसी खेल के मैदान में गया जिसे वह जीवन भर सबसे अधिक प्रेम करता था।

उसी दिन भवानी सिंह गद्दी पर बैठे। खिताब मिला। प्रिवी पर्स और कुछ विशेष अधिकार अभी भी थे। महल अब उनकी जिम्मेदारी थे। वे उत्तराधिकार से नहीं भागे। लेकिन उन्होंने उसे अपनी पूरी पहचान भी नहीं माना। जन्म ने उन्हें एक सदी बाद आया राजकुमार बनाया था। चुनाव ने उन्हें सैनिक बनाया था। जून 1970 में दोनों भूमिकाएँ एक साथ उनके कंधे पर आ गईं।

इसके बाद का समय छोटा था। आधिकारिक महाराजा के रूप में उनका काल डेढ़ वर्ष से कुछ अधिक चला। फिर भी उस छोटे काल का अर्थ बड़ा था। एक घर, जो वर्षों गोद लिए वारिसों से चलता रहा था, आखिर एक सगे पुत्र तक पहुँचा। वही पुत्र सिंहासन को शान नहीं, कर्तव्य समझता था। बबल्स का उपनाम बचपन का था। आगे का नाम सेना ने रखा। जवान उन्हें टाइगर कहने वाले थे।

वर्दी सिंहासन से बड़ी थी

1951 में सवाई भवानी सिंह ने भारतीय सेना में कमीशन लिया। थर्ड कैवलरी उनकी पहली रेजिमेंट बनी। यह फैसला दिखावा नहीं था। राजघराने के कई युवक तब भी सेवा चुनते थे, लेकिन उनके लिए यह सिर्फ परंपरा निभाना नहीं था। वे वर्दी को अपनी असली पहचान मानने वाले थे। महल विरासत में मिला था। सेना उन्होंने खुद चुनी थी।

शुरुआती साल घुड़सवार रेजिमेंट की दिनचर्या में बीते। ड्रिल, घोड़े, मैदान और अनुशासन रोज का हिस्सा थे। राजकुमार का खिताब यहाँ काम नहीं आता था। अफसर के रूप में प्रदर्शन काम आता था। जल्द ही उनकी क्षमता और आचरण दोनों पर नजर पड़ी।

1954 में वे प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड में चयनित हुए। यह यूनिट देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की सुरक्षा और औपचारिक ड्यूटी दोनों संभालती थी। 1954 से 1963 तक करीब नौ वर्ष उन्होंने यहीं बिताए। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के समय से लेकर बाद के वर्षों तक वे इस इकाई से जुड़े रहे। काम दो तरफा था। एक तरफ परेड और राजकीय समारोह की सटीकता। दूसरी तरफ नियमित सैनिक आदतें और सतर्कता। बॉडीगार्ड में सेवा करने का मतलब था कि छोटी गलती भी नजर में आती है। भवानी सिंह ने वहाँ शिष्टाचार और कठोरता दोनों सीखीं।

इसके बाद वे इंडियन मिलिट्री अकादमी, देहरादून में एडजुटेन्ट बने। यह पद युवा अफसरों के प्रशिक्षण से जुड़ा था। एडजुटेन्ट ड्रिल, अनुशासन और अकादमी के रोजमर्रा के मानक देखता है। भवानी सिंह के लिए यह काम स्वाभाविक था। वे खुद उस पीढ़ी से थे जो स्कूल और रेजिमेंट दोनों में अनुशासन से गुजरी थी। अब वे दूसरों को वही मानक सिखा रहे थे। आईएमए में बिताए वर्ष उन्होंने सिर्फ आदेश देने वाले अफसर के रूप में नहीं, बल्कि मिसाल पेश करने वाले अफसर के रूप में याद किए जाते हैं।

1967 में एक नया अध्याय खुला। 10 पैरा कमांडो नई उठ रही थी। यह बटालियन विशेष बलों के लिए बनाई गई थी। रेगिस्तान, ऊँचाई और कठिन इलाकों में काम करने वाली टुकड़ी। भवानी सिंह ने स्वयं इसके लिए आवेदन किया। कई लोग आरामदायक या प्रतिष्ठित पोस्टिंग चुन सकते थे। उन्होंने वह रास्ता चुना जहाँ जोखिम अधिक था और सुविधा कम। उसी साल वे बटालियन के सेकंड-इन-कमांड बने। 1968 में कमांडिंग ऑफिसर।

10 पैरा बाद में डेजर्ट स्कॉर्पियंस कहलाई। नाम युद्ध से पहले ट्रेनिंग में ही आकार लेने लगा था। भवानी सिंह ने यूनिट को उस दिशा में ढाला जहाँ लंबे रेगिस्तानी छापे, रात के संचालन और छोटी टीमों की स्वतंत्र कार्रवाई संभव हो। जवानों में कई स्थानीय राजपूत थे। वे रेत और सीमा को जानते थे। कमांडिंग ऑफिसर इलाके को दूसरे ढंग से समझते थे। राजस्थान की जमीन उनकी हड्डी में थी। जवान उन्हें टाइगर कहने लगे। यह नाम चापलूसी का नहीं था। यह उस अफसर का नाम था जो आगे चलता था और अपने से वही कठोरता माँगता था जो दूसरों से चाहता था।

1970 में पूर्व में तनाव बढ़ा। बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी। भारतीय सेना मुक्ति वाहिनी के काडरों को प्रशिक्षित करने में लगी। भवानी सिंह ने इस काम में हिस्सा लिया। प्रशिक्षण चमकदार नहीं था। यह मैदान, हथियार और संगठन की साधारण लेकिन जरूरी मेहनत थी। उन्होंने इसे भी उसी गंभीरता से लिया जिस गंभीरता से बाद में चाचरो का अभियान लिया।

सेना में उनके वर्षों की एक साफ रेखा दिखती है। थर्ड कैवलरी से बॉडीगार्ड, बॉडीगार्ड से आईएमए, आईएमए से पैरा कमांडो। हर कदम पर उन्होंने आराम की बजाय जिम्मेदारी चुनी। राजकुमार का खिताब उनके कंधे पर रहा, लेकिन वे उसे आगे नहीं रखते थे। वर्दी आगे रहती थी।

जून 1970 में पिता के निधन के बाद वे महाराजा भी बने। खिताब, महल और संपत्ति की जिम्मेदारी आई। फिर भी उनकी पहचान बटालियन कमांडर की ही रही। नक्शे, समय, गोला-बारूद और जवानों का मनोबल उनकी भाषा थे। सिंहासन विरासत था। वर्दी चुनाव था। और चुनाव में उन्होंने कभी संदेह नहीं दिखाया।

रेत में पाँच महीने

1971 की गर्मियाँ शुरू होते ही 10 पैरा की दिनचर्या बदल गई। युद्ध की संभावना साफ हो रही थी। पश्चिमी मोर्चे पर थार का रेगिस्तान मुख्य रंगमंच बनने वाला था। बटालियन को उसी इलाके के लिए तैयार होना था। जून से नवंबर तक करीब पाँच महीने का कठिन प्रशिक्षण चला। जगह बाड़मेर के आसपास थी। रेत, धूप और रात की ठंड रोज का साथी बन गए।

मकसद साफ था। लंबे रेगिस्तानी छापे। दुश्मन की सीमा से अस्सी किलोमीटर या उससे अधिक अंदर घुसना। रेंजर्स की चौकियों, आपूर्ति रेखाओं और संपर्क केंद्रों पर वार करना। भगदड़ पैदा करना। और नियमित सेना के आगे बढ़ने से पहले रास्ता खोलना। कोई बड़ी फौज नहीं। छोटी टीमें। तेज प्रहार। और वापसी।

प्रेरणा पुरानी थी। दूसरे विश्व युद्ध में उत्तरी अफ्रीका में ब्रिटिश एसएएस ने जर्मन हवाई अड्डों पर जो छापे मारे थे, उसी सोच को भारतीय रेगिस्तान के हिसाब से ढाला गया। दिखना नहीं। घुसना। वार करना। निकल जाना। हवाई सहायता की उम्मीद नहीं थी। कवच की छाया भी नहीं। अगर गाड़ी खराब हो गई तो रेत में उसी सामान से काम चलाना था जो साथ ले जाया गया हो।

जोंगा और जीपें इसी काम के लिए बदली गईं। मशीनगनें लगाई गईं। हल्की और मध्यम मशीनगनें। पानी की टंकियाँ। राशन। गोला-बारूद। हर वाहन को लंबे सफर और अचानक मुकाबले के लायक बनाया गया। रात में चलना मुख्य तरीका था। दिन में छिपना। हवा और रेत के हिसाब से रास्ता चुनना। छोटी गलती भी पकड़ी जा सकती थी। इसलिए अभ्यास बार-बार दोहराया गया।

दो टीमें बनीं। अल्फा और चार्ली। हर टीम को अपने लक्ष्य और रास्ते दिए गए। जवानों में कई स्थानीय राजपूत थे। उन्हें रेत की तहें, पुराने रास्ते और सीमा के आसपास की आदतें पता थीं। कुछ खातों में खोजा राजपूतों का जिक्र आता है, जो इलाके को अच्छी तरह जानते थे। कमांडिंग ऑफिसर सवाई भवानी सिंह खुद राजस्थान की जमीन को हड्डी में महसूस करते थे। वे नक्शे पर सिर्फ रेखाएँ नहीं देखते थे। वे रेत की साँस समझते थे।

प्रशिक्षण में चुपके से आगे बढ़ना, अचानक प्रहार करना और तुरंत निकल जाना बार-बार दोहराया गया। वाहनों की आवाज को भी सोचा गया। कुछ ब्यौरों के अनुसार बाद में वास्तविक अभियान में साइलेंसर हटाकर आवाज को भारी कवच जैसा बनाने की कोशिश हुई, ताकि दुश्मन भ्रमित हो। लेकिन मूल तैयारी सादगी और कठोरता पर टिकी थी। पानी नापकर। गोला-बारूद गिनकर। और हर आदमी को यह समझाकर कि पीछे मुड़ने का आसान रास्ता नहीं है।

जवान अपने कमांडिंग ऑफिसर को टाइगर कहने लगे थे। नाम महल से नहीं आया था। वह मैदान से आया था। जो अफसर आगे चलता था, वही नाम कमाता था। भवानी सिंह उसी अफसर थे। वे ट्रेनिंग में भी उसी कठोरता से रहते थे जो युद्ध में माँगने वाले थे।

पाँच महीने बीतते-बीतते बटालियन तैयार हो गई। रेगिस्तान अब सिर्फ भूगोल नहीं रह गया था। वह उनका मैदान बन चुका था। दिसंबर आते-आते युद्ध शुरू हो गया। 5 दिसंबर की रात वह तैयारी असली परीक्षा में उतरी। जोंगा और जीपों की पतली कतार थार में घुसी। अस्सी किलोमीटर अंदर। अंधेरे में। और उस अंधेरे में 10 पैरा ने वह काम किया जिसके लिए पाँच महीने रेत में पसीना बहाया था।

छापा: 5 से 10 दिसंबर 1971

5 दिसंबर की रात टीमें भारतीय इलाके से निकलीं और अंधेरे में घुसीं। पहले घंटे चुप्पी और रास्ता पहचानने के थे। रेगिस्तान में छिपने की जगह कम थी। गलत मोड़, तेज इंजन, लापरवाह रोशनी, और छापा शुरू होने से पहले खत्म हो जाता।

सुबह तक वे काफी अंदर थे। किता के पास, करीब सत्तर किलोमीटर भीतर, रेतीली पहाड़ियों पर तैनात मशीनगनों से फायर हुआ। कमांडो जमीन पर लेट गए, जवाब दिया, और बची हुई रात व टीलों की तहों का इस्तेमाल किया। दुश्मन की चौकी टिकी नहीं। हमलावरों ने उसे लिया और आगे बढ़े। दिन में हवाई नजर से बचने के लिए छिपे रहे। रात पड़ते ही फिर दूरी समेटने लगे।

6 दिसंबर की रात वे चाचरो से कुछ किलोमीटर पहले ठहर गए। कस्बे में रेंजर्स का मुख्यालय था। यही पहला बड़ा लक्ष्य था। जरूरी न सामान उतार दिया गया। रास्ते जाँचे गए। हमला भोर से ठीक पहले तय हुआ।

7 दिसंबर को सुबह तीन और चार बजे के बीच हमला शुरू हुआ। एक टीम कवर पर रही। दूसरी अंदर गई। जोंगा की आवाज से रक्षक कुछ देर भ्रमित रहे। कुछ ब्यौरों के अनुसार उन्होंने आने वाले वाहनों को भारी कवच समझ लिया। लड़ाई तेज और छोटी थी। भोर होते-होते चाचरो भारतीय हाथ में था। सत्रह रेंजर्स मारे गए। बारह बंदी बनाए गए। चौकी, कैदी और जमीन बाद में 20 राजपूत को सौंप दी गई, जो 11 इन्फैंट्री डिवीजन के बड़े अभियान के साथ जुड़ चुकी थी।

छापा वहीं नहीं रुका। चाचरो के बाद टीमें अगली सुरक्षित जगहों की ओर मुड़ीं। विरावाह पर हमला 8 दिसंबर की सुबह के शुरुआती घंटों में हुआ। निकट की लड़ाई हुई। रेंजर्स चौकी छोड़कर भागे। उसी दिन पहली रोशनी तक तहसील मुख्यालय नगरपारकर भी गिर गया। तरीका एक था। तेजी, अचंभा, और कब्जा लेने के बाद बैठ न जाना।

इस्लामकोट और लुनियो पर भी यही दबाव चला। गोला-बारूद के डिपो की तलाश हुई। वापसी के रास्ते एक काफिले पर घात लगाया गया। जगह-जगह के आँकड़े थोड़े अलग हैं, लेकिन तस्वीर एक है। दुश्मन के आदमी मरे, कैदी हुए, सामान छूट गया। भगदड़ किसी एक गोलीबारी से तेज फैली।

चार दिनों में कमांडो दुश्मन के इलाके में करीब पाँच सौ किलोमीटर चले। संशोधित जोंगा और जीपों में, नापे हुए पानी और गिने हुए गोला-बारूद के साथ, बिना हवाई छत्र और बिना टैंक के। छापेमार टीमों में भारतीय हताहत शून्य रहे।

महावीर चक्र के आधिकारिक प्रशस्ति-पत्र ने बाद में इस अभियान को संयत भाषा में लिखा। 5 दिसंबर 1971 की रात लेफ्टिनेंट कर्नल सवाई भवानी सिंह, पैराशूट रेजिमेंट (कमांडो) की बटालियन की कमान संभाले, अपने जवानों को दुश्मन के इलाके में गहराई तक ले गए। चार दिन-रात, निजी आराम और सुरक्षा की परवाह किए बिना, उन्होंने चाचरो और विरावाह की मजबूत चौकियों पर कुशल और निरंतर छापे मारे। उनकी प्रेरक अगुवाई और व्यक्तिगत साहस से दुश्मन के बड़े इलाके पर कब्जा हुआ। दुश्मन में भगदड़ और भ्रम फैला। वे पीछे हटे और बड़ी संख्या में कैदी व सामान छोड़ गए। इस अभियान में उन्होंने व्यक्तिगत साहस, असाधारण नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा उदाहरण दिया जो भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं में आता है।

जब ठिकाने सौंप दिए गए, कमांडो काम खत्म हो गया। जिस जमीन को उन्होंने खोला, वह बड़े अग्रिम का हिस्सा बनी। समय के साथ बटालियन को युद्ध सम्मान मिला: चाचरो 1971।

पदक और संविधान संशोधन

गणतंत्र ने वही माना जो रेगिस्तान पहले ही साबित कर चुका था। भवानी सिंह को महावीर चक्र दिया गया। उसी अभियान के लिए 10 पैरा को दस वीरता पुरस्कार मिले। उनमें उनके साथ लड़ने वाले अफसरों और जवानों के वीर चक्र भी थे। पदक राजसी गहना नहीं था। वह रेत में, रात में, गोली के नीचे कमाया गया था।

उसी साल एक और सरकारी बदलाव आया। 1971 के अंत में 26वें संविधान संशोधन ने प्रिवी पर्स और रियासती खिताबों की मान्यता समाप्त कर दी। 24 जून 1970 को शुरू हुआ भवानी सिंह का आधिकारिक महाराजा काल 28 दिसंबर 1971 को खत्म हो गया।

समय की यह संगति अतिरिक्त रंग की मोहताज नहीं। जिस साल उन्हें दुश्मन के सामने वीरता का देश का दूसरा सर्वोच्च सम्मान मिला, उसी साल गणतंत्र ने विरासत का खिताब छीन लिया। पदक उनके पास रहा। जवानों का सम्मान रहा। महल उन्हें जानता रहा। सेना उन्हें टाइगर के नाम से जानती रही।

उन्होंने इस अंतर पर भाषण नहीं दिया। जरूरत भी नहीं थी। रिकॉर्ड खुद बोलता था।

युद्ध के बाद

युद्ध के बाद के वर्षों में उन्होंने नियमित सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारियाँ और पुराने राजघरानों की बदली कानूनी दुनिया उन्हें जयपुर खींच लाई। वे उद्यमी बने और विरासत के रखवाले। रामबाग पैलेस और अन्य संपत्तियों को बंद संग्रहालय नहीं, जीती-जागती जगहों की तरह संभाला गया। वे पोलो खिलाड़ी रहे और उस शहर के सार्वजनिक चेहरे, जिसने उन्हें बबल्स से कमांडिंग ऑफिसर बनते देखा था।

वर्षों बाद जब ऑपरेशन पवन के दौरान 10 पैरा श्रीलंका में थी, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे यूनिट जाने को कहा। मकसद मनोबल था। वे गए। जो जवान कभी उन्हें टाइगर कहते थे, उन्होंने वही अफसर पहचाना। इस सेवा के लिए उन्हें ब्रिगेडियर की मानद रैंक दी गई। सक्रिय सूची से बाहर किसी अफसर के लिए यह दुर्लभ सम्मान था।

बाद में वे ब्रुनेई में भारत के उच्चायुक्त रहे। वे उस सैनिक की तरह जिए जो घर और शहर का रखवाला भी बन गया। 17 अप्रैल 2011 को गुड़गाँव के अस्पताल में बहु-अंग विफलता से उनका निधन हुआ। उम्र उनहत्तर वर्ष थी। शरीर जयपुर लाया गया। जिस शहर ने उनके जन्म पर शैम्पेन से जश्न मनाया था, वह अब उस आदमी के लिए शोक में खड़ा था जिसने जन्म की आसान जिंदगी के बजाय रेगिस्तान चुना था।

10 पैरा के महावीर चक्र विजेता

10 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) की इतिहास में महावीर चक्र का सम्मान एक ही नाम से जुड़ा है। लेफ्टिनेंट कर्नल सवाई भवानी सिंह।

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में वे 10 पैरा कमांडो के कमांडिंग ऑफिसर थे। 5 से 10 दिसंबर तक उन्होंने अपनी टीमों को सिंध के रेगिस्तान में अस्सी किलोमीटर गहराई तक ले जाकर चाचरो, विरावाह और आसपास के ठिकानों पर छापे मारे। चार दिन-रात की इस कार्रवाई में दुश्मन के इलाके में भगदड़ फैली। बड़े हिस्से पर कब्जा हुआ। कैदी और सामान छोड़े गए। छापेमार टीमों में भारतीय हताहत शून्य रहे।

उसी अभियान के लिए 10 पैरा को कुल दस वीरता पुरस्कार मिले। महावीर चक्र कमांडिंग ऑफिसर को मिला। मेजर एसडी शर्मा और नायक निहाल सिंह को वीर चक्र मिला। अन्य अफसरों और जवानों को सेना मेडल और उल्लेख भी दिए गए। बटालियन को युद्ध सम्मान चाचरो 1971 प्राप्त हुआ।

इकाई के बाद के इतिहास में कीर्ति चक्र, वीर चक्र, शौर्य चक्र और सेना मेडल कई बार आए। लेकिन महावीर चक्र का वह एकमात्र सम्मान 1971 के रेगिस्तानी छापे और उसके कमांडिंग ऑफिसर से जुड़ा रहा। भवानी सिंह बाद में ब्रिगेडियर बने। जवान उन्हें टाइगर कहते रहे। और 10 पैरा की पहचान डेजर्ट स्कॉर्पियंस के रूप में उसी अभियान से और मजबूत हुई।

एक युवा बटालियन। एक कठिन रेगिस्तान। और एक अफसर जिसने सिंहासन की बजाय रेत चुनी। 10 पैरा का महावीर चक्र इन्हीं तीन बातों की कहानी है।

HALO और HAHO पैराशूटिंग तकनीक

HALO और HAHO स्पेशल फोर्सेज की दो महत्वपूर्ण फ्री-फॉल पैराशूटिंग तकनीकें हैं। भारतीय पैरा (एसएफ) इकाइयाँ, जिनमें 10 पैरा भी शामिल है, इनका उपयोग दुश्मन के इलाके में चुपके से घुसने के लिए करती हैं। दोनों तकनीकें ऊँचाई से कूदने पर आधारित हैं, लेकिन खुलने के समय और मकसद में अंतर है।

HALO – हाई एल्टीट्यूड लो ओपनिंग: इसमें कमांडो बहुत ऊँचाई से (आमतौर पर 25,000 से 35,000 फीट या उससे अधिक) विमान से कूदते हैं। लंबे समय तक फ्री-फॉल करते हैं और पैराशूट जमीन के काफी करीब खोलते हैं। फायदा यह है कि हवा में खुला पैराशूट कम समय के लिए दिखता है। दुश्मन रडार या नजर से बचने में मदद मिलती है। ऊँचाई पर ऑक्सीजन मास्क जरूरी होता है क्योंकि हवा पतली होती है। लैंडिंग सटीक जगह पर करनी होती है। यह तकनीक उन मिशनों के लिए उपयुक्त है जहाँ जल्दी और चुपके से जमीन पर पहुँचना हो।

HAHO – हाई एल्टीट्यूड हाई ओपनिंग: इसमें भी ऊँचाई से कूदते हैं, लेकिन पैराशूट जल्दी खोल दिया जाता है। खुले पैराशूट के साथ कमांडो हवा में लंबे समय तक ग्लाइड करते हैं। तेज हवा का इस्तेमाल करके वे दसियों किलोमीटर दूर तक पहुँच सकते हैं। यह तकनीक तब काम आती है जब विमान को लक्ष्य के पास नहीं ले जाना हो। कमांडो दूर से कूदकर चुपके से लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। यहाँ भी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की जरूरत होती है। नेविगेशन और हवा के रुख को समझना बहुत जरूरी होता है।

दोनों तकनीकों में अंतर साफ है। HALO में देर से खोलना और तेज फ्री-फॉल मुख्य है। HAHO में जल्दी खोलना और लंबी दूरी तय करना मुख्य है। दोनों में विशेष उपकरण, ट्रेनिंग और शारीरिक-मानसिक तैयारी लगती है। गलती की गुंजाइश बहुत कम होती है।

भारतीय पैरा एसएफ में ये कौशल एडवांस्ड ट्रेनिंग का हिस्सा हैं। आगरा और अन्य प्रशिक्षण केंद्रों पर फ्री-फॉल कोर्स कराए जाते हैं। 10 पैरा जैसी इकाइयाँ रेगिस्तानी और अन्य इलाकों में इनका इस्तेमाल विशेष अभियानों के लिए करती हैं। ये तकनीकें साधारण पैराशूट जंप से बहुत आगे की हैं। इनमें चुपके से घुसना, सटीक लैंडिंग और कठिन परिस्थितियों में नियंत्रण बनाए रखना सीखा जाता है।

महाराजा सवाई भवानी सिंह का महत्व

महाराजा सवाई भवानी सिंह आधुनिक भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं। वे दो युगों को जोड़ने वाले व्यक्तित्व थे। एक तरफ पुरानी रियासतों की विरासत थी। दूसरी तरफ लोकतांत्रिक गणराज्य की वास्तविकता।

1931 में जन्म लेने वाले भवानी सिंह जयपुर के राज करने वाले महाराजा के लगभग सौ वर्षों में पहले सगे पुत्र थे। कछवाहा वंश की गौरवशाली परंपरा उनके हिस्से आई। लेकिन उन्होंने केवल औपचारिक राजकुमार का जीवन नहीं चुना। 1951 में भारतीय सेना में कमीशन लिया। थर्ड कैवलरी, प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड और इंडियन मिलिट्री अकादमी में सेवा के बाद 1967 में नई उठ रही 10 पैरा कमांडो में स्वयं सेवा की। 1971 के युद्ध में बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में उन्होंने सिंध के रेगिस्तान में गहरे छापे का नेतृत्व किया। चाचरो और आसपास के ठिकानों पर सफल कार्रवाई के लिए उन्हें महावीर चक्र मिला। उनकी इकाई को युद्ध सम्मान “चाचरो 1971” और कई वीरता पुरस्कार मिले। छापेमार टीमों में भारतीय हताहत शून्य रहे।

समय की एक खास संगति भी थी। जून 1970 में पिता की मृत्यु के बाद वे आधिकारिक महाराजा बने। दिसंबर 1971 में 26वें संविधान संशोधन ने प्रिवी पर्स और रियासती खिताब समाप्त कर दिए। उसी वर्ष उन्हें महावीर चक्र मिला। गणतंत्र ने खिताब छीन लिया। उन्होंने मैदान में कमाया गया पदक और अपने जवानों का सम्मान बचा रखा। जवान उन्हें “टाइगर” कहते थे। यह नाम जन्म से नहीं, आगे चलकर नेतृत्व करने से आया था।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने परिवार की विरासत संभाली। रामबाग पैलेस को होटल बनाया। ब्रुनेई में भारत के उच्चायुक्त रहे। ऑपरेशन पवन के दौरान राजीव गांधी के अनुरोध पर 10 पैरा का मनोबल बढ़ाने श्रीलंका गए। इसके लिए उन्हें ब्रिगेडियर की मानद रैंक दी गई। 2011 में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

उनका असली महत्व रियासत के खिताब में नहीं, बल्कि चुने हुए रास्ते में है। जब कई पूर्व शासक निजी जीवन में सिमट गए, तब उन्होंने सेवा, अनुशासन और बटालियन को प्राथमिकता दी। चाचरो छापा भारत के सबसे शुरुआती और साफ गहरे सर्जिकल स्ट्राइक में गिना जाता है। भवानी सिंह उसके सबसे चर्चित चेहरे हैं। एक राजकुमार जिसने दरबार की बजाय रेगिस्तान में अपनी पहचान साबित की।

कहानी अब भी क्यों चलती है

महीनों योजना बनी, दिनों में अमल हुआ, और छापेमार टीमों में एक भी भारतीय मौत नहीं हुई।

इसने पूरा युद्ध अकेला तय नहीं किया। इसने एक साफ बात दिखाई। अच्छी तरह प्रशिक्षित छोटी टुकड़ी शत्रु क्षेत्र में दूर तक जा सकती है, जिसके लिए गई वही कर सकती है, और लौट भी सकती है।

बड़ी बात इससे भी सीधी है। सिंहासन पर जन्मा आदमी ने खुद को महल से नहीं, बटालियन से नापा। वह औपचारिक महाराजा रह सकते थे। 1951 में वर्दी पहनी और उसे पोशाक नहीं माना। जब 5 दिसंबर की रात आई, थार में घुसने वाली कतार उस अफसर के पीछे थी जिस पर जवान इसलिए भरोसा करते थे कि वह उनके साथ था, उनसे ऊपर नहीं।

जोंगा अब नहीं हैं। रेत के निशान मिट गए। खिताब चला गया। पदक बचा है, और वह नाम भी जिससे जवान उन्हें पुकारते थे। अंधेरे में, अस्सी किलोमीटर अंदर, वे उन्हें टाइगर कहते थे। वही तस्वीर ठहरती है।

चाचरो छापा पूरे युद्ध का फैसला नहीं था। उसने एक साफ बात दिखाई। छोटी, अच्छी तरह प्रशिक्षित टुकड़ी बिना बड़े समर्थन के भी गहराई तक जा सकती है, वार कर सकती है, और सकुशल लौट सकती है।

सवाई भवानी सिंह का जन्म उस महल में हुआ था जिसने लगभग एक सदी बाद सगा वारिस देखा था। उनका अंत उस पदक के साथ हुआ जो रेत में कमाया गया था। उसी साल गणतंत्र ने रियासती खिताब समाप्त कर दिए। उन्होंने खिताब खोया। पदक और जवानों का सम्मान बचा रखा।

आज भी 10 पैरा डेजर्ट स्कॉर्पियंस कहलाती है। रेत के निशान मिट गए। पाठ नहीं मिटा। एक आदमी ने खुद को महल से नहीं, बटालियन से नापा। इसलिए यह कहानी अब भी चलती है। और टाइगर का नाम अब भी याद रहता है।

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