देवभूमि केदारनाथ या 'अय्याशी का अड्डा'? मंदिर में रील, शराब, सिगरेट, हनीमून- सनातन का अपमान और सरकार VIP कल्चर में व्यस्त, एक और 2013 जैसी त्रासदी को दे रहे न्यौता

देवभूमि केदारनाथ या ‘अय्याशी का अड्डा’? मंदिर में रील, शराब, सिगरेट, हनीमून- सनातन का अपमान और सरकार VIP कल्चर में व्यस्त, एक और 2013 जैसी त्रासदी को दे रहे न्यौता

सनातन धर्म के 11वें ज्योतिर्लिंग, भगवान केदारनाथ की पवित्र तपोभूमि आज अपने इतिहास के सबसे काले और शर्मनाक दौर से गुजर रही है। यह वह भूमि है जहाँ द्वापर युग के अंत में पांडवों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए कठोर तपस्या की थी। यह वह परम पावन धरा है जहाँ हिंदू धर्म के महान आदिगुरु शंकराचार्य ने अपने शरीर का त्याग किया था।

सदियों से केदारनाथ धाम हिंदुओं के लिए मोक्ष, तपस्या और वैराग्य का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है। लेकिन आज? आज इस परम पवित्र धाम का भारत के ही सोशल मीडिया में डूबे लोगों द्वारा सरेआम चीरहरण हो रहा है! और विडंबना देखिए की जिन लोगों ने खुद को ‘हिंदू रक्षक’ घोषित कर रखा है, वही सत्ताधारी इस पाप के सबसे बड़े भागीदार हैं।

उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने हिंदू आस्था के इस पवित्र केंद्र को महज एक ‘कमाई का जरिया’- ‘हनीमून स्पॉट’ और ‘वीकेंड गेटअवे’ में तब्दील कर दिया है।

आज केदारनाथ की उन बर्फीली वादियों में, जहाँ कभी केवल ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष और वैदिक मंत्र गूंजते थे, आज वहां दिल्ली, मुंबई और पंजाब से आए ‘पर्यटकों’ की बेहूदगी, हनीमून मनाने आए जोड़ों का अश्लीलपन, शराब की बोतलें, सिगरेट का धुआं और भद्दे बॉलीवुड गानों पर ‘इंस्टाग्राम रील्स’ बनाने वालों का नंगा नाच नजर आता है।

हिंदू समाज ने जिस भारतीय जनता पार्टी (BJP) को अपने धर्म, संस्कृति और मंदिरों की रक्षा के लिए प्रचंड बहुमत देकर सत्ता के सिंहासन पर बिठाया था, उसी सरकार ने अपनी तिजोरी भरने के लालच में इस धाम को एक ‘टूरिस्ट रिसॉर्ट’ में बदल दिया है।

ऊपर से प्रशाशन का ये VIP कल्चर- जिसमें पैसे वाले लोगों को तो डायरेक्ट मंदिर के अंदर एंट्री मिलती है, और आम जनता को लम्बी लाइन में खड़े रहकर पुलिस के डंडे मिलते हैं।

सरकार का यह लालच और प्रशासन का यह अमानवीय अहंकार 2013 की उस महाप्रलय को सीधा और खुला निमंत्रण दे रहा है, जिसमें हजारों निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

अब समय आ गया है की हिंदू समाज अपनी आँखें खोले और इन तथाकथित ‘हिन्दू धर्म के रक्षकों’ से सवाल करे, क्योंकि ‘विकास’ और ‘टूरिज्म’ के नाम पर सत्ता में बैठी यह सरकारें हमारे पवित्र मंदिरों की आत्मा को नष्ट करने पर तुल गई हैं।

आस्था के नाम पर अश्लीलता का नंगा नाच और तमाशा देखती हमारी सरकार

अब बात करते हैं वहां पहुंचने वाली इस नई आवारा भीड़ की। आज अगर आप केदारनाथ जाएं, तो आपको वहां शिव के असली भक्त कम, और हाथों में महंगे फोन लिए, आंखों पर सनग्लासेस चढ़ाए और छपरी स्टाइल के कपड़े पहने लड़के-लड़कियां ज्यादा दिखेंगे। मंदिर के ठीक सामने, गर्भगृह के आस-पास ये लोग भद्दे-भद्दे बॉलीवुड गानों पर ‘रील्स’ बना रहे होते हैं।

कोई वहां अपने बॉयफ्रेंड के साथ रोमांटिक पोज़ दे रहा है, तो कोई अश्लील डांस कर रहा है। हद तो तब पार हो गई जब रात के अंधेरे में पवित्र मंदाकिनी नदी के घाटों पर सिगरेट और शराब पीने के वीडियो सामने आने लगे।

ज़रा सोचिए! जिस गंगा और मंदाकिनी के जल को हम माथे से लगाते हैं, वहां ये लोग दारू की बोतलें खोल रहे हैं। मुझे एक बात बताइए, क्या दुनिया के किसी और धर्म में इतनी बेशर्मी की छूट है? सऊदी अरब चले जाइए मक्का-मदीना, या फिर वैटिकन सिटी ही चले जाइए।

वहां जाकर ऐसा उल्टा-सीधा काम या फूहड़ डांस कर के दिखाएं ज़रा! कोड़े मार-मार कर खाल उधेड़ देंगे वहां के प्रशासन वाले। लेकिन हमारे यहां? हमारे यहां तो ‘सेक्युलरिज्म’ का भूत सवार है प्रशाशन पर।

राज्य की धामी सरकार ने ‘टूरिज्म प्रमोट’ करने के चक्कर में सारी मर्यादाएं ताक पर रख दी हैं। रिकॉर्ड तोड़ने की होड़ मची है की इस साल इतने लाख टूरिस्ट आ गए, अगले साल उससे ज्यादा आने चाहिए। अरे भाई, टूरिस्ट क्यों बुला रहे हो? तीर्थयात्री बुलाओ ना! आज तक इन लोगों से एक छोटा सा ड्रेस कोड तक लागू नहीं किया गया।

जो मन में आ रहा है पहन कर पहुंच रहे हैं लोग वहां। मंदिर परिसर में मोबाइल और कैमरे पर बैन लगाने की औकात नहीं है इस प्रशासन की, क्योंकि इन्हें डर है की अगर रील्स-वील्स बननी बंद हो गईं तो इनका रेवेन्यू गिर जाएगा। पैसा कम हो जाएगा। भगवान के घर को मौज-मस्ती का अड्डा बना दिया है इन लालची नेताओं ने।

केदारनाथ में VIP लोगों के लिए बिछा रेड कार्पेट और 15 घंटे लाइन में लगे शिवभक्तों की पीठ पर खाकी लाठियां

वैसे, सबसे ज्यादा तकलीफ तो तब होती है जब एक आम हिंदू के साथ वहां जानवरों से भी बदतर सुलूक होता है। किताबों में तो हमने यही पढ़ा था की भगवान शिव के दरबार में राजा और रंक सब बराबर होते हैं। लेकिन इन हुक्मरानों और ठेकेदारों ने उस दरबार को भी अपनी जागीर समझ लिया है।

मुकेश अंबानी हों, शिल्पा शेट्टी, या कोई बड़ा मंत्री, विधायक या आईएएस-आईपीएस बाबू- इनके लिए तो वहां अलग ही दुनिया बसती है। ये लोग सीधे सरकारी या चार्टर्ड हेलीकॉप्टर से वहां लैंड करते हैं।

इनके पैर ज़मीन पर पड़ने से पहले रेड कार्पेट बिछ जाता है। पूरी की पूरी पुलिस फोर्स इनकी जी-हुजूरी में लग जाती है। मंदिर का प्रशासन दौड़-दौड़ कर इन्हें मालाएं पहनाता है और बिना एक मिनट इंतज़ार कराए सीधे गर्भगृह में ले जाकर स्पेशल दर्शन करवाता है।

और दूसरी तरफ हमारा वो आम हिंदू टैक्सपेयर? वो बेचारा, जिसने साल भर पाई-पाई जोड़कर, अपना पेट काटकर इस यात्रा के लिए पैसे जमा किए थे, वो 15-16 घंटे कड़ाके की ठंड और बारिश में सिकुड़ता हुआ बैरिकेड के पीछे धक्के खा रहा होता है। छोटे-छोटे बच्चे ठंड से कांप रहे होते हैं। बुजुर्गों की सांस उखड़ रही होती है। लेकिन मजाल है जो ये सिस्टम उनकी तरफ देख भी ले!

और जब कोई 15 घंटे लाइन में खड़ा-खड़ा थक जाता है, फ्रस्ट्रेट होकर व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो पता है क्या होता है? ये उत्तराखंड पुलिस के जवान उन शिवभक्तों पर लाठियां भांजना शुरू कर देते हैं। जी हाँ, डंडे मारते हैं उन्हें!

इंटरनेट पर ऐसे दर्जनों वीडियो भरे पड़े हैं जहाँ पुलिस वाले भक्तों को ऐसे धक्के मार रहे हैं जैसे कोई क्रिमिनल हों। अरे, शर्म आनी चाहिए इन सत्ताओं को! जो सरकारें मुसलमानों की हज यात्रा के लिए प्लेन और हॉटेल्स का बंदोबस्त करती है, क्रिश्चियनों को उनके त्योहारों पर पलकों पर बिठाती हैं, वो बहुसंख्यक हिंदू समाज को भेड़-बकरी समझ रही हैं?

एक वायरल चल रही वीडियो में तो एक बेचारा हिंदू बाप, जिसके बच्चे को मंदिर में खड़े पुलिस वालों ने डंडो से बेरहमी से पीट दिया, वो रोते हुए कह रहा था- “भगवान तो सही जगह है, पर ये मैनेजमेंट एकदम नीच है।” सच कहूं तो ये सिर्फ उस एक आदमी की आवाज़ नहीं थी, ये पूरे हिंदू समाज की चीख थी।

हम ही चंदा देते हैं, हम ही टैक्स भरते हैं, और बदले में हमें क्या मिलता है? डंडे! ये पैसे वालों का VIP कल्चर जब तक हमारे मंदिरों से उखाड़ कर फेंका नहीं जाएगा, तब तक ऐसे ही हिंदुओं का अपमान होता रहेगा।

केदारनाथ में तड़प-तड़प कर दम तोड़ते श्रद्धालु और विकास का ढिंढोरा पीटने वाली इस निर्दयी सरकार की खौफनाक हकीकत

खैर, बात सिर्फ लाठियों और धक्कों तक ही सीमित नहीं है। यहां तो लोगों की जान की कोई कीमत ही नहीं बची है। सरकार बड़े-बड़े विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये फूंक कर दावा करती है की केदारनाथ में हमने ‘वर्ल्ड क्लास’ फैसिलिटीज दे दी हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत देखकर किसी का भी खून खौल जाएगा।

11,000 फीट की ऊंचाई है! वहां हवा में ऑक्सीजन वैसे ही कम होती है, पल-पल में मौसम बदलता है। ऐसे में मेडिकल इमरजेंसी तो आनी ही है। लेकिन वहां मेडिकल सुविधाओं के नाम पर सिर्फ मौत का व्यापार चल रहा है।

अभी कुछ दिन पहले का ही वो वीडियो याद है? एक लड़का चीख-चीख कर रो रहा था कैमरे के सामने। उसके पिता को अचानक सीने में दर्द हुआ (कार्डियक अरेस्ट)। उस बेचारे ने 100 और 108 नंबर पर पागलों की तरह कॉल किया। मिन्नतें की। लेकिन डेढ़ घंटे तक… सोचिए, पूरे 90 मिनट तक कोई मेडिकल टीम या एंबुलेंस वहां नहीं पहुंची।

आख़िरकार उस बेटे को अपने मरते हुए बाप को एक खच्चर वाले की पीठ पर लादकर ले जाना पड़ा। और तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक बेटे के बाप ने वहीँ उसके सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

अब आप ही बताइए, क्या ये मर्डर नहीं है? ये सिस्टेमेटिक मर्डर है! अगर किसी VIP नेता को वहां हल्की सी छींक भी आ जाए ना, तो 15 मिनट के अंदर सरकारी हेलीकॉप्टर उड़कर वहां पहुंच जाता है।

लेकिन एक आम हिंदू की जान जा रही थी, तब इनके हेलीकॉप्टर कहां थे? और तो और, उस आदमी की मौत के बाद उसकी लाश को नीचे लाने के लिए भी दो-दो घंटे तक कोई इंतज़ाम नहीं हुआ। लाश वहीं खुले में पड़ी रही।

और इस तानाशाही की बेशर्मी देखिए ज़रा। जब कोई दुखी होकर वहां की इस बदइंतज़ामी का पर्दाफाश करता है, वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालता है, तो ये निकम्मा प्रशासन अपनी गलती सुधारने के बजाय उस आदमी पर ही पुलिस केस ठोक देता है। FIR दर्ज कर रहे हैं ये लोग!

मतलब आप हिंदुओं को वहां जानवरों की तरह मारोगे भी, और अगर कोई आवाज़ उठाएगा तो उसकी आवाज़ भी दबा दोगे? ये तो सीधे-सीधे तानाशाही है। इन सरकारों को अब सच सुनने से भी नफरत हो गई है।

केदारनाथ की पवित्र मंदाकिनी में बहता इंसानी कचरा और 2013 जैसी एक और महाप्रलय को खुली चुनौती

एक और बहुत बड़ी बात है जो हमें समझनी होगी। हमारे सनातन धर्म में प्रकृति को भगवान का ही रूप माना गया है। पहाड़, नदियां, पेड़-पौधे… ये सब हमारे लिए पूजनीय हैं। लेकिन ये जो ‘टूरिज्म’ का कीड़ा इन नेताओं और अफसरों के दिमाग में घुसा है ना, इसने वहां की प्रकृति का सत्यानाश कर दिया है।

केदारनाथ के रास्ते में अगर आप आज जायेंगे तो आपको आस पास का वातावरण देख कर ही घिन आ जाएगी। अब वहां पहाड़ों से पानी की जगह ‘कचरे का झरना’ बहता है। जी हाँ, पानी नहीं, प्लास्टिक, चिप्स के पैकेट, गंदी पॉलीथिन और गंदगी का एक पूरा का पूरा पहाड़ सीधे नीचे हमारी पवित्र मंदाकिनी नदी में गिर रहा होता है।

‘स्वच्छ भारत अभियान’ का झुनझुना बजाने वालों की नाक के नीचे देश के सबसे पवित्र तीर्थ की ये हालत है! नगर निगम और सफाई वाले वहां बस नाम के लिए हैं। सारा का सारा कचरा नदियों में बहाया जा रहा है।

क्या भूल गए हम लोग 2013 को? वो जो महाप्रलय आई थी, वो कोई अचानक आई कुदरती आफत नहीं थी। वो हमारे इंसानी लालच और प्रकृति के साथ किए गए खिलवाड़ का ही नतीजा था।

आज फिर से वही पाप दोहराया जा रहा है। वो इको-सेंसिटिव ज़ोन है! वहां की एक लिमिट है (कैरिंग कैपेसिटी)। लेकिन पैसे के लालच में अंधाधुंध भीड़ वहां भेजी जा रही है। जगह-जगह पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है।

ये तो बस शुरुआत है, प्रकृति जब अपना हिसाब करती है ना, तो कुछ नहीं छोड़ती। महादेव का तीसरा नेत्र खुलने में देर नहीं लगेगी, और अगर ऐसा हुआ तो ये सारा अहंकार, ये सारा विकास का ढोंग तिनके की तरह बह जाएगा।

केदारनाथ धाम में 1 लीटर पानी की कीमत 80 रुपये और निकम्मी सरकार का बोझ ढोता वो गरीब मज़दूर

जब सरकार बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर ‘वर्ल्ड क्लास’ फैसिलिटी और केदारनाथ के ‘पुनर्विकास’ का ढिंढोरा पीटती है, तो एक आम श्रद्धालु तो यही सोचेगा ना की वहां बेसिक इंतज़ाम होंगे! लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? आप यकीन नहीं करेंगे की केदारनाथ में 1 लीटर पानी की बोतल 80 रुपए में मिलती है, जो बाजार में सिर्फ 16 रुपए में मिलती है।

ये सरकारें हर साल अरबों रुपये का टैक्स, VIP दर्शन की पर्चियां और चंदा डकार जाती हैं, लेकिन आज तक 11,000 फीट पर पीने के साफ पानी की एक ढंग की सप्लाई लाइन नहीं बिछा पाईं। पीने के पानी जैसी बेसिक चीज़ के लिए भी वहां हाहाकार मचा है।

और पानी की वो पेटियां वहां हवा में उड़कर नहीं पहुंचतीं। एक गरीब नेपाली या स्थानीय हिंदू मज़दूर अपनी पीठ और माथे पर रस्सी बांधकर, 40-40 किलो की वो पानी की पेटियां लेकर जाता है। बारिश हो, बर्फ गिर रही हो, पैर फिसल रहे हों… वो बेचारा अपनी जान हथेली पर रखकर उस खड़ी चढ़ाई पर माल पहुंचाता है।

अब आप ही बताइए, जब कोई इंसान अपनी जान जोखिम में डालकर सामान ऊपर लाएगा, तो वो 16 का पानी 80 में नहीं बिकेगा तो क्या होगा?

लेकिन सवाल फिर वहीं आकर टिकता है- ये नौबत ही क्यों आई? अगर धामी और मोदी सरकार ने सच में कोई इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया होता, ज़रूरी सामान ले जाने के लिए ढंग के कार्गो रोप-वे बनाए होते, या तीर्थयात्रियों के लिए बेसिक चीज़ों पर कोई सब्सिडी दी होती, तो ना तो उस गरीब मज़दूर को जानवरों की तरह अपनी कमर तोड़नी पड़ती, और ना ही किसी श्रद्धालु को एक घूंट पानी के लिए 80 रुपये चुकाने पड़ते।

ये सरकार वहां VIP लोगों के लिए तो मिनटों में हेलीकॉप्टर उतार देती है, उनके लिए फाइव-स्टार टेंट लगा देती है, लेकिन आम जनता के लिए पानी-वानी और राशन का कोई सरकारी इंतज़ाम नहीं है। असली लुटेरा तो वो सिस्टम है जो हमारे धर्मस्थलों को निचोड़ कर खा रहा है और बुनियादी ढांचे के नाम पर हमें सिर्फ धोखा दे रहा है।

केदारनाथ को बचाने के लिए अब हिंदू समाज को खुद अपनी आंखें खोलनी होंगी

सच कहूं तो, गाली सिर्फ सरकार को देने से काम नहीं चलेगा। हमें खुद अपने गिरेबान में भी तो झांकना होगा ना! बहुत हो गया ये नाटक। अरे भाई, जब हम खुद ही अपने पवित्र धामों की इज़्ज़त नहीं करेंगे, तो ये नेता और आईएएस बाबू क्या खाक करेंगे?

आज जो हम लोग केदारनाथ जाकर हनीमून मना रहे हैं, सिगरेट-दारू पी रहे हैं, और महादेव के मंदिर के सामने भद्दे गानों पर ‘रील्स-वील्स’ बना रहे हैं… क्या यही हमारी संस्कृति है?

अगर आप वहां शिव से जुड़ने नहीं, बल्कि सिर्फ अपने इंस्टाग्राम पर व्यूज और लाइक्स बटोरने जा रहे हैं, तो हाथ जोड़कर विनती है- मत जाइए वहां! वो तपोभूमि है, आपका कोई वीकेंड पिकनिक स्पॉट नहीं।

जो लोग वहां जाकर प्लास्टिक फेंकते हैं, मर्यादा तार-तार करते हैं, वो शिव के भक्त हो ही नहीं सकते। हमें अपने आप को भी सुधारना होगा और तीर्थों की उस पुरानी पवित्रता का सम्मान करना सीखना होगा।

दूसरी तरफ, हमें ये बात भी बहुत अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लेनी चाहिए की कोई भी राजनीतिक पार्टी हमारे धर्म की सगी नहीं है। ये जो मुंह में राम और बगल में छूरी वाला हिसाब चल रहा है ना, ये ज्यादा दिन नहीं टिकेगा।

इनके लिए हमारे मंदिर सिर्फ और सिर्फ पैसे छापने की मशीनें हैं। जब तक इन मंदिरों पर सरकार का कब्ज़ा रहेगा, तब तक आम हिंदू वहां ऐसे ही लाठियां खाता रहेगा। चढ़ावे का पैसा ये लोग अपने खजाने में भरेंगे और उसका इस्तेमाल हमारे ही खिलाफ, सेक्युलर नीतियां बनाने में करेंगे।

अब वक्त आ गया है की हिंदू समाज अपनी इस कुंभकर्णी नींद से जागे। खुद भी सुधरे और सीधे-सीधे इन सत्ताओं की आंखों में आंखें डालकर अपनी मांगें रखे:

पहली बात- ये VIP कल्चर तुरंत खत्म होना चाहिए। महादेव के सामने कोई प्रधानमंत्री या अंबानी नहीं होता। सब सिर्फ भक्त हैं। तो लाइन में लगो! नहीं लग सकते, तो मत आओ।

दूसरी बात- कड़ा ड्रेस कोड और तीर्थ की मर्यादा। जो इंसान वहां ट्रेडिशनल और शालीन कपड़ों में नहीं आ सकता, जिसे तीर्थ में बर्ताव करने की तमीज़ नहीं है, उसे बेस कैंप से ही उल्टे पांव धक्के मारकर वापस भेज दो। ये कोई फैशन शो नहीं चल रहा है वहां।

तीसरी बात- पूरे इलाके में कैमरा, स्मार्टफोन और रील्स बनाने पर एकदम सख्त बैन। जो कोई भी बेशर्म वहां अश्लीलपना करता, नाचता हुआ, कचरा फेंकता या सिगरेट पीता हुआ पकड़ा जाए, उस पर लाखों का जुर्माना ठोको और उसे लाइफटाइम के लिए बैन कर दो।

और सबसे ज़रूरी बात- हमारे मंदिरों को इन सरकारों के चंगुल से आज़ाद करो! केदारनाथ हो या कोई भी और धाम, उसका मैनेजमेंट सच्चे संतों, शंकराचार्यों और उन असली भक्तों के हाथ में होना चाहिए जिनका मकसद धर्म बचाना है, पैसा कमाना नहीं।

ये सरकार और हम आम लोगों, दोनों के लिए एक अल्टीमेटम है। धामी जी हों या मोदी जी, आप लोगों ने हिंदुओं की सहनशीलता का बहुत इम्तिहान ले लिया है। और हिंदू समाज को भी अब ये समझना होगा की हम अपनी आस्था का खुद मज़ाक ना बनने दें।

अगर जल्द ही इन चीजों पर ब्रेक नहीं लगा, और केदारनाथ की वो पुरानी पवित्रता वापस नहीं लौटी, तो याद रखना… महादेव का तीसरा नेत्र खुलने में देर नहीं लगेगी। और जब कुदरत का असली गुस्सा निकलेगा, तो उसे संभालना किसी भी सत्ता के बस की बात नहीं होगी। महादेव का धाम तपोभूमि था, तपोभूमि है, और उसे तपोभूमि ही रहना होगा!

हर-हर महादेव!

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