मालाबार के हिन्दुओं का जबरन खतना करने आए टीपू सुल्तान के जिहादियों को उन्हीं के खून से नहलाने वाले ‘धर्म राजा’, केरल को इस्लामिक राज्य बनने से रोकने वाला अजेय हिन्दू सम्राट

इतिहासकारों ने उस खूंखार और जल्लाद टीपू सुल्तान को हमेशा ‘शेर-ए-मैसूर’ और एक महान स्वतंत्रता सेनानी बनाकर पेश किया।

अरे भाई! कौन सा शेर? कैसा स्वतंत्रता सेनानी? जिस टीपू सुल्तान ने लाखों बेगुनाह हिंदुओं का कत्लेआम किया, जिसने हमारे हज़ारों मंदिरों को तोड़कर वहां मस्जिदें खड़ी कर दीं, वो इन शांतिदूतों का बाप हो सकता है, लेकिन हमारा हीरो कभी नहीं हो सकता!

बात 18वीं सदी के अंत की है। ये वो खौफनाक दौर था जब मैसूर की गद्दी पर बैठा वो जिहादी दरिंदा टीपू सुल्तान अपनी विशाल फौज लेकर दक्षिण भारत को एक पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट बनाने के पागलपन में अंधा हो चुका था।

उसका सबसे बड़ा टारगेट था- केरल का मालाबार इलाका। टीपू ने मालाबार पर ऐसा भयंकर और खौफनाक जिहादी तांडव मचाया की वहां की जमीन हिंदुओं के खून से लाल हो गईं।

पूरा का पूरा मालाबार उस जिहादी आंधी में जल रहा था। बड़े-बड़े राजा और नवाब टीपू के खौफ से उसकी गुलामी स्वीकार कर रहे थे या अपनी रियासतें छोड़कर भाग रहे थे। ऐसा लग रहा था की दक्षिण भारत से अब सनातन धर्म का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाएगा।

लेकिन सनातन धर्म को मिटाना किसी जिहादी के बाप के बस की बात नहीं है। उसी खौफनाक दौर में, जब मालाबार में हिंदुओं की लाशें बिछाई जा रही थीं, तब त्रावणकोर (केरल) की गद्दी पर एक ऐसा अजेय हिंदू शेर बैठा था, जिसने टीपू सुल्तान की उस खौफनाक जिहादी आंधी को चकना चूर कर दिया।

उस शूरवीर हिंदू सम्राट का नाम था- ‘कार्तिक तिरुनल राम वर्मा’, जिन्हें सब लोग ‘धर्म राजा’ के नाम से जानते हैं।

वो धर्म राजा, जिन्होंने ठान लिया था की जब तक उनके शरीर में खून की आखिरी बूंद बाकी है, वो इस जिहादी सूअर को त्रावणकोर की पवित्र ज़मीन पर पैर नहीं रखने देंगे। आज हम उसी महान हिंदू सम्राट के खौफनाक शौर्य की बात करेंगे।

हिन्दुओं का सरेआम खतना और मुंह में ज़बरदस्ती गोमांस, केरल को इस्लामिक स्टेट बनाने का टीपू सुल्तान का डरावना खेल

अगर आपको टीपू सुल्तान की महानता का बुखार चढ़ा है, तो ज़रा मालाबार के इतिहास के वो काले पन्ने पलट कर देख लीजिए।

मालाबार में जब टीपू की फौज घुसी, तो उसने कोई युद्ध नहीं लड़ा, बल्कि उसने निहत्थे हिंदुओं का वो रक्तपात किया जिसे याद करके आज भी वहां के लोगों की रूह कांप जाती है।

ज़रा उस खौफनाक मंज़र को अपनी आंखों के सामने लाइए! टीपू के जिहादी कसाइयों ने मालाबार के गांव के गांव जला दिए। वहां के जो वीर नायर योद्धा और नंबूदिरी ब्राह्मण थे, उन्हें चुन-चुन कर पकड़ा गया।

उन बेगुनाह हिंदुओं को सरेआम पेड़ों से लटका कर फांसी दी गई। और जो मर्द ज़िंदा बच गए, उनके साथ जो बर्बरता हुई, वो किसी भी इंसान की इंसानियत को शर्मसार कर देगी।

टीपू के जिहादियों ने उन हिंदू मर्दों को जानवरों की तरह बांधा, और बिना किसी दवाई या एनेस्थीसिया के उनका सरेआम ज़बरन खतना कर दिया!

हाँ भाई, तलवार की नोक पर खतना! और सिर्फ खतना ही नहीं किया, बल्कि उन तड़पते हुए हिंदू मर्दों और ब्राह्मणों के मुंह में ज़बरदस्ती गोमांस (गाय का मांस) ठूंस दिया गया ताकि उनका धर्म हमेशा-हमेशा के लिए भ्रष्ट हो जाए।

ये कोई युद्ध की रणनीति नहीं थी, ये केरल को एक इस्लामिक स्टेट बनाने का वो खौफनाक जिहादी प्रोजेक्ट था जिसे टीपू सुल्तान अल्लाह के नाम पर चला रहा था।

और हमारी हिंदू औरतों के साथ जो दरिंदगी हुई, वो तो शब्दों में बयां भी नहीं की जा सकती। हमारी बहन-बेटियों को बंदी बनाकर मैसूर ले जाया गया ताकि उन्हें जिहादियों के हरम में रखा जा सके।

मालाबार के सैकड़ों प्राचीन और भव्य हिंदू मंदिरों को तोप के गोलों से उड़ा दिया गया। हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित करके मस्जिदों की सीढ़ियों में चुनवा दिया गया ताकि नमाज़ी उन्हें अपने जूतों से कुचल सकें।

सताए हुए मालाबार हिन्दुओं के लिए भगवान बनकर खड़े हुए धर्म राजा, अपनी जान पर खेलकर दी हजारों को पनाह

जब टीपू सुल्तान के जिहादी कसाई मालाबार में मौत का नंगा नाच कर रहे थे, तो वहां के जो हिंदू परिवार किसी तरह ज़िंदा बच गए थे, उन्होंने अपना घर, अपनी ज़मीनें और अपना सब कुछ वहीं छोड़ दिया।

वो हज़ारों सताए हुए हिंदू- जिनमें नायर, ब्राह्मण, औरतें और मासूम बच्चे शामिल थे- अपनी जान और अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए जंगलों और खाइयों के रास्ते दक्षिण की तरफ भागे। उनका बस एक ही लक्ष्य था- त्रावणकोर!

वो भूखे-प्यासे हिंदू शरणार्थी जब त्रावणकोर की सीमा पर पहुंचे, तो उन्हें लगा की शायद उन्हें यहां भी पनाह नहीं मिलेगी।

क्योंकि उस वक्त टीपू सुल्तान का खौफ इतना भयानक था की कोई भी राजा उसे अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता था। टीपू ने साफ ऐलान कर रखा था की जो भी इन भागे हुए ‘काफिरों’ को पनाह देगा, मैं उसके राज्य को शमशान बना दूंगा।

लेकिन त्रावणकोर की गद्दी पर कोई डरपोक या बिकाऊ नेता नहीं बैठा था। वहां बैठे थे सम्राट राम वर्मा! जब उन हज़ारों रोते-बिलखते हिंदुओं ने त्रावणकोर के दरबार में जाकर अपनी आपबीती सुनाई, तो उस हिंदू शेर का खून खौल उठा।

राम वर्मा ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि टीपू की फौज कितनी बड़ी है या इस पनाह की कीमत क्या चुकानी पड़ेगी। उन्होंने तुरंत अपनी रियासत के दरवाज़े उन हज़ारों हिंदू शरणार्थियों के लिए खोल दिए।

सम्राट राम वर्मा ने उन बेघर हिंदुओं को खाना दिया, घर दिया और सबसे बड़ी बात- उन्हें वो सम्मान दिया जो एक सनातनी को मिलना चाहिए। उन्होंने मालाबार के कई राजकुमारों और राजाओं को भी अपने यहां सुरक्षित पनाह दी।

अपनी जान और अपनी रियासत को दांव पर लगाकर, सनातनियों की रक्षा करने के इसी महान और ईश्वरीय काम के लिए ही केरल की जनता ने कार्तिक तिरुनल राम वर्मा को एक उपाधि दी- ‘धर्म राजा’ (Dharma Raja)। यानी वो राजा जो धर्म की रक्षा के लिए साक्षात भगवान बनकर खड़ा हो गया।

जब ये खबर मैसूर पहुंची, तो टीपू सुल्तान गुस्से से पागल हो गया। उसने तुरंत धर्म राजा को एक खौफनाक और धमकी भरा खत लिखा।

टीपू ने लिखा- “उन भागे हुए काफिरों और राजकुमारों को तुरंत मेरे हवाले कर दो, वरना मैं अपनी फौज लेकर आऊंगा और तुम्हारे पूरे त्रावणकोर को जलाकर राख कर दूंगा।”

ज़रा सोचिए, उस वक्त धर्म राजा ने क्या किया होगा? उन्होंने टीपू सुल्तान की उस धमकी भरे खत को जूतों तले कुचल दिया! धर्म राजा ने डंके की चोट पर जवाब भिजवाया की “वो शरणार्थी अब मेरे राज्य के मेहमान हैं।

अगर तू उन्हें छूना भी चाहता है, तो तुझे पहले मेरी और मेरी त्रावणकोर की सेना की लाशों से गुज़रना होगा।” ये कोई नॉर्मल जवाब नहीं था भाई, ये साक्षात जिहाद को दी गई एक खुली और खौफनाक चुनौती थी। धर्म राजा ने अपने राज्य में युद्ध का शंखनाद कर दिया था।

धर्म राजा की वो अभेद्य दीवार जिससे टकराकर चूर चूर हुआ टीपू सुल्तान के जिहादी गुरूर का सपना

धर्म राजा बहुत अच्छे से जानते थे की उन्होंने जिस टीपू सुल्तान को चुनौती दी है, उसके पास एक बहुत ही विशाल और खूंखार जिहादी सेना है।

उसके पास फ्रांसीसियों द्वारा दी गई आधुनिक तोपें थीं और लाखों सैनिक थे। इसलिए धर्म राजा सिर्फ जज़्बात में बहकर फैसला नहीं ले रहे थे, वो एक बहुत ही चतुर और दूरदर्शी रणनीतिकार भी थे।

टीपू के हमले को रोकने के लिए धर्म राजा ने अपने सबसे होनहार और वफादार दीवान (प्रधानमंत्री) ‘राजा केशवदास’ के साथ मिलकर एक ऐसा खौफनाक और अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार किया, जिसने आगे चलकर टीपू सुल्तान की कब्र खोदने का काम किया। इस सुरक्षा चक्र का नाम था- ‘नेदुमकोट्टा’ (The Travancore Lines)।

ये नेदुमकोट्टा कोई ईंट-पत्थर की दीवार नहीं थी। ये 48 किलोमीटर लंबी एक ऐसी खौफनाक और विशालकाय दीवार थी जिसे जंगलों, पहाड़ों, गहरी खाइयों और नदियों को मिलाकर बनाया गया था।

इस दीवार के चारों तरफ गहरी खाइयां खोदी गई थीं। और जानते हैं उन खाइयों में क्या था? उन खाइयों में कंटीली झाड़ियां और ज़हरीले सांप छोड़े गए थे ताकि अगर कोई जिहादी दीवार फांदने की कोशिश करे, तो वो वहीं तड़प-तड़प कर मर जाए।

दीवार पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर तोपें तैनात कर दी गई थीं और त्रावणकोर के खूंखार नायर योद्धा तीर-कमान और बंदूकों के साथ वहां डटकर खड़े हो गए थे।

दिसंबर 1789 का वो खौफनाक महीना आ गया। टीपू सुल्तान अपने जिहादी गुरूर में अंधा होकर 14,000 से ज़्यादा खूंखार सैनिकों की फौज लेकर नेदुमकोट्टा की दीवार के सामने आ धमका।

उसे लग रहा था की वो तो ‘शेर’ है, ये छोटी सी दीवार और त्रावणकोर की सेना उसका क्या बिगाड़ लेगी? टीपू को पक्का यकीन था की वो एक ही दिन में इस दीवार को तोड़ेगा, धर्म राजा का सिर काटेगा और त्रावणकोर की हिंदू औरतों को अपने हरम में ले जाएगा।

टीपू सुल्तान ने अपने कमांडरों को आदेश दिया की दीवार पर तोपें चलाओ और इस त्रावणकोर को मिट्टी में मिला दो। लेकिन उस जिहादी को ये नहीं पता था की वो जिस दीवार से टकराने आया है, वो ईंटों की नहीं, बल्कि सनातनियों के अजेय संकल्प की दीवार है।

टीपू सुल्तान की वो जिहादी सेना नेदुमकोट्टा की उस दीवार के सामने आकर ऐसे टकराई जैसे कोई कुत्ता किसी शेर की गुफा के बाहर आकर भौंक रहा हो। और यहीं से शुरू हुआ वो खौफनाक धर्मयुद्ध जिसने टीपू सुल्तान को उसकी असली औकात याद दिला दी!

1789 का वो खौफनाक धर्मयुद्ध जब धर्म राजा के नायर योद्धाओं ने टीपू की जिहादी फौज को बेरहमी से काटा

दिसंबर 1789 का वो महीना त्रावणकोर के इतिहास में मौत और शौर्य का ऐसा खेल लेकर आया था, जिसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकता।

टीपू सुल्तान अपनी 14,000 की खूंखार जिहादी सेना और फ्रांसीसी तोपों के साथ नेदुमकोट्टा की उस अभेद्य दीवार के सामने खड़ा था। कई दिनों तक टीपू की तोपें आग उगलती रहीं, लेकिन धर्म राजा की वो दीवार टस से मस नहीं हुई।

टीपू बौखला गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था की जिन ‘काफिरों’ को वो गाजर-मूली की तरह काटता आ रहा था, वो आज उसके सामने काल बनकर कैसे खड़े हो गए हैं!

जब टीपू को लगा की वो आमने-सामने की लड़ाई में इस दीवार को नहीं तोड़ सकता, तो उस कायर ने धोखे का सहारा लिया। 28 दिसंबर 1789 की वो खौफनाक और घनी काली रात!

टीपू सुल्तान ने रात के अंधेरे में अपनी जिहादी सेना के साथ दीवार के एक कमज़ोर हिस्से पर अचानक धावा बोल दिया। तोपों के लगातार गोलों से दीवार का एक छोटा सा हिस्सा टूट गया और टीपू के वो वहशी दरिंदे त्रावणकोर की पवित्र सीमा के अंदर घुस गए।

अंदर घुसते ही टीपू के जिहादियों को लगा की उन्होंने जंग जीत ली है। वो खुशी से चिल्लाने लगे और लूटपाट के लिए आगे बढ़ने लगे। लेकिन भाई, उन्हें ये नहीं पता था की वो किसी जन्नत में नहीं, बल्कि सीधे अपनी मौत के मुंह में घुस चुके हैं!

दीवार के उस पार धर्म राजा का खूंखार और अजेय सेनापति ‘वैकोम पद्मनाभ पिल्लई’ अपनी नायर फौज के साथ घात लगाए बैठा था।

पिल्लई त्रावणकोर का वो हिंदू शेर था जिसे साक्षात यमराज का दूसरा रूप माना जाता था। जैसे ही टीपू की फौज अंदर घुसी, वैकोम पद्मनाभ पिल्लई ने अपने 20 सबसे खूंखार नायर कमांडो की एक छोटी सी टुकड़ी के साथ उन हज़ारों जिहादियों पर ऐसा भयानक ‘एंबुश’ (गुरिल्ला हमला) किया की उन जिहादियों के पसीने छूट गए।

उस रात नेदुमकोट्टा की खाइयों में जो कत्लेआम मचा, वो इतिहास का सबसे खौफनाक मंज़र था! नायर योद्धाओं की तलवारें बिजली की तरह चमक रही थीं। उन्होंने टीपू के उन कसाइयों को उन्हीं के खून से नहला दिया।

जो जिहादी कल तक मालाबार के निहत्थे हिंदुओं का खतना कर रहे थे, आज उनकी अपनी गर्दनें धड़ से अलग होकर ज़मीन पर लोट रही थीं। पिल्लई और उसके नायर शेरों ने उन जिहादियों को ऐसा काटा जैसे खेत में फसल काटी जाती है।

अचानक हुए इस खूंखार हमले से टीपू की सेना में ऐसी भयानक भगदड़ मची की वो सुध-बुध खो बैठे। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की मार कहां से पड़ रही है।

डर के मारे वो जिहादी अपने ही सैनिकों को कुचलते हुए वापस उस टूटी हुई दीवार की तरफ भागने लगे। लेकिन पीछे से नायर योद्धा उनकी पीठ में भाले और तलवारें घोंपते जा रहे थे।

नेदुमकोट्टा की वो खाइयां जिहादियों की लाशों से पट गईं और वहां का पानी उनके नापाक खून से लाल हो गया।

खाई में गिरा टीपू सुल्तान, जीवन भर के लिए हुआ लंगड़ा, जिहादी सुल्तान की वो जलालत जो इतिहास में हो गई दर्ज

अब ज़रा उस टीपू सुल्तान की हालत पर गौर कीजिए जो खुद को ‘शेर-ए-मैसूर’ कहता था। जब उस कायर ने देखा की उसकी वो अजेय जिहादी फौज कुत्तों की तरह काटी जा रही है, जब उसने अपने कमांडरों के कटे हुए सिर ज़मीन पर लुढ़कते देखे, तो उस जिहादी का सारा घमंड और सारा गुरूर एक झटके में चकनाचूर हो गया।

‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाने वाला वो जल्लाद अब अपनी खुद की जान की भीख मांगते हुए उल्टे पैर भागने लगा।

अरे, भागना तो बहुत छोटी बात है, उस रात टीपू सुल्तान के साथ जो जलालत हुई, वो इतिहास में किसी भी आक्रांता के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी थी!

जान बचाने की हड़बड़ी में टीपू उस टूटी हुई दीवार की तरफ भागा, लेकिन अंधेरे और भगदड़ में उसका पैर फिसल गया।

वो सीधे नेदुमकोट्टा की उस खौफनाक और गहरी खाई में जा गिरा जहाँ उसी के जिहादी सैनिकों की लाशों का अंबार लगा हुआ था और ज़हरीले सांप रेंग रहे थे।

खाई में गिरते ही टीपू सुल्तान का पैर टूट गया! जी हां, वो जीवन भर के लिए लंगड़ा हो गया। खून और कीचड़ में सना हुआ टीपू दर्द से कराह रहा था।

उसे लगा की अब त्रावणकोर के नायर योद्धा उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे। मौत को अपने सिर पर नाचता देख टीपू सुल्तान इतना खौफज़दा हो गया की उसने अपना सारा शाही गुरूर वहीं कीचड़ में फेंक दिया।

खाई से निकलने और अपनी जान बचाने के लिए उस कायर टीपू सुल्तान ने अपनी वो मशहूर और बेशकीमती शाही तलवार, जिस पर उसे बहुत नाज़ था, वहीं लाशों के ढेर में फेंक दी!

उसने अपनी शाही अंगूठी, अपना खंजर, अपनी शाही पालकी और यहाँ तक की अपने शाही दस्तावेज़ भी वहीं कीचड़ में छोड़ दिए और रेंगते हुए एक गीदड़ की तरह अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला।

जो सुल्तान कल तक मालाबार की औरतों का चीरहरण कर रहा था, वो आज अपनी ही तलवार और अपनी इज़्ज़त कीचड़ में छोड़कर भाग रहा था।

अगली सुबह जब सूरज उगा, तो धर्म राजा की सेना ने नेदुमकोट्टा की खाई से टीपू की वो शाही तलवार, उसकी पालकी और उसकी अंगूठी ज़ब्त कर ली।

वो तलवार उस जिहादी के टूटे हुए घमंड और त्रावणकोर के हिंदुओं की प्रचंड विजय का सबसे बड़ा और साक्षात सबूत थी।

टीपू की ये जलालत पूरे दक्षिण भारत में जंगल की आग की तरह फैल गई और जिहादियों के सीने में धर्म राजा का वो खौफ बैठ गया जो मरते दम तक उनके साथ रहा।

अगर आज केरल और दक्षिण भारत में सनातन धर्म ज़िंदा है, अगर आज वहां हमारे भव्य मंदिर खड़े हैं और लोग माथे पर चंदन लगाकर घूम पा रहे हैं, तो उसकी एक अहम वजह सम्राट ‘धर्म राजा’ हैं ।

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