अगर आप आज किसी विदेशी से पूछोगे की दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज कहाँ है, तो वो चीन या यूरोप का नाम नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के कश्मीर का नाम लेगा!
जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में चिनाब नदी के ऊपर खड़ा ये सेतु नए भारत का वो गुरूर है, जिसके आगे आज पूरी दुनिया नतमस्तक है। अमेरिका और यूरोप की यूनिवर्सिटियों में हमारे इस ब्रिज की केस स्टडी पढ़ाई जा रही है।
लेकिन आज जिस ‘चिनाब रेलवे ब्रिज’ की तस्वीरें देखकर पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा रही है, जो आज नए भारत का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग चमत्कार बन चुका है, क्या आपको पता है की उसे रोकने के लिए हमारे देश के ही एक खास ईकोसिस्टम ने कितनी गंदी और नीच साज़िश रची थी?
कांग्रेस ने इस नेशनल प्रोजेक्ट को हमेशा के लिए मिट्टी में दफन करने की पूरी तैयारी कर ली थी। इन्हें देश के गौरव से कोई मतलब नहीं था, इन्हें तो बस अपने राजनीतिक आकाओं का वो एजेंडा चलाना था जिसके तहत कश्मीर हमेशा भारत से कटा रहे।
चलिए आज इस ‘पीआईएल (PIL) गैंग’ के काले टूलकिट का पूरा चिट्ठा खोलते हैं, जिसे पढ़कर हर सच्चे हिंदुस्तानी का खून उबलना तय है।
पेरिस के ‘एफिल टावर’ से ऊंचे इस आश्चर्यजनक ब्रिज ने कैसे उड़ाई पाकिस्तान और भारत के गद्दारों की नींद
पहले ज़रा इस बात को समझिए की आखिर इस चिनाब ब्रिज में ऐसा क्या है जिसने इस पूरे ईकोसिस्टम की रातों की नींद हराम कर दी थी। ये कोई मामूली लोहे का ढांचा नहीं है।
नदी के तल से 359 मीटर की ऊंचाई पर बना ये दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज है। यकीन मानिए, पेरिस का वो मशहूर ‘एफिल टावर’ भी हमारे इस ब्रिज से 35 मीटर छोटा पड़ जाता है!
लेकिन इस ब्रिज की असली ताकत इसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि इसके मक़सद में छिपी है। ये उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (USBRL) का वो ब्रह्मास्त्र है जो कश्मीर घाटी को सीधे कन्याकुमारी तक भारत की मुख्यधारा से जोड़ता है।
दशकों से कश्मीर जाने का सिर्फ एक ही मुख्य रास्ता था- जवाहर सुरंग वाला हाईवे, जो सर्दियों में भारी बर्फबारी या लैंडस्लाइड की वजह से अक्सर हफ्तों तक बंद रहता था। कश्मीर कट जाता था और वहां बैठे अलगाववादी इसी बात का फायदा उठाकर अपना ज़हरीला एजेंडा चलाते थे।
अब अगर ये ब्रिज बन गया, तो कश्मीर पूरे साल, हर मौसम में भारत के बाकी हिस्सों से जुड़ा रहेगा। इससे सीमा पार बैठे पाकिस्तान और उसके पाले हुए आतंकियों की नींद उड़ना तो बिल्कुल समझ में आता है।
लेकिन सोचने वाली बात ये है की दिल्ली के लुटियंस जोन में बैठे कांग्रेसी नेताओं और उनके दरबारी ‘अर्बन-नक्सलों’ के पेट में मरोड़ क्यों उठ रहे थे?
जवाब बहुत सीधा है- अलगाववाद की जिस आग पर कांग्रेस दशकों से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही थी, ये रेलवे ब्रिज उस आग पर पानी डालने वाला था।
कश्मीर के लोग जब सीधे तौर पर देश की तरक्की से जुड़ते, तो इन नेताओं की दुकान-वुकान हमेशा के लिए बंद हो जाती।
दुश्मन सिर्फ बॉर्डर पार नहीं था दोस्त, असली दुश्मन तो हमारे सिस्टम के भीतर बैठकर इस महा-प्रोजेक्ट की जड़ें खोद रहा था।
प्रशांत भूषण और पीआईएल गैंग का वो खौफनाक टूलकिट जिसे मिला हुआ था कांग्रेसी आकाओं का पूरा आशीर्वाद
जब सीधे तौर पर इस प्रोजेक्ट का विरोध करना मुमकिन नहीं हुआ, तो इस ईकोसिस्टम ने अपने सबसे पुराने और आज़माए हुए हथियार का इस्तेमाल किया- और वो हथियार है ‘पीआईएल (PIL) का धंधा’।
जनहित याचिका (Public Interest Litigation) के नाम पर देश के विकास में अड़ंगा लगाना इस गैंग का पुराना शगल है।
इस साज़िश का जिम्मा उठाया लुटियंस दिल्ली के उस वकील ने, जो राफेल से लेकर सेंट्रल विस्टा तक, हर उस प्रोजेक्ट के खिलाफ खड़ा नज़र आता है जिससे भारत मजबूत होता हो।
जी हां, हम बात कर रहे हैं प्रशांत भूषण और उनकी कुख्यात NGO ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (CPIL) की। ये वही प्रशांत भूषण हैं जिन्हें कश्मीर में जनमत संग्रह (Plebiscite) जैसी बातें करने में कभी कोई परहेज़ नहीं रहा।
प्रशांत भूषण और उनकी इस NGO ने बाकायदा दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और चिनाब ब्रिज सहित पूरे USBRL प्रोजेक्ट को रोकने के लिए एक पीआईएल ठोक दी।
कहने को तो यह एक NGO की याचिका थी, लेकिन राजनीति को समझने वाला बच्चा-बच्चा जानता है की इस पूरे ड्रामे को पीछे से किस ‘हाथ’ का आशीर्वाद मिला हुआ था।
कांग्रेस हमेशा से इस ‘पीआईएल गैंग’ के लिए ढाल बनकर खड़ी रही है। जब खुद सामने आकर किसी विकास कार्य को रोकना होता है तो फजीहत के डर से ये नेता पीछे छिप जाते हैं और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को कोर्ट में खड़ा कर देते हैं।
इनका मकसद साफ था.. मामले को कोर्ट के पचड़ों में ऐसा फंसा दो की सरकार थक-हार कर प्रोजेक्ट ही बंद कर दे।
अगर ये ब्रिज नहीं बनेगा, तो कश्मीर तक रेल नहीं पहुंचेगी, और अगर रेल नहीं पहुंचेगी, तो वहां अलगाववाद और आतंकवाद की फसल लहलहाती रहेगी।
इसी खौफनाक टूलकिट के दम पर इन्होंने भारत की तरक्की को बेड़ियां पहनाने का वो गंदा खेल शुरू किया, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ी।
“अरे ये तो गिर जाएगा और आतंकी इसे उड़ा देंगे…” कोर्ट में दिए गए इन कांग्रेसियों के बेहूदे और शर्मनाक बहाने
कोर्ट के अंदर इस गैंग ने जिस बेशर्मी से इस ब्रिज को रोकने के तर्क दिए, उन्हें सुनकर कोई भी अपना सिर पीट ले।
जब आप कोर्ट के पुराने रिकॉर्ड्स खंगालेंगे, तो आपको पता चलेगा की प्रशांत भूषण ने इस महा-प्रोजेक्ट को डिब्बे में डालने के लिए कैसे-कैसे फर्जी और बेतुके बहाने बनाए थे।
इनका सबसे पहला और सबसे घटिया तर्क था- ‘सुरक्षा का डर’। इन्होंने कोर्ट में चिल्ला-चिल्ला कर कहा की हुज़ूर, यह ब्रिज लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के बहुत करीब बन रहा है। ये इतना बड़ा टारगेट है की आतंकी इसे आसानी से बम से उड़ा देंगे!
मतलब सोचो ज़रा इनकी मानसिकता को! आतंकियों के डर से क्या हम अपने ही देश में विकास करना छोड़ दें? क्या हम अपने ही घर में दीवार इसलिए न बनाएं क्योंकि पड़ोसी का गुंडा उसे गिरा देगा?
यही तो पाकिस्तान चाहता था की भारत डर के मारे कश्मीर में कुछ बनाए ही नहीं! और हमारे देश के ये बड़े-बड़े वकील उसी पाकिस्तानी एजेंडे को कोर्ट में ढो रहे थे।
जब आतंकियों वाले बहाने से बात नहीं बनी, तो इन्होंने ‘पर्यावरण और डिज़ाइन’ का रोना शुरू कर दिया।
कोर्ट में उल्टी-सीधी फर्जी रिपोर्टें पेश करके कहा गया की यह पूरा इलाका ‘सीस्मिक जोन V’ (Seismic Zone V) में आता है, मतलब यहां भयंकर भूकंप आते हैं।
इनका तर्क था की यहां कभी भी लैंडस्लाइड हो सकता है और ये ब्रिज ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
और तो और, इन्होंने सरकार पर पैसों की बर्बादी का भी आरोप मढ़ दिया। कहा गया की इस प्रोजेक्ट का रूट (Alignment) ही बिल्कुल गलत है, इसमें टैक्सपेयर्स का बहुत पैसा बर्बाद हो रहा है, इसलिए इस पूरे रूट को ही बदल दिया जाए या प्रोजेक्ट को ही सस्पेंड कर दिया जाए।
सच्चाई तो ये थी दोस्त, की इन्हें ना तो टैक्सपेयर्स के पैसों की कोई परवाह थी और ना ही यात्रियों की सुरक्षा की।
इनका असली दर्द ये था की अगर यह ब्रिज बन गया, तो इनकी वो ‘सेक्युलर और लिबरल’ राजनीति खतरे में पड़ जाएगी जो कश्मीर के अलगाव पर ज़िंदा है।
जब एडवोकेट मनिंदर सिंह ने कोर्ट में उधेड़ी इनकी बखिया और सामने ला दिया इनकी नीयत का खोट
अब कोर्ट में ये कांग्रेस गैंग तो सोचकर आया था की अपनी झूठी रिपोर्टों और हवा-हवाई बातों से जज साहब को गुमराह कर देंगे। लेकिन इन्हें अंदाज़ा नहीं था की इनका पाला किससे पड़ने वाला है!
रेलवे और भारत सरकार की तरफ से केस लड़ने उतरे सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह। भाईसाहब, मनिंदर सिंह ने कोर्ट के अंदर प्रशांत भूषण और उनके इस पीआईएल (PIL) गैंग की जो धोबिया पछाड़ दी ना, वो इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो गई है।
मनिंदर सिंह ने एक-एक करके इनके सारे झूठे तर्कों के चीथड़े उड़ा दिए। जब इन अर्बन-नक्सलों ने ब्रिज के ‘गिर जाने’ और डिज़ाइन का रोना रोया, तो मनिंदर सिंह ने कोर्ट के टेबल पर DRDO, IIT रुड़की और दुनिया की सबसे बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की फाइनल डिज़ाइन रिपोर्ट्स पटक दीं।
उन्होंने कोर्ट को बताया की अरे भाई, ये कोई तुम्हारे ईकोसिस्टम के झोलाछाप ठेकेदारों का काम नहीं है, ये भारत के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियर्स का मास्टरपीस है!
ज़रा इंजीनियरिंग का लोहा तो देखिए… मनिंदर सिंह ने साबित किया की यह चिनाब ब्रिज 8 रिएक्टर स्केल के भयंकर से भयंकर भूकंप को भी हंसते-हंसते झेल जाएगा।
हवाओं का रोना रो रहे थे ना ये लोग? कोर्ट में बताया गया की इस घाटी में अगर 266 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाला बर्बादी का तूफ़ान भी आ जाए, तो भी इस ब्रिज का एक नट-बोल्ट नहीं हिलने वाला।
और सबसे तगड़ा तमाचा तो तब पड़ा जब आतंकियों के बम विस्फोट वाली थ्योरी का कच्चा-चिट्ठा खोला गया। मनिंदर सिंह ने कोर्ट में सीना ठोक कर बताया की इस ब्रिज में 63 मिलीमीटर (63mm) मोटा स्पेशल ‘ब्लास्ट-प्रूफ’ स्टील लगाया जा रहा है।
मतलब समझ रहे हैं आप? अगर पाकिस्तान के पाले हुए ये आतंकी वहां जाकर भारी बम भी लगा दें ना, तो भी इस पुल का बाल भी बांका नहीं होगा। बम खुद शर्मा जाएगा लेकिन पुल खड़ा रहेगा!
ये सब सबूत रखने के बाद मनिंदर सिंह ने वो सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र छोड़ा जिसने इस लिबरल ईकोसिस्टम की पूरी हवा निकाल दी। उन्होंने कोर्ट में डंके की चोट पर कहा की प्रशांत भूषण की इस पीआईएल में ‘जनहित’ (Public Interest) जैसा तो कुछ है ही नहीं।
इसके पीछे शुद्ध रूप से ‘मैलाफाइड इंटेंशन’ यानी ‘नीयत में खोट’ है! इनका इकलौता मक़सद किसी भी तरह से देश के सबसे महत्वपूर्ण नेशनल प्रोजेक्ट को अटकाना, भटकाना और लटकाना है, ताकि कश्मीर कभी भी भारत से पूरी तरह जुड़ न पाए।
सच कहूं तो कोर्ट में उस दिन पीआईएल के नाम पर चल रही इस देश-विरोधी दुकान की सरेआम धज्जियां उड़ गई थीं।
दो साल तक अटका रहा देश का महाप्रोजेक्ट और टैक्सपेयर्स के करोड़ों रुपये इन कांग्रेसी गद्दारों ने करवा दिए पानी में खाक
खैर, मनिंदर सिंह की कानूनी प्रक्रिया और पुख्ता सबूतों के आगे इस लिबरल गैंग की एक न चली। पहले दिल्ली हाई कोर्ट और फिर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की इस फालतू और ज़हरीली याचिका को उठाकर कचरे के डिब्बे में डाल दिया।
रेलवे को क्लीन चिट मिल गई और साफ कह दिया गया की ब्रिज का डिज़ाइन एकदम परफेक्ट है, काम चालू रखो।
लेकिन भाई, क्या हम सच में जीत गए? नहीं! कोर्ट से केस जीतने के बावजूद हमारे देश का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था।
वो इसलिए क्योंकि इन मुकदमों, तारीखों और स्टे (Stay) ऑर्डर्स के चक्कर में चिनाब ब्रिज का काम पूरे के पूरे 2 साल तक अटका रहा।
दो साल! ज़रा सोचिए! जो प्रोजेक्ट हमारे देश की शान था, जो कश्मीर को देश से जोड़ने वाली लाइफलाइन था, उसे विदेशी फंडिंग पर पलने वाले एक NGO ने महज़ चंद कागज़ों के दम पर 2 साल तक रोक कर रखा।
और इसका खामियाज़ा किसने भुगता? हमारे और आपके जैसे आम टैक्सपेयर्स ने! 2 साल तक काम रुकने का मतलब समझते हैं आप? प्रोजेक्ट की लागत कई सौ करोड़ रुपये बढ़ गई।
लेबर, मशीनरी, विदेशी एक्सपर्ट्स… सबका पैसा बर्बाद हुआ। क्या प्रशांत भूषण या उनको पीछे से सपोर्ट कर रही कांग्रेस पार्टी ने इस नुकसान का एक रुपया भी अपनी जेब से भरा? बिल्कुल नहीं!
ये हमारे लचर सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है यार। कोई भी झोलाछाप एनजीओ (NGO) देश के विकास को रोकने के लिए एक पीआईएल (PIL) टाइप करता है, और हमारा सिस्टम उसे गंभीरता से लेकर करोड़ों का नेशनल प्रोजेक्ट रोक देता है।
अगर यही काम चीन या रूस जैसे देशों में किसी ने किया होता ना, तो अब तक उसे ‘देशद्रोह’ के जुर्म में अंदर डाल दिया गया होता।
लेकिन हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की आज़ादी और जनहित के नाम पर ये गद्दार दिन-दहाड़े देश की तरक्की का गला घोंटते हैं और शाम को AC कमरों में बैठकर विदेशी शराब उड़ाते हैं।
सेना कश्मीर ना पहुंच पाए और वहां जिहाद फलता-फूलता रहे… यही था इस विकास विरोधी कांग्रेस टूलकिट का असली एजेंडा
अब आते हैं इस पूरे षड्यंत्र के असली कारण पर। डॉट्स को कनेक्ट करेंगे तो पूरा खेल शीशे की तरह साफ हो जाएगा।
आखिर इस कांग्रेस समर्थित गैंग को इस रेलवे ब्रिज से इतनी भयंकर नफरत क्यों थी? क्यों ये एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे थे की चिनाब पर ट्रेन कभी दौड़े ही ना?
असली दर्द ना तो पर्यावरण का था, ना डिज़ाइन का था, और ना ही टैक्सपेयर्स के पैसों का। इनका असली खौफ था ‘इंडियन आर्मी’ का कश्मीर तक सीधा मूवमेंट!
ज़रा भौगोलिक स्थिति को समझिए। अब तक सर्दियां आते ही कश्मीर घाटी देश से कट जाती थी। भारी बर्फ़बारी में सेना को भारी हथियार, गोला-बारूद और रसद पहुंचाने में पसीने छूट जाते थे।
आतंकियों और पत्थरबाज़ों के लिए यही सर्दियों के 3-4 महीने जन्नत होते थे। लेकिन इस चिनाब ब्रिज और पूरी रेलवे लाइन के चालू होने का मतलब क्या है?
इसका सीधा सा मतलब ये है की अब चाहे कश्मीर में 10 फुट बर्फ़ गिर जाए, भारतीय सेना सीधे रेलगाड़ियों पर अपने T-90 टैंक और भारी तोपें लादकर कुछ ही घंटों में सीधे बारामूला तक पहुँच जाएगी!
ये ब्रिज भारतीय सेना की वो रग है, जिससे सीधे तौर पर आतंकियों की कमर टूटने वाली है। और कांग्रेस का ये पूरा लिबरल इकोसिस्टम इसी बात से कांप रहा था।
कश्मीर में शांति हो गई, जिहाद खत्म हो गया, तो ये जो ‘कश्मीर समस्या’ के नाम पर सालों-साल से इनकी राजनीतिक रोटियां सिक रही थीं, वो तवा ही ठंडा हो जाता ना!
इन्हें वहां शांति नहीं चाहिए। इन्हें एक ऐसा सुलगता हुआ कश्मीर चाहिए जिसके नाम पर ये अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर ‘मानवाधिकार’ का रोना रो सकें और विदेशी फंडिंग डकार सकें।
यही इस टूलकिट का सबसे काला और घिनौना सच था। लेकिन आख़िरकार, सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं!
आज जब उस गगनचुंबी चिनाब ब्रिज के ऊपर से तिरंगा लहराती हुई ‘वन्दे भारत’ और मालगाड़ियां गुज़र रही हैं, तब इन कांग्रेसी नेताओं और प्रशांत भूषण जैसे लोगों के मुंह पर ऐसी कालिख पुती है जो सात जन्मों तक नहीं छूटेगी।
आज पूरी दुनिया भारत के इंजीनियर्स का लोहा मान रही है। जो लोग हमें ‘सपेरों का देश’ कहते थे, वो आज हमारे इस ब्रिज की तस्वीरें अपने इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं। लेकिन हम हिंदुस्तानियों को एक बात हमेशा गांठ बांध कर रखनी होगी।
हमारे दुश्मन सिर्फ बॉर्डर के उस पार हथियारों के साथ नहीं बैठे हैं… हमारे सबसे खतरनाक दुश्मन तो हमारे ही सिस्टम के भीतर, सूट-बूट और काले कोट पहनकर बैठे हैं, जो हमेशा मौके की ताक में रहते हैं की कब भारत के विकास की पीठ में छुरा घोंपा जाए।
