आजकल राहुल गांधी और उनकी पूरी कांग्रेस पार्टी हाथ में संविधान की एक छोटी सी लाल किताब पकड़कर ऐसे लहराते हैं, जैसे बाबा साहेब अंबेडकर के सबसे बड़े सगे यही लोग हों।
ये लोग जो दिन-रात “संविधान बचाओ, संविधान बचाओ” का रोना रोते हैं ना, असल में ये आज़ाद भारत के सबसे बड़े दोगले और बेशर्म लोग हैं।
सच तो ये है की इसी कांग्रेस पार्टी के परनाना जवाहरलाल नेहरू ने अपने चहेते मुस्लिम वोटबैंक के लालच में बाबा साहेब के सबसे बड़े सपने- यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) यानी समान नागरिक संहिता- का सरेआम खात्मा कर दिया था।
जब ये देश आज़ाद हुआ, तो हमसे कहा गया की भारत एक ‘सेक्युलर’ देश है, जहाँ सबके लिए बराबर कानून होगा।
लेकिन जब पूरे देश में UCC लागू करने और एक देश-एक कानून बनाने की बारी आई, तो मुल्लों और मौलवियों के फतवों के आगे पूरी की पूरी कांग्रेस सरकार घुटनों के बल बैठ गई। शांतिदूतों के उस मुगलों वाले शरिया कानून को हाथ तक नहीं लगाया गया।
आज इस देश में वक्फ बोर्ड जैसी जो खौफनाक बीमारी पनप रही है, जो तीन तलाक, हलाला और चार-चार शादियां करने का नंगा नाच दशकों तक इस देश में चला, वो आसमान से नहीं टपका।
ये सब जवाहरलाल नेहरू की उस ‘राजनीतिक कायरता’ और बेशर्म तुष्टिकरण का सीधा नतीजा है। जब देश के पहले प्रधानमंत्री ने ही मुसलमानों के सामने अपनी पतलून गीली कर दी थी, तो भला ये ‘शांतिदूत’ सिर पर क्यों नहीं चढ़ते?
आज हम इतिहास के उन पन्नों को फाड़कर बाहर निकालेंगे जिन्हें कांग्रेस ने सालों तक हमसे छुपा कर रखा।
आज बात होगी उस खौफनाक गद्दारी की, जब नेहरू ने UCC का गला घोंटते हुए मान लिया था की मुल्लों के कानूनों को हाथ लगाने की उनकी कोई औकात नहीं है।
बाबा साहेब का UCC, एक देश एक कानून का सपना और शरिया के खौफ से कांपने वाले नेहरू की शांतिदूत वोटबैंक वाली रोटी
संविधान सभा में जब इस देश का भविष्य लिखा जा रहा था, तब बाबा साहेब अंबेडकर की सोच शीशे की तरह एकदम साफ थी। बाबा साहेब कोई मामूली नेता नहीं थे, वो जानते थे की अगर इस देश को एकजुट रखना है, तो कानून सबके लिए बराबर होना ही चाहिए।
उनका विजन बहुत क्लियर था की जब देश एक है, संसद एक है, तो शादी-ब्याह, तलाक, प्रॉपर्टी और गोद लेने के कानून मजहब के हिसाब से अलग-अलग क्यों होने चाहिए?
बाबा साहेब चाहते थे की भारत में ‘समान नागरिक संहिता’ यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) सख्ती से और तुरंत लागू हो।
लॉजिक सीधा था- कानून देश के संविधान से चलेगा, किसी मजहबी किताब या मुल्ले के फतवे से नहीं। लेकिन भाई, जैसे ही बाबा साहेब ने ये प्रस्ताव रखा, संविधान सभा में बैठे उन मुस्लिम नेताओं के पेट में दर्द होना शुरू हो गया। उ
न्हें अपना शरिया और मजहबी ठेकेदारी खतरे में नज़र आने लगी। वो सीधे नेहरू के पास पहुंच गए रोने-गाने के लिए।
अब यहाँ एंट्री होती है नेहरू के गंदे वोटबैंक वाले डर की। नेहरू को लगा की अगर मैंने इन कट्टरपंथियों को नाराज़ किया, तो मेरा ये जो थोक के भाव में मिलने वाला मुस्लिम वोटबैंक है, ये खिसक जाएगा।
बजाय इसके की नेहरू एक मजबूत प्रधानमंत्री की तरह बाबा साहेब के साथ खड़े होते, उन्होंने बाबा साहेब को ही किनारे कर दिया। मुस्लिम नेताओं के आगे सरेंडर करते हुए नेहरू ने एक ऐसी चाल चली जिसने UCC की वहीं पर हत्या कर दी।
नेहरू ने UCC को संविधान के अनिवार्य हिस्से से निकालकर ‘नीति निर्देशक तत्वों’ (Directive Principles of State Policy – Article 44) वाले ठंडे बस्ते में फेंक दिया।
इसका सीधा सा मतलब था की सरकार की जब मर्जी होगी तब UCC लाएगी, कोई ज़बरदस्ती नहीं है। यानी मुल्लों पर कभी कोई कानून नहीं थोपा जाएगा।
बाबा साहेब उसी पल समझ गए थे की नेहरू की नीयत में खोट है और इस आदमी के लिए देश से बड़ा अपना वोटबैंक है।
विदेशी पत्रकार के सामने नेहरू की कायरता का कुबूलनामा “हमारी औकात नहीं की मुल्लों के कानून को छू सकें”
अगर आपको लगता है की नेहरू पर ये तुष्टिकरण का आरोप कोई मनगढ़ंत कहानी है, तो ज़रा गूगल खंगाल कर देख लीजिए। सच्चाई ऐसी है की सुनकर किसी भी आत्मसम्मान वाले इंसान का खून खौल उठेगा।
1955-56 का दौर था। एक बहुत ही मशहूर फ्रांसीसी-हंगेरियन पत्रकार भारत आए थे, जिनका नाम था टिबॉर मेंडे (Tibor Mende)।
उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ बहुत लंबे-लंबे इंटरव्यू किए थे, जो बाद में बाकायदा एक किताब के रूप में छपे जिसका नाम है “Conversations with Mr. Nehru”।
इस इंटरव्यू में टिबॉर मेंडे ने नेहरू से सीधा और चुभने वाला सवाल पूछ लिया। मेंडे ने पूछा की मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, आप हिंदुओं के पुराने कानूनों को तो एकदम बदल रहे हैं, उन पर नया हिंदू कोड बिल लागू कर रहे हैं, तो फिर आप मुसलमानों के कानूनों (Muslim Personal Law) में बदलाव क्यों नहीं कर रहे? आप पूरे देश के लिए एक कानून (UCC) क्यों नहीं लाते?
इस पर नेहरू ने जो बेशर्म जवाब दिया, वो आज भी कांग्रेस के मुंह पर एक करारा तमाचा है। नेहरू ने अंग्रेजी में कहा, “The time is not ripe”। यानी अभी सही समय नहीं आया है।
नेहरू ने आगे लीपापोती करते हुए कहा की “हम मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर उनकी मर्ज़ी के बिना कोई कानून नहीं थोप सकते। हमें उनका दिल जीतना होगा।”
अब आप ही बताइए, ये “The time is not ripe” का क्या ड्रामा था? क्या आजादी के वक्त कानून सिर्फ बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए बने थे? अगर सीधी और ठेठ भाषा में कहें तो देश के प्रधानमंत्री ने एक विदेशी पत्रकार के सामने खुलेआम अपनी कायरता कुबूल कर ली थी।
नेहरू ने इशारों-इशारों में मान लिया था की मेरी इतनी हैसियत या औकात नहीं है की मैं कट्टरपंथी मुस्लिमों के फतवों और शरिया कानून में रत्ती भर भी दखल दे सकूं।
हिंदुओं पर डंडा चलाना आसान था क्योंकि हिंदू सहिष्णु है, वो सड़क पर उतरकर दंगे नहीं करता। पर शांतिदूतों को छूने में नेहरू के हाथ कांपते थे।
भरी संसद में जेबी कृपलानी ने नेहरू को कहा कायर, और नेहरू की कर दी बोलती बंद
नेहरू का ये दोगलापन देश के बाकी बड़े नेताओं से छुप नहीं पाया था। मई 1955 का महीना था। संसद का मानसून सत्र चल रहा था और अंदर ‘हिंदू कोड बिल’ को लेकर भयंकर बहस छिड़ी हुई थी।
नेहरू पूरे फॉर्म में थे और हिंदुओं को ज्ञान बांट रहे थे की आपको अपनी पुरानी परंपराएं छोड़नी पड़ेंगी, आप एक से ज्यादा शादी नहीं कर सकते, आपको सेक्युलर बनना पड़ेगा।
तभी सदन में एक ऐसे दिग्गज नेता अपनी सीट से उठे, जिनकी आवाज़ सुनकर अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती थी। ये थे आचार्य जे.बी. कृपलानी (J.B. Kripalani)।
कृपलानी जी से नेहरू का ये पाखंड बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने भरी संसद में खड़े होकर नेहरू की आंखों में आंखें डालीं और जो ललकार भरी, उसने नेहरू के सारे सेक्युलरिज्म के छिलके उतार दिए।
कृपलानी ने भरी संसद में दहाड़ते हुए कहा था, “मैं आपकी सरकार पर सांप्रदायिक (Communal) होने का आरोप लगाता हूँ! आप सिर्फ हिंदुओं के लिए एक विवाह (Monogamy) का कानून ला रहे हैं और इसे बड़ा भारी समाज सुधार बता रहे हैं।
अगर ये इतना ही बड़ा सुधार है, तो इसे मुसलमानों पर लागू क्यों नहीं करते? मुझे यकीन है की मुस्लिम समुदाय भी इसके लिए तैयार हो जाएगा, लेकिन असलियत ये है की आपके अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं है की आप उन पर ये कानून लागू कर सकें!”
ये कोई छोटी बात नहीं थी भाई। एक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी ने देश के प्रधानमंत्री को भरी संसद में सीधा ‘कायर’ बोल दिया था। कृपलानी जी ने साफ कर दिया की नेहरू की ये सरकार पूरी तरह से सांप्रदायिक है जो सिर्फ हिंदुओं के साथ खिलवाड़ कर रही है।
और जानते हैं नेहरू ने क्या किया? नेहरू मुंह लटकाए अपनी सीट पर बैठे रहे। उनके पास कृपलानी के इस सच का कोई जवाब नहीं था। पूरी संसद गवाह थी की नेहरू का सेक्युलरिज्म सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को दबाने और शांतिदूतों की चाटुकारिता करने का दूसरा नाम था।
“मैं प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा”, हिंदुओं पर धमकी देकर थोपा गया कानून और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की खौफनाक चेतावनी
ज़रा इस पाखंडी सेक्युलरिज्म का लेवल देखिए। एक तरफ नेहरू विदेशी पत्रकारों के सामने गिड़गिड़ा रहे थे की मुसलमानों पर कानून थोपने का अभी ‘सही समय’ नहीं आया है, और दूसरी तरफ वही नेहरू बहुसंख्यक हिंदुओं की छाती पर बंदूक रखकर ‘हिंदू कोड बिल’ थोप रहे थे।
नेहरू का घमंड इतना आसमान छू रहा था की उन्होंने खुलेआम धमकी दे दी थी की अगर संसद ने हिंदुओं के खिलाफ ये बिल पास नहीं किया, तो मैं प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दूंगा।
मतलब, जब शांतिदूतों के शरिया की बात आई तो नेहरू की घिग्घी बंध गई, लेकिन जब बात हिंदुओं की परंपराओं को कुचलने की आई, तो नेहरू एकदम तानाशाह बन गए!
देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक ने नेहरू को खत लिखकर चेतावनी दी थी की हिंदुओं के निजी मामलों में इस तरह का दखल मत दीजिए, लेकिन तुष्टिकरण के नशे में चूर नेहरू ने किसी की नहीं सुनी।
उसी वक्त संसद में जनसंघ (आज की बीजेपी के पूर्वज) के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू के इस दोगलेपन की धज्जियां उड़ा कर रख दी थीं।
डॉ. मुखर्जी ने संसद में खड़े होकर नेहरू की आंखों में आंखें डालीं और जो ललकार भरी, वो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है।
मुखर्जी ने डंके की चोट पर कहा था, “मैं इस बिल को लाने वालों की असलियत और उनकी कमज़ोरी बहुत अच्छे से जानता हूँ।
इनकी हिम्मत नहीं है, इनकी इतनी औकात नहीं है की ये मुस्लिम माइनॉरिटी को छू भी सकें! लेकिन आप हिंदू समुदाय के साथ जो चाहे खिलवाड़ कर रहे हैं क्योंकि आपको पता है हिंदू सहिष्णु है।”
डॉ. मुखर्जी का सवाल एकदम सीधा था- अगर आप सच में इतने बड़े समाज सुधारक हैं, अगर आपको औरतों के हकों की इतनी ही चिंता है, तो कानून पूरे देश के लिए लाइए। सिर्फ हिंदुओं को ही क्यों अपनी इस सेक्युलर लैबोरेटरी का चूहा बना रखा है?
पर नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था। नेहरू ने मुखर्जी की खौफनाक चेतावनी को अनसुना कर दिया और हिंदुओं के सारे रीति-रिवाज़ बदलकर उन्हें एक नए सांचे में ढाल दिया, जबकि मुल्लों को 4-4 शादियां करने और अपनी औरतों को तीन तलाक की आग में झोंकने के लिए पूरी तरह आज़ाद छोड़ दिया।
27 सितंबर 1951 का वो काला दिन जब नेहरू की नीचता से टूटकर बाबा साहेब ने दिया इस्तीफा, भरी सभा में किया जलील
अब आते हैं उस सबसे बड़े और दर्दनाक सच पर, जिसे कांग्रेसी इकोसिस्टम आज तक छुपाता आया है। बाबा साहेब अंबेडकर ने दिन-रात एक करके, अपनी पूरी जान लगाकर हिंदू कोड बिल का ड्राफ्ट तैयार किया था।
उनकी शर्त साफ थी की पहले ये बिल पास हो और उसके तुरंत बाद पूरे देश के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लाया जाए ताकि इस देश में कोई मजहबी भेदभाव ना बचे।
लेकिन बाबा साहेब को क्या पता था की उनका पाला एक ऐसे इंसान से पड़ा है जिसके लिए अपना वोटबैंक देश के संविधान से भी बड़ा है।
जब नेहरू ने देखा की कट्टरपंथी मौलवी और उनके मुस्लिम नेता बवाल काट रहे हैं, तो नेहरू ने बाबा साहेब की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया।
नेहरू ने हिंदू कोड बिल को भी टुकड़ों में बांट दिया और UCC का तो नाम लेने से ही मुकर गए। बाबा साहेब अंदर तक टूट चुके थे। उन्हें साफ दिख गया था की ये सेक्युलरिज्म का चोला ओढ़े नेहरू असल में जिहादियों का सबसे बड़ा गुलाम है।
अपने इसी भयानक अपमान और नेहरू की इस गद्दारी से तंग आकर अंततः 27 सितंबर 1951 को बाबा साहेब अंबेडकर ने देश के पहले कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
ये आज़ाद भारत के इतिहास का वो काला दिन था, जब एक सच्चे देशभक्त को एक वोटबैंक के लालची नेता ने लात मारकर बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
और कांग्रेस की नीचता देखिए! जब कोई मंत्री इस्तीफा देता है, तो उसे संसद में अपना ‘इस्तीफे का बयान’ (Resignation Speech) पढ़ने का अधिकार होता है। बाबा साहेब अपना बयान लेकर संसद पहुंचे थे।
वो देश को बताना चाहते थे की नेहरू ने देश के साथ क्या धोखा किया है। लेकिन नेहरू के इशारे पर स्पीकर ने बाबा साहेब को संसद में अपना बयान तक ढंग से नहीं पढ़ने दिया।
उन्हें बार-बार टोका गया, जलील किया गया। हारकर बाबा साहेब को संसद से बाहर आना पड़ा और उन्होंने अपना वो ऐतिहासिक पर्चा सीधे मीडिया और प्रेस वालों के हाथ में थमा दिया।
बाबा साहेब ने अपने उस बयान में साफ लिखा था की जिस तरह से UCC को मारा गया है और जिस तरह से सरकार काम कर रही है, वो उनके लिए एक बहुत बड़ा सदमा है।
और आज? आज उसी नेहरू के खानदान का चश्म-ओ-चिराग राहुल गांधी रैलियों में संविधान की कॉपी हिलाकर दलितों को बेवकूफ बनाने की कोशिश करता है!
लानत है इनकी इस बेशर्मी पर, जिन्होंने जीते जी बाबा साहेब को खून के आंसू रुलाए, वो आज उनके नाम पर वोट मांग रहे हैं।
शांतिदूतों का कचरा साफ करने और देश में UCC का डंडा चलाने का आ गया है वक्त
इतिहास कोई बंद किताब नहीं है। नेहरू ने उस वक्त मुल्लों के डर से जो कायरता दिखाई थी, जो UCC का कत्ल किया था, उसी का नतीजा है की आज पूरा देश भुगत रहा है।
अगर 1950 के दशक में ही बाबा साहेब की बात मान ली गई होती, तो क्या आज इस देश में हलाला जैसी घिनौनी प्रथाएं ज़िंदा होतीं? क्या तीन तलाक के नाम पर औरतों की ज़िंदगी तबाह होती?
क्या आज ये वक्फ बोर्ड नाम का दानव पैदा होता जो पूरे देश की ज़मीनों, हमारे मंदिरों और किसानों के खेतों को निगल रहा है? बिल्कुल नहीं!
ये सारी बीमारियां, ये सारा इस्लामिक आतंकवाद नेहरू के उसी ‘तुष्टिकरण वाले बीज’ से पैदा हुआ है जिसे उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए बोया था। पर कहते हैं ना की पाप का घड़ा एक दिन जरूर फूटता है।
आज देश में वो सरकार बैठी है जिसकी हैसियत भी है और जो इन कट्टरपंथियों की आंखों में आंखें डालकर शरिया को कूड़ेदान में फेंकने की हिम्मत भी रखती है। तीन तलाक तो बस एक झांकी थी, असली हथौड़ा तो अब UCC के रूप में चलने वाला है।
अब वक्त आ गया है की इस दोगली कांग्रेस के असली चेहरे को देश के हर कोने, हर गांव और हर नुक्कड़ पर बेनकाब किया जाए।
जो लोग वोटबैंक के लिए बाबा साहेब का अपमान कर सकते हैं, जो हिंदुओं पर तानाशाही थोपकर शांतिदूतों के आगे मुजरा कर सकते हैं, वो इस देश के कभी सगे हो ही नहीं सकते।
जब आज मोदी सरकार और कई राज्य सरकारें देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) लागू करने की बात कर रही हैं, तो सबसे ज्यादा पेट दर्द भी इसी कांग्रेसी इकोसिस्टम और इन जिहादी ठेकेदारों को हो रहा है।
क्यों? क्योंकि इनकी दशकों पुरानी वो मजहबी दुकान बंद होने वाली है।
अब हमें साफ-साफ और डंके की चोट पर कहना होगा की ये देश मुल्लों के फतवों या सातवीं सदी के शरिया कानून से नहीं चलेगा। ये देश बाबा साहेब के संविधान से चलेगा।
नेहरू की गलतियों और कायरता का जो कचरा 70 सालों से इस देश में सड़ रहा है, उसे साफ करने का वक्त आ गया है। UCC तो अब हर हाल में लागू होकर रहेगा, चाहे इन शांतिदूतों को कितनी भी मिर्ची क्यों न लगे!
