यूपी के कैराना से केरल के मलप्पुरम तक खौफनाक डेमोग्राफिक जिहाद, हिन्दू परिवारों को खदेड़ कर छोटा पाकिस्तान बनाने की तैयारी

आज इन कट्टरपंथियों और जिहादियों को भारत पर कब्ज़ा करने या गज़वा-ए-हिंद का अपना नापाक सपना पूरा करने के लिए किसी बम-बारूद की कोई ज़रूरत नहीं है।

इन्होंने एक बहुत ही खौफनाक, साइलेंट और अचूक तरीका ढूंढ लिया है- ‘डेमोग्राफिक जिहाद’। मतलब, अपनी औरतों को बच्चा पैदा करने की मशीन बनाओ, 10-12 बच्चे पैदा करो और आबादी के नंबर गेम में हिंदुओं को इतना पीछे छोड़ दो की कल को चुनाव से लेकर सड़क तक सिर्फ और सिर्फ जिहादियों का ही राज चले।

जब तक इनकी आबादी 10 से 15 प्रतिशत रहती है, तब तक ये बहुत मीठा बोलते हैं, भाईचारे का गाना गाते हैं। लेकिन जैसे ही इनकी तादाद 30 या 40 प्रतिशत का आंकड़ा पार करती है, इनकी असली और खूंखार औकात बाहर आ जाती है।

फिर ये उसी इलाके के मूल निवासी हिंदुओं की बहन-बेटियों को छेड़ना शुरू करते हैं, उनके मंदिरों के बाहर गोमांस फेंकते हैं, उनके व्यापार पर कब्ज़ा करते हैं।

ये वहां ऐसा खौफनाक माहौल बना देते हैं की एक आम और शरीफ हिंदू तंग आकर, अपनी जान और अपनी बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए अपना पुश्तैनी घर-मकान कौड़ियों के भाव बेचकर वहां से भागने पर मजबूर हो जाता है। यही कैराना, मलप्पुरम, और मेवात जैसे इलाकों में भी हुआ!

जैसे ही हिंदू वहां से भागता है, ये जिहादी गिद्ध उस घर पर कब्ज़ा कर लेते हैं। और देखते ही देखते वो पूरा का पूरा मोहल्ला, वो पूरा का पूरा गांव एक ‘छोटा पाकिस्तान’ बन जाता है। एक ऐसा इलाका जहाँ पुलिस जाने से कांपती है, जहाँ भारत का संविधान नहीं बल्कि मुल्लों के फतवे और शरिया कानून चलता है

यूपी के कैराना से कैसे रातों रात गायब हो गए हिन्दू, पलायन का वो खौफनाक दर्द और जिहादियों का मिनी पाकिस्तान

अगर आपको इस ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ का असली और खौफनाक ट्रेलर देखना है, तो ज़रा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के उस कैराना (Kairana) कस्बे को कुरेद कर देखिए।

एक वक्त था जब कैराना में हिंदुओं का डंका बजता था। वहां के हिंदू व्यापारी, सुनार और बनिये अपनी मेहनत से पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था चलाते थे। लेकिन फिर धीरे-धीरे वहां डेमोग्राफी बदली।

बाहर से जिहादियों को लाकर बसाया गया और रातों-रात वहां का पूरा माहौल ही इस्लामीकरण की भट्टी में झोंक दिया गया।

जब इनकी आबादी बहुसंख्यक हो गई, तो क्या हुआ? मुकीम काला जैसे खूंखार जिहादी गैंगस्टरों ने खुलेआम सड़कों पर गुंडागर्दी शुरू कर दी। उनका सिर्फ एक ही टारगेट था- हिंदू व्यापारी।

दिनदहाड़े हिंदुओं की दुकानों पर पर्चियां फेंकी जाने लगीं की “इतने लाख की रंगदारी दो, वरना तुम्हारे बेटे को उठा लेंगे।” हमारी हिंदू बहन-बेटियों का घर से निकलना मुहाल हो गया।

बाज़ार जाते वक्त उन पर सरेआम फब्तियां कसी जाती थीं, उनके साथ छेड़छाड़ होती थी, और अगर कोई हिंदू भाई विरोध करता, तो जिहादियों की भीड़ आकर उसे बीच चौराहे पर पीट-पीट कर अधमरा कर देती थी।

वो डर, वो खौफ इतना भयंकर था की कैराना के 300 से ज़्यादा हिंदू परिवारों ने रोते हुए अपने ही पुश्तैनी घरों के दरवाज़ों पर लिख दिया- “यह मकान बिकाऊ है।” ज़रा सोचिए उस दर्द को!

जिस घर में आपके बाप-दादाओं ने अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ारी हो, जहाँ आपका बचपन बीता हो, उन घरों को कौड़ियों के भाव इन जिहादियों को बेचकर हमारे हिंदू भाइयों को रातों-रात वहां से भागना पड़ा। जिन घरों के दरवाज़ों पर कभी ‘ओम’ लिखा होता था, वहां रातों-रात ‘786’ के बोर्ड टंग गए।

कैराना कोई कस्बा नहीं रहा था, वो एक ‘मिनी पाकिस्तान’ बन चुका था जहाँ भारत का संविधान नहीं, बल्कि मुकीम काला जैसे जिहादियों का शरिया चलता था। उस वक्त की सेक्युलर अखिलेश सरकार आंखें मूंद कर तमाशा देख रही थी क्योंकि उन्हें अपना मुस्लिम वोटबैंक प्यारा था।

अगर बाद में यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार ना आती, अगर वहां अपराधियों पर बुलडोज़र ना चलते और इन जिहादी गैंगस्टरों का एनकाउंटर ना होता, तो आज पूरा पश्चिमी यूपी हिंदुओं से खाली हो चुका होता।

कैराना का वो पलायन हमें चीख-चीख कर एक ही बात समझाता है की जहाँ भी ये जिहादी बहुसंख्यक होंगे, वहां हिंदू अपनी जान और इज़्ज़त बचाकर भागने पर मजबूर हो ही जाएगा।

केरल का मलप्पुरम, 1969 में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बनाया गया वो ज़िला जो आज बन गया जिहाद की फैक्ट्री

अगर किसी को लगता है की ये सिर्फ उत्तर भारत की समस्या है, तो ज़रा दक्षिण की तरफ केरल के मलप्पुरम ज़िले का दौरा कर लीजिए। वहां जाकर आपको लगेगा ही नहीं की आप भारत की धरती पर खड़े हैं।

वामपंथी और कांग्रेसी सरकारों के गठजोड़ ने केरल के इस ज़िले को पूरी तरह से जिहादियों की एक ऐसी लैबोरेटरी बना दिया है जहाँ अब हिंदुओं का सांस लेना भी दूभर हो गया है।

बात 1969 की है। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी (ईएमएस नंबूदरीपाद) की सरकार थी। इन्हें सत्ता में बने रहने के लिए कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम लीग’ का साथ चाहिए था।

उसी मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए, उसी तुष्टिकरण की आग में घी डालने के लिए, इन वामपंथियों ने केरल के नक्शे को चीरकर एक नया ज़िला बना दिया- मलप्पुरम (Malappuram)।

ये कोई प्रशासनिक फैसले के तहत नहीं बना था, ये भारत का इकलौता ऐसा ज़िला है जिसे बाकायदा मज़हब के आधार पर काटकर बनाया गया था ताकि ये जिहादी अपनी मनमानी कर सकें।

और आज मलप्पुरम का क्या हाल है? आज वहां 70 प्रतिशत से ज़्यादा सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों की आबादी भरी पड़ी है। वहां का मूल निवासी हिंदू आज सिकुड़ कर मात्र 27 प्रतिशत रह गया है।

वहां की दुकानों पर आपको मलयालम या अंग्रेज़ी से ज़्यादा अरबी भाषा के बड़े-बड़े बोर्ड नज़र आएंगे। वहां का पूरा का पूरा बाज़ार ‘हलाल इकॉनमी’ के खौफनाक शिकंजे में जकड़ा हुआ है।

अगर कोई हिंदू वहां अपना व्यापार करना चाहे, तो उसे कदम-कदम पर ये मज़हबी सिंडिकेट कुचलने की कोशिश करता है।

वहां की ग्राम पंचायतों से लेकर प्रशासन तक में एक ‘पैरेलल शरिया सिस्टम’ काम कर रहा है। हिंदू वहां सिर्फ एक दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रह गया है जिसे हर बात पर इन शांतिदूतों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

और सबसे खौफनाक बात क्या है? ये मलप्पुरम वही इलाका है (मालाबार का हिस्सा) जहाँ 1921 में ‘मोपला का खूनी नरसंहार’ हुआ था।

उन मोपला जिहादियों ने खिलाफत आंदोलन के नाम पर हज़ारों बेगुनाह हिंदुओं को आरे से चीर डाला था, गर्भवती औरतों के पेट फाड़ दिए थे और सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर वहां गाय का खून फेंका था।

आज उसी ज़मीन पर डेमोग्राफी को बदलकर ये जिहादी उस खौफनाक इतिहास को दोबारा दोहराने की तैयारी कर रहे हैं।

वहां से लगातार PFI और ISIS के स्लीपर सेल पकड़े जा रहे हैं। ये लोग केरल की भोली-भाली हिंदू बेटियों का ब्रेनवाश करके उन्हें लव जिहाद के जाल में फंसाते हैं और सीधा सीरिया और अफगानिस्तान में आतंकवादियों की गुलाम बनने के लिए भेज देते हैं (‘द केरल स्टोरी’ इसका जीता-जागता सुबूत है)।

और केरल की कम्युनिस्ट सरकार क्या करती है? वो इन जिहादियों को संरक्षण देती है! मलप्पुरम चीख-चीख कर बता रहा है की जब स्टेट मशीनरी और जिहादी डेमोग्राफी मिल जाते हैं, तो सनातनियों का कैसा खौफनाक दम घोंटा जाता है।

मेवात में डेमोग्राफी का नंगा नाच, जिहादियों की भीड़ कैसे कर रही हमारे गांवों पर कब्ज़ा

अगर आपको लग रहा है की ये डेमोग्राफी का खेल सिर्फ दूर पिछड़े गांवो वाले इलाकों में चल रहा है, तो ज़रा अपनी आंखें मलिए और देश की राजधानी दिल्ली से सटकर बसे हरियाणा के मेवात (नूंह) इलाके की तरफ देखिए।

दिल्ली की नाक के ठीक नीचे एक ऐसा ‘मिनी पाकिस्तान’ बस चुका है, जहाँ भारत का कानून जाने से भी खौफ खाता है। मेवात आज सिर्फ साइबर ठगी और गौ-तस्करी का ही अड्डा नहीं है, बल्कि ये ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ का सबसे जीता-जागता और खौफनाक सबूत बन चुका है।

ज़रा ज़मीनी हकीकत का वो नंगा सच सुनिए जो वामपंथी मीडिया आपको कभी नहीं बताएगा। आज मेवात के 100 से ज़्यादा गांव ऐसे हैं जो पूरी तरह से ‘हिंदू-विहीन’ हो चुके हैं।

मतलब वहां एक भी हिंदू परिवार नहीं बचा! वहां सदियों से रहने वाले हमारे गरीब दलित और वाल्मीकि भाइयों को डरा-धमका कर, उनकी बहन-बेटियों को छेड़कर और उनकी पुश्तैनी ज़मीनों पर कब्ज़ा करके उन्हें वहां से भागने पर मजबूर कर दिया गया।

ये कोई पलायन नहीं था भाई, ये बहुसंख्यक हिंदुओं की छाती पर पैर रखकर किया गया एक खौफनाक और साइलेंट कब्ज़ा था।

और जब इनकी आबादी वहां 80-90 प्रतिशत के पार हो गई, तो इनका असली और खूंखार रूप बाहर आया। उस वक़्त को याद कीजिये, जब सावन के महीने में हमारे निहत्थे हिंदू भाई-बहन ब्रजमंडल की पवित्र शोभा यात्रा निकाल रहे थे।

उन शांतिपूर्ण शिवभक्तों पर इन्हीं कट्टरपंथियों ने क्या किया? पहले से छतों और अरावली की पहाड़ियों पर छुपकर बैठे इन ‘जिहाद’ गुंडों ने हमारी यात्रा पर अंधाधुंध गोलियां और पेट्रोल बम बरसाने शुरू कर दिए।

हमारे भाइयों को घेर कर मारा गया, गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया और पुलिस वालों तक को नहीं बख्शा गया।

ये दंगा अचानक नहीं भड़का था। ये उसी बढ़ती हुई डेमोग्राफी और उस ‘जिहाद’ मानसिकता का गुरूर था जो चीख-चीख कर कह रहा था की “ये इलाका अब हमारा है, यहाँ से तुम्हारे भगवान की कोई यात्रा नहीं निकल सकती।”

जब तुम अपने ही देश में, अपनी ही ज़मीन पर अपने इष्ट देव की यात्रा नहीं निकाल सकते, तो फिर तुम्हारी आज़ादी का क्या मतलब रह गया?

मेवात हमें साफ-साफ चेतावनी दे रहा है की अगर तुमने आज अपनी आबादी और अपनी ज़मीनों को नहीं बचाया, तो कल तुम्हारे मोहल्ले भी ऐसे ही हिंदू-विहीन हो जाएंगे और तुम्हें अपने ही घरों में छुपकर रोना पड़ेगा।

जनसांख्यिकी के इस कैंसर को नैचुरल बताने वाले वामपंथी गद्दार, लिबरल इकोसिस्टम के इस सफेद झूठ की धज्जियां

अब ज़रा उन वामपंथी पत्रकारों और प्रोफेसरों के उस सबसे बड़े फ्रॉड पर बात करते हैं, जिसे ये लोग रोज़ टीवी पर बैठकर एक मीठी गोली की तरह हमें खिलाने की कोशिश करते हैं।

जब भी कोई सच्चा हिंदू देश की बदलती डेमोग्राफी और इस कट्टरपंथी आबादी के खतरे पर सवाल उठाता है, तो ये अर्बन नक्सल तुरंत अपना ‘ज्ञान’ बांचने आ जाते हैं। ये चिल्लाते हैं की “अरे डरो मत! इनका टीएफआर (TFR – Total Fertility Rate) यानी जन्मदर अब घट रही है। हिंदू खतरे में नहीं है।”

वाह रे वामपंथी गद्दारों! तुम्हारी इस बाज़ीगरी और आंकड़ों के खेल को अब देश का आम हिंदू बहुत अच्छी तरह से समझने लगा है। ज़रा इस ‘घटती दर’ का खौफनाक सच तो सुनिए।

ये कहते हैं की बच्चे पैदा करने की दर 4 से गिरकर 3 या 2.5 के करीब आ गई है। अरे बेशर्मों, भले ही वो दर गिरी हो, लेकिन वो आज भी हिंदुओं की जन्मदर (जो 1.6 से 1.9 के बीच रेंग रही है) से बहुत ज़्यादा है!

और सबसे बड़ी बात है ‘बेस पॉपुलेशन’। जब तुम्हारी आबादी पहले से ही 20-25 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है, तो उस पर अगर दर थोड़ी सी भी ज़्यादा हुई, तो वो हर साल लाखों-करोड़ों की ऐसी डेमोग्राफिक सुनामी लेकर आएगी जो पूरे देश के संसाधनों को निगल जाएगी।

मुसलमानों में आज भी 4-4 बच्चे पैदा करना और फिर उन्हें सरकारी खैरात पर पालना एक मज़हबी अधिकार माना जाता है।

सबसे कड़क जनसंख्या नियंत्रण कानून ही इस खौफनाक जिहाद का परमानेंट इलाज

अब सवाल ये उठता है की इस खौफनाक और जानलेवा बीमारी का इलाज क्या है? क्या हमें कोई और जागरूकता अभियान चाहिए? क्या हमें दीवारों पर फिर से “छोटा परिवार, सुखी परिवार” के पोस्टर चिपकाने चाहिए? बिल्कुल नहीं!

बहुत हो गई ये सेक्युलर नौटंकी। जिनको समझना था वो दशकों पहले समझ चुके हैं, और जिन्होंने ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ की अफीम खा रखी है, वो किसी पोस्टर या टीवी विज्ञापन से नहीं सुधरने वाले।

इस सुनियोजित डेमोग्राफी के खतरे को रोकने के लिए अब हमें कोई अपील या विनती नहीं करनी है, हमें चाहिए एक बेहद क्रूर, कड़क और निर्दयी ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ (Population Control Bill)।

एक ऐसा कानून जिसका चाबुक सीधे इन कट्टरपंथियों और जिहादियों की दुखती रग पर जाकर पड़े। जो भी इंसान दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करे, सरकार को रातों-रात उसके सारे सरकारी हक़ छीन लेने चाहिए।

कानून का ड्राफ्ट एकदम साफ और बारूदी होना चाहिए। तीसरे बच्चे के पैदा होते ही सबसे पहले उस परिवार का राशन कार्ड रद्द किया जाए। हम टैक्सपेयर अपने खून-पसीने की कमाई से इन मुफ्तखोरों और इनके दर्जन भर बच्चों का पेट नहीं पालेंगे।

उनके बच्चों को किसी भी सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज न मिले, किसी भी सरकारी स्कूल-कॉलेज में वज़ीफा न दिया जाए। अगर तुम्हें 10 बच्चे पैदा करने का शौक है, तो अपने दम पर पालो, देश की छाती पर बोझ मत बनो!

और सबसे बड़ा और सबसे मारक प्रहार जो इस कानून में होना चाहिए, वो है- ‘वोटिंग राइट्स’ और चुनाव लड़ने पर परमानेंट बैन! जो भी दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करे, उसका वोटर आईडी कार्ड तुरंत कैंसल कर दिया जाए। उसे ना तो प्रधान का चुनाव लड़ने दिया जाए, ना विधायक-सांसद का और ना ही सरकारी नौकरी दी जाए।

राष्ट्रीय NRC और UCC के बिना नहीं बचेगा सनातन का भविष्य, संसद में बैठे नेताओं को करोड़ों हिन्दुओं की सीधी ललकार

हम आज चांद और सूरज तक पहुंच रहे हैं। देश में रोज़ नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, हमारी इकॉनमी दुनिया में डंका बजा रही है। लेकिन ज़रा एक मिनट के लिए रुक कर सोचिए भाई!

अगर 20-30 साल बाद इस देश का हिंदू ही माइनॉरिटी बन जाएगा, अगर यहाँ की डेमोग्राफी पूरी तरह से पलट जाएगी, तो इन चमचमाते हाईवेज और बुलेट ट्रेनों का हम क्या करेंगे?

अब देश के करोड़ों सनातनियों की आज सिर्फ एक ही मांग है- हमें मॉनसून सत्र में सबसे कड़क ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’, समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय एनआरसी (Nationwide NRC) एक साथ चाहिए।

UCC के ज़रिए बहुविवाह यानी चार शादियां करने पर ऐसा बैन लगे की कोई जिहादी दूसरी शादी करने की सोचे तो सीधे जेल जाए। जनसंख्या नियंत्रण कानून के ज़रिए इस आबादी के टाइम-बम को हमेशा के लिए डिफ्यूज़ किया जाए।

और एनआरसी का डंडा चलाकर देश के चप्पे-चप्पे से उन विदेशी घुसपैठियों को कॉलर से पकड़कर, लात मारकर इस देश की सीमाओं से बाहर फेंका जाए। और जो नेता या वामपंथी इनके मानवाधिकार का रोना रोए, उस पर देशद्रोह का मुकदमा ठोककर उसे भी उन्हीं के साथ डिपोर्ट कर दिया जाए।

हमें अपने शहरों और गांवों के बीच पनप रहे इन छोटे पाकिस्तानों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। जहाँ भी पुलिस को घुसने से रोका जाता है, वहां पुलिस को नहीं, बल्कि सीधे सेना को भेजकर सर्च ऑपरेशन चलाना चाहिए। ये हमारे अस्तित्व को बचाने की आर-पार की लड़ाई है।

भारतवर्ष सदियों से सनातनियों की मातृभूमि रहा है और हमेशा रहेगा। हम अपने पूर्वजों की इस पवित्र ज़मीन को ‘दारुल-इस्लाम’ नहीं बनने देंगे। अगर हमने आज इन जिहादियों की छाती पर पैर नहीं रखा, तो कल इतिहास हमारी कायरता पर थूकेगा।

जय श्री राम! भारत माता की जय!

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