आज हम आपको जो खबर देने वाले हैं, उसे पढ़कर एक बात तो पूरी तरह से साफ हो जाएगी की हिंदुस्तान के खिलाफ जो सबसे बड़ी जंग लड़ी जा रही है ना, वो बंदूकों और गोला-बारूद से तो बिल्कुल नहीं लड़ी जा रही।
वो जंग लड़ी जा रही है बड़े-बड़े लिबरल मीडिया की इमारतों में और NGO के दफ्तरों में बैठकर। इन दफ्तरों में वो ‘सफेदपोश’ पत्रकार बैठे रहते हैं जो दिन-रात हमारे ही देश का नमक खाते हैं और फिर विदेशी डॉलर्स की खनक पर भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम करते हैं!
ये जो लोग दिन-रात टीवी और इंटरनेट पर ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’, ‘मानवाधिकार’ और ‘फैक्ट-चेकिंग’ का चोला ओढ़कर ज्ञान बांटते हैं, उनका असली शर्मनाक सच आज हम अमेरिका के टैक्स दस्तावेजों के आधार पर सरेआम करने वाले हैं।
राष्ट्रवादी संस्था ‘The Pamphlet’ की टीम की एक गहरी और पुख्ता इन्वेस्टिगेशन ने इस पूरे वामपंथी ईकोसिस्टम के उस ‘सीक्रेट टूलकिट’ को क्रैक कर लिया है, जिसे ये लोग सालों से बड़ी चालाकी से छिपा रहे थे।
विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले अर्बन-नक्सलों का पर्दाफाश और देश तोड़ने के लिए अमेरिका से आया करोड़ों का सीक्रेट फंड
अगर आप सोचते हैं की सोशल मीडिया पर अचानक से हिन्दू त्योहारों को गाली देने वाला नैरेटिव सेट हो जाता है, या देश की चुनी हुई राष्ट्रवादी सरकार को गरियाने के लिए रातों-रात कोई हैशटैग अपने आप ही ट्रेंड करने लगता है, तो आप बहुत भोले हैं दोस्त!
ये सब रैंडम नहीं होता। इसके पीछे बाकायदा एक ग्लोबल सिंडिकेट काम कर रहा है।
‘The Pamphlet’ की इन्वेस्टिगेशन टीम ने जब अमेरिका के टैक्स विभाग (IRS – Internal Revenue Service) के पब्लिक रिकॉर्ड्स को खंगाला, तो उनके हाथ एक ऐसा फॉर्म लगा जिसने इस पूरे इकोसिस्टम की बखिया उधेड़ कर रख दी।
इस फॉर्म का नाम है ‘फॉर्म 990-PF’ (Form 990-PF)। अमेरिका में जो भी प्राइवेट फाउंडेशन काम करते हैं, उन्हें ये फॉर्म भरना पड़ता है और बताना पड़ता है की उन्होंने अपना पैसा कहाँ-कहाँ बांटा।
इसी फॉर्म से एक नाम निकलकर सामने आया- ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (Thakur Family Foundation)। अमेरिका के फ्लोरिडा में बैठे इस फाउंडेशन ने भारत के खिलाफ जो खौफनाक ज़हर बोने का काम किया है, उसका डेटा चीख-चीख कर सच उगल रहा है।
साल 2019 से लेकर 2022 के बीच (महज़ चार सालों में) इस एक अमेरिकी फाउंडेशन ने भारत के 163 लोगों, पत्रकारों, वकीलों और संस्थाओं को कुल 237 ग्रांट्स (फंडिंग) बांटे।
आप अमाउंट सुनेंगे तो आपका दिमाग सुन्न हो जाएगा! इन चार सालों में भारत के इन अर्बन-नक्सलों और लिबरल गैंग को पूरे 2.02 मिलियन डॉलर यानी भारतीय रुपयों में करीब 16 से 17 करोड़ रुपये की सीक्रेट फंडिंग दी गई!
और मज़ाक देखिए, इस फाउंडेशन का दावा है की ये पैसा ‘पब्लिक हेल्थ’ (जन स्वास्थ्य) और ‘सिविल लिबर्टीज़’ (नागरिक स्वतंत्रता) के लिए दिया गया था।
अरे भाई, पब्लिक हेल्थ के नाम पर पैसा बांटना था तो देश में हज़ारों अस्पताल हैं, गरीब बच्चों के अनाथालय हैं, वहाँ देते!
लेकिन नहीं… 2021 के साल को याद कीजिए। ये वो दौर था जब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, और सड़कों पर किसान आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाई जा रही थी।
उसी साल (2021 में) अचानक से इस अमेरिकी संस्था की फंडिंग 5 गुना बढ़ जाती है और भारत में बैठे इनके दलालों के खातों में धड़ाधड़ डॉलर्स बरसने लगते हैं।
इनका इकलौता और असली मकसद था हिंदुस्तान में अस्थिरता फैलाना, हिन्दू समाज को बदनाम करना और भारत की छवि को दुनिया भर में एक ‘असहिष्णु’ देश के तौर पर पेश करना।
ऑल्ट न्यूज़ से लेकर न्यूज़लॉन्ड्री और स्क्रॉल तक, बिकाऊ पत्रकारों की पूरी फौज जिन्हें भारत के खिलाफ भौंकने के लिए मिले लाखों डॉलर्स
अब ज़रा इन बिकाऊ चेहरों की लिस्ट पर नज़र डालते हैं। सबसे बड़ा पर्दाफाश तो इन वामपंथी मीडिया पोर्टल्स और तथाकथित ‘फैक्ट-चेकर्स’ का हुआ है, जो दिन-रात निष्पक्ष होने का ऐसा ढोंग रचते हैं जैसे इनसे बड़ा हरिश्चंद्र तो दुनिया में कोई पैदा ही नहीं हुआ।
शुरुआत करते हैं ‘ऑल्ट न्यूज़’ (Alt News) से। मोहम्मद ज़ुबैर और प्रतीक सिन्हा की इस प्रोपेगेंडा मशीनरी का काम ही यही है की कैसे सनातन धर्म और राष्ट्रवादियों की छवि खराब की जाए।
‘The Pamphlet’ की तफ्तीश में सामने आया है की इस ‘ऑल्ट न्यूज़’ की साइंस एडिटर सुमैय्या शेख (Sumaiya Shaikh) को विदेशी आकाओं ने पैसों से लाद दिया।
महज़ दो सालों के भीतर इस मोहतरमा को करीब $59,000 (लगभग 49 लाख रुपये) की भयंकर फंडिंग मिली!
अब आप खुद सोचिए, जो इंसान अमेरिका से 50 लाख रुपये की ‘भीख’ खा रहा हो, वो भारत के पक्ष में फैक्ट-चेक करेगा या अपने विदेशी मालिकों के एजेंडे को हवा देगा?
इसके बाद नंबर आता है वामपंथियों के सबसे चहेते पोर्टल ‘स्क्रॉल’ (Scroll.in) का। अमेरिका की इस संस्था ने स्क्रॉल मीडिया से जुड़ी कंपनी को सीधे $25,535 (20 लाख रुपये से ज़्यादा) का चंदा दिया।
बात यहीं नहीं रुकी, स्क्रॉल की जो पत्रकार भारत के खिलाफ ज़हर उगलने वाले लेख लिखती थीं, जैसे आरफा जोहरी और मृदुला चारी… उन्हें बाकायदा इंडिविजुअल (अलग से) डॉलर्स बांटे गए।
और अब तो ज़रा अपनी हंसी रोकिएगा! याद है वो पोर्टल जो टीवी पर और सोशल मीडिया पर छाती पीट-पीट कर कहता है की “हम विज्ञापनों से पैसा नहीं लेते, हम तो सिर्फ जनता के पैसों से चलते हैं”?
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ (Newslaundry) की। मधु त्रेहान और अभिनंदन सेखरी के इस गिरोह की कंपनी ‘Toque Content Solutions’ के बैंक खाते में भी गुपचुप तरीके से $11,188 (करीब 10 लाख रुपये) ट्रांसफर किए गए।
मतलब, कैमरे के सामने आकर ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ का ऐसा रोना रोते हैं की कोई भी पिघल जाए, और पीछे से टेबल के नीचे अमेरिकी डॉलर्स की गड्डियां गिनते हैं। क्या दोगलापन है यार!
वामपंथी पत्रकारों के एक और कुख्यात गैंग ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ (The Reporters’ Collective) का नाम भी इस लिस्ट में सबसे ऊपर चमक रहा है।
नितिन सेठी और कुमार संभव जैसे लोगों वाले इस गिरोह को तो ठाकुर फाउंडेशन ने सबसे ज़्यादा प्यार दिया। इन्हें करीब $83,000 यानी 70 लाख रुपये से भी ज़्यादा का खजाना थमा दिया गया।
इन पैसों के बदले इनका काम क्या था? मोदी सरकार की हर पॉलिसी में कीड़े निकालना और देश में एक निगेटिव माहौल खड़ा करना।
इसके अलावा, दक्षिण भारत में वामपंथी प्रोपेगेंडा चलाने वाले ‘द न्यूज़ मिनट’ (Spunklane Media) और समर हलारनकर जैसे पत्रकारों के पोर्टल ‘आर्टिकल 14’ को भी डॉलर्स से जमकर सींचा गया।
इन आंकड़ों को देखकर एक बात तो शीशे की तरह साफ हो जाती है। हिंदुस्तान का जो ये वामपंथी ईकोसिस्टम है ना, इसकी कोई विचारधारा नहीं है।
इनकी विचारधारा सिर्फ ‘विदेशी डॉलर’ है। जहां से पैसा आता है, ये उसी की बोली बोलने लगते हैं। इनके लिए ‘लोकतंत्र’ और ‘मानवाधिकार’ तो बस वो बिकाऊ शब्द हैं, जिन्हें बेचकर ये अपना बैंक बैलेंस भरते हैं।
शाहीन बाग से लेकर दंगों तक आग लगाने वाले हर्ष मंदर का विदेशी कनेक्शन और एनजीओ के नाम पर चल रहा देशद्रोह का धंधा
मीडिया और पत्रकारों के बाद अब बात करते हैं इस वामपंथी ईकोसिस्टम के असली ‘मास्टरमाइंड्स’ की।
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ उन झोलाछाप एनजीओ (NGO) और तथाकथित ‘मानवाधिकार कार्यकर्ताओं’ की, जिनका इकलौता काम हिंदुस्तान की सड़कों पर अराजकता फैलाना है।
इस लिस्ट में जब हमने अर्बन-नक्सलों के पोस्टर बॉय हर्ष मंदर (Harsh Mander) का नाम देखा, तो हमें बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई।
अगर आपको याद हो, तो हर्ष मंदर वही इंसान है जो शाहीन बाग से लेकर दिल्ली के दंगों तक, हर उस जगह खड़ा नज़र आता है जहाँ भारत सरकार और देश के खिलाफ ज़हर उगला जा रहा हो।
‘सेक्युलरिज्म’ और ‘अल्पसंख्यकों के अधिकार’ का रोना रोने वाले इस इंसान का विदेशी कनेक्शन अब पूरी तरह से नंगा हो चुका है।
अमेरिकी टैक्स रिकॉर्ड्स के मुताबिक, हर्ष मंदर से जुड़ी संस्था ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ (Centre for Equity Studies) के बैंक खाते में ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ ने $66,424 यानी भारतीय मुद्रा में करीब 55 लाख रुपये से भी ज़्यादा की भारी-भरकम रकम ट्रांसफर की।
अब आप खुद दिमाग लगाइए भाईसाहब! अमेरिका में बैठा एक फाउंडेशन हर्ष मंदर जैसे इंसान को 55 लाख रुपये क्यों दे रहा है?
क्या वो भारत में कोई स्कूल बनवा रहे हैं? क्या वो गरीबों को खाना खिला रहे हैं? बिल्कुल नहीं!
ये विदेशी पैसा इसलिए भेजा जाता है ताकि भारत की सड़कों पर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का पोस्टर लेकर खड़े होने वाले भाड़े के टट्टुओं को दिहाड़ी बांटी जा सके।
ये सिविल लिबर्टीज़ (Civil Liberties) और मानवाधिकार का वो झूठा लबादा है, जिसे ओढ़कर ये एनजीओ दिन-दहाड़े देश की जड़ों में मट्ठा डालते हैं।
और बात सिर्फ हर्ष मंदर पर आकर नहीं रुकती। इसी सीक्रेट फंडिंग लिस्ट में ADR (Association for Democratic Reforms) का भी नाम है, जिसे चुनाव सुधार के नाम पर $29,868 (करीब 25 लाख रुपये) थमा दिए गए।
इसके अलावा कानूनी पचड़े पैदा करने वाले ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ (Vidhi Centre for Legal Policy) को भी $25,700 (करीब 21 लाख रुपये) की फंडिंग मिली।
ज़रा सोचिए, ये वही ईकोसिस्टम है जो भारत के हर बड़े प्रोजेक्ट, हर राष्ट्रवादी कानून (जैसे CAA) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल (PIL) का अंबार लगा देता है।
अब समझ में आ रहा है ना की इनके वकीलों की करोड़ों की फीस और इनके महंगे वकीलों का खर्च कहाँ से निकल कर आ रहा था!
अशोका से लेकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी तक विदेशी डॉलर्स का खेल जहाँ तैयार की जा रही है भारत से नफरत करने वाली नई पौध
इस विदेशी साज़िश का सबसे खौफनाक हिस्सा पत्रकारों या एनजीओ तक सीमित नहीं है।
इन विदेशी ताकतों को बहुत अच्छे से पता है की अगर भारत को अंदर से खोखला करना है, तो सबसे पहले यहां के युवाओं और भविष्य के पॉलिसी मेकर्स (नीति निर्माताओं) का ब्रेनवॉश करना होगा।
और इसके लिए इन्होंने चुना हिंदुस्तान की उन एलीट और महंगी यूनिवर्सिटीज़ को, जहां से अक्सर हिन्दू-विरोधी और वामपंथी नैरेटिव की बदबू आती रहती है।
आपको जानकर भयंकर झटका लगेगा की इस पूरे विदेशी फंड का सबसे बड़ा हिस्सा, यानी पूरे रजिस्टर की सबसे बड़ी सिंगल एंट्री किसी एनजीओ को नहीं, बल्कि ‘अशोका यूनिवर्सिटी’ (Ashoka University) को गई।
जी हाँ! इस फाउंडेशन ने अशोका यूनिवर्सिटी से जुड़ी संस्था को सीधे-सीधे $3 लाख (करीब 2.5 करोड़ रुपये) का भारी भरकम ग्रांट दे डाला।
ये अशोका यूनिवर्सिटी वामपंथियों का वो गढ़ है, जहां आए दिन ‘हिन्दू ब्राह्मणवाद से आज़ादी’ जैसे नारे गूंजते हैं, जहां के प्रोफेसर खुलकर वामपंथी एजेंडा चलाते हैं।
अब जब करोड़ों रुपये अमेरिका से आएंगे, तो ज़ाहिर सी बात है की सिलेबस और रिसर्च के नाम पर वही पढ़ाया जाएगा जो विदेशी आका चाहेंगे!
सिर्फ अशोका ही नहीं, हिंदुस्तान के बड़े-बड़े लॉ कॉलेजों और मैनेजमेंट संस्थानों में भी इन डॉलर्स की जमकर बारिश की गई।
देश की सबसे टॉप लॉ यूनिवर्सिटी ‘नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी’ (NLSIU), बेंगलुरु को दो सालों के भीतर $1,34,337 (1 करोड़ 12 लाख रुपये से ज़्यादा) दे दिए गए।
इसके बाद O.P. Jindal University (सोनीपत) को $62,618 (करीब 52 लाख रुपये) और यहां तक की IIM अहमदाबाद जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को भी ‘पब्लिक हेल्थ ग्रांट’ के नाम पर $40,000 (करीब 33 लाख रुपये) का झुनझुना थमा दिया गया।
अब यहाँ एक बहुत सीधा सा सवाल खड़ा होता है। अमेरिका के फ्लोरिडा में बैठे एक प्राइवेट फाउंडेशन को भारत के वकीलों, मैनेजमेंट छात्रों और पॉलिसी रिसर्चर्स पर डॉलर्स लुटाने की क्या खुजली मची है?
क्या अमेरिका में पब्लिक हेल्थ के मुद्दे खत्म हो गए हैं जो वो भारत की लॉ यूनिवर्सिटीज़ को पैसा दे रहे हैं?
सच्चाई तो ये है दोस्त, की ये पैसा एजुकेशन के लिए नहीं, बल्कि भारत के ‘लॉ एंड ऑर्डर’ और सिस्टम को हाइजैक करने के लिए दिया जा रहा है।
जब देश का भविष्य कहे जाने वाले लॉयर्स और रिसर्चर्स विदेशी पैसों की ग्रांट पर रिसर्च करेंगे, तो उनकी रिपोर्ट में हमेशा भारत सरकार को ही विलेन बनाया जाएगा।
ये एक पूरी की पूरी ‘फैक्टरी’ लगा दी गई है, जहां ऐसे युवाओं की पौध तैयार की जा रही है जो खाएंगे हिंदुस्तान का, लेकिन गाएंगे विदेशी आकाओं का।
हर बिके हुए ‘एक्सपर्ट’ का रेट फिक्स था, दिहाड़ी लेकर बिके भारत के ये वामपंथी बुद्धिजीवी
जब ‘The Pamphlet’ की टीम ने ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ के इन टैक्स दस्तावेजों को गहराई से खंगाला, तो ग्रांट्स (फंडिंग) बांटने का एक इतना अजीबोगरीब और बेशर्म पैटर्न सामने आया, जो सीधे-सीधे साबित करता है की ये लोग कोई ‘रिसर्च स्कॉलर’ नहीं, बल्कि विदेशी आकाओं के इशारे पर काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर हैं।
ज़रा सोचिए, जब कोई संस्था रिसर्च या मेरिट के आधार पर स्कॉलरशिप या फंड देती है, तो हर व्यक्ति का प्रोजेक्ट और उसका बजट अलग-अलग होता है ना?
लेकिन यहाँ तो खेल ही एकदम उल्टा था। साल 2021 और 2022 के डेटा में दिखा की इस फाउंडेशन ने कई तथाकथित ‘एक्सपर्ट्स’ को बिल्कुल ‘कॉपी-पेस्ट’ (Copy-Paste) अमाउंट दिया!
उदाहरण के तौर पर 2022 के आंकड़े देखिए। हर्ष मंदर, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी, जेएनयू (JNU) की रिटायर्ड प्रोफेसर इमराना कादिर, और विश्वजीत धर…
इन सबको बिल्कुल एग्जैक्ट $391 (तीन सौ इक्यानवे डॉलर) दिए गए! ना एक डॉलर कम, ना एक डॉलर ज़्यादा।
इसी तरह 2021 में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स और पॉलिसी रिसर्चर्स की एक लंबी लाइन को बिल्कुल एक समान $480 (चार सौ अस्सी डॉलर) की फंडिंग दी गई।
अरे भाई, ये कोई ग्लोबल स्कॉलरशिप चल रही थी या मनरेगा (MGNREGA) की दिहाड़ी बंट रही थी? अलग-अलग फील्ड के लोगों को, अलग-अलग रिसर्च के नाम पर बिल्कुल एक जैसा फिक्स रेट!
इसका सीधा सा मतलब ये है की अमेरिका में बैठे इनके आकाओं ने भारत के इन ‘बिके हुए चेहरों’ का एक ‘फिक्स रेट कार्ड’ बना रखा था।
तुम हमारे लिए भारत सरकार के खिलाफ एक लेख लिखो, लो अपने 391 डॉलर्स पकड़ो और चुपचाप निकल लो।
लेकिन इस पूरी साज़िश का सबसे घिनौना और खौफनाक पहलू पैसों का आना नहीं है। इसका सबसे खौफनाक पहलू है- ‘पाठकों के साथ किया गया भयंकर धोखा’।
आप ज़रा इन पत्रकारों, लॉयर्स और तथाकथित फैक्ट-चेकर्स का पाखंड देखिए। ये वही लोग हैं जो ‘स्क्रॉल’ और ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ जैसे पोर्टल्स पर दिन-रात पारदर्शिता (Transparency) और ‘सच्चाई’ पर लंबे-लंबे ज्ञान पेलते हैं।
जब कोरोना महामारी आई थी, तो इन्हीं लोगों ने भारत सरकार की नीतियों, हमारी स्वदेशी वैक्सीन और हमारे हेल्थ सिस्टम को गरियाने के लिए हज़ारों पन्नों के आर्टिकल छापे थे।
लेकिन क्या इन निष्पक्ष और ‘ईमानदार’ पत्रकारों ने कभी अपने किसी आर्टिकल के नीचे एक लाइन का डिस्क्लेमर (Disclaimer) दिया की “भैया, हम ये जो मोदी सरकार और भारत के खिलाफ ज्ञान बांट रहे हैं, इसके लिए हमें अमेरिका की फलां संस्था से हजारों डॉलर की फंडिंग मिल रही है”? नहीं! बिल्कुल नहीं!
इन्होंने भारत की भोली-भाली जनता और अपने पाठकों को पूरी तरह से अंधेरे में रखा। पब्लिक को लगा की ये तो बड़े निष्पक्ष पत्रकार हैं, जो ज़मीनी हकीकत दिखा रहे हैं।
लेकिन हकीकत में ये अपनी पत्रकारिता की आड़ में वो ‘ज़हरीला एजेंडा’ चला रहे थे, जिसकी स्क्रिप्ट और पैसा दोनों अमेरिका से आ रहा था।
ये पत्रकारिता नहीं है भाईसाहब, ये सीधे-सीधे विदेशी एजेंट बनकर अपने ही देश के खिलाफ ‘इन्फॉर्मेशन वारफेयर’ लड़ना है।
अब ज़रा डॉट्स को कनेक्ट कीजिए, पूरी पिक्चर एकदम शीशे की तरह साफ हो जाएगी। आपने देखा होगी की जब भारत सरकार ने विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों पर सख्ती करी, तो इस लिबरल गैंग के पेट में भयंकर मरोड़ उठने लगे।
रातों-रात ये रोने लगे की “प्रेस की आज़ादी ख़त्म हो गई है”, “तानाशाही आ गई है।”
असल में तानाशाही नहीं आई है, बल्कि इनकी वो ‘विदेशी डॉलर’ वाली पाइपलाइन कट गई है जिस पर इनकी पूरी की पूरी देश-विरोधी दुकान चल रही थी!
