हमारा इतिहास कोई शांति और अहिंसा के भजनों से नहीं लिखा गया है दोस्तों! ये वो इतिहास है जो हमारे पूर्वजों ने अपनी बोटी-बोटी कटवाकर, अपने खून से इस धरती को सींचकर लिखा है।
आज जिस सनातन धर्म के छांव में हम और आप सुरक्षित सांस ले रहे हैं, उसे मिटाने के लिए सदियों पहले एक ऐसा खौफनाक जिहादी तूफान उठा था जिसने पूरे देश में मौत का नंगा नाच शुरू कर दिया था। उस तूफान का नाम था- औरंगजेब!
बात साल 1681 की है। दिल्ली के तख्त पर बैठा वो खूंखार और ज़ालिम मुगल बादशाह अपनी लाखों की जिहादी फौज, हजारों तोपों, हाथियों और अथाह खज़ाने के साथ दक्कन (दक्षिण भारत) की तरफ निकल पड़ा था।
उसके दिमाग में बस एक ही फितूर सवार था.. किसी भी तरह इस मराठा ‘स्वराज्य’ को मिट्टी में मिला दो, इन काफिरों की गर्दनें काट दो और पूरे भारत को शरिया का गुलाम बना दो।
औरंगजेब एक ऐसा वहशी दरिंदा था जिसे हिंदुओं के खून की प्यास थी। ‘दक्कन’ में आते ही मुगलों ने जो कहर बरपाया, वो सोचकर ही रूह कांप जाती है।
वो मराठा साम्राज्य के लिए सबसे भयानक और काला दौर था। हमारे अजेय प्रेरणास्रोत छत्रपति ‘शिवाजी महाराज’ का निधन हो चुका था। उसके बाद उस क्रूर औरंगजेब ने धर्मवीर छत्रपति ‘संभाजी महाराज’ को धोखे से पकड़ लिया।
संभाजी महाराज की आंखें फोड़ दी गईं, उनकी ज़बान काट दी गई, उनकी खाल उधेड़ दी गई, लेकिन उस मराठा शेर ने मरते दम तक अपना सनातन धर्म नहीं छोड़ा।
संभाजी महाराज के उस सर्वोच्च बलिदान के बाद उनके छोटे भाई छत्रपति ‘राजाराम महाराज’ ने मराठा साम्राज्य की कमान संभाली और मुगलों को लोहे के चने चबवाए। लेकिन साल 1700 में बीमारी के कारण राजाराम महाराज का भी निधन हो गया।
ज़रा सोचिए उस वक्त मराठों के कैंप का मंज़र! शिवाजी महाराज नहीं रहे, संभाजी महाराज को बर्बरता से मार डाला गया, और अब राजाराम महाराज भी चल बसे।
पूरा का पूरा मराठा साम्राज्य मानो अनाथ हो गया था। मुगलों के तंबू में तो जैसे दीवाली मनने लगी। औरंगजेब और उसके जिहादी कमांडर खुशी से पागल हो रहे थे।
उन्हें लगा की अब तो मराठों की कमर टूट चुकी है, इनका कोई राजा ही ज़िंदा नहीं बचा, अब तो ये मुट्ठी भर काफिर खुद हमारे पैरों में गिरकर इस्लाम कबूल कर लेंगे या बेरहमी से काट दिए जाएंगे।
लेकिन उन मुगलों और उस अंधे औरंगजेब को ये नहीं पता था कि सह्याद्रि की उन कठोर पहाड़ियों से सनातन की एक ऐसी खौफनाक शेरनी जन्म लेने वाली है, जो मुगलों का सबसे भयानक काल बनेगी।
एक ऐसी शेरनी जिसने मुगलों के उस गुरूर को उसी दक्कन की धूल में ऐसा मिलाया की मुगलिया सल्तनत की नींव ही उखड़ गई।
जब 25 साल की हिन्दू विधवा ने उठाई भवानी तलवार और अपने चार साल के बेटे को गद्दी पर बिठाकर किया जिहादियों के संहार का ऐलान
जब पूरे मराठा कैंप में मातम पसरा हुआ था, बड़े-बड़े सरदार मायूस होकर बैठे थे और सबको लग रहा था की अब आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है, तब राजाराम महाराज की पत्नी और एक 25 साल की हिंदू विधवा ने वो किया जिसने इतिहास की धारा ही पलट कर रख दी।
उस वीरांगना का नाम था- महारानी ताराबाई!
महारानी ताराबाई कोई साधारण राजघराने की नाज़ुक औरत नहीं थीं भाई। उनके रगों में छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे खूंखार और अजेय मुख्य सेनापति ‘सरनोबत हंबीरराव मोहिते’ का खून दौड़ रहा था।
वो बचपन से ही गुड़ियों से नहीं खेली थीं, बल्कि उन्होंने तलवारबाज़ी, घुड़सवारी और युद्धनीति के गुर सीखे थे। उनके डीएनए में ही मुगलों को काटने का जज़्बा कूट-कूट कर भरा था।
जब राजाराम महाराज की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी, तब इस 25 साल की क्षत्राणी ने आंसू बहाने और अपनी किस्मत का रोना रोने के बजाय भवानी तलवार अपने हाथों में उठा ली।
उन्होंने मराठा सरदारों को बुलाया और एक ऐसी दहाड़ लगाई की मुर्दा रगों में भी खून उबलने लगा। ताराबाई ने साफ कह दिया की “मुगलों के आगे घुटने टेकने का सवाल ही पैदा नहीं होता! हम लड़ेंगे और इन जिहादियों को इसी मिट्टी में गाड़ेंगे।”
उन्होंने एक पल की भी देरी किए बिना अपने 4 साल के मासूम बेटे (शिवाजी द्वितीय) को पन्हाला के किले में छत्रपति की गद्दी पर बिठाया और खुद को राजप्रतिनिधि (Regent) घोषित कर दिया।
ज़रा उस पागलपन और उस राष्ट्रभक्ति की कल्पना कीजिए! सामने लाखों की वो मुगल फौज खड़ी है जिसने पूरे उत्तर भारत को रौंद डाला था, और बगावत का झंडा किसने उठाया है? एक 25 साल की विधवा ने जिसके गोद में 4 साल का बच्चा है!
ताराबाई ने मुगलों के खिलाफ आर-पार के महासंग्राम का ऐलान कर दिया। उन्होंने मराठा सरदारों- धनाजी जाधव, परशुराम त्र्यंबक, और संताजी घोरपड़े के भाईयों- को एक धागे में पिरोया और मराठा सेना के अंदर वो आग भर दी की हर एक सैनिक मुगलों का खून पीने के लिए बेताब हो उठा।
मुगलों का वो जिहादी घमंड जो महारानी ताराबाई ने पैरों तले कुचला, जब एक औरत के खौफ से कांप उठी लाखों की मुगलिया फौज
अब ज़रा उस क्रूर औरंगजेब की गलतफहमी और उसके घमंड पर बात करते हैं। वो बुड्ढा औरंगजेब और उसके जिहादी कमांडर औरतों को क्या समझते थे? उनके लिए औरतें सिर्फ हरम की शोभा बढ़ाने या पैरों की जूती थीं।
जब औरंगजेब को पता चला की मराठों की कमान एक औरत ने संभाल ली है, तो वो अपने तंबू में बैठकर जोर-जोर से हंसा था। उसे लगा की अब तो मराठा साम्राज्य को खत्म करने में एक हफ्ता भी नहीं लगेगा।
भला एक नाज़ुक औरत मुगलों की इतनी खौफनाक और भारी-भरकम फौज का सामना कैसे करेगी?
लेकिन औरंगजेब की ये गलतफहमी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी भूल साबित हुई। जब महारानी ताराबाई अपने शाही लिबास को उतारकर, नौ गज की साड़ी को कमर में बांधकर, खुद घोड़े पर सवार होकर मैदान-ए-जंग में उतरीं, तो मुगलों के होश फाख्ता हो गए।
दोनों हाथों में तलवारें लिए जब वो शेरनी अपनी मराठा सेना के आगे-आगे घोड़े दौड़ाती थी, तो बड़े-बड़े खूंखार मुगल कमांडरों की पैंट गीली हो जाती थी।
ताराबाई कोई महल में बैठकर फरमान जारी करने वाली रानी नहीं थीं। वो खुद मोर्चे पर जाती थीं, अपनी सेना के साथ जंगलों में भूखी-प्यासी सोती थीं, कमांडरों की मीटिंग लेती थीं और मुगलों की छावनियों पर हमले का पूरा प्लान खुद डिज़ाइन करती थीं।
अरे भाई, मैं क्या कह रहा हूं, खुद मुगलों के अपने दरबारी इतिहासकार ‘खाफी खान’ ने अपनी डायरी (मुंतखब-उल-लुबाब) में रो-रो कर ताराबाई के खौफ का ज़िक्र किया है।
खाफी खान ने लिखा है- “राजाराम की पत्नी ताराबाई कोई साधारण औरत नहीं है। वो इतनी चालाक और युद्धनीति में इतनी माहिर है की उसने मुगलों की नाक में दम कर रखा है।
उसने मराठों के अंदर ऐसा खौफनाक जज़्बा भर दिया है की हमारे मुगल सेनापति उससे लड़ने से पहले ही हार मान लेते हैं।”
ज़रा सोचिए! मुगलों का अपना इतिहासकार मान रहा है की उनकी लाखों की फौज एक हिंदू औरत के सामने घुटने टेक चुकी है।
जो मुगल कमांडर अपनी छाती ठोकते हुए दिल्ली से दक्कन आए थे, वो अब ताराबाई का नाम सुनते ही थर-थर कांपने लगे थे। ये उस जिहादी घमंड का चकनाचूर होना था जिसने पूरे भारत पर इस्लामी हुकूमत का सपना देखा था।
सह्याद्रि के जंगलों में महारानी ताराबाई ने बिछाई मुगलों की लाशें, ‘गनिमी कावा युद्धनीति’ जिसने जिहादियों को रुला दिए खून के आंसू
महारानी ताराबाई जानती थीं की लाखों की मुगल फौज, भारी तोपखाने और बंदूकधारियों से आमने-सामने के खुले मैदान में लड़ना बेवकूफी होगी।
मुगलों के पास अथाह खज़ाना था, पर मराठों के पास थी सह्याद्रि की वो दुर्गम और खतरनाक पहाड़ियां!
ताराबाई ने छत्रपति शिवाजी महाराज की उसी पुरानी और खौफनाक युद्धनीति ‘गनिमी कावा’ (Guerrilla Warfare यानी छापामार युद्ध) को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
ताराबाई के आदेश पर मराठा सेना छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई। ये मराठे दिन के उजाले में कहीं नज़र नहीं आते थे।
लेकिन जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, ये सह्याद्रि के जंगलों से भूखे भेड़ियों की तरह निकलते और मुगलों के बड़े-बड़े कैंपों पर टूट पड़ते।
मुगलों को समझ ही नहीं आता था की हमला कहां से हो रहा है। मराठे मुगलों के तंबू उखाड़ देते, उनके सेनापतियों की गर्दनें काट देते, खज़ाना लूट लेते और इससे पहले की मुगल सेना पलटवार के लिए तैयार होती, मराठे वापस उन घने जंगलों में भूत की तरह गायब हो जाते।
ताराबाई ने मुगलों की रसद काटने का खौफनाक प्लान बनाया। मुगलों का जो भी राशन दिल्ली या सूरत से आता था, मराठे उसे बीच रास्ते में ही लूट लेते थे।
लाखों की मुगल सेना दक्कन के उन पठारों में भूखी-प्यासी तड़पने लगी। मुगलों के हाथी-घोड़े चारे और पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस कर मरने लगे।
औरंगजेब जिस किले को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता, करोड़ों रुपये फूंक देता और महीनों तक घेरा डालकर बैठता, ताराबाई बहुत ही चालाकी से उस किले को मुगलों के हवाले कर देतीं।
मुगल खुश हो जाते की उन्होंने किला जीत लिया। लेकिन जैसे ही औरंगजेब वहां से आगे बढ़ता, ताराबाई की मराठा सेना कुछ ही दिनों बाद पलटवार करती और मुगलों के पहरेदारों को काटकर उस किले पर दोबारा अपना सनातन का भगवा झंडा गाड़ देती!
औरंगजेब इसी चक्रव्यूह में फंसा रह गया। वो एक किला जीतता, मराठे दूसरा छीन लेते। वो दूसरा जीतता, मराठे पहला वापस छीन लेते।
मुगलों के बड़े-बड़े और खूंखार सिपहसालारों को जंगलों में ऐसा काटा जाने लगा की मुगल सैनिकों में बगावत फैलने लगी।
वो अपने सरदारों से कहने लगे की “हमें वापस दिल्ली ले चलो, हम इस मराठा चुड़ैल (मुगल उन्हें इसी नाम से डरते थे) से नहीं लड़ सकते।”
ताराबाई ने उन जिहादी मुगलों को उसी दक्कन की धूल में ऐसा घिसट-घिसट कर मारा की मुगलों की अर्थव्यवस्था और उनकी सेना की रीढ़ की हड्डी हमेशा-हमेशा के लिए टूट गई।
बचाव नहीं बल्कि सीधा खौफनाक पलटवार, महारानी ताराबाई की सेना ने मालवा और गुजरात में घुसकर मुगलों की छावनियां फूंकी
अब ज़रा महारानी ताराबाई की उस युद्धनीति को समझिए जिसने पूरे मुगल साम्राज्य की रीढ़ की हड्डी तोड़ कर रख दी थी।
आमतौर पर जब कोई छोटा राज्य किसी बड़े और खूंखार दुश्मन से लड़ता है, तो वो सिर्फ अपना बचाव करता है।
वो अपने किलों में छुपकर बैठता है। औरंगज़ेब को भी यही लगा था की ये मराठे बस अपनी जान बचाकर सह्याद्रि की पहाड़ियों में छुपते फिरेंगे।
लेकिन उस घमंडी औरंगज़ेब को इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि वो जिस हिंदू शेरनी से टकराया है, वो सिर्फ बचाव करना नहीं जानती, वो दुश्मन के घर में घुसकर उसकी छाती फाड़ना जानती है।
साल 1705 आते-आते ताराबाई ने मराठा सरदारों की एक गुप्त बैठक बुलाई। उन्होंने डंके की चोट पर ऐलान किया की “अब हम सिर्फ अपने किले नहीं बचाएंगे।
अब हम इन जिहादियों को इनके ही घर में घुसकर मारेंगे। इन्हें पता तो चले की जब मराठों की तलवारें चमकती हैं, तो मौत का खौफ कैसा होता है!”
महारानी ताराबाई ने अपने सबसे खूंखार सरदारों- नेमाजी शिंदे, धनाजी जाधव और खंडेराव दाभाड़े- को आदेश दिया की मराठा घुड़सवारों की एक विशाल सेना लेकर नर्मदा नदी पार कर जाओ।
ये इतिहास का वो सबसे बड़ा और खौफनाक पलटवार था जिसने दिल्ली के तख्त को हिला कर रख दिया।
मराठा सेना आंधी की तरह मालवा, गुजरात और खानदेश के उन इलाकों में घुस गई, जिन्हें मुगलों का सबसे सुरक्षित और अमीर सूबा माना जाता था।
मराठों ने मुगलों की छावनियों में वो आग लगाई की जिहादियों को भागने का रास्ता नहीं मिला। गुजरात और मालवा के वो नवाब और सूबेदार, जो कल तक औरंगज़ेब के नाम की धौंस जमाते थे, वो मराठों के खौफ से अपनी हवेलियां छोड़कर भाग खड़े हुए।
मराठों ने मुगलों के खज़ाने लूट लिए। मुगलों की नाक के नीचे से ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ (एक प्रकार का टैक्स) वसूलना शुरू कर दिया।
जो खज़ाना औरंगज़ेब अपनी सेना को पालने के लिए इस्तेमाल करता था, वो खज़ाना अब मराठों की युद्ध मशीनरी को ताकत दे रहा था।
ज़रा सोचिए इस खौफनाक मंज़र को! एक तरफ औरंगज़ेब दक्कन के जंगलों में मराठों के किले जीतने के लिए अपनी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहा था।
वहीं दूसरी तरफ ताराबाई के मराठा वीर उसी औरंगज़ेब के सबसे अमीर सूबों को जलाकर राख कर रहे थे।
मुगलों को समझ ही नहीं आ रहा था की वो जाएं तो जाएं कहां। शिकारियों का शिकार होना शुरू हो चुका था।
ताराबाई ने मुगलों की अर्थव्यवस्था का वो दिवाला निकाला की मुगल सैनिकों को महीनों तक पगार नहीं मिली और वो बगावत पर उतर आए।
ये थी एक हिंदू रानी की वो आक्रामक और खौफनाक स्ट्राइक जिसने मुगलों की अजेयता को उनके ही जूतों के नीचे कुचल दिया!
दक्कन की धूल फांकता हुआ वो बूढ़ा जिहादी औरंगजेब, जो महारानी ताराबाई के खौफ से अपने तंबू में कीड़े मकोड़ों की तरह मौत के मुंह में समाया
अब ज़रा उस क्रूर, वहशी और हिंदुओं के खून के प्यासे औरंगज़ेब की उस खौफनाक ज़िल्लत पर नज़र डालते हैं, जो इतिहास का सबसे बड़ा न्याय है।
वो औरंगज़ेब जो 1681 में पूरे गाजे-बाजे और लाखों की जिहादी फौज के साथ इस घमंड में दक्कन आया था की वो चंद महीनों में मराठों का नामोनिशान मिटा देगा, वो 27 सालों तक उसी दक्कन की धूल फांकता रह गया।
ज़रा सोचिए एक ऐसे बादशाह की बेबसी को, जिसके नाम से कभी बड़े-बड़े राजा कांपते थे! वो औरंगज़ेब अब एक 89 साल का बुड्ढा और लाचार इंसान बन चुका था।
उसकी लाखों की सेना एक 25 साल की विधवा हिंदू रानी को पकड़ना तो दूर, उसके खौफ से अपने तंबूओं से बाहर निकलने में भी कांपती थी।
मुगलों के ही ऐतिहासिक दस्तावेज़ गवाही देते हैं की अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिनों में औरंगज़ेब डिप्रेशन और खौफ में जी रहा था।
जब रोज़ उसके तंबू में खबरें आती थीं की आज ताराबाई की सेना ने फलां मुगल सूबेदार की गर्दन काट दी, आज मालवा का खज़ाना लूट लिया गया, आज हमारे हज़ार सैनिक मारे गए… तो वो क्रूर बादशाह अपने बाल नोच-नोच कर रोता था।
उसे समझ आ चुका था की उसने सनातन धर्म से पंगा लेकर और एक हिंदू क्षत्राणी की ताकत को कम आंककर अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी गलती कर दी है।
उसके सैनिक भूखे मर रहे थे, खज़ाना पूरी तरह से खाली हो चुका था, और दिल्ली का तख्त उसके हाथों से खिसक रहा था।
जिस औरंगज़ेब ने अपने बाप शाहजहां को पानी की एक बूंद के लिए तरसाया था, अपने भाइयों का कत्ल किया था और लाखों हिंदुओं को बेरहमी से कटवाया था, उस दरिंदे को भगवान ने उसी दक्कन की मिट्टी में वो खौफनाक सज़ा दी जिसे पूरी दुनिया ने देखा।
साल 1707 की शुरुआत! थका हुआ, हारा हुआ, ज़िल्लत की आग में जलता हुआ और खौफ से कांपता हुआ वो जिहादी औरंगज़ेब अहमदनगर (महाराष्ट्र) में अपने बिस्तर पर कीड़े-मकोड़ों की तरह तड़प-तड़प कर मौत के मुंह में समा गया।
ना कोई बड़ी फतह, ना कोई जश्न, और ना ही दिल्ली की वो गद्दी नसीब हुई।
वो आया था मराठा स्वराज्य की कब्र खोदने, लेकिन महारानी ताराबाई ने उस खूंखार औरंगज़ेब और उसके ‘गज़वा-ए-हिंद’ के सपने को उसी दक्कन की ज़मीन में ज़िंदा दफना दिया।
ये सिर्फ एक मुगल बादशाह की मौत नहीं थी, ये इस्लाम के उस क्रूर आक्रांता पर सनातन धर्म की वो सबसे भयंकर और खौफनाक विजय थी, जिसने मुगल साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी थी।
औरंगज़ेब के मरते ही मुगलों का वो घमंड ताश के पत्तों की तरह ढह गया जिसे ताराबाई की तलवारों ने पहले ही खोखला कर दिया था।
