सच बताऊं तो जब भी मैं अपने देश के सिस्टम को देखता हूँ, तो कई बार समझ ही नहीं आता की हम आज़ाद हुए भी हैं या आज भी मानसिक गुलामी की उसी सड़ी हुई जंजीर से बंधे हैं!
हमें किताबों में पढ़ाया गया की “वास्को डी गामा एक बहुत महान खोजकर्ता (Explorer) था, जिसने भारत की खोज की।”
अरे, क्या भारत कोई सुई था जो किसी भूसे के ढेर में खो गया था और इस दाढ़ी वाले डी गामा ने आकर उसे ढूंढ निकाला?
भारत तो उस ज़माने में दुनिया की सबसे अमीर सोने की चिड़िया हुआ करता था। पूरी दुनिया के लुटेरों की लार टपकती थी हमारे देश का खजाना देखकर।
वास्को डी गामा ने भारत की कोई खोज-वोज नहीं की थी, बल्कि उसने यूरोप के लुटेरों के लिए भारत तक पहुँचने और यहाँ डाका डालने के एक समुद्री रास्ते की खोज की थी।
लेकिन हमारे सिस्टम की बेशर्मी तो देखिए!
जिस जल्लाद ने हमारे पूर्वजों के खून से अपने हाथ रंगे, जिसने इंसानियत की सारी हदें पार करते हुए हमारे लोगों को तड़पा-तड़पा कर मारा, उसके ही नाम पे आज हमारे देश में पूरा का पूरा शहर बसा हुआ है!
और इतना ही नहीं, आज पूरे देश में वास्को डी गामा के नाम की ट्रेनें चलती हैं!
आज हम उसी पुर्तगाली दरिंदे वास्को डी गामा का वो काला सच खोलने जा रहे हैं, जिसे हमारे सिस्टम ने किताबों से गायब कर दिया, ताकि हम अपने ही हत्यारे को सिर-आंखों पर बिठाते रहें।
भारत की खोज के नाम पर स्कूलों में रटाया गया इतिहास का सबसे बड़ा झूठ, खूनी दरिंदे ‘वास्को डी गामा’ के भारत आने का असली मक़सद
अगर आप आज भी ये मानते हैं की वास्को डी गामा कोई शांति का दूत या व्यापारी था, तो आप बहुत बड़े मुगालते में जी रहे हैं।
1498 में जब वो पहली बार भारत के कालीकट (केरल) तट पर उतरा था, तो उसके हाथ में कोई गुलाब का फूल नहीं था।
वो बाकायदा पुर्तगाल के राजा का आदेश लेकर, अपनी जहाज़ों पर भारी तोपें और तलवारें लादकर आया था।
उसका मक़सद बहुत ही क्लियर और खौफनाक था- पहला, भारत का खजाना और यहाँ के मसाले लूटना। और दूसरा, तलवार की नोक पर यहाँ के लोगों का धर्म भ्रष्ट करके उन्हें जबरन ईसाई बनाना।
पुर्तगाल के राजा ने उसे साफ आदेश दिया था की जहां भी जाओ, वहां सिर्फ ईसाइयत का झंडा लहराना चाहिए, और जो इसके आड़े आए, उसका नामो-निशान मिटा दो।
वास्को कोई नाविक नहीं था, वो एक क्रूर, खूंखार और सनकी हत्यारा था, जिसे इंसान का खून बहता हुआ देखकर एक अजीब सी ख़ुशी मिलती थी।
ज़रा सोचिए, जो आदमी हमारे देश में सिर्फ लूट-पाट और धर्म बदलने की नीयत से आया था, उसे हमारे इतिहासकारों ने एक ‘महान व्यक्ति’ का दर्ज़ा कैसे दे दिया?
इतिहास में इस बात का बख़ूबी ज़िक्र है की जब वास्को पहली बार कालीकट आया था, तो वहाँ के राजा ज़ामोरिन (Zamorin) ने उसका स्वागत एक मेहमान की तरह किया था।
हमारे देश की तो परंपरा ही है ‘अतिथि देवो भव:’। लेकिन उस ज़हरीले सांप ने उसी राजा की पीठ में छुरा घोंपा।
जब वो वापस पुर्तगाल गया, तो अपने साथ जहाज़ भरकर लूटा हुआ खजाना ले गया और वहाँ जाकर उसने ऐलान कर दिया की भारत को लूटना बहुत आसान है।
और इसके बाद जब वो दूसरी बार (1502 ई. में) भारत आया, तो वो व्यापारी बनकर नहीं, बल्कि मौत का फरिश्ता बनकर आया था।
सात सौ बेगुनाहों को बीच समंदर में जिंदा भून डालने वाला वो खौफनाक दिन जो वास्को डी गामा की हैवानियत का है सबसे बड़ा सुबूत
अब मैं आपको इतिहास की वो घटना बताता हूँ, जिसे पढ़कर शायद आज रात आप सो न पाएं। ये बात 1502 की है।
वास्को डी गामा अपनी दूसरी भारत यात्रा के दौरान 20 हथियारों से लैस जहाज़ों का बेड़ा लेकर अरब सागर से गुज़र रहा था।
तभी उसकी नज़र एक बड़े यात्री जहाज़ पर पड़ी, जिसका नाम ‘मीरी’ (Miri) था। यह जहाज़ मक्का से तीर्थयात्रियों को लेकर वापस भारत (कालीकट) लौट रहा था।
वास्को डी गामा ने तुरंत अपने तोपचियों को आदेश दिया और उस निहत्थे यात्री जहाज़ को चारों तरफ से घेर लिया। आपको पता है उस जहाज़ में कौन थे?
कोई फौजी या हथियारबंद लोग नहीं थे! उसमें करीब 700 आम इंसान थे। औरतें थीं, बूढ़े थे और छोटे-छोटे मासूम बच्चे थे, जो अपनी माओं की गोद में खेल रहे थे।
वास्को के गुंडों ने उस जहाज़ को लूट लिया। जितना भी सोना, चांदी और कीमती सामान था, सब अपने जहाज़ों में भर लिया।
लेकिन वास्को डी गामा की प्यास सिर्फ दौलत से कहाँ बुझने वाली थी। उसे तो खून चाहिए था।
जब उस जहाज़ के लोगों को लगा की अब उन्हें छोड़ दिया जाएगा, तब वास्को ने एक ऐसा खौफनाक आदेश दिया जिसने इंसानियत को हमेशा के लिए शर्मसार कर दिया।
उसने अपने आदमियों से कहा की इस जहाज़ के सारे दरवाज़े बाहर से बंद कर दो ताकि कोई भी बाहर न निकल सके।
इतिहास के पुर्तगाली दस्तावेज़ खुद गवाही देते हैं की उस जहाज़ में मौजूद औरतों ने अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाकर वास्को डी गामा से रहम की भीख मांगी थी।
उन्होंने अपने गहने, बालियां, और जो कुछ भी बचा था, वो सब वास्को के जहाज़ की तरफ फेंक दिया और रोते-रोते गिड़गिड़ाईं की “हमारा सब कुछ ले लो, लेकिन इन मासूम बच्चों की जान बख्श दो।”
लेकिन उस शैतान का दिल बिल्कुल नहीं पसीजा। उसने जहाज़ को बाहर से लॉक करवाया और उसमें आग लगवा दी।
और तो और, जब वो जहाज़ धू-धू कर जल रहा था, अंदर से औरतों और बच्चों की चीखें आसमान फाड़ रही थीं, लोग आग से बचने के लिए समंदर में कूदने की कोशिश कर रहे थे, तो वास्को डी गामा अपने जहाज़ पर खड़ा होकर उन पर गोलियां चलवा रहा था और ठहाके मारकर हंस रहा था।
पूरे के पूरे 700 लोग… 700 ज़िंदा इंसान उस दिन बीच समंदर में तड़प-तड़प कर कोयला बन गए। पानी के ऊपर सिर्फ जली हुई लाशें और मासूम बच्चों के अवशेष तैर रहे थे।
और यह सब किसने किया? उसी ‘महान’ वास्को डी गामा ने, जिसके नाम की कसमें आज हमारा सिस्टम खाता है।
ब्राह्मण दूत के कान काटकर कुत्ते के कान सिलने वाला पुर्तगाली जल्लाद, मासूम मछुआरों पर ढाया गया कहर
अगर आपको लगता है की वास्को डी गामा की दरिंदगी सिर्फ उसी जहाज़ तक सीमित थी, तो आप गलत हैं।
मीरी जहाज़ को राख करने के बाद जब वो कालीकट के तट पर पहुंचा, तो वहाँ के राजा ज़ामोरिन को इस भयानक नरसंहार का पता चल चुका था।
ज़ामोरिन ने युद्ध और खून-खराबा टालने की एक आखिरी कोशिश की। उन्होंने अपने एक मुख्य पुजारी (ब्राह्मण दूत) को वास्को डी गामा के जहाज़ पर बातचीत करने के लिए भेजा।
राजा को लगा की शायद बातचीत से मामला शांत हो जाए। लेकिन वास्को के दिमाग में तो सिर्फ शैतान बैठा था।
जब वो शांतिदूत वास्को के सामने पहुंचा, तो उस दरिंदे ने बिना कोई बात सुने अपने सैनिकों को आदेश दिया की इस आदमी को पकड़ लो।
इसके बाद वास्को ने तलवार से उस निहत्थे दूत के दोनों होंठ और कान खुद अपने हाथों से काट दिए। खून से लथपथ वो दूत दर्द से तड़प रहा था।
लेकिन वास्को का पागलपन यहीं नहीं रुका। उसने अपने सैनिकों से कहकर एक कुत्ते को मरवाया।
उस कुत्ते के कान काटे गए और फिर एक सूई-धागा मंगवाकर, उस शांतिदूत के कटे हुए कानों की जगह उस कुत्ते के कानों को उसके सिर पर सिल दिया गया! फिर उस लहूलुहान दूत को राजा के पास वापस भेज दिया गया ताकि पूरे राज्य में पुर्तगालियों की क्रूरता का खौफ बैठ जाए।
ख़ौफ़ फैलाने का ये सिलसिला लगातार चलता रहा। एक दिन केरल के तट पर कुछ मासूम मछुआरे अपनी छोटी-छोटी नावों में मछली पकड़ रहे थे।
उनका किसी से कोई लेना-देना नहीं था। वास्को डी गामा के सैनिकों ने अचानक उन पर हमला कर दिया। करीब 30-40 मछुआरों को पकड़कर जहाज़ पर लाया गया।
वास्को ने उनके हाथ-पैर काट दिए, उनकी नाक काट दी, और उन कटे हुए इंसानी अंगों को एक नाव में भरकर राजा ज़ामोरिन के महल की तरफ भेज दिया, और साथ में एक पर्ची लिख दी की “इन अंगों से अपने लिए कढ़ी बना लेना।”
जिन निहत्थे मछुआरों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया, जिनका कोई कसूर नहीं था, उनकी चीखें आज भी केरल के उस तट पर गूंजती हैं।
वास्को डी गामा एक साइकोपैथ (Psychopath) था, जिसे दूसरों को तड़पता हुआ देखने में मज़ा आता था।
और आज सबसे बड़ा दुख इस बात का है दोस्त, की हमारी किताबों ने हमें इस हैवानियत के बारे में एक शब्द भी नहीं बताया।
हमारे एजुकेशन सिस्टम ने वास्को डी गामा के इन सारे कुकर्मों पर ‘भारत की खोज’ नाम का एक ऐसा पर्दा डाल दिया, जिसके नीचे हमारे पूर्वजों का खून आज भी रिस रहा है।
धर्म न बदलने पर हमारे पूर्वजों के पिलास से खींचे गए नाखून, उंगलियां कुचलने वाले गोवा इनक्विजिशन का रोंगटे खड़े कर देने वाला काला सच
वास्को डी गामा ने भारत में जिस बर्बरता और खौफ का बीज बोया था, उसने आगे चलकर एक ऐसे ज़हरीले पेड़ का रूप लिया जिसकी छांव में लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ।
वास्को के जाने के बाद उसके साथी पुर्तगालियों ने गोवा पर कब्ज़ा जमा लिया। और फिर भारत पहुंचा क्रूरता का दूसरा बड़ा चेहरा- ईसाई मिशनरी ‘फ्रांसिस ज़ेवियर’ (Francis Xavier)।
इसी फ्रांसिस ज़ेवियर की मांग पर पुर्तगाल के राजा ने 1560 में गोवा में ‘इनक्विजिशन’ (Goa Inquisition) यानी ‘धार्मिक अदालत’ की शुरुआत की।
दोस्त, कहने को तो ये एक अदालत थी, लेकिन असल में ये मौत और टॉर्चर का वो खौफनाक कारखाना था जिसके आगे हिटलर के नाज़ी कैंप भी छोटे पड़ जाएं।
इस इनक्विजिशन का इकलौता मक़सद था- गोवा के हिन्दुओं का सनातन धर्म मिटाकर उन्हें जबरन ईसाई बनाना।
अगर कोई हिन्दू अपना धर्म छोड़ने से मना कर देता, या कोई नया बना ईसाई छुपकर अपने पुराने हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करता हुआ पकड़ा जाता, तो उसे इस अदालत में लाया जाता था।
यहाँ जो टॉर्चर दिए जाते थे, उनके बारे में पढ़कर ही इंसान का दिमाग सुन्न हो जाता है।
ज़रा सोचिए, उंगली में एक छोटा सा कांटा चुभ जाए तो हमारी जान निकल जाती है। पुर्तगाली दरिंदे क्या करते थे?
जो हिन्दू ईसाई बनने से इंकार करते थे, उनके हाथों और पैरों की उंगलियों को भारी लोहे के औजारों में फंसाया जाता था और पिलास (Pliers) से उनके एक-एक नाखून को शरीर से नोच कर निकाल लिया जाता था!
खून से लथपथ वो इंसान दर्द से तड़पता रहता, चीखता रहता, लेकिन ये जल्लाद उसके सामने क्रॉस (Cross) रखकर कहते की “अब भी ईसाई बन जा, वरना आगे और दर्द मिलेगा।”
इन्होंने टॉर्चर के ऐसे-ऐसे तरीके ईजाद किए थे जो सीधे शैतान के दिमाग की उपज थे। एक तरीका था ‘पेस्टल एंड मोर्टार’ (Pestle and Mortar)।
इसमें खासकर हिन्दू पुजारियों और ब्राह्मणों की उंगलियों को लोहे के भारी खांचे में रखकर तब तक कुचला जाता था, जब तक की उंगलियों की हड्डियां चूर-चूर न हो जाएं और खून की एक-एक बूंद न निकल जाए।
एक और मशीन थी जिसे ‘हिन्दू रैक’ (Hindu Rack) कहा जाता था। इस मशीन पर हिन्दुओं को बांधकर उनके हाथ-पैर विपरीत दिशाओं में इतनी बेरहमी से खींचे जाते थे कि इंसान की हड्डियां उसके जोड़ों (Joints) से टूटकर बाहर आ जाती थीं।
लोग तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देते थे, लेकिन इन पुर्तगालियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी।
घर में तुलसी रखने पर दी जाती थी फांसी, सैकड़ों प्राचीन मंदिरों को बम से उड़ाकर पुर्तगालियों ने गोवा को बना दिया था शमशान
ये सिर्फ इंसानों को मारने का अभियान नहीं था। ये हमारी पूरी की पूरी संस्कृति, हमारी भाषा और हमारी पहचान को जड़ से मिटाने का एक खौफनाक सांस्कृतिक नरसंहार था।
पुर्तगाली अच्छी तरह जानते थे कि जब तक हिन्दू अपनी संस्कृति से जुड़ा है, उसे पूरी तरह से गुलाम नहीं बनाया जा सकता।
इसलिए गोवा में बाकायदा फरमान जारी कर दिए गए। सबसे बड़ा निशाना बनी हमारी पवित्र ‘तुलसी’। हिन्दू घरों के आंगन में तुलसी का पौधा होना आम बात है, लेकिन पुर्तगालियों ने इस पर सख्त बैन लगा दिया।
अगर किसी के घर में तुलसी का पौधा मिल जाता या कोई उसकी पूजा करता हुआ दिख जाता, तो उसे सरेआम फांसी दे दी जाती थी।
और कई बार तो सज़ा इतनी खौफनाक होती थी की उस इंसान के गले में तुलसी के पत्ते तब तक ठूंसे जाते थे जब तक की उसका दम न घुट जाए और वो तड़प कर मर न जाए।
इन्होंने हमारे पहनावे तक पर पाबंदी लगा दी। कोई भी आदमी धोती नहीं पहन सकता था, औरतें चोली नहीं पहन सकती थीं।
माथे पर तिलक लगाना एक बहुत बड़ा अपराध घोषित कर दिया गया। हमारी मातृभाषाओं- कोंकणी और मराठी- के बोलने पर बैन लगा दिया गया और पुर्तगाली भाषा थोप दी गई।
जिन हिन्दुओं ने इसका विरोध किया, उनके मुंह में जबरन गौमांस (Beef) ठूंस दिया गया ताकि उनका धर्म हमेशा के लिए भ्रष्ट हो जाए।
और मंदिरों का जो हाल इन्होंने किया, वो तो इतिहास का सबसे बड़ा घाव है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ गवाह हैं की पुर्तगालियों ने गोवा के 280 से ज़्यादा भव्य, सुंदर और प्राचीन हिन्दू मंदिरों को बारूद और तोपों से उड़ा दिया।
मंदिरों की मूर्तियों को सड़कों पर फेंका गया, उन्हें तोड़ा गया और उन मंदिरों के मलबे के ठीक ऊपर बड़े-बड़े चर्च खड़े कर दिए गए।
आज जो गोवा आपको टूरिस्ट डेस्टिनेशन और पार्टियों का अड्डा लगता है ना, दरअसल वो हमारे पूर्वजों की लाशों और तोड़े गए मंदिरों के शमशान पर खड़ा है।
जिस हत्यारे के हाथ हमारे पूर्वजों के खून से हैं सने, आज उसी वास्को डी गामा के नाम पर वीआईपी ट्रेनें और शहर ढो रहा है हमारा मानसिक गुलाम सिस्टम
इतिहास का वो दर्दनाक पन्ना तो हमने पलट लिया, लेकिन अब आते हैं आज की सच्चाई पर। आज़ाद भारत की सच्चाई। भाईसाहब, इस देश के सेक्युलर सिस्टम और सरकारों का दोगलापन देखकर सच में खून खौल उठता है।
जिस वास्को डी गामा ने हमारे देश में आकर खौफ का वो नंगा नाच शुरू किया, जिसने औरतों और मासूम बच्चों को बीच समंदर में ज़िंदा जलाया, जिसके इशारे पर हमारे पूर्वजों के पिलास से नाखून खींचे गए… आज आज़ाद भारत में हम उसके साथ क्या सुलूक कर रहे हैं? हम आज भी उस जल्लाद को सिर-आंखों पर बिठाकर घूम रहे हैं!
आपको जानकर शर्म आएगी की आज भी गोवा के सबसे बड़े, सबसे अहम और कमर्शियल शहरों में से एक का नाम बाकायदा ‘वास्को डी गामा’ (Vasco da Gama – VSG) है।
पूरा का पूरा शहर उस कातिल के नाम पर बसा हुआ है! और हद तो तब हो गई जब हमारी अपनी ‘भारतीय रेलवे’ ने इस बेशर्मी को एक कदम और आगे बढ़ा दिया।
हमारे टैक्स के पैसों से चलने वाली रेलगाड़ियों के नाम इस हत्यारे के नाम पर रखे गए हैं। दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन से एक ट्रेन चलती है ‘गोवा एक्सप्रेस’, जो सीधा ‘वास्को डी गामा’ स्टेशन जाकर रुकती है।
इसके अलावा ‘पटना – वास्को डी गामा सुपरफास्ट एक्सप्रेस (12741)’, ‘यशवंतपुर – वास्को डी गामा एक्सप्रेस’… स्टेशनों पर लाउडस्पीकर में रोज़ आवाज़ गूंजती है की “वास्को डी गामा जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर एक पर आ रही है।”
ज़रा सोचिए यार, ये कैसी आज़ादी है हमारी? दुनिया के किस स्वाभिमानी देश में अपने ही हत्यारों का नाम जपा जाता है? क्या इज़राइल में आपको कभी हिटलर के नाम पर कोई शहर या ट्रेन मिलेगी?
क्या अमेरिका में ओसामा बिन लादेन के नाम पर कोई सड़क मिलेगी? नहीं ना! तो फिर भारत में वास्को डी गामा के नाम पर शहर और ट्रेनें कैसे चल सकती हैं?
ये हमारी मानसिक गुलामी और इस सेक्युलर सिस्टम की सड़ी हुई मानसिकता का सबसे भद्दा और घिनौना रूप है, जो हर रोज़ हमारे स्वाभिमान को तार-तार करता है।
जब दिल्ली में राजपथ का नाम ‘कर्तव्य पथ’ हो सकता है, जब औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखा जा सकता है, जब मुगलों की निशानियों को मिटाया जा रहा है… तो फिर गोवा से वास्को डी गामा का नाम क्यों नहीं मिटाया जा सकता?
उस खूनी दरिंदे का नाम स्टेशनों के बोर्ड से, ट्रेनों के नाम से और गोवा के नक़्शे से हमेशा-हमेशा के लिए उखाड़ कर फेंक देना चाहिए।
वहां नाम होना चाहिए उन वीर मराठों का, छत्रपति शिवाजी महाराज का या उन गुमनाम हिन्दुओं का जिन्होंने धर्म के लिए अपने नाखून तो खिंचवा लिए लेकिन अपना शीश नहीं झुकाया।
