Author name: संदीप (शिवा) | संस्थापक – लोगसभा

जिसकी जहाँ आस्था होगी, वही जाएँगे! चार यात्राएँ एक मजार तक, सत्ता के वर्षों में राम जन्मभूमि तक कोई नहीं

कोई बच्चा घर में पूछता है: आस्था किसे कहते हैं। बड़े व्यक्ति उत्तर देते हैं, जहाँ मन झुकता है। फिर वही बच्चे स्कूल में नक्शा देखते हैं। एक तीर काबुल जाता है। एक तीर अयोध्या जाता है। तीर का रंग परिवार के पासपोर्ट से ज्यादा सच बोलता है। स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे शासन वाले […]

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बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 2- 2014 में मोदी जी को ‘चायवाला’ बोलकर ‘मणिशंकर अय्यर’ ने कैसे थाली में सजाकर बीजेपी को दे दिया एक आम हिंदुस्तानी का वोटबैंक

राजनीति में एक बात कही जाती है की बीजेपी तो चुनाव जीतने की मशीन बन चुकी है। कुछ लोगों को लगता है की बीजेपी के पास कोई ऐसी जादुई छड़ी या चमत्कारी फॉर्मूला है की वो कभी चुनाव हार ही नहीं सकती। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बहुत अलग है। सच कहूं तो बीजेपी कोई अजेय

बीजेपी अजेय नहीं विपक्ष ही अनाड़ी है, Episode 2- 2014 में मोदी जी को ‘चायवाला’ बोलकर ‘मणिशंकर अय्यर’ ने कैसे थाली में सजाकर बीजेपी को दे दिया एक आम हिंदुस्तानी का वोटबैंक Read More »

लाल बहादुर शास्त्री और सन् 1965 का साहस

सोमवार की शाम है। शहर युद्ध में है, पर होटल का शटर पहले गिर रहा है। रसोई में चूल्हा ठंडा छोड़ दिया गया है। बच्चा पूछता है कि दूसरी रोटी कहाँ है। माँ कहती है, आज प्रधानमंत्री ने भी नहीं खाई। सीमा पर उस शाम टैंक की आवाज है। बंदरगाह पर उस शाम जहाज की

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गोरखा अलग गोरखालैंड क्यों माँगते हैं? पश्चिम बंगाल का सबसे पुराना अधूरा सवाल

कलकत्ता के एक दफ्तर में बाबू नेपाली सरनेम देखकर रुक जाता है। पहाड़ का आदमी पासपोर्ट निकालता है। रेजिमेंट की पट्टियाँ निकालता है। फिर भी सवाल वही रहता है: आप कहाँ के हैं। गोरखालैंड इसी क्षण से पैदा होता है। राज्य की माँग नक्शे की माँग से पहले पहचान की रसीद है। 22 अगस्त 2026

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15 साल संघ, 15 साल संगठन और 15 साल सत्ता का महाज्ञान, आज के कमज़ोर विपक्ष के सामने मोदी का 45 साल का अनुभव बन गया जनता के मन को पढ़ने का ‘ब्रह्मास्त्र’

आज के दौर की राजनीति देखकर कभी-कभी बहुत हंसी आती है। आज नेताओं को लगता है की Twitter पर दो-चार तीखे पोस्ट कर दिए, या टीवी डिबेट में आकर चिल्ला दिए, तो बस बन गए ‘मास लीडर’! चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाले इन हवा-हवाई नेताओं को लगता है की राजनीति में

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सबसे बड़ा पाप कमज़ोरी है: विजय इतिहास लिखती है, कमज़ोरी राष्ट्र की नियति

रात के दो बजे तराजू बोलती है। झंडा नहीं बोलता। मंदिर नहीं बोलता। तिमाही का अंक नहीं बोलता। तराजू केवल इतना पूछती है कि इस घर को लेने की क़ीमत क्या है। क़ीमत सस्ती हो तो घर बिक चुका। क़ीमत महँगी हो तो घर बचा हुआ। इतिहास इसी तराजू का रजिस्टर है। कुछ सौ अजनबी

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एक अजनबी महाद्वीप पार कर कामरूप आया: ह्वेनसांग की नजर से भास्करवर्मन का दरबार और प्राचीन असम का सच्चा बयान

तेजपुर के पास एक गाँव है, दह परबतिया। ऊपर अहोम काल की ईंट का मंदिर भूकंप में गिरा। नीचे एक प्रस्तर द्वारपट निकला, लगभग छठी सदी का। गुप्त छाया वाला अलंकरण। शिव का नाम द्वार पर चिल्लाता नहीं। पत्थर चुपचाप कहता है कि इस घाटी में देवस्थान राजवंश की अंतिम कथा से पहले खड़ा था।

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कार्तिकेय के उपासक यौधेय: राजपूत परंपरा की प्राचीन जड़ें

सतलुज और यमुना के बीच की पुरानी धरती आज भी चुपचाप बोलती है। कभी-कभी एक किसान की फावड़े में तांबे की छोटी मुद्रा चिपक जाती है। उस पर एक युवा देवता खड़े होते हैं। हाथ में भाला। चरणों में मोर। किनारे पर ब्राह्मी अक्षरों में लिखा होता है: यौधेय गणस्य जय। यह मुद्रा किसी राजा

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सिद्धराज जयसिंह के पास सेना थी, झील थी, रुद्रमहालय था – फिर भी उन्होंने अमरता के लिए एक व्याकरण चुना और श्रेय बाँट लिया

पत्थर की दीवारें समय के सामने झुक जाती हैं। झीलें सूख जाती हैं। विजय स्तंभ भी एक दिन खंडहर बन जाते हैं। फिर भी राजा लोग इन्हीं चीजों में अपनी अमरता ढूँढते रहे। बारहवीं सदी के गुजरात में एक शैव राजा ने अलग रास्ता चुना। सिद्धराज जयसिंह के पास सेना थी, धन था और भव्य

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पवित्र ऊंचाई पर संकट: तुंगनाथ मंदिर का झुकाव, रौंदे जाते अल्पाइन मैदान और हिमालय की अंतिम चेतावनी

हिमालय की गोद में, बादलों से भी ऊंचे, एक छोटा सा पत्थर का मंदिर सदियों से खड़ा है। तुंगनाथ। दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर। जहां पांडवों ने शिव की भुजाओं की पूजा की थी, जहां सर्दियों में छह महीने तक सन्नाटा छाया रहता था, और जहां बुग्यालों की मुलायम घास पर हिमालयन मोनाल की

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