Author name: संदीप (शिवा) | संस्थापक – लोगसभा

नीलाचल पर मां की दिव्य लीला: अम्बुबाची मेला शक्ति, रहस्य और भक्ति का अनुपम संगम

नीलाचल पर मां की दिव्य लीला: अम्बुबाची मेला शक्ति, रहस्य और भक्ति का अनुपम संगम

नीलाचल पहाड़ियों पर मानसून की पहली झड़ी पड़ते ही ब्रह्मपुत्र नदी का जल लाल हो उठता है। हजारों भक्तों के जयकारों से आसमान गूंज उठता है। गेरुए वस्त्रों में साधु, मां के नाम का जप करते परिवार और दिव्य ऊर्जा से भरा वातावरण यह दृश्य देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। यह है पूर्वोत्तर भारत […]

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2600 वर्ष पहले का भारतीय सर्जन: सुश्रुत और उनकी अमर संहिता

2600 वर्ष पहले का भारतीय सर्जन: सुश्रुत और उनकी अमर संहिता

कल्पना कीजिए, २६०० वर्ष पहले गंगा के पावन तट पर काशी की प्राचीन गुरुकुल भूमि। एक ब्राह्मण ऋषि-चिकित्सक सुश्रुत अपने शिष्यों के सामने खड़े हैं। उनके हाथ में एक तीखा यंत्र है और सामने एक रोगी जिसकी नाक युद्ध में कट गई है। कुछ ही घंटों में सुश्रुत उसकी नाक को नए सिरे से गढ़

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नर्रई नाला की शहीद रानी: दुर्गावती की वीर गाथा

भारत की धरती वीरों और वीरांगनाओं की गाथाओं से भरी पड़ी है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी हैं जो सदियों बाद भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। 16वीं शताब्दी में, जब मुगल साम्राज्य अपना विस्तार कर रहा था, तब एक राजपूत-गोंड रानी ने तलवार उठाई। वह रानी दुर्गावती थीं। कालिंजर किले में जन्मी यह शेरनी गोंडवाना

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कमजोर मानसून और एल नीनो की आहट: 2026 सूखे का साल तो नहीं?

कमजोर मानसून और एल नीनो की आहट: 2026 सूखे का साल तो नहीं?

कल्पना कीजिए वर्ष 1899 की एक गर्म दोपहर। मध्य भारत के एक गांव में किसान अपनी सूखी ज़मीन को देखकर आंसू पोछ रहा है। जहां कभी हरी-भरी फसलें लहराती थीं, वहां अब सिर्फ फटी धरती और मुरझाए पौधे बाकी हैं। मानसून ने साथ छोड़ दिया था। लाखों परिवार भूख और प्यास की मार झेल रहे

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पंचांग और ब्रह्मांड का सामंजस्य: प्राचीन भारत की खगोलीय विरासत

कल्पना कीजिए कि सदियों पहले एक शांत भारतीय गांव में साफ रात के आसमान के नीचे एक युवा विद्वान खड़ा है। वह ऊपर देखता है, चंद्रमा की चमकती किनारी को एक परिचित नक्षत्र समूह के सामने ट्रेस करता है और चुपचाप उस दिन का पंचांग नोट करता है। बिना किसी आधुनिक उपकरण के वह जान

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संख्याओं का पागल जीनियस: दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर और 6174 की अनकही दास्तान

संख्याओं का पागल जीनियस: दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर और 6174 की अनकही दास्तान

कल्पना कीजिए, आप एक साधारण चार अंकों की संख्या लेते हैं – जैसे 2025। अब उसके अंकों को उलट-पुलटकर सबसे बड़ी और सबसे छोटी संख्या बनाते हैं, फिर घटाते हैं। कुछ चरणों के बाद एक जादुई संख्या सामने आती है – 6174। फिर चाहे आप कुछ भी करें, यह संख्या खुद को दोहराती रहती है।

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ब्रिटिश संस्थाओं का कलंक: नस्लवाद के डर में ग्रूमिंग गैंगों को संरक्षण देने वाले अब बेनकाब

कल्पना कीजिए एक मां की, जिसकी 13 साल की बेटी घर से निकलकर कभी वापस नहीं आई। वर्षों तक वह इंतज़ार करती रही, पुलिस के दरवाज़े खटखटाती रही, लेकिन जवाब मिला सिर्फ चुप्पी। आज, 2026 में, उस चुप्पी को तोड़ने की कोशिश हो रही है। यूनाइटेड किंगडम ने ऑपरेशन बीकनपोर्ट के तहत ग्रूमिंग गैंग के

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विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन: राष्ट्र की बौद्धिक शक्ति का जीवंत केंद्र

विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन: राष्ट्र की बौद्धिक शक्ति का जीवंत केंद्र

जब स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की मिट्टी पर खड़े होकर विश्व को भारत की सनातन चेतना का संदेश दिया था, तब शायद उन्होंने यह भी कल्पना की होगी कि एक दिन उनका नाम एक ऐसे संस्थान से जुड़ेगा जो भारत को आधुनिक दुनिया की जटिल चुनौतियों से निपटने की रणनीति सिखाएगा। विवेकानंद इंटरनेशनल

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एक ईमानदार इंजीनियर की अनकही कहानी: सत्येंद्र नाथ दुबे

एक ईमानदार इंजीनियर की अनकही कहानी: सत्येंद्र नाथ दुबे

रात के अंधेरे में एक युवा इंजीनियर अपनी डायरी में कुछ शब्द लिख रहा था। “मैं चुप नहीं रह सकता। देश का पैसा लुट रहा है और सड़कें मौत का जाल बन रही हैं।” यह सिर्फ एक नोट नहीं था। यह एक ईमानदार आत्मा की पुकार थी जो भ्रष्टाचार के अंधेरे को चुनौती दे रही

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निमुफूइच्छु की धारा में अमर हुआ कर्तव्य: लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी

निमुफूइच्छु की धारा में अमर हुआ कर्तव्य: लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी

जब देश की सीमा पर कर्तव्य पुकारता है, तो कुछ सपूत बिना सोचे अपनी जान न्योछावर कर देते हैं। लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी उसी अनोखी परंपरा के वीर पुत्र थे। अयोध्या की पावन भूमि से उठकर वे सिक्किम की बर्फीली चोटियों पर पहुंचे और एक साधारण गश्त को अमर बलिदान में बदल दिया। उनकी शहादत हमें

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