Author name: संदीप (शिवा) | संस्थापक – लोगसभा

गोरखा अलग गोरखालैंड क्यों माँगते हैं? पश्चिम बंगाल का सबसे पुराना अधूरा सवाल

कलकत्ता के एक दफ्तर में बाबू नेपाली सरनेम देखकर रुक जाता है। पहाड़ का आदमी पासपोर्ट निकालता है। रेजिमेंट की पट्टियाँ निकालता है। फिर भी सवाल वही रहता है: आप कहाँ के हैं। गोरखालैंड इसी क्षण से पैदा होता है। राज्य की माँग नक्शे की माँग से पहले पहचान की रसीद है। 22 अगस्त 2026 […]

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15 साल संघ, 15 साल संगठन और 15 साल सत्ता का महाज्ञान, आज के कमज़ोर विपक्ष के सामने मोदी का 45 साल का अनुभव बन गया जनता के मन को पढ़ने का ‘ब्रह्मास्त्र’

आज के दौर की राजनीति देखकर कभी-कभी बहुत हंसी आती है। आज नेताओं को लगता है की Twitter पर दो-चार तीखे पोस्ट कर दिए, या टीवी डिबेट में आकर चिल्ला दिए, तो बस बन गए ‘मास लीडर’! चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाले इन हवा-हवाई नेताओं को लगता है की राजनीति में

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सबसे बड़ा पाप कमज़ोरी है: विजय इतिहास लिखती है, कमज़ोरी राष्ट्र की नियति

रात के दो बजे तराजू बोलती है। झंडा नहीं बोलता। मंदिर नहीं बोलता। तिमाही का अंक नहीं बोलता। तराजू केवल इतना पूछती है कि इस घर को लेने की क़ीमत क्या है। क़ीमत सस्ती हो तो घर बिक चुका। क़ीमत महँगी हो तो घर बचा हुआ। इतिहास इसी तराजू का रजिस्टर है। कुछ सौ अजनबी

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एक अजनबी महाद्वीप पार कर कामरूप आया: ह्वेनसांग की नजर से भास्करवर्मन का दरबार और प्राचीन असम का सच्चा बयान

तेजपुर के पास एक गाँव है, दह परबतिया। ऊपर अहोम काल की ईंट का मंदिर भूकंप में गिरा। नीचे एक प्रस्तर द्वारपट निकला, लगभग छठी सदी का। गुप्त छाया वाला अलंकरण। शिव का नाम द्वार पर चिल्लाता नहीं। पत्थर चुपचाप कहता है कि इस घाटी में देवस्थान राजवंश की अंतिम कथा से पहले खड़ा था।

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कार्तिकेय के उपासक यौधेय: राजपूत परंपरा की प्राचीन जड़ें

सतलुज और यमुना के बीच की पुरानी धरती आज भी चुपचाप बोलती है। कभी-कभी एक किसान की फावड़े में तांबे की छोटी मुद्रा चिपक जाती है। उस पर एक युवा देवता खड़े होते हैं। हाथ में भाला। चरणों में मोर। किनारे पर ब्राह्मी अक्षरों में लिखा होता है: यौधेय गणस्य जय। यह मुद्रा किसी राजा

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सिद्धराज जयसिंह के पास सेना थी, झील थी, रुद्रमहालय था – फिर भी उन्होंने अमरता के लिए एक व्याकरण चुना और श्रेय बाँट लिया

पत्थर की दीवारें समय के सामने झुक जाती हैं। झीलें सूख जाती हैं। विजय स्तंभ भी एक दिन खंडहर बन जाते हैं। फिर भी राजा लोग इन्हीं चीजों में अपनी अमरता ढूँढते रहे। बारहवीं सदी के गुजरात में एक शैव राजा ने अलग रास्ता चुना। सिद्धराज जयसिंह के पास सेना थी, धन था और भव्य

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पवित्र ऊंचाई पर संकट: तुंगनाथ मंदिर का झुकाव, रौंदे जाते अल्पाइन मैदान और हिमालय की अंतिम चेतावनी

हिमालय की गोद में, बादलों से भी ऊंचे, एक छोटा सा पत्थर का मंदिर सदियों से खड़ा है। तुंगनाथ। दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर। जहां पांडवों ने शिव की भुजाओं की पूजा की थी, जहां सर्दियों में छह महीने तक सन्नाटा छाया रहता था, और जहां बुग्यालों की मुलायम घास पर हिमालयन मोनाल की

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सोने का सिंहासन छोड़ पहनी ’10 पैरा कमांडो’ की वर्दी, 1971 में बिना टैंक और हवाई मदद के पाकिस्तान में 80 किलोमीटर अंदर घुसकर दुश्मनों की कब्र खोदने वाले भारत के अंतिम महाराजा ‘सवाई भवानी सिंह’

5 दिसंबर 1971 की रात थार का रेगिस्तान चुप था। जोंगा और जीपों की एक पतली कतार सीमा पार कर अंदर घुस रही थी। इंजन धीमे थे। रोशनी बंद थी। अस्सी किलोमीटर दुश्मन के इलाके में वे लोग जा रहे थे जिनके पास न टैंक था, न हवाई छत्र। कतार के आगे बैठे अफसर को

सोने का सिंहासन छोड़ पहनी ’10 पैरा कमांडो’ की वर्दी, 1971 में बिना टैंक और हवाई मदद के पाकिस्तान में 80 किलोमीटर अंदर घुसकर दुश्मनों की कब्र खोदने वाले भारत के अंतिम महाराजा ‘सवाई भवानी सिंह’ Read More »

विपक्ष नहीं बल्कि ये सायरन वाला ‘VIP कल्चर’ मार रहा बीजेपी के पैरों पर कुल्हाड़ी, उत्तराखंड BJP को टैक्स देने वाली पब्लिक को रोड ब्लॉक करके धूप और बारिश में तड़पाना डुबोएगा इन नेताओं की लुटिया

सुबह की धूप तेज है। देहरादून से मसूरी जाने वाली सड़क पर गाड़ियों की कतार खड़ी है। एक स्कूल बस में बच्चे बेचैन हो रहे हैं। बगल में एक ऑटो वाला बार-बार घड़ी देख रहा है। दूर से सायरन की आवाज आती है। लोग सोचते हैं शायद एंबुलेंस है। रास्ता खुल जाएगा। लेकिन सामने से

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लखनऊ का सबक: भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को योगी आदित्यनाथ से क्यों सीखना चाहिए

सत्ता लंबे समय तक चलने के बाद एक खास बीमारी पैदा करती है। ऊपर बैठे लोग धीरे-धीरे जमीन की आवाज सुनना बंद कर देते हैं। वे अपनी सफलता के शोर में खो जाते हैं। फीडबैक कमजोर पड़ जाता है। फैसले देर से होते हैं। और एक दिन अचानक चुनाव या सड़क का गुस्सा याद दिलाता

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